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जम्मू-कश्मीर में ‘लॉकडाउन’ का एक वर्ष

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 2, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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जम्मू-कश्मीर में ‘लॉकडाउन’ का एक वर्ष

धारा 370 को समाप्त हुए लगभग एक साल हो चुका है. धारा 370 को समाप्त करते हुए केन्द्र सरकार और भाजपा द्वारा कहा गया था कि इससे जम्मू-कश्मीर में शांति कायम हो जायेगी और कश्मीर देश का सबसे विकसित राज्य बन जायेगा. उस समय जो गिरफ्तारियां की गयीं और जो कर्फ्यू लगाया गया उसके बारे में कहा गया कि ये कुछ समय में वापस हो जायेंगे लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद स्थिति इसके उलट है.

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5-6 अगस्त, 2019 को किए गए असंवैधानिक बदलाव के खिलाफ कश्मीरी जनता के आक्रोश को दबाने के लिए 4 अगस्त को केन्द्र सरकार द्वारा पूर्ण बंदी के आदेश ने पूरे राज्य का चक्का जाम कर दिया. सिर्फ कश्मीर घाटी में 88 लाख मोबाइल फोन बंद कर दिए गए. राज्य की संसदीय पार्टियों और अलगाववादी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व समेत 6,600 लोग गिरफ्तार कर लिए गए. राज्य में सुरक्षा बलों की मौजूदगी काफी बढ़ा दी गयी ताकि लोगों को गिरफ्तार किया जा सके, या हिरासत में रखा जा सके और प्रदर्शनों को रोका जा सके.

यद्यपि जम्मू-कश्मीर में कितने दिन कर्फ्यू रहा है, इसका आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. जन गोलबंदी पर 4 अगस्त, 2019 से लेकर 24 मार्च, 2020 तक प्रतिबंध रहा और उसके बाद से कोविड-19 महामारी का लॉकडाउन रहा है. लैंडलाइन को 2019 के अंत में पुनर्बहाल किया गया और मोबाइल को जनवरी 2020 में. इंटरनेट तक पहुंच अभी भी 2 जी के माध्यम से ही है. सिर्फ ‘सफेद सूची’ वाले सोशल मीडिया की इजाजत है.

इंटरनेट पर बाधाओं की वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग का व्यापक नुकसान हुआ है. इंटरनेट प्रतिबंधों पर नजर रखने वाले एक अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ ‘एक्सेस नाऊ’ के अनुसार जम्मू और कश्मीर का इंटरनेट प्रतिबंध चीन और म्यांमार को छोड़कर दुनिया का सबसे लंबा प्रतिबंध है.

कश्मीर मसले को हल करने के लिए वार्ता प्रक्रियाओं के बंद हो जाने से लोगों में निराशा और असहजता है. यह नौजवानों में ज्यादा है. 2017 के बाद से उग्रवाद विरोधी उपायों के ज्यादा सख्त हो जाने ने समाज को घायल किया है और हिंसा को सामाजिक वैधता प्रदान की है. साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (एसएटीपी) के अनुसार आतंकी हिंसा की घटनायें जो कि 2013 में घटकर 84 हो गयी थी, 2018 में बढ़कर 205, 2019 में 135 और 2020 के साढ़े 6 माह में 80 हो गयी हैं. उग्रवाद और मरने वालों में स्थानीय लोगों की संख्या भी बढ़ रही है.

एसएटीपी की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 2018 में हुई 257 उग्रवादी मौतों में से कम से कम 142 स्थानीय हैं. ऐसे ही 2019 के 152 उग्रवादी मौंतो में से कम से कम 120 स्थानीय हैं. स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय भावनाओं का सांप्रदायीकरण हो. गहरे रूढ़िवादी धार्मिक सांस्कृतिक तत्वों ने विविध क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाया है.

अगस्त, 2019 के बाद के व्यापक प्रतिबंधों से ऊपरी तौर पर आतंकी वारदातों में कमी दिखाई दे रही है लेकिन लंबे लॉकडाउन, गिरफ्तारियां और मीडिया और 4 जी मोबाइल इंटरनेट पर प्रतिबंध ने एक चिंताजनक बेचैनी और युवा आक्रोश पैदा किया है.

4 अगस्त के बाद से गिरफ्तार किए गए ज्यादातर लोगों को छोड़ दिया गया लेकिन जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ्तार किए गए 444 लोगों में से 389 लोग मार्च, 2020 तक बंद थे. मार्च, 2020 के आंकड़े के अनुसार कुल 437 लोग अभी भी गिरफ्तार हैं. शुरूआती इंकार के बाद केन्द्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने उच्चतम न्यायालय में स्वीकार किया कि अगस्त-सितम्बर, 2019 में 144 बच्चों को हिरासत में रखा गया.

4 अगस्त के बाद से धारा 144 का अतार्किक तरीके से इस्तेमाल हुआ है. उच्चतम न्यायालय के धारा 144 संबंधी आदेशों को प्रकाशित करने के आदेश के बावजूद इसका पालन नहीं हुआ. मीडियाकर्मी और कार्यकर्ताओं के खिलाफ पर्याप्त आधार के बगैर देशद्रोह, पीएसए और यूएपीए लगाया जा रहा है.

अगस्त, 2019 से मार्च के बीच मात्र 2 सप्ताह के लिए स्कूल खुले. इस दौरान भी अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए चिंतित अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजा. कोरोना के लॉकडाउन के बाद चलने वाली ऑनलाइन कक्षाओं में 4 जी इंटरनेट नहीं होने की वजह से काफी दिक्कतें आईं. प्रतिबंधों ने बच्चों के ऊपर बुरा मनौवैज्ञानिक असर डाला है.

बच्चे और किशोर उदास, अकेलापन और कटा-सा महसूस करते हैं. बच्चों के प्रति मां-बाप की चिंतायें भी बढ़ी हैं. इंटरनेट बाधाओं की वजह से शिक्षकों को भी अपनी तैयारी में और अपनी बातों के प्रसारण में काफी समस्यायें आई. उच्च शिक्षा के छात्रों को अध्ययन की तो समस्या हो ही रही हैं, ऑनलाइन परीक्षायें उनके तनाव का अतिरिक्त कारण हैं.

4 अगस्त, 2019 से राज्यव्यापी धारा 144 लागू होने से मरीजों का अस्पताल जाना या डॉक्टरों से संपर्क करना अत्यंत कठिन हो गया. टेलीफोन सेवा बंद करने की वजह से एंबुलेन्स और फायर ब्रिगेड के आकस्मिक नंबर भी बंद थे. दवाओं की कमी हो गयी और अस्पतालों और क्लिनिकों तक उनके वितरण में देरी हुई.

कोरोना लॉकडाउन में आवाजाही के संबंध में स्थिति पहले जितनी बुरी नहीं है लेकिन कोरोना के अलावा अन्य मरीजों के लिए इलाज हासिल करना असंभव जैसा है. कोरोना लॉकडाउन में भी डाक्टरों को चेक पोस्ट पर रोके जाने-पीटे जाने और प्रताड़ित किए जाने की घटनायें हुई हैं.

इंटरनेट बाधाओं की वजह से डॉक्टरों को कोविड के सम्बन्ध में जानकारी हासिल करने और वीडियो कान्फ्रेंस के द्वारा मरीजों का इलाज करने में दिक्कतें आ रही हैं. लोगों की आर्थिक समस्यायें बढ़ जाने की वजह से भी उन्हें इलाज की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. लोगों की मानसिक रोग की समस्या भी बढ़ी हैं. आत्महत्या की प्रवृत्ति और नशे का सेवन बढ़ा है.

अगस्त, 2019 के प्रतिबंधों से पहले जम्मू-कश्मीर आर्थिक तौर पर और मानव विकास सूचकांक के आधार पर बढ़िया प्रदर्शन कर रहा था. यह निचली गरीबी दर वाले देश के दस अच्छे राज्यों में शामिल था. इसका निवल राज्य घरेलू उत्पाद 2011-12 में 53,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2016-17 में 78,000 करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में इसका प्रति व्यक्ति राज्य घरेलू उत्पाद 60,000 रुपये से बढ़कर 1,00,000 रुपये हो गया था.

अगस्त के प्रतिबंधों के बाद से राज्य लगातार गोता लगा रहा है. दिसम्बर, 2019 तक राज्य की अर्थव्यवस्था काफी दयनीय हो गयी. कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (केसीसीआई) के अनुसार इन चार महीनों में कश्मीर के उद्योगों को 17,878.18 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ जबकि लगभग 5 लाख रोजगार समाप्त हुए. अगस्त 2019-जून 2020 की पूरी अवधि में 40,000 करोड़ के नुकसान का अनुमान है.

जम्मू के तुलनात्मक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन जम्मू चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इण्डस्ट्री ने प्रशासन से व्यवसायों को हुए नुकसानों का आंकलन करने और मुआवजा देने की मांग की है. उन्होंने स्थानीय लोगों की इकाईयों को बड़ी औद्योगिक इकाईयों की प्रतियोगिता से बचाने के लिए संरक्षण देने की भी मांग की है.

फल उद्योग जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था का 10 प्रतिशत है. यातायात बाधाओं की वजह से यहां 1.35 लाख मीट्रिक टन फसल का नुकसान हुआ. सोपोर के एक फल व्यापारी के अनुसार प्रायः सभी सेब व्यापारी विभिन्न बैंकों का उधार चुकाने में असमर्थ हो गये हैं.

सेब के व्यापार में 4 जी नेटवर्क का इस्तेमाल ऑनलाइन भुगतान, परिवहन की उपलब्धता, कीटनाशकों की गुणवत्ता की निगरानी और मंडी में फसलों की कीमत की जानकारी के लिए होता है. स्ट्रॉबेरी और चेरी की फसल तैयार है लेकिन इनको बेचने के लिए बाजार नहीं है.

पर्यटन राज्य की अर्थव्यवस्था का 8 प्रतिशत हिस्सा है. 2019 के अंत तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार पर्यटन से प्राप्तियों में 71 प्रतिशत की गिरावट है और उद्योग की रिपोर्ट के अनुसार 86-90 प्रतिशत की गिरावट है. अगस्त से दिसम्बर की अवधि में सिर्फ पर्यटन और दस्तकारी में 1,44,500 रोजगार समाप्त हुए.

जुलाई में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने नयी मसौदा हाउसबोट नीति जारी की है. इसके तहत हाउसबोट स्वामियों को सरकार की अलग-अलग एजेंसियों के मानकों पर खरा उतरते हुए अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना होगा. इसके लिए काफी कम समय के भीतर हाउसबोट को नए सिरे से बनाना होगा.

हाउसबोट का व्यवसाय प्रभावित होने पर शिकारा वालों, फूल बेचने वालों, मछुआरों, फोटोग्राफरों, लकड़ी के काम से जुड़े लोगों, दस्तकारी से जुड़े लोगों आदि का भी व्यवसाय प्रभावित होगा. इस साल अमरनाथ यात्रा के सीमित होने का असर भी लोगों के रोजगार पर पड़ेगा.

इंटरनेट पर निर्भर व्यवसाय सबसे बुरी तरह प्रभावित है. आईटी कम्पनियों के बाहर स्थानांतरित हो जाने की वजह से कामगारों की छंटनी हुई है. कुटीर, कपड़ा उद्योग, कालीन-दरी उद्योग आदि बिक्री के लिए ऑनलाइन आर्डर पर निर्भर करते हैं, इन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ा है.

बस और ट्रक के बंद होने से इनके ड्राइवर बेरोजगार हुए. इनके मालिकों की ऋण की किश्तें अटक गयीं. दुकानों और छोटे व्यवसायों के नुकसान का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन मीडिया में व्यक्तिगत नुकसान की असंख्य रिपोर्टें मौजूद हैं.

अगस्त, 2019 के बाद शुरूआती महीनों में अखबार नहीं प्रकाशित हुए. अखबार छोटे हो गये और उनकी सामग्री का स्तर भी गिरा. इससे ग्राहकों की संख्या कम हुई और दर्जनों पत्रकारों की नौकरियां गयी.

जुलाई, 2020 में जम्मू-कश्मीर की बेरोजगारी दर 17.9 प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय स्तर की दोगुनी है. शिक्षित युवाओं का एक चौथाई हिस्सा बेरोजगार है. यह भी राष्ट्रीय औसत से दोगुना है. मार्च, 2020 में घोषित नयी डोमिसाइल नीति ने बेरोजगारी बढ़ने के डर को और बढ़ा दिया है.

अगस्त, 2019 के बाद से जम्मू-कश्मीर की मीडिया में काफी बदलाव हुआ है. असंतोष से संबंधित न तो कोई खबर और न ही संपादकीय मीडिया में आते हैं. दैनिक अखबार सरकार के भोंपू बन गए हैं. 5 अगस्त, 2019 के बाद केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को अपने सीधे नियंत्रण में रखने के लिए पूरी तफसील से एक प्रक्रिया विकसित की.

गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर के लिए एक ‘संशोधित मीडिया नीति’ जारी की जो पांच साल तक लागू रहेगी, अगर इसे पहले बदला नहीं जाता है. यह नीति बगैर किसी शर्म के कहती है : ‘जम्मू-कश्मीर में महत्वपूर्ण कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की चिंताएं हैं. यहां सीमा पार से समर्थित और उकसाया गया परोक्ष युद्ध चल रहा है…यह महत्वपूर्ण है कि असामाजिक और राष्ट्रद्रोही तत्वों के शांति भंग करने के प्रयासों को निष्फल किया जाए. इसके लिए यह अपरिहार्य किया जाता है कि सरकार के विज्ञापनों के लिए अखबारों/न्यूज वेबसाइटों के पैनल तय करते समय उनके और उनके प्रकाशकों (सम्पादकों) महत्वपूर्ण व्यक्तियों के पूर्व इतिहास को देखा जाए.’

मीडिया की रोजमर्रा की निगरानी के लिए कहा गया है : ‘सूचना और जन सम्पर्क निदेशालय प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक और अन्य मीडिया की सामग्री की फर्जी खबर, चोरी के लेखन, अनैतिक और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए निगरानी करेगा.’ आगे कहा गया है कि ‘ऐसी सामग्री मिलने पर उन समूहों को पैनल से हटा दिया जाएगा और भारतीय दंड संहिता/साइबर कानून के तहत कार्यवाही की जाएगी.’ इस तरह जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने साम-दाम-दण्ड-भेद सभी तरीकों से जम्मू-कश्मीर में खास तौर पर कश्मीर घाटी में पत्रकारिता का गला घोंटने का रास्ता तैयार कर लिया है.

इस तरह हम देखते हैं कि धारा-370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर की जनता पर पूरे साल भर तरह-तरह की मुसीबतें ढहाई जाती रही हैं. वैसे तो धारा-370 को पहले ही काफी कमजोर किया जा चुका था और उसके रहने पर भी उससे जम्मू-कश्मीर के लोगों को कोई खास लाभ नहीं था लेकिन धारा-370 और 35-ए हटाना अपने आप में जम्मू-कश्मीर की जनता को यह संदेश देना था कि वे अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान को भूल जाए, नहीं तो लगातार मुसीबतें झेलते रहें.

केन्द्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ आबादी के संघटन (डेमोग्राफी) में बदलाव करने का प्रयास भी कर रही है लेकिन ऐसे कदमों से आज के जमाने में राष्ट्रीयता के संघर्षों को नहीं समाप्त किया जा सकता.

केन्द्र सरकार दावा कर रही है कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य होने की तरफ बढ़ रही है लेकिन बंदूक की नोंक पर किसी आबादी को सामान्य नहीं किया जा सकता. ऐसी स्थिति का अब-तक पाकिस्तानी सरकार लाभ उठाने की कोशिश कर ही रही थी, अब चीन की सरकार ने भी कश्मीर विवाद का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. पाकिस्तान में चीन के राजनयिक ने ट्वीट किया है कि ‘भारत-चीन सीमा विवाद गरमाने का कारण धारा-370 को हटाया जाना और लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया जाना है.’

कश्मीर की जनता के जले पर नमक छिड़कते हुए भाजपा धारा-370 को हटाये जाने पर जश्न मनाने जा रही है, कोई भी इंसाफ पसंद आदमी इस जश्न पर लानतें भेजेगा.

(दि फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स इन जम्मू एंड कश्मीर की रिपोर्ट पर आधारित. इस फ़ोरम की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन बी लोकुर और जम्मू-कश्मीर के लिए वार्ताकार समूह की सदस्य रहीं राधा कुमार ने की. इस फ़ोरम में इन दोनों के अलावा पूर्व जज एपी शाह व हसनैन मसूदी, पूर्व नौकरशाह गोपाल पिल्लई व निरुपमा राव और लेफ़्टिनेंट जनरल एच एस पनाग (सेवानिवृत्त) सहित 19 सदस्य भी शामिल थे.) (लेेेख ‘नागरिक’ पत्रिका से साभार)

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