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भारत की सत्ता से टकराते जनान्दोलन के एक सदस्य का साक्षात्कार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 17, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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भारत की सत्ता से टकराते जनान्दोलन के एक सदस्य का साक्षात्कार

भारत की सत्ता से टकराते जनान्दोलन के एक सदस्य का साक्षात्कार लेना एक बेहद मुश्किल और साहस भरा पल होता है. ऐसा ही एक पल तब आया था जब सीपीआई माओवादी के सैैैन्य ईकाई पीपुल्स गुरिल्ला लिबरेशन आर्मी के एक प्लाटून सदस्य रवि का यह साक्षात्कार लेने का मौका आज से 20 साल पहले मिला था. यह साक्षात्कार लेने का मौका महज एक संयोग था.

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यह साक्षात्कार पलामू के विसरामपुर थाना क्षेत्र में कार्यकरत एक प्लाटून सदस्य का था, जिनसे बातें करने के बाद कई चीजों से अवगत होने का मौका मिला. यहां इस बात को गौर करना होगा कि आज से 20 साल पहले सीपीआई माओवादी का गठन नहीं हुआ था और संयुक्त बिहार में सीपीआई एमएल पीपुल्सवार और एमसीसीआई अलग-अलग कार्यरत थे, जो बाद में 2004 ई. में एक महासम्मेलन के जरिए सीपीआई माओवादी के तहत एकजुट हुए.

यह साक्षात्कार सीपीआई माओवादी के घटक संगठन सीपीआई एमएल पीपुल्सवार के प्लाटून के सदस्य का था. घने जंगलों व पहाड़ों के बीच चल रही एक बैठक की सुरक्षा में तैनात एक प्लाटून के सदस्य रवि का यह साक्षात्कार इसी सुरक्षा से जुड़े हुए थे, जो काफी आग्रह के बाद अपनी बात रखने के लिए राजी हुए थे. पेश है उनके साथ बातचीत का एक अंश –

पत्रकार: आपका नाम क्या है ?

रवि: रवि या और भी कुछ कह सकते हैं.

पत्रकार: आपका गांव कहां है ?

रवि: छ…, जहां विश्वनाथ जी का घर है. (विश्वनाथ इस प्लाटून के एक अन्य सदस्य थे.)

पत्रकार: पार्टी के सम्पर्क में कैसे आये ?

रवि: गांव में ये लोग आते रहते हैं. पहले हम एमसीसीआई में आये थे.

पत्रकार: आप एमसीसी में कब शामिल हुए ?

रवि: करीब डेढ़ साल पहले.

पत्रकार: एमसीसी में कैसे आना हुआ ?

रवि: पहले वही लोग आये थे. संदीप जी, जो जोनल कमांडर थे, उन्हीं के सम्पर्क में आये थे और वहीं साथ हो लिये. वे राज्य सदस्य जैसे थे. जैसे कि हमारे सुधीर जी हैं.

पत्रकार: उसमें से क्यों निकल आये ?

रवि: ….

पत्रकार: क्या जैसे ?

रवि: … पत्रकार: वहां आप कितनी बार पुलिस के साथ काउन्टर किये थे ?

रवि: दस-बारह.

पत्रकार: कहां-कहां ?

रवि: …., उतना याद नहीं रहता है.

पत्रकार: फिर आप इस संगठन (सीपीआईएमएल पीपुल्सवार) में कैसे शामिल हुए ?

रवि: ….

पत्रकार: आपके पिताजी क्या करते हैं ?

रवि: उनका देहान्त हो गया है सात-आठ साल पहले.

पत्रकार: आपके घर में और कौन-कौन हैं ?

रवि: दो भाई, दो बहन. मां हैं बस. दोनों बहन की शादी हो चुकी है. मैं बड़ा भाई हूं. एक छोटा भाई मात्रा 12-13 साल का है. छठी क्लास में पढ़ता है. मैं भी छठी कक्षा तक ही पढ़ सका हूं. छोटे भाई को अभी 15 दिन पहले पुलिस ने केस कर दिया था, जिसमें अभी वह जेल में बंद है. उस गांव में एक हत्या हुआ था, जिसका हत्या हुआ है, उसका परिजन भी नहीं बोल रहा है कि हत्या किसने किया. अब जैसे आप लोगों के गांव में होता है किसी के साथ जमीन का झगड़ा वगैरह. उसी में शक के आधार पर पुलिस ने छह आदमी पर केस कर दिया है, जिसमें से 4 अभी भी जेल में है. एक आठ साल का बच्चा है, एक 10 साल का. मेरा भाई 13 साल का है. भला ये बच्चे लोग किसी की हत्या कर सकता है ?

(पुलिस द्वारा छोटे-छोटे बच्चों पर फर्जी मुकदमा दर्ज कर जेलों में बंद करने की ऐतिहासिक परम्परा है, जो समूचे देश में देखने को मिलती है.)

पत्रकार: आप कक्षा छह तक ही क्यों पढ़ सके हैं ?

रवि: पिताजी का देहान्त हो गया जाने के बाद घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई थी.

पत्रकार: तब घर की जरू रत वगैरह की पूर्ति कैसे होती है ?

रवि: हमारे पास जितनी जमीन है सबकी बटाईदारी लगी हुई है, जिससे आधा मिल जाता है. उसकी देख-रेख मां करती है.

पत्रकार: शहर से सटा हुआ है आपका गांव ?

रवि: नहीं.

पत्रकार: जब आप पार्टी में शामिल हुए तब आपको कुछ अजीब नहीं लगा था ?

रवि: हमार यहां के और भी लोग शामिल हैं यहां. वे यहां के रहन-सहन आदि के बारें में बतलाते थे और फिर जनता में तो प्लाटून के विचारों का प्रभाव तो पड़ता ही है, उससे मालूम हुआ. यहां दो पार्टी काम कर रही है – पीपुल्सवार और एमसीसी. दोनों का ही अच्छा-बुरा प्रभाव जनता के उपर पड़ता है. यहां व्यक्तिगत कुछ भी नहीं होता है. सब कुछ सामूहिक है. हमें ही तो देखकर (प्रेरणा पाकर) अन्य लोग आते हैं. हम शहीद हो जायेंगे तो दूसरे साथी आयेंगे और संघर्ष को जारी रखेंगे. आज संगठन में जितनी भी रायफलें हैं, उसकी खातिर कितने ही कामरेडों ने अपनी शहादतें दी है. आज हम उनकी विरासत को थामे हुए हैं. कल हम शहीद हो जायेंगे तो फिर नये लोग आयेंगे…

प्लाटून सदस्य के इस साक्षात्कार में एक बाधा पड़ गया था, जिससे यह साक्षात्कार यही खत्म हो गया. परन्तु, इनकी छोटी सी पर सधी हुई ईमानदार वार्तालाप एक तस्वीर खींच देती है, कि किस तरह पुलिसिया आतंक के खिलाफ माओवादियों के नेतृत्व में लोग उठ खड़े हो रहे हैं, बेहद निर्भीकता और बेहद साहस के साथ, जो आज भी बरकरार है.

  • रणदीप

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