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Home गेस्ट ब्लॉग

शक्ति की परिभाषा बदलते देर नहीं लगती

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 17, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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शक्ति की परिभाषा बदलते देर नहीं लगती

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

सबसे खतरनाक है इस देश की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठना और यह सबके लिये समान रूप से खतरनाक है. उनके लिये भी, जो आज किसी खास आधार की सामूहिकता पर अपने को शक्तिशाली मान रहे हैं, क्योंकि सांस्कृतिक जटिलताओं से भरे इस देश में सामाजिक विभाजन के अनेक आयाम हैं और समय के साथ ये आयाम बदल भी सकते हैं.

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जो आज खुद को शक्तिशाली मान रहे हैं और इस कारण न्याय व्यवस्था पर उठ रहे सवालों पर हंस रहे हैं, कल को सामूहिकता के किसी अन्य आयाम के तहत वे कमजोर भी पड़ सकते हैं और तब अपने हितों की रक्षा के लिये उन्हें न्याय तंत्र का मुंह जोहना भी पड़ सकता है.

सामूहिकता अगर अपना न्याय प्रिय चरित्र खोती है और अराजक बहुसंख्यकवाद की चादर ओढ़ती है तो यह एक सिलसिला बन सकता है. कल को बहुसंख्यक होने का कोई अन्य आधार आज के किसी शक्तिशाली प्रभु वर्ग को अल्पसंख्यक होने का अहसास करवा सकता है. यह हो सकता है, बिल्कुल हो सकता है क्योंकि सामाजिक गतिमानता सदैव इसकी संभावना बनाए रखती है.

इसलिये, लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं के सुदृढ़ और निरपेक्ष बने रहने की अवधारणा विकसित की गई है. हर वोटर लोकतंत्र में समानता का अधिकार रखता है और इसकी गारंटी संविधान देता है. किसी खास सामाजिक या सांस्कृतिक आधार पर अगर कोई अल्पसंख्यक है तो उसके संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा का दायित्व संवैधानिक संस्थाओं पर है.

चुनाव आयोग की निरपेक्षता पर उठ रहे सवालों पर आज अगर कोई हंसता है और सवाल उठाने वालों पर तंज कसता है तो वह भविष्य की अपनी पीढ़ियों के लिये गड्ढा खोद रहा है. यही बात अन्य संस्थाओं पर भी लागू होती है.

कोई सरकार अगर संवैधानिक संस्थाओं की कमजोर होती भित्तियों पर अपने राजनीतिक हितों की बेल चढ़ाती है तो वह खुद की मजबूती की कीमत पर देश को कमजोर करने का अपराध कर रही है.

देश की मजबूती किसी सरकार की मजबूती पर निर्भर नहीं करती, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती पर निर्भर करती है. संस्थाओं का चरित्र बल ही उनकी शक्ति है और इसका बने रहना इस देश के हर खासोआम के लिये बेहद जरूरी है. आज जो खास हैं वे कल खास नहीं रहेंगे.

कभी कांग्रेस का फार्मूला हुआ करता था कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्रियों की नियुक्तियों में ब्राह्मण और ठाकुर के समीकरण बिठाए जाते थे. अगर यहां ठाकुर तो वहां ब्राह्मण देना होता था, जैसे कि इन जातियों का विशेषाधिकार हो कोई.

समय बदला, माहौल बदला. आज कोई सोच भी नहीं सकता कि इन राज्यों में कुछ खास ऊंची जातियों की ही बपौती है मुख्यमंत्री का पद. समय आगे बढ़ चुका है, राजनीति का चेहरा बदल चुका है, भले ही सत्ता की संरचना में अभी उस अनुपात में बदलाव नहीं हो पाए हों. लेकिन, समय के साथ सत्ता की सामाजिक संरचना में भी बदलाव आएंगे. आएंगे ही क्योंकि इन बदलावों को कोई नहीं रोक सकता.

उसी तरह, देश के न्याय तंत्र का सामाजिक आधार भी बदलेगा, उसकी जातीय संरचना बदलेगी. जिन्हें इन बदलावों की संभावना पर यकीन नहीं है वे भ्रम के किसी अंधेरे में भटक रहे हैं. नहीं बदलेंगे तो वे हैं हमारे आदर्श, जिनकी रखवाली का जिम्मा हमारी संस्थाओं के पास है. ये आदर्श बचे रहने चाहिये. इनसे खिलवाड़ बहुत खतरनाक है.

सामूहिकता के किसी आधार के तहत कोई आज शक्तिशाली है और इन शक्तियों के बल पर अराजक होकर वह किसी जिला न्यायालय की छत पर चढ़ कर किसी खास रंग का झंडा लहरा देता है. पुलिस मूक दर्शक बनी रहती है, जज साहेबान किंकर्त्तव्यविमूढ़ बने रहते हैं, मीडिया अंधा बना रहता है.

कल को सामूहिकता की इस शक्ति का आधार बदल सकता है. कल कोई अन्य अराजक समूह किसी कोर्ट की छत पर चढ़ कर उधम मचा सकता है. पुलिस का, कोर्ट का, मीडिया का चरित्र अगर यही रहा तो कल को होने वाली संभावित अराजकता भी निर्बाध विचरण करेगी.

सरकारें आएंगी, जाएंगी, नेता आएंगे, जाएंगे, हमारी संस्थाएं रहेंगी क्योंकि उनके रहने से ही हम हैं, हमारे हित हैं, हमारी सुरक्षा है. संस्थाएं अगर किसी सरकार या किसी नेता के घटिया राजनीतिक स्वार्थों की बंधक बना दी जाती हैं तो यह उदाहरण अगली पीढ़ियों में भी हस्तांतरित हो सकता है.

कल को ऐसी कोई सरकार आ सकती है, ऐसा कोई नेता आ सकता है जो आज के शक्तिशाली लोगों की परिधि से परे की कोई चीज हो. शक्तिशाली की परिभाषा बदलते देर नहीं लगती. इतिहास गवाह है इसका.

तब, जो आज संस्थाओं के क्षरण पर चिंतित होने वालों पर कंटीली मुस्कान फेंकते हैं वे रोने के लायक भी नहीं रहेंगे क्योंकि उनके रोने पर भी पाबंदियां लगा दी जा सकती हैं. वो कहावत है न ‘जबरा मारे और रोने भी न दे.’

अराजकताएं किसी समय, किसी समुदाय, किसी सामूहिकता के पल्ले बंधी नहीं रहतीं. यह जब किसी समाज का चरित्र बना दी जाती हैं तो शक्तियों के संतुलन के बदलने के बाद भी कायम रहती हैं. ‘मनुज बली नहीं होत है, समय होत बलवान, भीलन लूटी गोपिका, वहि अर्जुन वहि बाण.’ समय बदला तो अर्जुन से उसका गांडीव तक नहीं उठा.

हमें किसी भी तरह की अराजकता का विरोध करना होगा क्योंकि यह विरोध आज के शक्तिशाली अर्जुन की तब रक्षा करेगा जब कल वह किसी न किसी कारण से कमजोर होगा. कोई सदैव शक्तिशाली नहीं रहता लेकिन, संस्थाओं को हमेशा के लिये शक्तिशाली बना कर रखना चाहिए क्योंकि शक्ति संतुलन के बदलने के बाद भी वही कमजोरों की रक्षा करेंगी.

संस्थाओं का क्षरण हंसने, मजा लेने और तंज कसने की बात नहीं. ये अफ़सोस करने की बात है, चिंतित होने का कारण है, सबके लिये.

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