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Home गेस्ट ब्लॉग

इवीएम की धांंधली से भाजपा को वोट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 3, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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छपरा के गरखा विधानसभा क्षेत्र के मुबारकपुर गांंव में लालटेन पर एक वोट डालने पर कमल को पांंच वोट गिर रहे थे. भारी हंगामों के बीच मतदान लोगों ने रोका. इवीएम का खेल दूसरे चरण में शुरु हो गया. भाजपा के फ़ासिस्ट नेतृत्व ने अल्पसंख्यक बहुमत वाले इलाक़ों में ख़ासकर ऐसा इंतज़ाम किया है.

मैं बार-बार आगाह करता रहा हूंं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की भारी जीत इवीएम के बदौलत हुई. मैं इसका गवाह रहा हूंं. मेरे डाटा विशेषज्ञ मित्र मुझसे इत्तफ़ाक़ नहीं रखते. उनके अनुसार लाख लतियाने के वावजूद मोदी मैजिक चल रहा है.

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सच्चाई ये है कि सांप्रदायिक लाईन पर सोचने वाली भ्रष्ट पुलिस प्रशासन से भाजपा के घृणित एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए कोई ख़ास मेहनत नहीं करनी पड़ती. सवाल मोदी के बड़े या छोटे नेता होने का नहीं है, सवाल हमारी सरकारी मशीनरी पर दाखिल संघी सोच वाले लोगों की है. बहुत ही आश्चर्यजनक तरीक़े से 1992 के बाद से आज तक, विशेष कर हिंदी पट्टी का सबसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा वर्ग का बहुमत नीच संघियों के साथ है.

मैंने व्यक्तिगत परिचर्या में तथाकथित हिंदी के बड़े लेखकों, संपादकों और प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत के दौरान यह जाना और महसूस किया है. अगर नाम गिनाऊंं तो जगह कम पड़ जाएगी. हरिवंश जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों का उदाहरण आपके सामने है.

दरअसल, सिकुड़ती संभावनाओं और मौक़ों के समय में बुद्धिजीवी वर्ग के सामने दो ही चुनाव रहता है, जिसे दुष्यंत कुमार ने 1975 में ही लिख दिया था – ‘इस दौर में जीने की क़ीमत दारो रसन या ख्वारी है.’ अफ़सोस कि ख्वारी चुनने वालों की बहुतायत है.

बिहार में जब इवीएम मशीन गुजरात से लाया गया तभी धांंधली की संभावना प्रबल हुई. आपको सूरत याद होगा. किस तरह से इवीएम लदी हुई ट्रक पलट गई और भाजपा उन्हीं 17 विधानसभा क्षेत्रों के रिज़ल्ट के बूते पर गुजरात में सरकार बना ली.

मोदी शाह की भाजपा को समझने के लिए आपको क्रिमिनल मनोविज्ञान का विशेषज्ञ होना पडेगा. अगर आप एक सेकेंड के लिए भी इनको आदमी मानते हैं तो आपका सारा निष्कर्ष ग़लत साबित होगा.

ख़ैर, मैं अभी भी यह मानता हूंं कि बिहार में भाजपा और जदयू 50 से 60 सीटों तक सिमट जाएगी. बिहार जन आंदोलनों की भूमि रही है. बिहार मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसा न ही राजनीतिक चेतना शून्य है, न ही सांप्रदायिक. मोदी के लाख चाहने पर भी बिहार में सांप्रदायिक कार्ड नहीं चला.

मोदी एक फ़्रॉड है, ये बिहारी जानते हैं. 10 प्रतिशत सवर्ण वोट लेकर भी कुछ नहीं हासिल होगा. बिहार की जनता को सजग रहने की ज़रूरत है. जहांं भी इवीएम की धांंधली दिखे भाजपाईयो को खदेड़ कर मारो, सब ठीक हो जाएगा.

  • सुब्रतो चटर्जी

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