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पापुलैरिटी की हवस और कोलोनियल भाषा हिन्दी की गरीबी का रोना

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 28, 2022
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पापुलैरिटी की हवस और कोलोनियल भाषा हिन्दी की गरीबी का रोना
पापुलैरिटी की हवस और कोलोनियल भाषा हिन्दी की गरीबी का रोना
Rangnath singhरंगनाथ सिंह

बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि अमेरिका में हर किसी को अपने वायरल मोमेंट का इंतजार है और उसके लिए वह कुछ भी कर सकता है तब वह बात अजीब लगी थी. अब यह रोज हमारी आंखों के सामने घटित हो रहा है. आज आप कोई चालू या घटिया बात बोल दीजिए. उसपर थाना-कचहरी हो जाए आप रातोंरात विचारक-चिन्तक-लेखक-पत्रकार-बुद्धिजीवी-सोशलमीडिया इन्फ्लूएंसर बन सकते हैं.

यह बीमारी इतनी गहरी हो चुकी है कि जेएनयू-डीयू के प्रोफेसर कट-कॉपी-पेस्ट कारखाने के कुंजी लेखकों की किताबें प्रमोट कर रहे हैं. कोई पीएम, सीएम या राष्ट्रपति को मां-बहन की गाली दे दे और उस पर कोई उतना ही सिरफिरा थाना-कचहरी कर दे तो गाली देने वाले का सोशलमीडिया स्टार बनना तय है. एक प्लेकार्ड या एक फोटो या किसी वीडियो या अहमकाना ट्वीट या पोस्ट से आप नोम चोम्स्की से ज्यादा सोशलमीडिया फॉलोवर बटोर सकते हैं.

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पापुलैरिटी की हवस ने बहुतों को पागल कर दिया है. पापुलैरिटी की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह मोमेंटरी है. पहले ये मोमेंट थोड़े लम्बे होते थे, अब तो मोमेंटरी ही हो चुके हैं. कुछ साल पहले एक अभिनेत्री एवं अभिनेता के सम्भोग की क्लिप पब्लिक हो गयी थी. बाद में कुछ लोगों ने कहा कि एक पीआर एजेंसी ने सलाह दी थी कि इससे मिलने वाली पापुलैरिटी से उनका करियर रिवाइव हो सकता है. उस क्लिप वाली अभिनेत्री का करियर तो रिवाइव नहीं हुआ लेकिन एक दूसरे सिंगर का डूबता करियर इसलिए रिवाइव हो गया क्योंकि उन्होंने एक स्त्री का जबरदस्ती चुम्मा ले लिया था. हुई तो जबरदस्ती थी लेकिन उसके बाद दोनों ही फायदे में रहे, ऐसा उनकी कुछ साल बाद की खबरों को देखकर लगा.

बाकी पेशों का नहीं पता लेकिन लेखन और लोकप्रियता के बीच कैच-22 की स्थिति बनी रहती है. एक समय लोकप्रिय होने की किसी भी अशालीन कोशिश को पापुलिस्ट कहकर हतोत्साहित किया जाता था. एक समय ऐसा आया कि लोग कहने लगे कि जो पापुलर नहीं है, उसका होना ही व्यर्थ है. पापुलैरिटी का नशा कोकीन, गांजे, शराब से अलग नहीं है. शोबिज में फेस-पापुलैरिटी का महात्म्य पुराना है. लेखन जगत में इसने देर से एंट्री ली.

पापुलैरिटी के नशे के बिजली की गति से फैलने का लाभ एक दूसरे लेखक वर्ग ने भी लिया और यह घोषित कर दिया कि कोई पापुलर नहीं है इसका अर्थ है कि वह महान प्रतिभाशाली है, बस लोग उसे समझ नहीं पा रहे हैं. अफसोस ऐसी घोषणा करने वालों के जीवन का उद्देश्य भी लो-लेवल की पापुलैरिटी हासिल करना ही था और वो उसके लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते रहे.

पापुलैरिटी की हवस पुरानी बीमारी है. पिछले कुछ सालों में इस बीमारी में कुछ नए आयाम जुड़ गये हैं, जिससे यह और खतरनाक हो चुकी है. पापुलैरिटी की बीमारी को पहले कैमरे और फिर सोशलमीडिया के आविष्कार नए गम्भीर स्तर तक पहुंचा दिया है. हिन्दी में ऐसे लेखकों की संख्या दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती जा रही है, जिनकी सबसे प्रमुख महत्वाकांक्षा यह बन चुकी है कि लोग उनका चेहरा पहचान लें. लोग पहचान लें कि ये महान जुमला इन्हीं महान चेहरे वाले महान लेखक ने लिखे हैं.

ऐसा नहीं है कि यह नई बीमारी पापुलिस्ट कहे जाने वाले लेखकों में ही है. खुद को कालजयीभाव का लेखक समझने वाले पापुलिज्म विरोधी भी मरे जा रहे हैं कि लोग उनका चेहरा पहचान लें. कुछ लेखकों, खासकर कवियों में यह बीमारी इतनी गहरी हो चुकी है कि लोग पीठ पीछे उनका नाम सुनते ही थू-थू करने लगते हैं. उनके सार्वजनिक कृत्यों से ऐसा लगता है जैसे कोई सुबह-दोपहर-शाम दिन-रात अपनी तस्वीर को चुम्मा दिए जा रहे है और फलस्वरूप उसके थूक से तस्वीर गील होकर फटती जा रही है. लेकिन चूमने वाले को होश नहीं है कि वह तस्वीर का कागज तक चाट चुका है.

यह बीमारी इतनी फैल चुकी है कि लेखकों के जुमले और तस्वीर के काकटेल को लोकप्रिय बनाने के लिए एजेंट रखे जाने लगे हैं. कुछ जेब से तंग दिल के अमीर लेखक मिलजुलकर आपस में एक-दूसरे के जुमले-तस्वीर फैला लेते हैं. कुछ को यह काम खुद ही खुद से अकेले करना पड़ता है. हिन्दी सोशल मीडिया इस तरह पापुलर बनाने का एक पूरा तंत्र तैयार हो चुका है. एक-दो लाइन के जुमले के साथ उससे 4-8-16 गुना बड़ी तस्वीर लगाकर उसे वायरल कराने का प्रयास किया जाता है.

पहले किसी विषय पर आलेख प्रकाशित होता था तो उस विषय से जुड़ी तस्वीर फीचर इमेज के तौर पर लगायी जाती थी. जैसे- कार्ल मार्क्स पर लेख होगा तो मार्क्स की तस्वीर ऊपर लगी होगी. अब बुद्ध पर लेख लिखने वाले बबलू कुमार अपनी बड़ी सी तस्वीर के साथ उसे छपवाते हैं, शीर्षक होता है- बबलू कुमार की बांकी नजर में बुद्ध के आड़े-तिरछे विचार ! आज आप कह सकते हैं लेखक का चेहरा आज उसके लेखन और पाठक के बीच रोड़ा बन गया है.

फोटो और वीडियो के आविष्कार के पहले लेखकों का काम केवल शब्दों से चल जाता था. उनका नाम ही उनका परिचय हुआ करता था. नाम पापुलर हो जाए, यही उनका इच्छा होती थी. ऐसे लेखक भी हुए जिनका वास्तविक नाम नहीं पता लेकिन उनके विचार अमर हो गये. ऐसे लेखक भी हैं जिनका नाम रह गया और उनकी रचना खो गयी, जैसे- स्वयम्भू.

आज स्वयम्भू एक नकारात्मक विशेषण बन चुका है लेकिन कभी इस नाम के सम्मानित प्राकृत लेखक हुए थे. तकनीकी ने अपने प्रिय लेखकों को देखने-सुनने का सुख दिया लेकिन इस सच के नीचे यह सच दब नहीं जाएगा कि लेखक मूलतः पढ़ने-सोचने की चीज है. चेहरा कभी लेखन की पहचान नहीं बन सकेगा. लेखन ही चेहरे की पहचान होगा. लोकप्रिय लेखक की हवस से लोकप्रिय चेहरा बनने का अथक प्रयास अश्लील लगता है.

लिपि के आविष्कार के बाद लेखन से नाम जोड़ना आसान हो गया. कागज के आविष्कार ने नाम के प्रचार को और आसान बनाया. छापेखाने के आविष्कार के बाद लोकप्रिय-नाम होना पहले से भी आसान हो गया. 20वीं सदी ने लोकप्रिय नाम के साथ लोकप्रिय चेहरा होना भी सम्भव कर दिखाया. 21वीं सदी ने सोशलमीडिया देकर इस पुरानी बीमारी को नया आयाम दे दिया.

सोशलमीडिया से पहले व्यक्ति का नेम-फेस किसी कारण से पापुलर होता था या उसे पापुलर बनाने के लिए कारण खोजना पड़ता था. सोशलमीडिया के बाद पापुलर होना ही मूल कारण है जिसकी वजह से उस व्यक्ति के बाकी कार्यों का मूल्य है. सोशलमीडिया ने पापुलैरिटी को मुख्य गुण की तरह स्थापित किया है. बात लेखन जगत के सन्दर्भ में हो रही है तो उसका उदाहरण लेकर हम देख सकते हैं कि पापुलैरिटी को सोशलमीडिया ने क्या रूप दिया है.

आप देख सकते हैं कि सोशलमीडिया पर जिन लेखकों के हजारों-लाखों फॉलोवर हैं उनकी किताबें कुछ सौ बिक जाएं तो वो जयघोष करने लगते हैं. कम से कम हिन्दी में लेखक अपनी किताबों की बिक्री का आंकड़ा सार्वजनिक करने में हिचकिचाते हैं. हिन्दी प्रकाशक भी पहले इसपर चुपचुप रहते थे. पिछले कुछ सालों में कुछ हिन्दी प्रकाशकों को मार्केंटिंग वालों का यह फण्डा अपना लिया है कि ‘बहुत बिक रहा है, बहुत बिक रहा है’ कहकर भी सामान बेचा जा सकता है.

कुछ प्रकाशकों ने लेखक के साथ आपसी सहमति से (ताकि रायल्टी का मसला न उठे) बिक्री संख्या दोगुनी-चौगुनी बतानी शुरू कर दी. किताब छह हजार प्रति बिकी तो 10 हजार कॉपी बिकने का क्रिएटिव बनाकर शेयर करवा दी. शायद इसी वजह से सोशलमीडिया पर ‘बहुत बिक रही है’ के प्रचार के असर में आकर किसी किताब को खरीदने और पढ़कर मायूस होने वाले पाठकों की संख्या भी बढ़ने लगी है.

आप देख सकते हैं कि सोशलमीडिया में पापुलैरिटी लेखक को सुपरसीड कर चुकी है. लेखक को लोग फॉलो तो करते हैं, उसके सोशलमीडिया कमेंट को तो पढ़ते हैं लेकिन उसके आधे या चौथाई फॉलोवर भी उसकी किताब खरीदकर नहीं पढ़ना चाहते. यह सच है कि किताब खरीदना क्रय-शक्ति से जुड़ा मामला है और सोशलमीडिया में फ्री में फॉलो किया जा सकता है लेकिन क्या हिन्दी लेखकों के फॉलोवरों 10-20 हजार ऐसे लोग नहीं है जिनकी हैसियत साल में हजार-पांच सौ अपने प्रिय लेखक की किताब पर खर्च करने की हो. अगर ऐसा है तो लोकप्रिय होने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाले लेखकों को इस पर सोचना चाहिए.

लोकप्रिय नेम के साथ पापुलर फेस बनने के लिए मरे जा रहे लेखकों पर इतना कहने के बाद उनपर भी कुछ कहना लाजिमी है जो अलोकप्रियता को ही गुणवत्ता की शिनाख्त मानते हैं. यह सच है कि ज्ञानरंजक साहित्य मनोरंजक लेखन से कम बिकता है. कविता-कहानी लेखन जगत की सबसे लोकप्रिय विधा हैं. प्रेमचन्द की कहानियां और उपन्यास जितने लोगों ने पढ़े होंगे उसके आधे लोगों ने भी शायद उनके वैचारिक आलेख नहीं पढ़े होंगे.

कविता-कहानी लिखने वाले कई लेखक मनोरंजन के साथ थोड़ा ज्ञानरंजन भी करना चाहते हैं. ऐसे लेखकों के पाठक विशुद्ध मनोरंजन प्रदान करने वाले लेखकों से कम होते हैं. ऐसे लेखकों ने जिन्हें आम जबान में साहित्यिकार कहा जाता है, अपने पाठकों के लिए एक नया नाम ही गढ़ लिया- सुधी पाठक. ऐसा पाठक जो मनोरंजन के अलावा कुछ और सुध भी लेना चाहता है. जाहिर है कि सुधी पाठकों की संख्या सामान्य पाठकों से काफी कम होती है लेकिन वह इतनी भी कम नहीं होती जितनी हमारे कालजयीभाव वाले लेखक बताते हैं.

आपने गौर किया होगा कि हिन्दी में खुद को साहित्यकार बताने वाले ऐसे लेखक काफी संख्या में हैं जिनका दावा है कि उनकी किताबें नहीं बिकतीं क्योंकि हिन्दी पाठकों का टेस्ट खराब है. अपने बचाव में वो मनोरंजक लेखन करने वालों की बड़ी बिक्री संख्या दिखाकर कहते हैं देखो- लोग तो ये पढ़ते हैं ! जाहिर है कि सामान्य पाठकों में कुमार विश्वास लोकप्रिय हैं लेकिन सुधी पाठकों के भी सेलिब्रिटी कवि हैं.

कुमार विश्वास की किताब खरीदने वाले एक लाख पाठक हैं तो धूमिल या दुष्यंत कुमार की किताब खरीदने वाले पांच-दस हजार सुधी पाठक भी हैं. इसके बावजूद हमारे कालजयीभाव वले लेखकों की कविता/कहानी/उपन्यास की साल में केवल 25-50-120 प्रति बिकती है तो इसे ये सुधी पाठकों द्वारा मिला रिजेक्शन नहीं मानते. कुमार विश्वास के पाठक हमारे कालजयी कवि को क्यों नहीं पढ़ते, यह सबको समझ में आता है लेकिन निराला-मुक्तिबोध-धूमिल-दुष्यंत को पढ़ने वाले पाठक भी कालजयीभाव वाले कवि को क्यों नहीं पढ़ते, यह भी कवि को छोड़ सबको समझ में आता है.

चलते-चलते यह कहना भी जरूरी है कि लेखन और लोकप्रियता का सम्बन्ध पूजा और प्रसाद जैसा है. बहुत से लोग प्रसाद के चक्कर में ही पूजा में आकर बैठ जाते हैं लेकिन प्रसाद खाने के लिए पूजा नहीं की जाती. पूजा पूरी किए बिना प्रसाद खाने की हड़बड़ी नासमझ बच्चों में पायी जाती है. परिपक्व वयस्कों में नहीं. लेखन ऐसा काम है कि आप अच्छे से करें तो लोकप्रियता देर-सबेर आपके पीछे-पीछे चलने लगती है. यदि आप इसका स्वाभाविक क्रम बदलकर नेम-फेस की लोकप्रियता के पीछे-पीछे चलकर कहीं जा रहे हैं तो आपको सोचना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं !

2019 की रिपोर्ट के अनुसार बॉलीवुड ने टिकट बेचकर 216 अरब रुपये से ज्यादा कारोबार किया था. बाकी मद से होने वाली आय अलग. हिन्दी भाषा में बनने वाले सिनेमा से होने वाली इस आय पर उन लोगों का कब्जा है जो सार्वजनिक जीवन में हिन्दी बोलने-लिखने से कतराते हैं. बॉलीवुड के कंटेंट के दम पर चलने वाली कल्चरल इंडस्ट्री का सालाना कारोबार अलग है और उसपर भी उन लोगों को कब्जा है, जो ठीक से हिन्दी लिखना-बोलना नहीं जानते.

कुछ लोग हिन्दी की गरीबी का रोना अक्सर रोते हैं लेकिन मेरा अनुभव है कि हिन्दी के पास जहां पैसा है उसपर हिन्दी-हेटर्स का कब्जा है. दशकों पहले एसपी सिंह ने लिखा था कि बॉलीवुड वाले खाते हिन्दी की हैं, गाते अंग्रेजी की हैं. हिन्दी फिल्में बनाकर अरबों कमाने वाले भी सार्वजनिक जीवन में हिन्दी नहीं लिखते-बोलते. यह केवल गुलाम देश में ही हो सकता है. साउथ के स्टार के इस मामले में बेहतर हैं कि वो अपनी भाषा के लिए बोलते हैं.

बॉलीवुड भारत में कोलोनियल स्लेव माइंडसेट का सबसे बड़ा उदाहरण है. बालीवुड के बायपोडक्ट कल्चर इंडस्ट्री पर भी इंग्लिश इलीट का कब्जा है. जरा सोचिए जिस चीज को हिन्दी समझने वाली जनता करोड़ों रुपये देकर सफल बनाती है, उसके बौद्धिक विमर्श पर उनका कब्जा है जिनमें ज्यादातर एक पेज साफ-सुथरी हिन्दी नहीं लिख सकते.

इंग्लिश इलीट विदेशी भाषा की फिल्मों की मााला जपकर बहुत सालों तक लोगों को डराते रहे. इंटरनेट और टॉरेंट ने उनके इस वर्चस्व को तोड़ दिया. उसके पहले हॉलीवुड के इतर विदेशी सिनेमा सरकारी कृपा से फिल्म उत्सव में दिखाया जाता था, जिसे दिल्ली मुम्बई में रहने वाले फ्री में देखकर फिल्म विशेषज्ञ बने फिरते थे.

हिन्दी में भी कुछ लोग केवल इसलिए विदेशी सिनेमा विशेषज्ञ कहे गये क्योंकि उनके पास उन फिल्मों का एक्सेस था. जिन लोगों ने राज कपूर या दिलीप कुमार की फिल्में देखकर उन्हें स्टार बनाया था, उन्हें कंट्रोल्ड कोलोनाइज्ड मीडिया के माध्यम से हमेशा यह अहसास कराया गया कि असली सिनेमा ये नहीं वो है. तुम लोगों का तो टेस्ट ही खराब है.

कल्चर इंडस्ट्री पर कब्जा जमाए बैठे इंग्लिश इलीट विश्व सिनेमा की बात बहुत करते हैं लेकिन उन्होंने आज तक नहीं बताया कि सिनेमा के मामले में समृद्ध माना जाने वाले दुनिया के किस देश में सिनेमा बोलता तो अवाम की भाषा है लेकिन उसे वो लोग चलाते हैं जो किसी कोलोनियल भाषा में सोचते-लिखते-पढ़ते हैं.

दुनिया के किस भाषा के सिनेमा इलीट अपनी भाषा, अपने लोक, अपने इतिहास, अपनी संस्कृति, अपने जन से इतना कटा हुआ है ? तुर्रा ये कि ऐसी सारी कटी पतंग खुद को फेलिनी, बर्गमैन, त्रुफो समझती हैं ! ये भूल जाती हैं कि वो दिनरात जिनका नाम जपते हैं वो सब जिस भाषा में फिल्म बनाते हैं, उसी में सोचते-बोलते-लिखते-पढ़ते हैं इसलिए उनमें मौलिकता और नवता है.

हिन्दी को लेकर होने वाली हर बहस में कुछ लोग ‘अंग्रेजी ज्ञान-विज्ञान की भाषा’ है का राग अलापने लगते हैं!. करन जौहर काफी विथ करन में आलिया भट्ट, रणबीर कपूर, सलमान खान से किसी वैज्ञानिक सिद्धान्त पर चर्चा करते हैं. टीओआई, एक्सप्रेस, हिन्दू में कौन-सा साइंटिफिक पेपर छपता है, जिसे देश के अमीर नौकरशाह-फिल्मस्टार-कारोबारी पढ़ते हैं.

यह वही कोलोनियल स्लेवरी है और भाषाई इलीटइज्म है जो कभी रूस, ब्रिटेन और फ्रांस में भी थी कि वहां का सत्ताधारी वर्ग अपने लिए अलग जबान रखता था. अफसोस यह है कि वहां तो यह राजशाही में हुआ था, हमारे यहां लोकतंत्र के नाम पर होता रहा है.

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