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मंजिल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र न थे

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 2, 2020
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मंजिल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र न थे

गुरूचरण सिंह

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हर राष्ट्रीय पर्व पर यह अहसास कुछ और गहरा जाता है. विभाजन की त्रासदी के बावजूद कुछ सपने देखे गए थे, उनके टूटने की आवाज़ डराने लगती है. बांस की फांस-सी दिल में कहीं गहरे उतर जाती है. सड़कों, बड़ी-बड़ी इमारतें, सिकुड़ते गांंवों और पैर पसारते शहरों/स्मार्ट शहरों, मोबाइल, टीवी और नफा-नुकसान के हिसाब से चलते देश के बावजूद बदला तो असल में कुछ भी नहीं है.

कल तक हम अंग्रेजों की गुलामी करते थे और आज उन्हीं के तलवे चाट कर बड़ी हुई एक जमात के जोर-जुल्म और मनमानियां बरदाश्त कर रहे हैं. जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई को कमजोर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, शहीदों के खिलाफ मुखबिरी की, उनके खिलाफ कोर्ट में गवाही दी, माफी मांगी इस लडाई में भाग लेने के लिए, अच्छी खासी पेंशन पाई, वही लोग आज देशभक्ति और गद्दारी के सर्टिफिकेट बांट रहे हैं !!

कोई हैरानी नहीं कि गणतंत्र दिवस पर सम्मानित किए जाने वाले लोगों की सूची में कभी किसी ‘आतंकवादी’ का नाम नहीं होता. आतंकवादियों से मेरा आशय उन शहीदों से है, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र मुहिम छेड़ी थी ! असफल सशस्त्र क्रांति को तो वैसे भी हर मुल्क और हर दौर में आतंकवाद ही कहा जाता है. इतना भी कम है क्या कि उन्हें ‘शहीद’ कह कर कम से कम फूलमाला तो पहना दी जाती है.

जरा सोचिए अगर नेताजी सुभाष चंद्र बोस सफल हो गए होते तो ? हिंदोस्तान रिपब्लिक आर्मी, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और उनके हजारों साथी अगर अपने मकसद में कामयाब हो गए होते तो ? नहीं सोच पाएंगे आप क्योंकि आपके दिमाग को तो एक खास किस्म की शिक्षा और प्रचार से कंडीशंड कर दिया गया है. अप्रैल-मई, 2016 तक तो दिल्ली यूनिविर्सटी की एक पाठ्य पुस्तक ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ में शहीद भगत सिंह को जगह-जगह ‘क्रांतिकारी आतंकवादी’ कहा गया था.

इन्हीं क्रांतिकारियों के नाम से संघ-भाजपा नेहरू और गांधी को हमेशा से ही गरियाते रहे हैं, लेकिन लगभग 12 साल तक सत्ता में रहने के बावजूद इन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया. याद दिला दें कि जिस पाकिस्तान को संघ-भाजपा रात दिन गरियाती रहती है, उसकी सरकार तो पहले ही भगत सिंह को शहीद का दर्जा दे चुकी है और लाहौर का एक चौक भी उसके नाम पर है.

देश के नौजवानों के नाम 2 फरवरी, 1931 को लिखा गया भगत सिंह का यह खत खास तौर पर गौर किए जाने के लायक है : ‘ये बात प्रसिद्ध है कि मैं आतंकवादी रहा हूं ! लेकिन मैं आतंककारी नहीं हूं, मैं तो एक क्रान्तिकारी हूं जिसके कुछ निश्चित विचार और निश्चित आदर्श हैं और जिसके सामने एक लंबा कार्यक्रम है. मुझे ये दोष दिया जायेगा, जैसा कि लोग रामप्रसाद बिस्मिल को भी देते थे कि फांसी की काल कोठरी में पड़े रहने से मेरे विचारों में भी कोई बदलाव आ गया है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. मेरे विचार अब भी वही हैं, मेरे हृदय में अब भी उतना ही और वैसा ही उत्साह है और वही लक्ष्य है, जो जेल से बाहर था. पर मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हम बम से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सकते. ये बात हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के इतिहास से आसानी से मालूम हो जाती है. केवल बम फेंकना ना सिर्फ बेकार है, बहुत बार हानिकारक भी है. उनकी आवश्यकता किन्हीं खास अवस्थाओं में ही पड़ती है. हमारा मुख्य लक्ष्य तो मज़दूरों और किसानों का संगठन होना चाहिए.’

इसकी बजाए हुआ क्या ? देश के 63 व्यक्तियों के कारोबार की राशि तो दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मुल्क के बजट से भी ज्यादा हो गई. तीन करोड़ से अधिक लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हो गए. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं आज भी आबादी के एक बड़े हिस्से की पहुंच के बाहर हैं. जेब में पैसा है तो लो नहीं तो भाड़ में जाओ- यही है मूलमंत्र नई व्यवस्था का. इन सारी समस्याओं को भूल कर जय श्री राम बोलो, भगवा हाथ में पकड़ लो या धारण कर लो, संन्यासी बन जाओ। फिर जो भी करने की इच्छा हो करो, सब जायज़ हो जाता है इतना भर करने से; चाहे दान-दक्षिणा के नाम पर खुली लूट करना हो, काले धन को सफेद करना हो, आश्रमों में ‘इंद्र का दरबार’ लगाना हो, सुरा सुंदरी का सेवन करना हो, जायज़ और नाजायज़ असले का भंडार करना हो, यकीन मानिए कोई कुछ नहीं पूछेगा. भगवा रंग तो अब सब कुछ छिपा लेता है ! पता नहीं कैसे रहे होंगे वे साधू संत जो कहते थे ‘संतन सों का सीकरी सों काम !’ अब तो भैया ‘सीकरी’ से ही काम चलता है सब संतन का, वरना तो वे निठल्ले परजीवी ही हैं.

गुरू नानक देव ने बाबर बाणी में बाबर के आक्रमण के समय के हालात का वर्णन किया है. वह कहते हैं : ‘राजे शिकारी बने हुए हैं और उनके मुकद्दम यानि कर्मचारी कुत्ते जो जनता पर भौंक भी रहे हैं, काट भी रहे हैं और उनका खून भी पी रहे हैं. शर्म और धर्म दोनों मुंह छिपा कर कहीं चले गए हैं और झूठ प्रधान बना इतराता हुआ घूम रहा है.’

आपको नहीं लगता आज के हालात भी कोई अलग नहीं हैं इससे ! झूठ और केवल झूठ का ही कारोबार ! गोडसे और गांधी को एक ही समय पर प्रणाम करते हैं पीएम और संघ के साथ गोडसे का संबंध भी स्वीकार नहीं करते ! कितना झुठलाएंगे आप संघ के इस सच को ? कितना छिपेंगे आप कानूनी पेचीदगियों के पीछे ? भले ही गांंधी का चरखा चुरा कर उसके साथ अपनी फोटो खिचवा लें, लेकिन गांंधी जी हत्या पर आपने कितनी खुशियां मनाई थी !! मिठाइयां बांटने का अनुरोध करने वाले पर्चे किसने बांटे थे, यह सब तो अब इतिहास का हिस्सा है, वह इतिहास जिसे आप बराबर नकारते आए हैं. 9 फरवरी, 1948 के इंडियन एक्सप्रेस की एक कतरन संलग्न कर रहा हूं, जो बहुत कुछ कह जाती है :

9 फरवरी, 1948 के इंडियन एक्सप्रेस की एक कतरन, जिसमें RSS ने महात्मा गांधी की हत्या की खुशी मनाई और मिठाईयां बांटी.

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