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बहस – 1 : राम एक राष्ट्र के ही नहीं पूरी वैश्विक मानव जाति के हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 13, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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बहस - 1 : राम एक राष्ट्र के ही नहीं पूरी वैश्विक मानव जाति के हैं

Vinay Oswalविनय ओसवाल, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं चिंतक
धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत पाश्चात्य जगत के राजनैतिक दर्शन की देन है. त्यागने योग्य है. जिसको तिलांजलि दे भारतीय मनीषीयों द्वारा स्थापित ‘सर्व धर्म समभाव’ और ‘वसुधैवकुटुम्बकम’ जो भारतीय मनीषीयों के चिंतन की अवधारणा पर आधारित है, भारतीय राजनीति में ईमानदारी से अपनाने योग्य है.

अयोध्या में 5 अगस्त को भारत के प्रधानमन्त्री मोदी जी द्वारा राम मंदिर निर्माण का शुभारंभ करते हुए उसकी नींव का पूजन किया गया. इसके साथ ही भारत में राजनैतिक, सांस्कृतिक व सामाजिक इतिहास का बड़ा अध्याय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है.

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प्रधानमन्त्री के साथ मंच साझा करने वालों में आरएसएस के सरसंघ चालक मोहन भागवत जी की उपस्थिति विशेष तौर उल्लेखनीय रही है. तो उल्लेखनीय यह भी है कि राम मंदिर आंदोलन के तमाम हीरो चेहरे या तो कार्यक्रम स्थल पर ही मौजूद नहीं थे और जो मौजूद थे उनकी हैसियत मात्र दर्शक से ज्यादा नजर नहीं आ रही थी.

पाठक खुद विश्लेषण करें सत्ता सिंहासन पर बैठ जाने के बाद पार्टी की पालकी ढोने वाले कहारों को महल के दरवाजे के बाहर से विदा करके पीठ क्यों मोड़ ली गई ? नए भारत के निर्माण का खाका तैयार करने वाले कौन हैं ? और किनको गुमनामी के अंधेरे में धकेला जाना है ?उसके संकेत तो अर्से से मिल रहे थे, परन्तु अब उन संकेतों को मजबूत आधार दिया जा रहा है तो यह अच्छी बात है.

राम मंदिर निर्माण को लेकर जिस तरह प्रमुख राजनैतिक दलों के बयान आये हैं, वे भारतीय राजनीति में धर्म की भूमिका की पुनर्व्याख्या की मांग करते हैं. इससे धर्म और राज्य के उस रिश्ते में बदलाव लाया जा सकता है, जो अब तक भारतीय सैद्धांतिक राजनीति का हिस्सा रहा है. यानी ‘धर्म निरपेक्षता’ का नीति निदेशक सिद्धान्त.

धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत पाश्चात्य जगत के राजनैतिक दर्शन की देन है. त्यागने योग्य है. जिसको तिलांजलि दे भारतीय मनीषीयों द्वारा स्थापित ‘सर्व धर्म समभाव’ और ‘वसुधैवकुटुम्बकम’ जो भारतीय मनीषीयों के चिंतन की अवधारणा पर आधारित है, भारतीय राजनीति में ईमानदारी से अपनाने योग्य है.

प्रधानमन्त्री ने राम मंदिर की बुनियाद में ईंट को रखते हुए सम्भवतः ‘जय सियाराम’ के नारे के साथ पूरे विश्व में फैले सनातनधर्मावलम्बियों को सन्देश दिया है कि भारत में आने वाले समय में ‘धर्म और राज्य’ के उस रिश्ते में बदलाव आएगा जो अभी तक सैद्धांतिक रूप से ‘धर्म निरपेक्षता’ पर आधारित राजनीति का हिस्सा था.

आज जब मंदिर निर्माण में ज्यादातर राजनैतिक दलों ने श्री राम के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की है तो हम सरयू के तट से आये सन्देश को ग्रहण करें. अब जरूरत है कि देश के नव निर्माण में धर्म की शक्ति का सकारात्मक इस्तेमाल किए जाने की.

‘जयश्रीराम’ के उद्घोष से किसी अस्पष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संग्राम छेड़ने से पूर्व युद्धोन्माद पैदा करना एक बात है, ‘जय सियाराम’ का उद्घोष उसके ठीक उलट दिशा की ओर भारतीय राजनीति को मोड़ने की शुरुआत का संकेत है, जो स्वागत योग्य है, जिसकी अभिव्यक्ति मैं पूर्व में भी कर चुका हूंं.

एक घाव जो वर्ष 1528 ई. में लगा उसे भरने में पांच शताब्दियांं खर्च हो गईं. इस दौरान कितनी पीढियों ने समय-समय पर अपने अपने तरीके से कुर्बानियां दी, उनकी फेहरिस्त इतिहास में आज मुश्किल से ढूंढे भी मिल जाए, इसमें मुझे सन्देह है.

जब मन्दिर बनने की शुरुआत का सफर इतना लंबा है तो राम की अवधारणा की मर्यादा का सम्मान और पालन करने वाले राज्य की स्थापना के लिए – कितनी लम्बी प्रतीक्षा करनी होगी ? पाठक कल्पना करें.

तुलसी के राम आध्यत्मिक राम हैं, जिसे जितने मनोयोग से महात्मा गांधी ने समझा शायद ही किसी राजनेता ने आज तक समझा हों. आइंस्टीन ने गांधी के बारे में कहा था कि ‘आने वाली पीढियां, मुश्किल से यकीन करेंगी कि धरती पर हाड़-मांस का ऐसा कोई व्यक्ति कभी चलता-फिरता भी था.’

गांधी को तुलसी की रामायण के राम की मर्यादा पर यकीन था. वे जानते थे राम क्या है. राम तो जन्म के बाद कि मंगल कामना है, पालने की लोरी है, बेटी के ब्याह का शुभ गीत है तो पंच तत्व में अंत होने का संदेश भी है.

गांधी ने राम में ऐसा शासक देखा जिसने उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक पूरे भौगोलिक भारत को एक सूत्र में बांधे रखा. अयोध्या में राम मंदिर तो इक्कीसवीं शताब्दी में बन रहा है, लेकिन गांधी ने बीसवीं सदी में ही राजनैतिक ‘इमाम-ए-हिन्द’ राम को भारत की राजनैतिक प्रयोगशाला में लोक कल्याणकारी रामधुन के साथ उतार दिया था. गांधी के आध्यात्मिक राम तो कण कण में बसते हैं वो अयोध्या में अपने जन्म स्थल पर किसी एक मंदिर में नहीं.

गांधी जानते थे कि भारतीय जनमानस के चिंतन में आध्यात्मिकता रोम-रोम में बसी हुई है, इसे राज्य से अलग नहीं किया जा सकता इसलिए वह चाहते थे सत्ता के सूत्र थामने वाले ‘सर्व धर्म समभाव और वसुधैवकटुम्बकम’ की राह पर चलने वाले राम की तरह आचरण करे.

दुर्भाग्य कि गांधी की हत्या भारतीय संविधान के मसौदे के संसद में पारित होने से बहुत पहले ही कर दी जाती है. काश गांधी पांच साल और जिंदा रहते तो सम्भवतः संविधान की नींव पाश्चात्य धरनिर्पेक्षता के बजाय भारतीय मनीषीयों के विचारों पर आधारित धर्मनिरपेक्षता यानी सर्वधर्म समभाव एवम वसुधैवकुटुम्बकम की अवधारणा पर ही रखी जाती.

जिस भारत ने गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों की औपनिवेशिक दासता से खुद को मुक्त कर दुनियांं को अहिंसा का पाठ पढ़ाया, उसी भारत में राम मंदिर आंदोलन से लेकर बाबरी ढांचे को गिराने और उसके बाद ‘जय श्री राम’ के उन्मादी नारों के साथ गुजरात में हिंसा का जो तांडव हुआ, उसका सन्देश भी पूरी दुनियां में गया है, जो सर्वधर्म समभाव, वसुधैवकुटुम्बकम की अवधारणा वाले आध्यत्मिक राम की स्थापित मर्यादाओं के सर्वथा प्रतिकूल भी है.

गांधी ‘ईश्वर अल्लाह तेरो ही नाम’ वाले राजनैतिक राम को भी खड़ा कर धर्म की शक्ति का इस्तेमाल करना दिखा चुके हैंं, अब हमें एक ऐसे राजर्षि को खोजना है जो भारत की राजनीति में आये इस खाली स्थान को भर सके. राम – देश, धर्म, नस्ल, संस्कृति और भाषा इन सीमित दायरों वाली परिभाषा पर आधारित राष्ट्र के ही नहीं वह पूरी वैश्विक मानव जाति के राम हैं. जय सियाराम !

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