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कोरोना : महामारी अथवा साज़िश, एक पड़ताल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 21, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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कोरोना : महामारी अथवा साज़िश, एक पड़ताल

Ram Chandra Suklaराम चन्द्र शुक्ल, अधिकारी, उत्तर प्रदेश

आज संसार भयभीत है कि कोरोना से उसका बचाव कैसे हो, पर क्या आप वास्तव में भयभीत हैं ? अथवा आपको भयभीत होने पर मज़बूर किया जा रहा है भविष्य के व्यवसाय को सुरक्षित करने हेतु ? आइये कुछ चरणों में इसे जानने का प्रयत्न करते हैं.

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क्या है कोरोना :

कोरोना जैसे लगभग 3,20,000 वायरस/बैक्टीरिया संसार में हम सबके आस पास रहते हैं और जब कभी भी हमें कोई फ्लू होता है तो वो इनकी ही वजह से होता है. साधारणतः फ्लू उचित भोजन लेने से तीन दिन में स्वतः ही समाप्त हो जाता है. कोरोना भी इसी प्रकार का एक फ्लू है, जो किसी भी उत्तम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले को कुछ हानि नहीं पहुंचा सकता. 2-4 दिन पूर्व ही ‘New England Journal of Medicine’ ने एक पेपर पब्लिश करके बताया है कि ‘कोरोना से मृत्यु का खतरा मात्र 0.1% है अर्थात 1000 लोगों को यदि कोरोना हो तो मात्र एक व्यक्ति की मृत्यु होगी. अतः ये साधारण सर्दी-जुकाम-बुख़ार की भांति ही है.

यदि यह साधारण फ्लू ही है तो इतना हल्ला क्यूंं ?

दरअसल जिसे आप महामारी समझ रहे हैं वास्तव में वो एक व्यवसायिक संधि है, जो अमेरिका और चीन के बीच में हुई है. संधि का आधार है कि कोरोना वायरस को नियंत्रित करने हेतु जो भी उपकरण अथवा दवाइयां अभी अथवा भविष्य में बिकेंगी, उनका लाभ चीन और अमेरिका में आपस में बांटा जायेगा और इन सबका निर्माण वो ही पेटेंट कानून के आधार पर कर पाएंगे. अभी आपको ये गप्प लगेगी पर इसकी असलियत जानने हेतु मैं आपको कुछ पीछे ले जाना चाहता हूंं.

1984 में इसी प्रकार से अमेरिका ने अफवाह फैलाई थी एचआईवी वायरस की, और लोगों को इतना डरा दिया कि यदि किसी पीड़ित का हाथ छू गया, रुमाल छू गया तब भी यह फ़ैल जाएगा. चारों ओर बस एचआईवी का ही भय था और इसी बीच उस समय इन लोगों ने जांच हेतु उपकरण और बचाव हेतु खूब वस्तुएं बेची. इसके उपरांत इसका टीका बना दिया, जो कि अब हर बच्चे को पैदा होने के कुछ समय में ही लगा दिया जाता है.

डॉक्टर भी प्रायः किसी भी रोग में इसकी जांच करवाते रहते हैं. पर इसके पीछे की सच्चाई ये है कि 1984 से आजतक एक भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसमें एचआईवी का वायरस पाया गया हो अथवा किसी की मृत्य एचआईवी से हुई हो. यदि ऐसा कोई शोधपत्र आपके पास हो तो अवश्य हमें उपलब्ध करावें. लोग एड्स से मरे हैं पर इसको एड्स से मत जोड़िए क्योंकि एड्स एक शारीरिक रोग है और एचआईवी एक वायरस दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है.

स्मृति में रहे कि एचआईवी के लिए अमेरिका और फ़्रांस ने आपस में संधि की थी. इस प्रकार की ही कहानी टीबी की है. ऐसी और भी बीमारियां हैं पर इन दोनों का ही लगभग हर देश प्रतिवर्ष हज़ारों करोड़ का बजट बनाता है, और पैसा अमेरिका के पास जाता है क्योंकि दवाइयों व उपकरण बनाने के पेटेंट उनके पास हैं. यह उनकी सदैव के लिए बनी एक स्थाई आय है.

इसी प्रकार का एक बजट कुछ दिनों में कोरोना का बनेगा और उनके अभी हो रहे कुछ आर्थिक नुकसान से लाखों गुना बढ़कर उन्हें प्रतिवर्ष मिलने वाले हैं. यह हानि नहीं उनका इन्वेस्टमेंट है, लाइफटाइम फिक्स रिटर्न के लिए।

फिर लोग मर कैसे रहे ?

आपके मन में प्रश्न होगा कि लोग तो मर रहे हैं, पर कैसे पता चला है कि मरने वाला कोरोना से मरा है ? इसकी जांच हेतु बस एक ही परिक्षण होता है, जिसे पीसीआर टेस्ट कहते हैं. पर संभवतः आपको नहीं पता कि ये जांच प्रामाणिक नहीं है. यह जांच यदि किन्हीं भी 100 स्वस्थ लोगों पर भी की जाएगी, तब भी ये उनमें से एक को कोरोना का पॉज़िटिव केस बताएगी क्योंकि इसके बारे में कहा जाता है कि ‘PCR test can detect Corona with 99% specificity’ और स्वयं इसके निर्माता श्री कैरी मलिस ने कहा था कि The PCR test is for genetic sequencing of the virus and not a test for the virus itself.’

इसके साथ ही यदि आप तमाम देशों में होने वाले परीक्षण और पॉजिटव मिले मामलों का औसत निकालेंगे तो आपको ज्ञात हो जाएगा कि यह किट कैसे कार्य करती है. अतः जो लोग मर रहे हैं वो या तो बहुत कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के चलते मर रहे हैं अथवा वो जिन्हें पहले से ही कोई गंभीर रोग है और वो वृद्ध हैं अथवा उन्हें ज़बरदस्ती कोरोना से मरा बताया जा रहा है.

प्रतिवर्ष पूरे विश्व में लगभग 1 करोड़ 70 लाख लोग वायरस व बैक्टीरियल इन्फेक्शन से मरते हैं, पर उनमें से अधिकांश का बाज़ार बन चुका है, अतः उन पर कोई चर्चा नहीं है. उदाहरण हेतु टीबी. टीबी से पूरे विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख लोग मरते हैं और इनमें से 5 लाख तो मात्र भारत में ही मरते हैं, पर इसके बचाव हेतु आपको कुछ नहीं बताया जाता क्योंकि इसके हज़ारों करोड़ का बाज़ार बना हुआ है, पर कोरोना टीबी की तुलना में बिल्कुल भी हानिकारक नहीं है, पर इसका इतना भयभीत कर देने वाला प्रचार बस इसलिए ही हो रहा है क्योंकि आप डरेंगे नहीं तो इनकी उपकरण और दवाइयां कौन खरीदेगा ?

प्रतिवर्ष ऐसे ही बाज़ार खड़े किये जाते हैं कभी स्वाइन फ्लू, कभी बर्ड फ्लू, कभी डेंगू, कभी चिकेनगुनिया, कभी इबोला और कभी कोरोना के नाम पे और इन सबकी दवाएं व उपकरण बनाने के पेटेंट लगभग सदैव अमेरिका के पास ही रहते हैं. क्या आपको लगता है कि ये पहले वाले वायरस – बैक्टीरिया सब कोरोना के भय से कहीं दुबक के बैठ गए हैं ? नहीं ये भी उतने ही मौजूद हैं बल्कि कोरोना से बहुत अधिक हैं पर उनको इसलिए नहीं दिखाया जा रहा क्योंकि उनका बाज़ार स्थापित हो चुका है, सरकारें उसका बजट बनाती हैं और सब मिल बांटके खाते हैं. संभवतः अब आपको कुछ खेल समझ आया हो.

फिर क्या करें ?

कुछ भी न करिए. सबसे पहले तो भयभीत होना बंद करिये. अपना भोजन और रोग प्रतिरोधक क्षमता उचित रखिए, कभी भी जीवन में ऐसा कोई रोग आपको नहीं लगेगा.

सैनिटाइज़र का उपयोग करें अथवा नहीं ?

सेनेटाइजर का उपयोग आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को और दुर्बल कर देगा और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना हर सामान बेचने में बहुत चतुर तो हैं ही, साथ में वो एड सेल भी बखूबी करते हैं. देखिए, हमारे हाथों में सदैव विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया रहते हैं, जिन्हें विज्ञान की भाषा में फ्रेंडली अर्थात शरीर हेतु मित्र बैक्टीरिया बोला जाता है, जो कि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाये रखने में सहायतार्थ होते हैं. जब आप सेनेटाइजर का उपयोग करते हैं तो दूषित बैक्टीरिया तो आपके पास पहले ही नहीं होता है, पर उसके चक्कर में आपके ये मित्र बैक्टीरिया पूर्ण रूप से समाप्त हो जाते हैं और जिसके कारण आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बड़ा आघात लगता है व आप शीघ्र ही बीमार पड़ने लगते हैं और इस प्रकार पहले कंपिनयां आपको सेनेटाइजर बेचती हैं और फिर बाद में वही कंपनियां दवा. दूसरी बात बैक्टीरिया मारने हेतु जो रसायन आपने अपने हाथों में डाला और पश्चात उन्हीं हाथों से कुछ खाया तो निसंदेह वो विषकारी रसायन आपके शरीर में भी जाएगा, जो कि घातक है. क्या आप डिटोल अपने हाथों में चुपड़ के मुंह से चाट सकते हैं ??

मास्क पहनें अथवा नहीं ?

प्रथम बात तो ये कि यह वायरस वायु में घूमने वाला वायरस नहीं है, अतः इसका मास्क से कोई लेना-देना नहीं है. यह शारीरिक स्पर्श से ही फैलता है. दूसरी बात कि यह अथवा कोई भी वायरस इतने सूक्ष्म होते हैं कि वो शरीर के किसी भी छिद्र से भीतर जा सकते हैं, यहां तक कि रोमछिद्रों से भी, तो ऐसे में आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ही आपको बचाएगी, कोई सेनेटाइजर अथवा मास्क नहीं. रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत रखिए और आनंद में रहिए.

डिसइंफेक्टेंट डालें अथवा नहीं ?

यह एक मूर्खतापूर्ण कृत्य है. ऐसे विषैले पदार्थ डालने से लोगों के ऊपर और भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. आज से लगभग 30 – 40 वर्ष पूर्व टीबी व अन्य संक्रमित रोगों से बचने हेतु प्रतिदिन सरकारों की ओर से डीडीटी का छिड़काव किया जाता था, पर अब 30 वर्ष बाद शोध में ये निकल के सामने आया कि उस डीडीटी के छिड़काव के कारण ही पोलियो नामक खतरनाक बीमारी का जन्म हुआ था. अतः इन सबसे दूर रहें तो ही उत्तम है.

विशेष नोट : उपरोक्त में से अधिकांश जानकारियां देश विदेश के जाने माने चिकित्सक व जनमानस की भलाई हेतु ‘एचआईवी सदी का सबसे बड़ा धोखा’ व ‘हार्ट माफिया’ जैसी पुस्तकें लिख चुके श्री विश्वरूप रॉय चौधरी जी के वक्तव्यों से ली गयी है.

आशा है कि हमारे ये लेख आपको इन वैश्विक प्रोपगंडा से बचा पाएगा और आप एक भयभीत नहीं बल्कि मज़बूत इंसान बन पाएंगे. जय हिन्द.

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