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पुलिसिया जुल्म के खिलाफ अमेरिका से यह भी सीख लो

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 1, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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ट्रंप ने अमेरिकी जनता पर गोली चलाने की खुली घोषणा की, ट्विटर ने राष्ट्रपति के हिंसा के पक्ष में किये गये ट्वीट को रोक दिया. भारत में राजनेता खुलेआम लोगों को गोली मारने का नारा लगता है और उसकी पुलिस सैकड़ों निरपराध लोगों को पीट पीटकर हत्या कर देती है और गिद्ध मीडिया उल्टे मार डालेे गये लोगों को ही दोषी ठहरा देता है और भारत की सड़ांध न्यायपालिका भी मार डाले गये लोगों को ही दोषी करार दे देती है. अमेरिकी पूूंंछ बनने को बेेताब लोगों को अमेरिका से पुलिसिया जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना भी सीख लेना चाहिए – सं.

पुलिसिया जुल्म के खिलाफ अमेरिका से यह भी सीख लो

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अश्वेत अमेरिका जॉर्ज फ्लायड की पुलिस के हाथों हुई मौत के बाद लोगों की गुस्सा पुलिस पर फूटा.

कोरोना वायरस की मार झेल रहे अमेरिका के कई शहर अब हिंसा की आग में जल रहे हैं. अश्वेत अमेरिका जॉर्ज फ्लायड की पुलिस के हाथों हुई मौत के बाद लोगों की गुस्सा पुलिस पर फूटा. मिनिपोलिस शहर में शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अमेरिका के 16 राज्यों के 30 शहरों तक फैल गया है. हिंसक प्रदर्शनों की आंच व्हाइट हाउस तक पहुंच चुकी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वाशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस के बाहर प्रदर्शनकारियों के जमा होने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कुछ समय के लिए एक भूमिगत बंकर में ले जाया गया था.

एक अमेरिकी पुलिस ऑफिसर के ऊपर 46 साल के अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या करने का आरोप लगा है. मिनिपोलिस के पुलिस ऑफिसर ने अश्वेत नागरिक को पकड़ने के दौरान उसके गले पर अपना पैर रख दिया, जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई. इसके बाद कई अमेरिकी शहरों में भेदभाव को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया.

गुस्साएं लोगों ने पूरे शहर में हंगामा किया. बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और आगजनी भी की गई. यहीं नहीं जिस थाने के पुलिस पर जॉर्ज फ्लायड की हत्या का आरोप है, लोगों ने उस थाने में भी आग लगा दी. अमेरिका का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्र्ंप ने भी कहा कि उन्होंने जॉर्ज फ्लायड के घरवालों से बात की है.

न्यूयॉर्क शहर के मेयर बिल डे ब्लासियो ने शहर में हिंसा के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया है. अमेरिका के कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है वहीं सैकड़ों लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है.

थोड़ा ही सही अमरीका में तो लोगों को एहसास हो रहा है कि एक दक्षिणपंथी सरकार के पैदा किये हालात ने फ़िज़ां में कितनी नफरत घोल दी है. हिन्दुस्तान अभी इस एहसास से दूर किचन में नई रेसिपी तैयार करने में व्यस्त है. अभी दम केवल मजदूरों का घुट रहा है, अभी लिंचिंग केवल दलितों और अल्पसंख्यकों की हो रही है.

अभी केवल वो जेलों में ठूसें जा रहे हैं जो असहमत हैं, अभी आपको लोकतंत्र का गला घोंटे जाने की साजिशों का एहसास नहीं हो रहा है. दिल्ली में पिंजरा तोड़ बच्चियों के खिलाफ और देश भर में अलग-अलग इलाकों में हुई ऐसी साजिशों की आंच अभी आपके दरवाजे तक नहीं पहुंची है.

अभी मजदूरों का खून और पसीना आपको केवल किसी टीवी चैनल की एक खबर बस लग रही है. अभी लॉक डाउन-जनित बेरोजगारी से त्रस्त लोगों में आपका कोई अपना शामिल नहीं है और होना भी नहीं चाहिए लेकिन आप तो अभी अपनी सेहत को लेकर फिक्रमंद हैं.

अभी ना तो ये चीखें आपके कानों तक पहुंच रही हैं ना इनका गुस्सा आपको ये बतला रहा है कि आपकी हालत अमरीका से ज़्यादा बदतर है, कि आपकी गर्दन भी घोटी जा रही है, लेकिन ताली, थाली और मोमबत्तियों ने अभी आपकी चेतना का गला घोंट रखा है.

अभी आपने भी अपनी तर्कशक्ति को, अपनी इंसानी संवेदनाओं को, अपने सवालों को एक ऐसी चेतना-शून्य जकड़न के हवाले कर रखा है, जिससे आज़ादी आसान नहीं है. अभी आपको एहसास नहीं है कि उस अमरीकी पुलिस अफसर के बूटों की धमक आपकी गलियों तक सुनाई दे रही हैं.

अभी आप दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की गौरव गाथाओं को ही पढ़ रहे हैं. अभी आपने अपने लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमलों से आंखें मूंद रखी हैं. अभी आपको अपने देश की न्यायव्यवस्था के पतन का अंदाज़ नहीं है. अभी आपको शायद इस बात का अनुमान भी नहीं है कि आपकी अपनी स्वतंत्रता किस पूंजी की जकड़न में कराह रही है.

अभी आपको यह याद नहीं है कि आज आप जिस स्वतंत्रता के गीत गा रहे हैं, वो किन कुर्बानियों से हासिल हुई थी. अभी तो आपको अपने ही संविधान की प्रस्तावना एक कागज का टुकड़ा भर लगने लगी है. अभी तो आप ये भी भूल गए हैं कि इस संविधान का इस देश की आकांक्षाओं से क्या रिश्ता है.

आपको भी ये लगने लगा है कि संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथ निरपेक्ष’ शब्द किसी 42वें संशोधन के जरिये घुसा घुसा दिए गए हैं और इसका ना तो हमारे महान स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों से कोई लेना-देना था, ना ही इस देश के निर्माण में इन मूल्यों का कोई योगदान था !

आप जितना संविधान को रद्दी की टोकरी में डालना चाह रहे हैं, उतना आप अपनी स्वतंत्रता का गला घोंट रहे हैं, अभी तो आपको इस बात का भी एहसास नहीं है. ज़रा अपनी संवेदनाओं को कुरेद कर देखिए ! ज़रा अपनी चेतना को झकझोरिये, ज़रा अपने विवेक को काम पर लगाइए, स्वतन्त्रता की अपनी आकांक्षाओं को थोड़ा महसूस कीजिये और सोचिए कि ये स्वतंत्रता किस कीमत पर हासिल हुई और आप कितनी आसानी से, बिना कोई सवाल किए खुद को अविवेकी भीड़ का हिस्सा बनाते जा रहे हैं ?

सोचिए कि दुनिया के सबसे विकसित राष्ट्र होने का दम भरने वाले अमरीका में अश्वेतों के खिलाफ नफरत किस अमानवीय हद तक है और सोचिए कि आपको किस आसानी से इस तरह की नफरत की आग में झोंक दिया जा रहा है.

आपकी अपनी स्वतन्त्रता की मॉब लिंचिंग हो रही है. सोचिए कि विज्ञान, तर्क, सदभाव, प्रेम, आस्था के गंगा जमुनी रंग इन सबको कुचल कर आप कैसे अपनी आज़ादी को बचा सकेंगे ?

अक्सर अमरीका से आप बहुत कुछ पाने को व्याकुल नज़र आते हैं. थोड़ा इस नफरत के अनुभव और इसके खिलाफ सभ्य अमरीकी समाज के गुस्से को भी महसूस कीजिये. शायद आपको अपनी गर्दन पर भी जकड़न का एहसास हो !’

  • भूपेन्द्र हस मौर्य एवं रुचिर गर्ग

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