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राष्ट्रभाषा का सवाल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 26, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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राष्ट्रभाषा का सवाल
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राष्ट्रभाषा का सवाल

राम चन्द्र शुक्ल

काबिले तारीफ है कि कोई अपनी भाषा या उस भाषा के साहित्य से प्रेम करे व लगाव रखे, यह बात बंगलाभाषियों पर पूरी तरह से लागू होती है. वे अपनी भाषा से तथा उसके साहित्य से खूब स्नेह करते हैं, करना भी चाहिए. दो बंगला भाषी देश व दुनिया के किसी भी हिस्से में मिलें तो वे आपस में बंगला भाषा में ही बात करेंगे – वहां की स्थानीय भाषा में नही. यह भी काबिले तारीफ है, पर कभी कभी जब उनका यह मातृ भाषा प्रेम सुपीरियारिटी काम्पलैक्स का रूप धारण कर लेता है तो बात अखरने लगती है. कई बंगाली मित्रों से आमने-सामने तथा सोशल मीडिया पर बातचीत होती है तो पहली बात तो वे हिंदी को राजभाषा के दर्जे पर आपत्ति जताते हैं. हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के सवाल पर तो वे झगडे पर उतारू हो जाते हैं.

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हिंदी के प्रति यही मानसिकता कुछ पंजाबी भाषियों में देखी है. वे भी हिंदी को राष्ट्र भाषा तो क्या राज भाषा बनाने का भी विरोध करते हैं. यह चीज थोड़ी मात्रा में मराठी भाषियों में पायी जाती है पर कुछ कठमुल्ले टाइप के लोगों में ही. इसका एक कारण मुझे यह लगता है कि मराठी व हिंदी दोनों ही भाषाओं की लिपि देवनागरी है. साथ ही भाषिक व व्याकरणिक समानता भी दोनों भाषाओं में काफी हद तक है.

इन तीनों भाषाओं के बोलने वालों की एक शिकायत समान है कि हिंदी साहित्यिक रूप से गरीब भाषा है. उनसे पूछा जाए कि आपने हिंदी का कितना व किन-किन रचनाकारों का साहित्य पढ़ा है तो वे तुरंत बगलें झांकने लगते हैं तथा यह कहते हैं कि हिंदी साहित्य में पढ़ने लायक रचनाएंं कहांं हैं ?

किसी भाषा के साहित्य को पढ़े बिना उसे साहित्यिक रूप से गरीब मानने को मैं गावदूपन के सिवा और कुछ नहीं मानता. अंग्रेजी के सवाल पर ये सभी ज्यादातर एकमत हैं कि केंद्र व राज्यों के मध्य संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी को बनाए रखा जाना चाहिए.

इसके ठीक विपरीत अंग्रेजी की अनिवार्यता का सबसे जादा खामियाजा वे हिंदी भाषी भुगत रहे हैं जो ग्रामीण पृष्ठभूमि के तथा कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों से संबंध रखते हैं. अभी तक केंद्र की लगभग सभी सरकारें हिंदी के राजभाषा के दर्जे को वास्तविकता में लागू करने से कतराती रही हैं. हांं, वे हिंदी दिवस व हिंदी पखवाडा मनाए जाने का कर्मकांड खूब अच्छी तरह करती रही हैं. यही काम समाजवादी कांग्रेस करती रही है तथा यही काम वर्तमान राष्ट्रवादी भी कर रहे हैं.

यह निश्चित है कि इस देश में एक न एक दिन हिंदी राज भाषा के रूप में तो लागू ही होगी, साथ ही राष्ट्र भाषा के रूप में भी उसे लागू करना होगा तथा अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म होगी, तथा वह चीन जापान व कोरिया की तरह एक ऐच्छिक भाषा बन कर रह जाएगी. पर यह स्थिति आने में हो सकता है कुछ समय लगे. यह तभी संभव होगा जब इस देश की सत्ता देश के बहुसंख्यक मेहनतकशों व किसानों के हाथ में आएगी, पर एक न एक दिन यह होगा जरूर.

जहांं तक हिंदी प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड) की जनता का सवाल है तो वह जैसे अपने जीवन में सहिष्णु हैं, वैसे ही भाषा व साहित्य के मामले में भी हैं. इस बात की एक वृहद सूची तैयार की जानी चाहिए कि अब तक दूसरी भारतीय भाषाओं का कितना साहित्य व अन्य विषयों/विधाओं की किताबें हिंदी में अनुवादित हो चुकी हैं.यह काम वृहद पैमाने पर निरंतर हो रहा है.

मैंने खुद उड़िया, असमिया, बंगला, मराठी, तेलगु, कन्नड़, मलयालम, तमिल, पंजाबी तथा उर्दू भाषाओं से हिंदी में अनुवादित इतना सारा साहित्य पढ़ा है कि यदि उसकी सूची बनाने लगूं तो वह बहुत लंबी हो जाएगी.

जहाँ तक श्रेष्ठता व यथार्थ बोध का सवाल है तो मैं पहले नंबर पर पंजाबी, दूसरे पर बंगला, तीसरे पर कन्नड़ तथा चौथे स्थान पर उर्दू को रखना चाहूंंगा. दक्षिण की चारों भाषाओं में सर्वश्रेष्ठ साहित्य कन्नड़ का है. पूर्वी भारत की सभी भाषाओं (असमिया, मणिपुरी, उड़िया तथा बंगला) में सर्वश्रेष्ठ साहित्य बंगला भाषा में लिखा गया है, जो कि बंगलादेश की राज व राष्ट्र भाषा है. जहांं तक उत्तर की भाषाओं (कश्मीरी, सिंधी, उर्दू व पंजाबी) का सवाल है तो इन चारों भाषाओं में सर्वश्रेष्ठ साहित्य पंजाबी का है. अब बची पश्चिमी भारत कीभाषाएं (गुजराती, कोंकणी तथा मराठी) तो इन तीनों भाषाओं में साहित्यिक रूप से सर्वाधिक श्रेष्ठ भाषा मराठी है.

हिंदी पूरे देश की जनता समझ लेती है तथा काम चलाऊ बोल भी लेती है. अगले साल जनगणना होनी है, तब तक देश की आबादी एक सौ चालीस करोड़ तक हो जाने की संभावना है, जिसमें से 70 से 80 करोड़ लोग हिंदी भाषी होंगे इसलिए संविधान में की गयी व्यवस्था के अनुरूप सरकारी कार्य व व्यवहार में हिंदी भाषा को देश की राजभाषा के साथ ही राष्ट्रभाषा भी बनाना होगा तथा अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता को सभी क्षेत्रों से खत्म कर इसे पूरी तरह से ऐच्छिक भाषा का दर्जा देना होगा.

यह काम जितनी जल्दी होगा उतना ही देश व देश की बहु संख्यक जनता के हित में होगा, तभी देश का विकास सच्चे अर्थों में संभव होगा.

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क्या इस समय और समाज को एक नई भाषा की ज़रूरत नहीं है ?
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