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वन अर्थ, वन हेल्थ : न्यू वर्ल्ड आर्डर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 19, 2021
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वन अर्थ, वन हेल्थ : न्यू वर्ल्ड आर्डर

गिरीश मालवीय

‘न्यू वर्ल्ड आर्डर’ यदि आपको अभी भी कोई साजिश सिद्धांत लग रहा है तो आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जी-7 समिट का भाषण सुनना चाहिए. जी-7 समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लेते हुए अपने संबोधन में ‘वन अर्थ, वन हेल्थ’ की बात की है. उन्होंने कहा कि ‘भारत भविष्य की महामारी को रोकने के लिए वैश्विक कार्रवाई का समर्थन करता है. मानवता के लिए हमारा संदेश ‘एक धरती, एक स्वास्थ्य’ का है.’

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दरअसल यूएन एजेंडा 2030 – ‘वन वर्ल्ड गवर्नमेंट’ के लिए ही बनाया गया है. अगर आप अक्टूबर 2019 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ साझेदारी में जॉन्स हॉपकिन्स सेंटर में हुई ईवेंट 201 सिमुलेशन के सारे वीडियो देखें तो पाएंगे कि उसमे मुख्य रूप से किसी महामारी के दौरान सूचना के केंद्रीकृत नियंत्रण की आवश्यकता की बात की गयी है और यह नियंत्रण वैश्विक रूप से रखा जाएगा.

दरअसल यह नैरेटिव पिछले डेढ़ सालों में सेट कर दिया गया है कि अगर मौजूदा विश्व व्यवस्था सही तरीक़े से काम कर रही होती, तो दुनिया को नए कोरोना वायरस के इस संकट को पहचनाने में देर नहीं लगती. बल्कि, दुनिया के सामने आने वाले इस संकट को पहचान कर पूरी दुनिया को आगाह किया जाता.

ये भी समझिए कि अनिवार्य वेक्सीनेशन को लेकर न केवल मोदी सरकार बल्कि सभी सरकारें पूरी तरह से डेस्परेट नजर आ रही है. वेक्सीनेशन सरकारों को नागरिकों के शरीर तक पहुंचने की अनुमति देता है. हम ठीक से जानते भी नहीं हैं कि वैक्सीन में क्या-क्या तत्व है लेकिन उसके बावजूद उसे हमारे शरीर में डाला जा रहा है.

इसी प्रकार पब्लिक हेल्थ और सेफ्टी का बहाना बनाकर हमारे ज्ञान या सहमति के बिना हमारे शरीर में अन्य सभी प्रकार की चीजों को प्रत्यारोपित किया जा सकता है. वह कोई चिप भी हो सकती है या कोई भी RFID तकनीक युक्त टैटू भी.

इस नयी विश्व व्यवस्था को लागू करने के लिए कई स्तरों पर काम किया जा रहा है. चाहे वह नए नवेले OTT प्लेटफार्म हो या सोशल मीडिया, फिल्म और टेलीविजन के माध्यम से भी युवा पीढ़ी की मानसिकता ‘नई विश्व व्यवस्था’ के अनुकूल बनाने के लिए बहुत तेजी से काम चल रहा है. मोदी द्वारा बोला गया वाक्य ‘वन अर्थ वन हेल्थ’ मोदी के दिमाग की उपज नहीं है, यह ग्लोबल एजेंडा है जो एक तरह से इस न्यू वर्ल्ड आर्डर की असली चाबी है.

आपने खबर पढ़ी होगी कि पीएम मोदी ने जब G7 कॉन्फ्रेंस में ‘वन अर्थ, वन हेल्थ’ का नारा दिया तो इसका जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने भरपूर समर्थन किया और चांसलर एंजेला मर्केल ने इस बात के लिए पीएम मोदी की तारीफ भी की. आपने कभी सोचा कि ऐसा क्यों हुआ ? दरअसल ‘वन अर्थ, वन हेल्थ’ का जो नारा है, वह जर्मनी का ही दिया हुआ है.

2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अपनी प्राथमिकता वॉचलिस्ट में ‘डिजीज एक्स’ को जोड़ा. ‘…डिजीज X यानी आने वाले वर्षों में एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय महामारी जो एक पैथोजन यानी रोगजनक के कारण होने वाली है, जो वर्तमान में मानव रोग पैदा करने के लिए अज्ञात है’

जी हां 2018 में Johan Neyts बेल्जियम के KU Leuven यूनिवसिर्टी के वायरोलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर हैं. ये प्रोफेसर साहेब 2018 के पहले से ही अपने लेक्चर में कहते रहे हैं कोई नया पैथोजन जल्दी ही दुनिया में आएगा पैंडेमिक बन के. उनके शब्दों में ‘We can be absolutely sure that new pathogens will emerge in the future. And we should be prepared for the expected unexpected.’ (हम पूरी तरह से आश्वस्त हो सकते हैं कि भविष्य में नए रोगजनक उभरेंगे. और हमें अपेक्षित अप्रत्याशित के लिए तैयार रहना चाहिए.) और वह 2020 में वाकई में आ गया.

इस डिजीज X के लिए बिल गेट्स अपने संगठन CEPI के जरिए कमर कस कर बैठे हुए थे. CEPI दरअसल सार्वजनिक, निजी, परोपकारी और नागरिक संगठनों के बीच एक अभिनव साझेदारी है, जो 2017 में दावोस में शुरू की गई, ताकि भविष्य की महामारियों को रोकने के लिए टीके विकसित किए जा सकें. हमारे देश की वायरोलोजिस्ट गगनदीप कंग भी CEPI में महत्वपूर्ण पोस्ट संभाल चुकी है.

जी हां 2017 में सीईपीआई की प्राथमिक बीमारियों में इबोला वायरस, लासा वायरस, मध्य पूर्व श्वसन सिंड्रोम कोरोनावायरस, निप्पा वायरस, रिफ्ट वैली बुखार और चिकनगुनिया वायरस शामिल थे. CEPI मुख्य रूप से टीका निर्माण से ही जुड़ा हुआ है. फ़ाइजर और morerna वाले टीकों में आप जो यह Mrna यानी मैसेंजर RNA वाली तकनीक देख रहे हैं, यह बहुत कुछ इन्हीं की मेहरबानी से विकसित हुई है.

खैर, ‘वन अर्थ, वन हेल्थ’ पर वापस आते हैं. इसे बर्लिन सिद्धांत भी कहा जाता है. अक्टूबर 2019 में, WCS यानी वन्यजीव संरक्षण सोसायटी और जर्मन फेडरल फॉरेन ऑफिस ने ‘वन प्लैनेट, वन हेल्थ, वन फ्यूचर’ नामक एक सम्मेलन की बर्लिन में सह-मेजबानी की, जिसमें लगभग 50 देशों के शिक्षाविदों, सरकार, नीति और नागरिक समाज के सदस्यों को एक साथ लाया गया. इस सम्मेलन के ठीक दो महीने बाद COVID-19 महामारी ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया.

लेकिन मजे की बात यह है कि ‘वन अर्थ, वन हेल्थ’ मूल रूप से जर्मन विचार भी नहीं है. दरअसल बर्लिन सिद्धांत 2004 से मैनहट्टन सिद्धांतों को अपडेट करने का प्रयास था, जिसने दुनिया के सामने पहली बार ‘वन अर्थ, वन हेल्थ’ के नारे को सामने लाया.

2004 में, वन्यजीव संरक्षण सोसायटी WCS ने मानव, पशु और पारिस्थितिकी तंत्र स्वास्थ्य की गठजोड़ पर वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों पर चर्चा करने के लिए हितधारकों को एक साथ लाया और रॉकफेलर विश्वविद्यालय में संगोष्ठी ‘एक वैश्विक दुनिया में स्वास्थ्य के लिए अंतःविषय पुलों का निर्माण’ ने ‘मैनहट्टन सिद्धांतों’ को जन्म दिया.

जी हां इसमे रॉकफेलर फाउंडेशन भी शामिल था और गेट्स फाउंडेशन भी, और दुनिया के बड़े-बड़े NGO भी. इसलिए मैं बार बार कहता हूं कि जो सामने दिख रहा सिर्फ वो मत देखिए, उसके पीछे जो खेल चल रहे हैं उसे समझने का प्रयास कीजिए.

वेक्सीनेशन पूरी तरह से अनिवार्य होकर ही रहेगा

यूरो कप में हंगरी ओर पुर्तगाल का मैच बुडापेस्ट में हो रहा है, उसमें 67 हजार की कैपेसिटी के स्टेडियम में 61 हजार दर्शक मौजूद हैं. यह 2020 में कोविड 19 महामारी आने के बाद पहला ऐसा मैच है, जहां किसी स्टेडियम की फुल कैपेसिटी को इस्तेमाल में लाया जा रहा है. जो समर्थक हंगरी से हैं, उन्हें स्टेडियम में प्रवेश करने से पहले वेक्सीनेशन सर्टिफिकेट प्रस्तुत करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

अगर कोई फुटबॉल फैन हंगरी में बाहर से आया है तो भी उसके पास वैक्सीन का सर्टिफिकेट मौजूद होना चाहिए तभी वह स्टेडियम में प्रवेश पा सकेगा, लेकिन उसकी निगेटिव Rt-Pcr रिपोर्ट भी जरूरी होगी. हंगरी के अलावा जिन देशों में फुटबॉल फैन स्टेडियम में मैच देखने को जा रहे हैं, उनसे भी अपने टीकाकरण की स्थिति एनएचएस ऐप के माध्यम से प्रदर्शित करने पर ही स्टेडियम में प्रवेश दिए जाने की बात की जा रही है.

सीधी बात है कि यदि आपको वैक्सीन लगी है, तभी आप अपने कहीं भी आने जाने की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर पाएंगे. बहुत जल्द यह व्यवस्था भारत मे भी लागू कर दी जाएगी, और सारे लिबरल लोग इसके लिए सहमत होकर सरकार की हां में हां मिलाएंगे.

आईसीएमआर

कोरोना काल में आईसीएमआर काफी खबरों में रहती है. मैं डॉ. पी. के. राजगोपालन का एक लेख पढ़ रहा था. उन्होंने इस लेख में एक घटना का जिक्र किया –

मैं वेक्टर कण्ट्रोल रिसर्च सेण्टर, पाण्डिचेरी में काम कर रहा था, तब की एक मजेदार घटना बताता हूं. 1981 की बात है. प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने यूनियन हेल्थ मिनिस्टर बी. शंकरानन्द से पूछा –– आईसीएमआर क्या करती है ? तब आईसीएमआर में एक मीटिंग आयोजित की गयी और इन्दिरा गांधी को न्यौता दिया गया. आईसीएमआर के अलग–अलग संस्थानों के डायरेक्टर्स ने प्रजेण्टेशन देकर अपने कामों के बारे में बताया.

इन्दिरा गांधी ने ध्यानपूर्वक सुना, नोट्स बनाये. तब उन्होंने वैज्ञानिकों को प्रेजेण्टेशन के लिए आभार व्यक्त किया और आयोजनकर्ताओं को धन्यवाद दिया. अन्त में उन्होंने कहा कि ‘उनकी समझ में नहीं आता कि राजस्थान में रतौन्धी रोग इतना ज्यादा क्यों फैला हुआ है ? बहुत सारी औरतें गले के कैंसर से क्यों पीड़ित हैं ? मलेरिया जैसी बीमारियों से बहुत सारे लोग क्यों मर जाते हैं ? वह जानना चाहती हैं कि आईसीएमआर ने उनके लिए क्या किया ?’

क्या मोदी से आप ऐसी उम्मीद कर सकते हैं ?

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