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ऑनलाइन शिक्षण

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 6, 2020
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ऑनलाइन शिक्षण

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

अचानक से यह शब्द बहुत अधिक चर्चा में आ गया है. गम्भीर शिक्षार्थियों के लिये यह महामारी के इस संकटकाल में अपनी पढ़ाई जारी रखने का सहज रास्ता बन कर आया, वहीं बहुत सारे निजी स्कूलों के लिये बंदी के लंबे दौर में भी अभिभावकों से नियमित फीस ऐंठने का सहज बहाना बना.

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सिस्टम तो ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिशों में काफी पहले से लगा था, कोविड-19 संकट ने उसे बड़ा अवसर और उससे भी बड़ा बहाना दे दिया. आमलोगों ने भी इस संकट के दौरान ही पहली बार ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली को गम्भीरता से जाना और विवश भाव से ही सही, इसे स्वीकार किया. आखिर, उनके लिये बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है जिन पर संक्रमण का सतत खतरा है.

हालांकि, ऑनलाइन शिक्षा के प्रति सिस्टम और आम लोगों की सोच में अंतर है. जब सिस्टम में शिक्षा को अधिकाधिक ऑनलाइन करने की सोच पनप रही थी तो इस सोच के केंद्र में स्वास्थ्य या किसी तरह का संक्रमण तो बिल्कुल ही नहीं था.

सिस्टम चाहता था कि तकनीकी विकास का लाभ लेकर ऑनलाइन शिक्षा को अधिकाधिक बढ़ावा दिया जाए ताकि संस्थानों के स्थापना खर्च में कमी की जा सके. कम इंफ्रास्ट्रक्चर और कम स्टाफ में अधिक से अधिक शिक्षण. तकनीक इसे सम्भव भी बना रहा था.

ऑनलाइन प्रणाली ने शैक्षणिक संपर्कों को असीमित विस्तार दिया और यह इसकी सबसे महत्वपूर्ण देन है. ज्ञान के परस्पर आदान-प्रदान के दायरे वैश्विक हो गए और पिछड़े क्षेत्रों के ज्ञानार्थियों को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वानों को सुनने-जानने, अक्सर परस्पर संवाद का मौका भी मिला.

लेकिन, ऑनलाइन प्रणाली में सिस्टम के लिये सबसे अच्छी बात यह थी, जो वह शिद्दत से चाहता भी था कि इसमें किसी खास स्थल या कैम्पस में युवा छात्रों का जमावड़ा लगने की बात नहीं थी.

जैसे-जैसे यह दौर आगे बढ़ रहा है, बदलते दौर के साथ सिस्टम जिन शक्तियों की मुट्ठियों में कैद होता जा रहा है, वे नहीं चाहते कि किसी एक जगह युवाओं का नियमित जमघट लगता रहे.

सैकड़ों-हजारों युवाओं के एक साथ होने के अपने खतरे हैं और सिस्टम पर काबिज शक्तियों के लिये ये कभी भी चुनौती खड़ी कर सकते हैं. चुनौतियां खड़ी होती भी रही हैं.

भारतीय आंदोलनों के इतिहास में कैम्पसों की बड़ी, बल्कि निर्णायक भूमिका रही है. यहां विचार हैं, तर्क हैं, सवाल हैं, आक्रोश हैं, अभिव्यक्ति की आकुलताएं हैं, विरोध की व्यग्रताएंं हैं. यही सब मिल कर तो आंदोलनों या क्रांतियों की भूमिका तैयार करते हैं.

सिस्टम कैसे चाहेगा कि कैम्पसों का यह रूप बरकरार रहे ! आखिर युवाओं के शोषण के बल पर ही इस सिस्टम को फलना-फूलना है. तो ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा देना समय से अधिक सिस्टम की मांग है. कोविड-19 ने इसे स्वर्णिम अवसर भी दे दिया.

सिस्टम के लिये एक अच्छी बात यह भी है कि ऑनलाइन शिक्षण में छात्रों और शिक्षकों के संबंध अत्यंत ही औपचारिक होते हैं. कैम्पसों में यह संबंध अक्सर अनौपचारिक भी होते हैं जो विचारों के संक्रमण में बड़ी भूमिका निभाते हैं. सिस्टम को विचार शून्य समाज, विचार शून्य युवा चाहिये.  इसके लिये शिक्षकों और छात्रों के अनौपचारिक संबंधों को हतोत्साहित किया जाना जरूरी है.

बहरहाल, कोविड-19 की अफरातफरी में जो ऑनलाइन शिक्षा देने की विवशता हो गई है उसमें अधिकतर मामलों में नाटक के सिवा कुछ और नहीं. खास कर छोटे शहरों और कस्बाई-ग्रामीण इलाकों के अधिकतर शिक्षकों को ऑनलाइन शिक्षा देने का कभी कोई अनुभव नहीं रहा. बहुत सारे लोगों में तकनीकी स्तर पर न्यूनतम दक्षता का भी अभाव है क्योंकि वे इस स्थिति के लिये बिल्कुल तैयार नहीं थे.

यही स्थिति छात्रों के एक बड़े वर्ग की भी है जो ऑनलाइन प्रणाली के लिये मानसिक तौर पर बिल्कुल भी तैयार नहीं. नेटवर्क की गुणवत्ता, गैजेट्स की उपलब्धता आदि तो महत्वपूर्ण मुद्दे हैं ही.

किसी भी शिक्षा-प्रणाली में देखने की बात यह है कि सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र और समाज उसके प्रति किस तरह रिएक्ट करते हैं. जाहिर है, भारत के विशेष परिप्रेक्ष्य में यह सवाल और अधिक मौजूं है.

आजकल कई विशेषज्ञ और विचारक अक्सर यह कहते सुने जा रहे हैं कि जिस तरह इतिहास को ईसा पूर्व और ईसा के बाद देखने की दृष्टि रही है, उसी तरह आने वाले समय में इतिहास को कोविड-19 पूर्व और पश्चात के विभाजन के साथ विश्लेषित किया जाएगा. जाहिर है, कोरोना त्रासदी का यह दौर बहुत कुछ स्थायी तौर पर बदल देगा. शिक्षा-प्रणाली भी इन बदलावों से प्रभावित होगी.

पिछड़े इलाके, आर्थिक रूप से विपन्न समुदाय, तकनीकी विकास में पीछे पड़ चुके समाज शिक्षा के क्षेत्र में आने वाले इन बदलावों के साथ किस तरह जुड़ पाते हैं, सिस्टम उन्हें कितना जोड़ पाता है, ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर कितनी गम्भीरता बरती जाती है, कितना नाटक किया जाता है. आने वाले दौर में यह सब देखना-समझना दिलचस्प होगा.

इस बीच टीवी पर ऑनलाइन कोचिंग के विज्ञापनों की संख्या अचानक से बढ़ गई है..जाहिर है, कोचिंग का पारंपरिक तंत्र अचानक से इस कदर ध्वस्त हो गया है कि उसे फिर से खड़ा होने में वर्षों लग सकते हैं, तब भी यह अपने पुराने रूप में शायद अब कभी लौट नहीं सके.

यद्यपि, ब्लैकबोर्ड पर चॉक-डस्टर लेकर सामने खड़े शिक्षक का विकल्प नहीं, उसे फिर से उस जगह पर खड़ा होना ही होगा लेकिन, कोविड-19 ने हमें अचानक से ऑनलाइन शिक्षा के आंगन में भी धकेल दिया है, जो इसमें पीछे रह जाएंगे वे जीवन की दौड़ में पीछे रह जाएंगे. समय कितनी तेजी से बदल गया !

जो समाज इन बदलावों के साथ जीना और आगे बढ़ना सीख लेगा वह उतना ही विकास करेगा. पता नहीं, सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ा हमारा कस्बाई/ग्रामीण समाज समय के इन तेज पहियों की गति के साथ कितना तारतम्य बिठा सकेगा.

केरल से आई एक खबर के अनुसार नौवीं कक्षा की एक अछूत छात्रा ने ऑनलाइन क्लास में शामिल नहीं हो पाने के कारण कथित तौर पर आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके पास स्मार्टफोन नहीं था और उसके घर का टेलीविजन काम नहीं कर रहा था. पिता दिहाड़ी मजदूर है, घर में कंप्यूटर आदि कुछ नहीं, पैसे की तंगी के चलते टीवी भी ठीक नहीं करा पाये.

केरल में सोमवार से ऑनलाइन कक्षाओं के साथ नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुआ है. विद्यार्थियों के लिए ऑनलाइन क्लास शुरू होने के कुछ ही घंटों बाद वलनचेरियन के पास 14 वर्षीय देविका ने अपने घर के पास आग लगाकर आत्महत्या कर ली. देविका प्रतिभाशाली छात्रा थी, घबराई हुई व परेशान थी और डिजिटल क्लास में भाग लेने में असमर्थ होने की वजह से निराश.

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