Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

रामराज्य : गुलामी और दासता का पर्याय

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 8, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

[ भारत के प्रधानमंत्री पद पर विराजमान आरएसएस के एजेंट नरेन्द्र मोदी देश के संविधान को रद्द कर एक बार फिर देश में रामराज्य को लाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. ऐसे में रामराज्य को समझना बेहद जरूरी हो गया है.

रामराज्य असल में विशुद्ध रूप से मनुस्मृति के रूप में खूंखार शोषण का शासकीय स्वरूप है. यह ब्राह्मणवाद का सर्वाधिक रक्तपिपासु स्वरूप है, जहां निरंतर रूप से एक विशाल आबादी का खून चूसा जाता है. यही कारण है कि देश में आये दिन मनुवादियों और शोषणकारियों द्वारा संविधान के खिलाफ प्रदर्शन किये जा रहे हैं, बाबा साहेब के मुर्दावाद के नारे लगाये जा रहे हैं, तो कहीं संविधान को ही जलाया जा रहा है. क्योंकि देश में मौजूदा संविधान काफी हद तक इन शोषणकारी रक्तपिपासुओं के मंसूबों पर अंकुश लगता है.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

आज जब देश की सत्ता पर इन मनुवादियों ने कब्जा जमा लिया है तब वह देश में अवैज्ञानिक विचारों, रूढ़िवादिता को मंचों से बेहिचक खुलेआम प्रचारित-प्रसारित कर रहा है, ताकि एक बार फिर देश में शोषण और लूट की खुंखार व्यवस्था को बहाल किया जा सके. खुद प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी तक इस अवैज्ञानिक विचारों के पक्ष में बोल रहे हैं और देश में रामराज्य लाने की वकालत ऐसे कर रहे हैं मानो रामराज्य आ जाने से जनता की सारी समस्या दूर हो जायेगी.

ऐसे में देश के सर्वाधिक विवादास्पद, पूंजीवाद के प्रबल समर्थक और समाजवाद के घोर आलोचक रहे आध्यात्मिक गुरू के तौर पर विख्यात तर्कवादी ओशो रजनीश के द्वारा ‘रामराज्य’ के बारे में व्यक्त विचारों को अवश्य जानना चाहिए.

यहां ओशो रजनीश द्वारा ‘रामराज्य’ को तर्क की कसौटी पर कसने का भरपूर प्रयास किया है. उनका स्पष्ट मत था कि “कभी भूल कर रामराज्य मत लाना. राम के समय को तुम रामराज्य कहते हो. हालात आज से भी बुरे थे. कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना ! एक बार जो भूल हो गई, हो गई. अब दुबारा मत करना.”  ]

रामराज्य : गुलामी और दासता का पर्याय

कभी भूल कर रामराज्य मत लाना. राम के समय को तुम रामराज्य कहते हो. हालात आज से भी बुरे थे. कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना ! एक बार जो भूल हो गई, हो गई. अब दुबारा मत करना.

राम के राज्य में आदमी बाजारों में गुलाम की तरह बिकते थे. कम से कम आज आदमी बाजार में गुलामों की तरह तो नहीं बिकता ! और जब आदमी गुलामों की तरह बिकते रहे होंगे, तो दरिद्रता निश्चित रही होगी, नहीं तो कोई बिकेगा कैसे ? किसलिए बिकेगा ? दीन और दरिद्र ही बिकते होंगे, कोई अमीर तो बाजारों में बिकने न जाएंगे. कोई टाटा, बिड़ला, डालमिया तो बाजारों में बिकेंगे नहीं.

स्त्रियां बाजारों में बिकती थीं ! वे स्त्रियां गरीबों की स्त्रियां ही होंगी. उनकी ही बेटियां होंगी. कोई सीता तो बाजार में नहीं बिकती थी. उसका तो स्वयंवर होता था. तो किनकी बच्चियां बिकती थीं बाजारों में ? और हालात निश्चित ही भयंकर रहे होंगे. क्योंकि बाजारों में ये बिकती स्त्रियां और लोग आदमी और औरतें दोनों, विशेषकर स्त्रियां-राजा तो खरीदते ही खरीदते थे, धनपति तो खरीदते ही खरीदते थे, जिनको तुम ऋषि-मुनि कहते हो, वे भी खरीदते थे ! गजब की दुनिया थी ! ऋषि-मुनि भी बाजारों में बिकती हुई स्त्रियों को खरीदते थे !

अब तो हम भूल ही गए वधु शब्द का असली अर्थ. अब तो हम शादी होती है नई-नई, तो वर-वधु को आशीर्वाद देने जाते हैं. हमको पता ही नहीं कि हम किसको आशीर्वाद दे रहे हैं ! राम के समय में, और राम के पहले भी–वधु का अर्थ होता था, खरीदी गई स्त्री ! जिसके साथ तुम्हें पत्नी जैसा व्यवहार करने का हक है, लेकिन उसके बच्चों को तुम्हारी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा ! पत्नी और वधु में यही फर्क था. सभी पत्नियां वधु नहीं थीं, और सभी वधुएं पत्नियां नहीं थीं. वधु नंबर दो की पत्नी थी. जैसे नंबर दो की बही होती है न, जिसमें चोरी-चपाटी का सब लिखते रहते हैं ! ऐसी नंबर दो की पत्नी थी वधु.

ऋषि_मुनि भी वधुएं रखते थे ! और तुमको यही भ्रांति है कि ऋषि-मुनि गजब के लोग थे. कुछ खास गजब के लोग नहीं थे. वैसे ऋषि-मुनि अभी भी तुम्हें मिल जाएंगे.

इन ऋषि-मुनियों में और तुम्हारे पुराने ऋषि-मुनियों में बहुत फर्क मत पाना तुम। कम से कम इनकी वधुएं तो नहीं हैं ! कम से कम ये बाजार से स्त्रियां तो नहीं खरीद ले आते ! इतना बुरा आदमी तो आज पाना मुश्किल है जो बाजार से स्त्री खरीद कर लाए. आज यह बात ही अमानवीय मालूम होगी ! मगर यह जारी थी !

रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का ! यह तो कल्पना के बाहर की बात थी, कि डाक्टर अम्बेडकर जैसा अतिशूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था ! असंभव !! खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था – गरम सीसा, उबलता हुआ सीसा ! क्योंकि उसने चोरी से, कहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थे, वे छिप कर सुन लिए थे. यह उसका पाप था; यह उसका अपराध था. और राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं ! राम को तुम अवतार कहते हो ! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे. क्या करना है ? शूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना है ? उसके कान तो फूट ही गए होंगे. शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा. उस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना! शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी. क्योंकि ये सब जुड़े हैं; कान, आंख, नाक, मस्तिष्क, सब जुड़े हैं। और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ … !

तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है निर्मल घोष ! उबलते हुए शीशे की जरा सोचो! उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगा, तो चला गया होगा पर्दों को तोड़ कर, भीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगा; मस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा. फिर इस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना है ! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया. ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की. यह धर्म की रक्षा थी ! और तुम कहते हो, “मौजूदा हालात खराब हैं !’

युधिष्ठिर जुआ खेलते हैं, फिर भी धर्मराज थे ! और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं ! आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगे ? और जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहीं, सब जुए पर लगा दिया. पत्नी तक को दांव पर लगा दिया ! एक तो यह बात ही अशोभन है, क्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है. मगर उन दिनों यही धारणा थी, स्त्री-संपत्ति !

उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता है, तो उसको कहते हैं कन्यादान ! क्या गजब कर रहे हो ! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है. कन्यादान कर रहे हो ! यह दान है ? स्त्री कोई वस्तु है ? ये असभ्य शब्द, ये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए. अमानवीय हैं, अशिष्ट हैं, असंस्कृत हैं.

मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे. और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी ! हद्द का दीवानापन रहा होगा. पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे. इतना भी होश न रहा. और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहे; इससे कुछ अंतर न आया. इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा. इससे उनका आदर जारी रहा.

भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था. मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे ! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था. मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे ! अगर कौरव अधार्मिक थे, दुष्ट थे, तो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी ! और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहीं ? तो खाक ब्रह्मचर्य था यह ! किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थे ? और द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भी, और अर्जुन को बहुत चाहा भी था. लेकिन धन तो कौरवों के पास था; पद कौरवों के पास था; प्रतिष्ठा कौरवों के पास थी. संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे. राज्य उनका था. पांडव तो भिखारी हो गए थे. इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे. और कसूर कुछ कौरवों का हो, ऐसा समझ में आता नहीं. जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गए, तो मांगते किस मुंह से थे ? मांगने की बात ही गलत थी. जब हार गए तो हार गए. खुद ही हार गए, अब मांगना क्या है ?

लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुए; खड़े हुए उनके साथ जो गलत थे.

यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित में, क्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा. तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से. क्यों ? क्योंकि शूद्र था. और तुम कहते हो, “मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं !’

निर्मल घोष, एकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगे ? उस गरीब का कसूर क्या था ? अगर उसने मांग की थी, प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांति, मुझे भी सीखने का अवसर दे दो ? लेकिन नहीं, शूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है !!!

मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा. अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला. खून खौलता तो साधारण युवक, दो कौड़ी का. सभी युवकों का खौलता है, इसमें कुछ खास बात नहीं. उसका खून नहीं खौला. शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया. एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली. और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा. उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा. अदभुत युवक था. उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा, जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया था; अपमान न लिया. अहंकार पर चोट तो लगी होगी, लेकिन शांति से, समता से पी गया.

धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है. तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुई, क्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं. और अर्जुन पर ही सारा दांव था. अगर अर्जुन सम्राट बने, और सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बने, तो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी. उनका शिष्य, उनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाए, तो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा. उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था. और एकलव्य अगर आगे निकल जाए, तो बड़ी बेचैनी की बात थी.

तो यह बेशर्म आदमी, जिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है, यह गुरु द्रोण, जिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने से, यह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया ! शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरु, जिसने दीक्षा ही न दी, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया ! हालात बड़े अजीब रहे होंगे ! शर्म भी कोई चीज होती है ! इज्जत भी कोई बात होती है ! आदमी की नाक भी होती है ! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे ! किस मुंह से–जिसको दुत्कार दिया था–उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए !

और फिर भी मैं कहता हूं, एकलव्य अदभुत युवक था; दक्षिणा देने को राजी हो गया. उस गुरु को, जिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी ! यह जरा सोचो तो ! उस गुरु को, जिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है ! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते !

बड़ा मजा है ! जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते, उस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो ! मगर उसमें षडयंत्र था, चालबाजी थी.

उसने चरणों पर गिर कर कहा, आप जो कहें. मैं तो गरीब हूं, मेरे पास कुछ है नहीं देने को. मगर जो आप कहें, जो मेरे पास हो, तो मैं देने को राजी हूं. यूं प्राण भी देने को राजी हूं.

तो क्या मांगा ? मांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे !

जालसाजी की भी कोई सीमा होती है ! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट की, कूटनीति की भी कोई सीमा होती है ! और यह ब्रह्मज्ञानी ! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया. और अदभुत युवक रहा होगा, निर्मल घोष, दे दिया उसने अपना अंगूठा ! तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया ! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई. अब मेरा कोई भविष्य नहीं. इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया. शिक्षा दी नहीं, और दक्षिणा में, जो मैंने अपने आप सीखा था, उस सब को विनिष्ट कर दिया.

Read Also –

मैं नास्तिक क्यों हूंं ?
अटल बिहारी बाजपेयी : ब्राह्मणवाद-साम्प्रदायिकता का मानवीय मुखौटा ?
धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम
रामायण और राम की ऐतिहासिक पड़ताल

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

[ प्रतिभा एक डायरी ब्लॉग वेबसाईट है, जो अन्तराष्ट्रीय और स्थानीय दोनों ही स्तरों पर घट रही विभिन्न राजनैतिक घटनाओं पर अपना स्टैंड लेती है. प्रतिभा एक डायरी यह मानती है कि किसी भी घटित राजनैतिक घटनाओं का स्वरूप अन्तराष्ट्रीय होता है, और उसे समझने के लिए अन्तराष्ट्रीय स्तर पर देखना जरूरी है. प्रतिभा एक डायरी किसी भी रूप में निष्पक्ष साईट नहीं है. हम हमेशा ही देश की बहुतायत दुःखी, उत्पीड़ित, दलित, आदिवासियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों के पक्ष में आवाज बुलंद करते हैं और उनकी पक्षधारिता की खुली घोषणा करते हैं. ]

Previous Post

इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करने में पश्चिमी देश सबसे आगे

Next Post

बताइये ! इस लेखक से मोदी जी की जान को खतरा है

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

बताइये ! इस लेखक से मोदी जी की जान को खतरा है

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

पिछड़ा और दकियानूसी विचार यानी हिंदुत्व सांप्रदायिक उन्माद

January 25, 2022

राजनीतिक चेतना से वंचित लोगों का मुक्तिद्वार स्वत: ही बंद हो जाता है

November 25, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.