Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

फर्जी राष्ट्रवादी अट्टहास के कुशल और पेशेवराना प्रयास का प्रतिफल मोदी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 27, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

फर्जी राष्ट्रवादी अट्टहास के कुशल और पेशेवराना प्रयास का प्रतिफल मोदी

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के साथ 2004 के आम चुनाव में उतरे अटल बिहारी वाजपेयी अपनी जीत के प्रति प्रायः आश्वस्त थे लेकिन, वे चुनाव हार गए. विश्लेषकों ने इस हार की समीक्षाएं की, जिनमें एक बात उभर कर सामने आई कि ग्रामीण और गरीब भारत ने वाजपेयी सरकार, जिसे एनडीए-1 भी कहा जाता है, के ‘इंडिया शाइनिंग’ को नकार दिया क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि जिस चमकते इंडिया की बातें की जा रही है, उसमें उनकी उपेक्षा हुई है.

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

यह आर्थिक उदारवाद के वाजपेयी मॉडल की भी राजनीतिक हार थी, जिसमें देश की जीडीपी दो बार 8 प्रतिशत तक पहुंच गई थी और स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी परियोजनाओं ने आधारभूत संरचना के क्षेत्र में एक दीर्घकालीन क्रांति का सूत्रपात किया था. वाजपेयी के खाते में सफल परमाणु परीक्षण और कारगिल विजय जैसी उपलब्धियां तो थी ही, चंद्रयान-1 परियोजना की शुरुआत का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है.

मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-1 के दौरान जो देश की जीडीपी ऊंचाइयां छूते 9 प्रतिशत तक पहुंची, विशेषज्ञ उसमें भी पूर्ववर्त्ती वाजपेयी सरकार के आर्थिक फैसलों का कुछ न कुछ सकारात्मक असर बताते रहे.

व्यक्तिगत स्तरों पर वाजपेयी देश के सर्वाधिक सम्मानित राजनेताओं में रहे, जिनकी प्रशंसा विरोधी भी करते थे. कहा गया कि पहली बार कोई गैर-कांग्रेसी नेता प्रधानमंत्री बना, जिसने अपनी व्यवहारिक और राजनीतिक कुशलता से गठबंधन के अंतर्विरोधों को साधते 5 वर्षों का अपना कार्यकाल पूरा किया. तथापि, वे हार गए, और जैसा कि कहा जाता है, इस अप्रत्याशित हार के सदमे से वे कभी उबर नहीं सके और फिर मुख्यधारा से क्रमशः ओझल हो गए.

नरेंद्र मोदी 2012-14 के दौरान सपनों के सौदागर की तरह देश के मानस पर छाए और 2014 में शानदार जीत के बाद पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने, जिनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने स्वयं की ताकत से बहुमत का आंकड़ा पूरा किया था. उसके बाद, अगले पांच वर्षों तक वे देश को दिखाए सपनों की ऐसी की तैसी करते रहे, एक से एक ऐसे भ्रामक नारे भी देते रहे, जिनका ज़मीन से कोई खास वास्ता कभी नजर नहीं आया.

मोदी शासन के पहले-दूसरे वर्ष में जीडीपी सात-सवा सात के करीब रही जो जल्दी ही आर्थिक कुप्रबंधन की वजह से गोता लगाने लगी. विशेषज्ञों ने नोटबन्दी और जीएसटी के अपरिपक्व प्रबंधन को जीडीपी में गिरावट का एक बड़ा कारण तो माना ही, अन्य मायनों में भी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन को इसके लिये जिम्मेदार माना, जिसमें रोजगार सृजन की बात तो दूर, लोगों के रोजगार छिनने लगे.

जो नेता दो करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष देने के वादे पर सत्ता में आया था, उसके शासन के पांंचेक वर्ष पूरे होते-होते देश बेरोजगारी के मामले में 45 वर्षों के उच्चतम स्तरों तक पहुंच गया. स्मार्ट सिटी, सांसदों की गोद में एक आदर्श गांव आदि जैसे प्रोजेक्ट ऐसे भूलुंठित नजर आए जिनकी चर्चा करना भी मज़ाक का कारण बनने लगा. सोशल मीडिया के सशक्त होते दौर में स्मार्ट सिटी, आदर्श गांव जैसे मुद्दे मनोरंजक किन्तु त्रासद हास्य का विषय बनने लगे.

वाजपेयी सरकार ने विनिवेश मंत्रालय का गठन कर निजीकरण को जो रफ्तार देने की कोशिश की, वह दस वर्षों के मनमोहन सरकार में भी जारी रही और मोदी सरकार साहसिक तरीके से उसे अमली जामा पहनाने लगी. मोदी सरकार का निजीकरण अभियान अवधारणा के स्तर पर भले ही आर्थिक उदारवाद का अगला चरण हो, व्यावहारिक स्तरों पर यह कुछेक खास कारपोरेट घरानों के हाथों में राष्ट्रीय संपत्ति सौंपते जाने का विवादास्पद मामला बन कर सामने आया.

कुछ खास औद्योगिक घरानों की संपत्ति में महज़ एकाध वर्षों में ही इतनी वृद्धि हुई कि तमाम आर्थिक समीक्षक हैरान रह गए. यह सतह के नीचे सत्ता और कारपोरेट के अपवित्र गठजोड़ का प्रत्यक्ष उदाहरण था, जिसे देश की जनता ने महसूस तो किया, लेकिन मोदी सरकार और उसके खैर ख़्वाहों के बेजोड़ मीडिया और सोशल मीडिया प्रबंधन ने जनता का ध्यान इन मुद्दों से परे कर अन्यत्र भटकाने में बड़ी सफलता हासिल की.

2019 का आम चुनाव आते-आते देश का आर्थिक संकट गहराने लगा था, बेरोजगारी चरम पर पहुंचने लगी थी, आमलोगों की वास्तविक आमदनी बढ़ने के बजाय घटने लगी थी, मध्यवर्ग की आर्थिक रीढ़ नित नए और बढ़ते टैक्सों के बोझ से झुकने लगी थी, निजीकरण अभियान अंध निजीकरण में तब्दील होने लगा था, 2014 के चुनाव पूर्व दिखाए बहुत सारे सपने धराशायी हो चुके थे.

विश्लेषकों का एक वर्ग मानने लगा था कि मोदी सरकार अगर दोबारा सत्ता में वापस आई भी तो पहले के मुकाबले कमजोर होकर आएगी. वह भी इस कारण कि निस्तेज और विभाजित विपक्ष मोदी सरकार की नाकामियों को भुनाने में नितांत अक्षम है. किन्तु, 2019 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने कमाल कर दिया. पहले से भी अधिक सीटें लाकर जहां भाजपा ने इतिहास निर्मित किया, वहीं एनडीए का ग्राफ भी बहुत आगे बढ़ा.

इतनी असफलताओं और वादखिलाफियों के बावजूद ऐसा कैसे हुआ ? क्या इसके लिये सिर्फ विपक्ष की अपंगता को दोषी ठहराया जा सकता है, जो वाजपेयी के खिलाफ 2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में बाजी पलटने वाला साबित हुआ था ? या, क्या यह भारतीय जनमानस पर प्रभाव जमाने की उन सतत कोशिशों का नतीजा था जिसमें मोदी और उनके खैरख्वाहों को महारत हासिल है ?

वाजपेयी कारगिल की सफलता को भुना न सके जबकि मोदी ने पुलवामा की असफलता को भी अपने पक्ष में मोड़ लिया. यहीं से मीडिया, सोशल मीडिया और पोस्ट-ट्रूथ दौर की फेक खबरनवीसी की निर्णायक भूमिका की पड़ताल शुरू होनी चाहिए.

2004 में मोबाइल सामान्य फीचर फोन की शक्ल में था और देश की आबादी के बहुत कम प्रतिशत के हाथों में था. जाहिर है, लोगों, खास कर युवाओं के मानस को अपंग बनाने के राजनीतिक हथियार के रूप में इसकी कोई भूमिका नहीं थी. मुख्यधारा के मीडिया का भी तब तक इस हद तक नैतिक पतन नहीं हुआ था, जो सिर्फ और सिर्फ शक्तिशाली राजनीतिक जमात का भोंपू बन कर रह जाए.

2014 तक मोबाइल फोन स्मार्ट फोन में तब्दील हो चुके थे और तकनीक के विकास ने लोगों तक नेताओं की पहुंच को आसान बना दिया था. नरेंद्र मोदी के सलाहकारों ने इसकी उपयोगिता को पहचाना. मीडिया का बड़ा तबका मोदी गान कर ही रहा था, मोबाइल के माध्यम उनकी ऐसी सुनियोजित और आक्रामक ब्रांडिंग की गई, जिसका भारत के राजनीतिक इतिहास में अन्य दूसरा उदाहरण नहीं. जाहिर है, आशाओं और आकांक्षाओं के पंखों पर सवार मोदी पूरी धज के साथ सत्ता तक पहुंचे.

वही मीडिया, वही स्मार्टफोन, वही तकनीक 2019 तक आते-आते निपट देहातों के निठल्ले युवाओं तक पहुंच चुका था. बिजली की सुधरी व्यवस्था ने टीवी न्यूज चैनलों की पहुंच को विस्तार दिया, पत्रकार से राजनीतिक एजेंट की भूमिका में आ चुके दर्जनों नामचीन एंकरों के अनर्गल प्रलापों को सुनने के लिये अब बड़ा ऑडियंस सामने था, शातिर मीडिया सेल के माध्यम से फेसबुक और व्हाट्सएप के द्वारा गलत तथ्यों को युवाओं के मानस में प्रत्यारोपित करना इतिहास में इतना आसान कभी नहीं था, जितना अब था.

नतीजा, 2019 का चुनाव आते-आते न बेरोजगारी मुद्दा रहा, न देश का आर्थिक कुप्रबंधन, न अंध निजीकरण, न गिरती जीडीपी. जो सामने था वह था – सस्ते स्मार्टफोन पर व्हाट्सएप में आते फर्जी मैसेजों पर आत्मघाती उन्माद और उत्साह से मचलते अपंग मानस ग्रामीण युवाओं का राष्ट्रवादी अट्टहास, जिन्हें लग रहा था कि जब देश ही नहीं रहेगा तो रोजगार कैसा, विकास कैसा !

यह भोले ग्रामीण युवाओं के निच्छल देशप्रेम को राजनीतिक रूप से भुना लेने का ऐसा कुशल और पेशेवराना प्रयास था, जिसकी सफलता ने देश की ऐसी नई राजनीतिक इबारत लिख दी, जब आम लोगों की कसौटियों पर नितांत असफल कोई प्रधानमंत्री दोबारा पुरी ठसक के साथ सत्ता में वापस लौटा.

2004 में वाजपेयी के सलाहकार चाहते तब भी राष्ट्रभक्ति के इस ज्वार को पैदा नहीं कर सकते थे. कारगिल विजय के बाद भी नहीं, परमाणु विस्फोट के बाद भी नहीं
क्योंकि, तब का मीडिया नई सदी की शुरुआत में नैतिक पतन के पहले-दूसरे पायदान पर ही था, क्योंकि, तब लोगों के हाथों में स्मार्टफोन नहीं पहुंचा था, क्योंकि, तब तक जियो क्रांति के द्वारा फ्री डाटा की आंधी नहीं चली थी और फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप आदि के द्वारा सोशल मीडिया के क्षेत्र में क्रांति नहीं आई थी !

2019 नई सदी के दूसरे दशक का अंतिम दौर था जब भारत के मीडिया की मुख्यधारा नैतिक तौर पर इतनी पतित हो चुकी थी कि उसे जनसामान्य के हितों से कोई मतलब नहीं रह गया था और किसी शक्तिशाली राजनीतिक धारा के पक्ष में कृत्रिम सत्य की प्रतिस्थापना में लगे एंकर/एंकरानी लोकलाज को पूरी तरह खो चुके थे.

सस्ते स्मार्टफोन की सहज उपलब्धता, जियों के उद्भव से उपजी फ्री डाटा क्रांति, पत्र-पत्रिकाओं और किताबों से युवाओं का रहा-सहा संपर्क भी टूट जाना, इन सबने उस मीडिया सेल को असीमित अवसर दिए जिसने पूरे देश में वास्तविक सत्य को नेपथ्य में डाल अधिकतर लोगों के अपंग हो चुके मानस में कृत्रिम सत्य को स्थापित करने में बड़ी सफलता हासिल की. नतीजा, सब कुछ सामने है.

2014 के नरेंद्र मोदी देश के अधिकतर लोगों की आशाओं-आकांक्षाओं के प्रतीक थे. 2019 के नरेंद्र मोदी हमारी पीढ़ी की मानसिक और बौद्धिक अपंगता की उपज भी हैं और उसके प्रेरक भी. यह उनकी राजनीति के लिये वरदान है कि सामाजिक न्याय की राजनीति अपने ही अंतर्विरोधों का शिकार हो ठहर-सी गई लगती है और कांग्रेस ऐसी वंश परंपरा से जूझ रही है जो कभी उसकी ताकत भी थी.

अजीब-सा निर्वात छाया है भारतीय राजनीति के प्रांगण में, जो ऐसे नायक को प्रतिष्ठापित कर मजबूती दे रहा है, जिसका मूल्यांकन इतिहास जब करेगा तो आने वाली पीढियां आश्चर्य करेंगी कि कैसा था उस दौर का जनमानस, जिसमें अधिकतर लोग ऐसी डालियों को ही काटने में लगे थे, जिन पर वे बैठे थे और जिनकी शाखाओं पर उनके बच्चों का बसेरा बसने वाला था.

Read Also –

एक झूठा आदमी जब सत्ता पर काबिज हो जाये
चोर नचाये मोर
हमारी मूढ़ पीढ़ी अपना और अपने बच्चों का सब कुछ गंवा रही है
एक रिसर्च स्कॉलर का राष्ट्रभक्ति पर एक संस्मरण
कश्मीर से 370 हटाने और अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के साथ गोलवलकर के सपनों का भारत अब साकार लेने लगा है ? 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

स्टालिन : अफवाह, धारणाएं और सच

Next Post

महाशक्तिशाली पाकिस्तान !

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

महाशक्तिशाली पाकिस्तान !

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

अल्बर्ट पिंटो

January 13, 2024

मलखान सिंह और उनकी कविताएं

October 1, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.