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8 मार्च : लैंगिक असमानता के विरोध में समानाधिकार की लड़ाई

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 8, 2021
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8 मार्च : लैंगिक असमानता के विरोध में समानाधिकार की लड़ाई

Women in leadership : Achieving an equal future in a COVID-19 world…. Happy International women’s Day.

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पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

इतिहास के अनुसार आम महिलाओं द्वारा पुरुष प्रताड़ना और लैंगिक असमानता के विरोध में समानाधिकार की लड़ाई शुरू की गई थी और सम्पूर्ण विश्व की महिलायें देश, जात-पात, भाषा, राजनीतिक, सांस्कृतिक भेदभाव से परे एकजुट होकर इस लड़ाई में शामिल होती गई. सर्वप्रथम सन 1909 में 28 फरवरी को पहली बार अमेरिका में यह दिन सेलिब्रेट किया गया.

सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने न्यूयॉर्क में 1908 में गारमेंट वर्कर्स की हड़ताल को सम्मान देने के लिये इस दिन का चयन किया ताकि इस दिन महिलायें काम के घंटे के लिये अपना विरोध कर कार्य-समय कम करने और बेहतर वेतनमान के लिये अपनी मांग दर्ज करवा सकें. लेकिन सर्वप्रथम सोशलिस्ट इंटरनेशनल द्वारा कोपनहेगन में सन 1910 में महिला दिवस की स्थापना आधिकारिक तौर पर हुई.

सन 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटज़रलैंड में लाखों महिलाओं द्वारा रैली निकाली गई और नौकरी में भेदभाव को खत्म करने, मताधिकार देने और सरकारी कार्यकारिणी में जगह देने जैसे कई मुद्दों की मांग इस रैली में की गई. सन 1913-14 महिला दिवस युद्ध का विरोध करने का प्रतीक बन कर उभरा.

रूसी महिलाओं द्वारा पहली बार शांति की स्थापना के लिये फरवरी माह के अंतिम रविवार को महिला दिवस मनाया गया और पहले विश्व युद्ध का विरोध दर्ज कराया गया लेकिन ये रैली असफल रही. मगर जब सन 1917 तक विश्व युद्घ में रूस के 2 लाख से ज्यादा सैनिक मारे गये तब रूसी महिलाओं ने फिर रोटी और शांति के लिये आज के दिन अर्थात 8 मार्च को हड़ताल की.

हालांकि तब भी रुसी राजनेता इसके खिलाफ थे मगर महिलाओं ने अपना आन्दोलन जारी रखा और फलतः रूस में ‘जार’ को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी और सरकार को महिलाओं को वोट देने के अधिकार की घोषणा करनी पड़ी तथा सन 1917 में ही सोवियत संघ ने इस दिन को राष्ट्रिय अवकाश के रूप में घोषित किया.

सिर्फ रूस में ही नहीं बाद में ये क्रांति यूरोप में हुई और यूरोप में भी महिलाओं ने पीस ऐक्टिविस्ट्स को सपोर्ट करने के लिये 8 मार्च को रैलियां की. प्राचीन ग्रीस में तो लीसिसट्राटा नामक एक महिला ने ‘प्राचीन ग्रीस में फ्रेंच क्रांति के दौरान’ युद्ध समाप्ति की मांग रखते हुए 8 मार्च से आंदोलन की शुरुआत की. अर्थात न सिर्फ सोवियत रूस और यूरोप बल्कि फ़्रांस से लेकर मंगोलिया और तुर्किस्तान के साथ साथ फारस में भी ये क्रांति की मशाल जली.

वरसेल्स में तो फ़ारसी महिलाओं के समूह ने 8 मार्च को एक ऐसा मोर्चा निकाला, जिसका उद्देश्य युद्ध के कारण महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार को रोकना था. इस तरह अलग-अलग जगह अलग-अलग महिलाओं द्वारा की गयी समानाधिकार की इस लड़ाई को अब ‘इंटरनेशनल विमेंस डे’ के रूप में पुरे विश्व भर में हर साल 8 मार्च को मनाया जाता है अर्थात महिला दिवस अब लगभग सभी विकसित, विकासशील देशों में मनाया जाता है.

यह दिन महिलाओं को उनकी क्षमता, सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक तरक्की दिलाने व उन महिलाओं को याद करने का दिन है जिन्होंने महिला अधिकार के लिये अथक प्रयास किये. 21 देशों में इस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित है और तमाम देश उपहार, ग्रीटिंग्स और शुभकामनाओं के साथ महिला दिवस मनाने की परंपरा निभाते हुए महिलाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते हैं.

‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने भी महिलाओं के समानाधिकार को बढ़ावा और सुरक्षा देने के लिए विश्वभर में कुछ नीतियां, कार्यक्रम और मापदंड निर्धारित किये. सन 1975 यूनाइटेड नेशंस का वो पहला साल था जब अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया और अब तो भारत में भी ‘महिला दिवस’ व्यापक रूप से मनाया जाने लगा है.

हालांकि यहां (भारत में) आज भी महिलाओं के समानाधिकार की लड़ाई पूरी नहीं हुई है क्योंकि पुरुषप्रधान समाज की सामंतवादी मर्दानगी वाली सोच अभी भी पुरुषों के मनोमस्तिष्क पर हावी है और वे महिलाओं को कमतर आंकते हैं. हालांकि जागरूकता पैदा करने के लिये इस दिन सरकार द्वारा नारी-विमर्श से संबंधित कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है और समाज में महिलाओं की भूमिका और उनकी महत्ता पर चर्चाये होती हैं मगर खुद महिलायें ही अभी अपने अधिकारों के प्रति पूर्ण जागरूक नहीं हुई है.

जो इक्की-दुक्की महिलायें अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ती है, उसे तमाम तरह के महिला संगठन इस दिन अर्थात 8 मार्च को उन महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्यों के लिये सम्मानित भी करते हैं. लेकिन महिलाओं में कानून के प्रति सजगता की कमी उनके सशक्तीकरण के मार्ग में रोड़े अटकाने का काम करती है और अशिक्षित महिलाओं को तो छोड़िये, शिक्षित महिलायें भी कानूनी दांवपेच से अनजान होने की वजह से जाने-अनजाने में हिंसा सहती रहती हैं और घरेलू हिंसा का शिकार बनती है.

ऐसे में भारत में महिलाओं को कानूनी रूप से शिक्षित करने के लिये मुहिम शुरू करना वक्त की जरूरत है लेकिन ऐसे मामलों में शासन-प्रशासन दोनों ही बेरुखी बरतते हैं. हालांकि भारत में अब महिलाओं को शिक्षा का अधिकार, वोट देने का अधिकार और सभी मौलिक अधिकार प्राप्त है और धीरे-धीरे ही सही बदलती परिस्थितियों ने शहरी महिलाओं को काफी आगे बढ़ाया, जिससे वे राजनीति से लेकर आर्म्ड फाॅर्स तक में शामिल हुई और प्रेजिडेंट, प्रधानमंत्री, लोक सभा अध्यक्ष लेकर प्रतिपक्ष की नेता जैसे पदों पर भी आसीन हुई.

एक तरफ जहां आर्मी, एयर फोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में भी पुरूषों के कंधे से कंधा मिला कर शहरी महिलायें चल रही हैं, वहीं गांव-देहातों में और पिछड़े कस्बों में आज भी उसे घरेलू कार्य करने वाली बिना पैसे की दासी और बच्चे पैदा करने वाली मशीन समझा जाता है, जो पैदा ही सिर्फ पुरुष की सेवा करने के लिये हुई हो.

भारत के एक सिमित वर्ग में अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं हैं लेकिन वक़्त के साथ इसे विस्तारित करना जरूरी है क्योंकि वैश्विक सोच के अनुसार 2030 तक विश्व की सभी महिलाओ को लैंगिक समानता और वैचारिक समानता में बराबरी का अधिकार देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जो भारत में मुझे थोड़ा मुश्किल ही लग रहा है.

भारतीय पुरुषों को अपनी मानसिकता में बदलाव लाना जरूरी है क्योंकि जब तक समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में महिलाओं के नजरिये को महत्व नहीं दिया जायेगा तब तक सामंतवादी पौरुषिक सोच तथा प्रताड़ना, भ्रूण हत्या, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, जबरन वैश्यावृति, वूमेन ट्रेफिकिंग जैसी कितनी ही दकियानूसी सोचों से छुटकारा पाना नामुमकिन है. हालांकि सरकार द्वारा हर साल महिला दिवस पर महिला अधिकारों के प्रति पुरुषों की मानसिकता में बदलाव लाने के लिये एक थीम प्रेषित की जाती है, जिससे जागरूकता बढे.

2018 की थीम PressForProgress थी, जो महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिये पुरुषों का वैचारिक सपोर्ट निर्धारण के लिये थी और 2019 की थीम Balance4better थी जो महिलाओं को समानाधिकार देने की सोच को बढ़ावा देने के लिये बनायीं गयी थी. पिछले साल यानि 2020 में ये थीम #Each4Equal थी, जो समान सोच और समानाधिकार के बदलाव को बढ़ावा देने के लिये बदलाव लाने के लिये थी और इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए प्रोत्साहित करना था.

अबकी बार अर्थात 2021 में यह थीम #Women_in_leadership है अर्थात कोरोना जैसी वैश्विक महामारी में भी महिलाओ का समान नेतृत्व प्राप्त करना लेकिन सही मायने में भारत में महिला दिवस मनाना तब ही सार्थक होगा, जब महिलाओं को मानसिक व शारीरिक रूप से संपूर्ण आजादी मिलेगी.

भारत में हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन एक थीम निश्चित की जाती है. मैं भारतीय मर्दों से आग्रह करता हूं कि अपनी झूठी मर्दानगी दिखाने के लिये महिलाओं पर अत्याचार न करे और पिता/पति/भाई/ बेटे के रूप में उन्हें दबाने का, उन्हें अधिकारों से वंचित करने का प्रयास न करे और महिलाये भी मां/बहन/पत्नी/बेटी के रूप में मानसिक बदलाव के लिये सशक्त बनें ताकि हम सब मिलकर एक बेहतर दुनिया के लिये कार्यरत हों जिसमें लिंगभेद से इतर सबको शामिल किया जाये.

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महिला, समाजवाद और सेक्स

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