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सिनेमा के पर्दों पर बदलता राजनीति के पतन का जमीनी चेहरा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 31, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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सिनेमा के पर्दों पर बदलता राजनीति के पतन का जमीनी चेहरा

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

1984 में अमिताभ बच्चन की एक फ़िल्म आई थी ‘इंकलाब’ और राजेश खन्ना की एक फ़िल्म आई थी ‘आज का एमएलए रामअवतार.’ दोनों फिल्मों की पृष्ठभूमि राजनीतिक थी और उस दौर में इन फिल्मों को लेकर खूब विवाद हुए थे.

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दरअसल, साउथ के विख्यात निर्देशक दासारि नारायण राव ने तेलुगु में एक फ़िल्म बनाई थी ‘एमएलए एडुकोंडालु’, जो अपनी राजनीतिक विषयवस्तु को लेकर खासी चर्चित हुई थी. राजनीति में गलत लोगों के प्रवेश और उनकी कारगुजारियों पर बातें करती इस फ़िल्म ने अच्छी व्यावसायिक सफलता भी हासिल की.

तेलुगु फ़िल्म की सफलता से उत्साहित होकर दासारि नारायण राव ने इसका हिन्दी रीमेक बनाने का फैसला किया और राजेश खन्ना को मुख्य भूमिका में लेकर काम शुरू कर दिया. फ़िल्म का नाम रखा गया…’आज का एमएलए.’

तभी, खबर आई कि इसी विषय वस्तु से मिलती जुलती एक फ़िल्म का निर्माण अमिताभ बच्चन को लेकर भी शुरू हो गया है. निर्देशक भी साउथ के ही थे टी रामाराव. अब विवाद छिड़ गया.

दोनों फिल्मों के निर्माता-निर्देशक एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे कि उन्होंने उनका आइडिया चुराया है. उस दौर की फिल्मी पत्रिकाओं में इस विवाद की खबरें चलती रही, शायद कोर्ट या किसी प्राधिकार में भी यह मामला गया.

इसी बीच खबर आई कि इसी से मिलते-जुलते कंटेंट पर तब के बड़े अभिनेता जितेंद्र को ले कर भी एक फ़िल्म शुरू हो गई है. अब, विवाद भी चलते रहे और तीनों फिल्मों की शूटिंग भी जारी रही.

मुख्य विवाद राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की फिल्मों के बीच था. जितेंद्र की फ़िल्म विवाद को त्रिकोणात्मक बना तो रही थी, लेकिन उतनी चर्चा में नहीं थी.

‘इंकलाब’ पहले पूरी हुई. कहा जाता है कि अमिताभ की व्यस्तताओं के बावजूद उनकी यह फ़िल्म रिकार्ड समय में बना ली गई थी. जनवरी, 1984 में यह रिलीज हो गई.

इधर, जल्दी ही राजेश खन्ना की फ़िल्म भी पूरी हो गई, लेकिन इसके नाम को लेकर सेंसर बोर्ड ने अड़ंगा डाल दिया तो ‘आज का एमएलए’ में ‘रामअवतार’ जोड़ कर फ़िल्म का नाम हुआ ‘आज का एमएलए रामअवतार.’

मार्च, 1984 में एमएलए रामअवतार भी सिनेमा हॉलों में लग गई. तब तक ‘इंकलाब’ फ़िल्म हिट हो चुकी थी और अपने क्लाइमेक्स को लेकर खासी विवादित भी.

कहा जाता है कि रामअवतार के निर्देशक ने इंकलाब के क्लाइमेक्स को देखते हुए अपनी फिल्म में कुछ जोड़ घटाव कर दिए, ताकि कहानी में कुछ अलग नजर आ सके.

बहरहाल, दोनों फिल्मों में कोई सुपर हिट तो नहीं हुई, लेकिन हिट का तमगा दोनों को मिला. इस दौरान, जितेंद्र की फ़िल्म कब आई, लोगों ने उतनी नोटिस नहीं ली. हालांकि, वे बड़े स्टार थे, उनका अपना दर्शक वर्ग था, इसलिये वह फ़िल्म भी चली ही. अपने क्लाइमेक्स को लेकर अमिताभ की ‘इंकलाब’ की चर्चा सबसे अधिक हुई.

फ़िल्म की मूल कहानी यह थी कि एक सीधा-साधा शरीफ आदमी राजनीति की भूलभुलैया में भटकते, सीढियां चढ़ते एक दिन मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाता है. इसे आप ‘एक्सिडेंटल चीफ मिनिस्टर’ कह सकते हैं.

राजनीतिज्ञों को करीब से देखने-जानने के बाद हीरो महाशय के मन में उनके लिये वितृष्णा और आक्रोश के भाव उभरते जाते हैं लेकिन, वह इन भावों को छुपाता चलता है और राजनीति की गोटियां खेलता रहता है.

बतौर मुख्यमंत्री शपथ लेने के दौरान वह मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों के प्रोफ़ाइल देखता है. एक से एक बेईमान, हत्यारे, ब्लैक मार्केटियर, मिलावटखोरों से सुसज्जित अपने मंत्रिमंडल के तमाम सदस्यों को पहले वह बुरी तरह ज़लील करता है, फिर, पहले से अपने ब्रीफकेस में छुपा कर लाए गए किसी अत्याधुनिक हथियार से तड़ातड़ गोलियां चलाते वह तमाम मंत्रियों की हत्या कर देता है.

हमलोग नए-नए कॉलेज गोइंग थे उस दौर में. सिनेमा हॉल का माहौल याद है, जब अमिताभ अपनी स्टेनगन से तमाम मंत्रियों को भून रहे थे तो पूरा हॉल उन्माद भरे शोर में गूंज उठा था. दोस्तों के साथ हमने कई बार उस फिल्म को देखा. हमेशा यही देखा भ्रष्ट, कुटिल, हत्यारे राजनीतिज्ञों पर स्टेनगन से गोलियां बरसाते अमिताभ और पागलों की तरह हल्ला करती ऑडिएंस. जैसे, भीड़ को भी कोई दौरा पड़ा हो.

गोलियों की तड़तड़ाहट…उन्मादित भीड़ का शोर…तड़ तड़ तड़ तड़…हो…हो..हो…हो…मारो सालों को, भून दो हरामजादों को.

कई मिनट तक गोलियां चलती हैं, पूरा मंत्रिमंडल मारा जाता है. चेहरे पर संतुष्टि का भाव लिये दर्शक हॉल से बाहर निकलते हैं…’ऐसा ही करना चाहिये सालों के साथ’…’एकदम ठीक किया’..आदि आदि.

वह 1984 था. आज से 36 वर्ष पहले का दौर. आजादी मिले तब चार दशक भी पूरे नहीं हुए थे लेकिन, राजनीति इतनी पतित हो चुकी थी कि सही लोगों का राजनीति में आना और बना रहना प्रायः असम्भव हो चुका था. विधानसभाएं और लोकसभा भी एक से एक घृणित नेताओं से भर गई थी.

तब तक गुंडों को डायरेक्ट माननीय बना देने का चलन बहुत जोर नहीं पकड़ पाया था. गुंडों के सफेदपोश सरदार ही अधिकतर एमएलए और एमपी बनते थे. गांधी टोपी पहने, खादी धारण किये, विकास और गरीबों की बात करते लेकिन, असल में एक से एक कुकर्म करते, गरीबों का खून पीते, गुंडों को पालते, चुनावों में बूथ कैप्चर करते, हत्या करवाते, ड्रग्स और नशे का धंधा करते, जाति का कार्ड खेलते… पता नहीं क्या क्या करते !

जनता त्रस्त थी, लेकिन जनता ही थी. आज भी त्रस्त है, लेकिन, क्या करे, आखिर जनता ही है. जाति, धर्म और न जाने किन किन आधारों पर विभाजित. पर, भीतर ही भीतर उतनी ही आक्रोशित, जिसकी एक झलक अमिताभ के स्टेनगन चलाने के दौरान जनता की उन्मादित प्रतिक्रियाओं से मिली थी या बाद की फिल्मों में भी. जब इस तरह के दृश्यों का सृजन किया गया तो जनता ने उत्साह से तालियां बजाई, खूब शोर मचाया.

तब से साढ़े तीन दशक बीत चुके हैं. राजनीति अपनी पतन गाथा के एक से एक अध्याय लिख चुकी है. अब कोई गुंडा किसी राजनीतिज्ञ से संरक्षण पाने के बजाय खुद माननीय बन जाना प्रेफर करता है. पहले, जो बहुत बड़ा गुंडों का सरदार और काले धन का मालिक होता था वह एमएलए ही नहीं, मंत्री भी बनता था. अब बड़े वाले गुंडों का मंत्रिमंडल में डायरेक्ट शामिल होना आम चलन में है.

जनता पहले भी दमित आक्रोश की अभिव्यक्ति का मंच मिलने पर किसी सिनेमा हॉल, किसी थियेटर में मनोवैज्ञानिक स्तरों पर संतुष्ट हो लेती थी. आज तो इसकी भी अधिक जरूरत नहीं रही. आज जनता इतनी सोचती ही नहीं.

आज तो जनता इतनी भक्त है कि अगर गुंडा जी किसी मर्डर केस में संयोगवश सजायाफ्ता हो गए तो उनकी जगह उनकी पत्नी को, उनके भाई या किसी भी परिजन को सिर माथे पर उठाने को तत्पर रहती है. फिर, जाति भी तो एक चीज है. जाति की गौरव-गरिमा का ठेका जितनी अच्छी तरह गुंडा जी लोग ले सकते हैं, उतना कोई सामान्य-शरीफ आदमी कैसे ले सकता है ?

1984 के लगभग दशक भर बाद आर्थिक उदारीकरण और उपभोक्तावाद का बोलबाला अपने देश में भी बढ़ने लगा. स्वाभाविक भी था. इतिहास और विकास के चक्र की गति को रोका नहीं जा सकता.

यह 2020 है. 1984 के बाद साढ़े तीन दशक बीत चुके हैं. समय आगे बढ़ा तो देश भी आगे बढ़ा. अब एमएलए लोग खुल कर बिकते हैं. लाज-शरम भी नहीं. अब जब निष्ठा बदलने के 10-20 करोड़ तक मिलने लगें तो क्यों नहीं बदलें ? चरित्र दर्शाने से वोट नहीं मिलते. चुनाव लड़ने, राजनीति में बने रहने के लिये पैसा सबसे बड़ी जरूरत है.

सोचता हूंं, 1984 के दौर का नायक तब के ही नेताओं से इतना गुस्सा हो गया था कि उन्हें सामूहिक रूप से स्टेनगन से भून डाला. वह अगर 2020 में जन्म ले और आज की राजनीति और आज के राजनेताओं को देखे तो क्या करेगा…???

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