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चे : प्रेम कहानियां सबकी होती हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 13, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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चे : प्रेम कहानियां सबकी होती हैं

किसी फिल्म का ही एक डायलॉग है, ‘आतंकवादियों की प्रेम कहानियां नहीं होती.’ इस एक लाइन में ही दो विमर्श जन्म लेते हैं. इस सवाल के साथ कि पहले ये तय हो कि आतंकवादी कौन ?

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भारत ने आज से करीब बीस साल पहले एक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ के सामने पेश किया था कि पूरी दुनिया के लिए आतंकवाद की कोई एक तय परिभाषा हो, तब से लेकर 2019 तक हर साल ही संयुक्त राष्ट्र संघ में इस बात पर बहस होती है कि आतंकवाद क्या है ? और आज तक सभी देश मिलकर आतंकवाद की एक साझी परिभाषा तय नहीं कर पाए हैं.

ये विलंबता इस बात की भी तस्दीक करती है कि किसी राज्य के लिए एक आदमी आतंकवादी हो सकता है तो वही आदमी दूसरे राज्य के लिए नायक भी हो सकता है. एक तरह से नायक और आतंकवादी की परिभाषाएं दोनों ही एक दूसरे के करीब हैं. आतंकवादी और नायक के बीच में महीन सा ही पर्दा है. ऐसा ही एक नायक था चे ग्वेरा, क्यूबा के लिए नायक, बोलिविया के लिए नायक, अर्जेंटीना के लिए नायक, लेकिन अमेरिका के लिए आतंकवादी. साम्राज्यवादियों के लिए गुरिल्ला.

साल 1967 में आज ही के दिन बोलिविया में चे की हत्या कर दी गई थी. उसमें पूरा-पूरा हाथ अमेरिका का ही था लेकिन समय की सीमाओं के चलते हम इस विषय के और अधिक अंदर नहीं जाएंगे.

फिलहाल एक बात जान लेते हैं कि एक ऐसा आदमी जिसे 39 साल की उम्र में ही खत्म कर दिया गया, क्रांतिकारी गुरिल्लाओं में जिस आदमी की अदब का टशन हो, जिसे हर रोज जंगल-जंगल जान बचाने के उपाय करने पड़ते हों, उस नौजवान के अंदर प्रेमी कितना बचा होगा ? क्या उसकी भी कोई प्रेम कहानी हो सकती है ?

दरअसल चे एक लड़की से ‘बेइंतहा’ प्यार करते थे और वो लड़की भी चे से बेइंतहा प्यार करती थी. वैसे दो प्रेम करने वालों के साथ ‘बेइंतहा’ शब्द लगाना भी गैरजरूरी ही है. एकदम अनावश्यक है. दो प्रेम करने वाले प्रेम करेंगे तो ‘बेइंतहा’ ही करेंगे. इसके पीछे कोई जीवविज्ञान नहीं है. ये बेहद ही सहज है. उस लड़की का नाम था चिनचीना.

चिनचीना अर्जेंटीना की रहने वाली थी, मूलतः चे भी अर्जेंटीना के ही रहने वाले थे. वो अलग बात है बाद में वह दक्षिण अमेरिका में क्रांति करने के उद्देश्य से क्यूबा चले गए थे. चिनचिना आर्थिक दृष्टि से बेहद धनी परिवार से थी और यदि उस समय लिखी किताबों पर विश्वास कर लें तो चिनचिना की खूबसूरती पर उस समय, बड़े-बड़े अमीर परिवार के लोग भी मरते थे. लेकिन उसे चे से प्यार हुआ.

चे के पक्ष में उन्हें गरीब बताकर भावुक करना मेरा उद्देश्य नहीं है. चे गरीब तो नहीं ही थे लेकिन अमीर परिवार से भी नहीं थे. ये समझ लीजिए बीच का सा परिवार था. चे विचारों में आजाद ख्याल के आदमी थे, उल्टे-सीधे कपड़े पहनते, कई बार तो फटेहाल कपड़ों से ही चिनचीना के घर की पार्टी में पहुंच जाया करते थे लेकिन चे की प्रेमिका चिनचीना एक रूटीन लाइफ चाहती थी, जिसमें एक सामान्य सा जीवन हो, शाम को पति घर पर लौट आता हो. ऐसा वाला जीवन.

चे ठहरे गुरिल्ला युद्धों के नायक, जंगलों के निवासी. नेचर में बदमिजाज वो भी बेहिसाब. हालांकि चे पढ़ाई से डॉक्टर थे. बहुत सारी किताबें भी पढ़ीं थी. बाद में जब क्यूबा की क्रांति सक्सेजफुल हुई तो क्यूबा के उद्योग मंत्री भी बने थे, साथ ही क्यूबा की राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष भी बने.

दुनियाबी नजर से देखें तो इसे चे का पीक माना जाना चाहिए. क्या नहीं था उनके पास, क्यूबा सरकार की विदेश नीति से लेकर आर्थिक नीति तय करने में भी उनकी जुबान का वजन था. क्यूबियाई जनता में तो हीरोइक इमेज थी ही लेकिन इन सब कम्फर्ट लाइफ में चे का मन ही नहीं लगा.

जैसे एक क्रांति काफी न हो, जैसे एक देश की आजादी काफी न हो, 6 साल बाद ही चे ने क्यूबा भी छोड़ दिया. वहां की नागरिकता भी त्याग दी. ताकि दूसरे देशों में क्रांति करने वाले गुरिल्लाओं की मदद कर सकें, उन्हें लीड कर सकें, जंगल-जंगल जाकर ट्रेनिंग दे सकें. एक तरह से चे न आराम और इज्जत की जिंदगी छोड़, लानत और संघर्ष की जिंदगी चुनी.

चे ने क्यूबा के उद्योग मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. क्यूबा की राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष पद का मोह छोड़ जंगलों में जाकर दोबारा से निर्वासित होकर जिंदगी जीना चुना. ऐसी प्रकृति के प्रेमी से चिनचीना को प्रेम था. स्वभाविक है ये दो ध्रुवों का मिलन था.

चिनचीना चाहती थी कि चे एक स्थायी जीवन जिए. चे चाहते वह जंगलों में निर्वासित होकर आजादी की लड़ाई लड़ें. अंततः चे ने अपनी प्रेमिका के सामने एक प्रस्ताव रखा कि वह अपने पिता की संपत्ति छोड़ उनके साथ चली आएं, वहां से दोनों वेनेजुएला चले जाएंगे, जहां चे के दोस्त यानी अलबर्टो ग्रैनडास के साथ कोढ़ियों की बस्ती में रहेंगे, कोढ़ियों की सेवा करेंगे. जंगल में रहा जाएगा. गुरिल्लाओं को ही परिवार मानेंगे. लेकिन चिनचीना फिलोसॉफी में नहीं जीती थी, वह अपनी शर्तों पर अड़ी रहीं, चे अपनी शर्तों पर. हुआ वही कि चिनचीना चे का साथ न दे सकी.

एक तरह से देखा जाए तो चे भी चिनचीना का साथ न निभा सके और ये प्रेम कहानी एक दूसरों के दिलों में हमेशा के लिए दबी रह गई. इस कहानी को जानने समझने वालों को चे की प्रेम कहानी अधूरी लग सकती है. लेकिन अधूरी जैसी चीज इस दुनिया में है ही नहीं. अधूरापन भी किसी एक नियति की पूर्णता से ही प्राप्त होता है.

चे की जिंदगी में चिनचीना का सफर उतना ही था लेकिन यहां एक चीज देखने की है. चे अपने विचारों, लक्ष्यों के लिए हर निजी कीमत चुकाने तक गए. आराम की जिंदगी भी चुकाई, प्रेम भी चुकाया, केवल आजाद ख्यालों के लिए. प्रतिरोध के लिए, आजादी के लिए, क्रांति के लिए.

वैसे भले ही प्रेम अपने आप में क्रांति नहीं है लेकिन क्रांति का सबसे उत्तम ईंधन है. मेरा भी यही मानना है कि अगर कोई प्रेम नहीं कर सकता तो वह दुनिया की कोई क्रांति भी नहीं कर सकता इसलिए प्रेम कहानियां सबकी होती हैं, नायकों की भी, क्रांतिकारियों की भी, आतंकवादियों की भी…

  • श्याम मीरा सिंह

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