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देश के सभी ‘अर्बन नक्सलों’ से एक ‘अर्बन नक्सल’ की कुछ बातें

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 8, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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एक वक्त था जब ‘नक्सल’ शब्द दुश्प्रचार के कारण भयावहता का द्योतक होता था. अनजान आम जनों में आतंक का माहौल बन जाता था और लोग उसे मारने के लिए घरों से दौड़े निकल पड़ते थे. परन्तु बीते पचास सालों में नक्सल शब्द समाज और पूरे देश भर में प्रेम, भाईचारा और सबसे ईमानदार क्रांतिकारियों में इनकी गिनती होने लगी है. अब शासक वर्ग जब किसी को नक्सल कहता है, तो उसके प्रति आम जनों के हृदय में प्रेम उमड़ पड़ता है. अब चाहे शासक नक्सल शब्द को कितने ही रूपों में परिभाषित क्यों न करें – अर्बन नक्सल, लिटरल नक्सल ब्लां-ब्लां, ये सारे प्रारूप लोगों के प्रेम को सहज ही जोड़ देता है. बहरहाल फासिस्टों के लिए एक राहत की बात यह भी है कि बिखरी हुई (और ज्यादातर दिशाहीन) क्रांतिकारी शक्तियों की ओर से फ़िलहाल उनके सामने कोई आसन्न चुनौती नहीं है और छोटे-मोटे, या इलाकाई चौहद्दियों में सिमटे प्रतिरोधों को वे खून के दलदल में डुबो देने या जेल-फाँसी-क़ैदखाना-फर्जी एनकाउंटर आदि के सुसंगठित तंत्र के बूते बखूबी निपट रहे हैं. इस आतंक-राज के आगे आपातकाल के उन्नीस महीने तो कुछ भी नहीं हैं. सौभाग्य से मैं भी एक ‘अर्बन नक्सल’ हूँ और इसी नाते अपने सभी ‘अर्बन नक्सल’ साथियों से ये बातें कर रही हूँ.

देश के सभी 'अर्बन नक्सलों' से एक 'अर्बन नक्सल' की कुछ बातें

अब इस बात में संशय का कोई कारण नहीं है कि यह फासिस्ट सत्ता उन सभी आवाज़ों का किसी भी क़ीमत पर गला घोंट देना चाहती है, जो नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकारों के पक्ष में मुखर हैं. भीमा कोरेगांव षड्यंत्र मुक़दमा उसी साज़िश की अबतक की सबसे ख़तरनाक कड़ी है.

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कल फादर स्टेन स्वामी का न्यायिक-सांस्थानिक हत्या हुई और आज ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की भारत संवाददाता निहा मसीह की एक रिपोर्ट के हवाले से पता चला है कि अमेरिका के मैसाचुसेट्स की डिजिटल फोरेंसिक फर्म ‘आर्सेनल कंसल्टिंग’ ने भीमा कोरेगांव मामले में ही, माओवादी षड्यंत्र और प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश में जेल में बंद आरोपियों में से दो – रोना विल्सन और सुरेन्द्र गाडलिंग के डिजिटल रिकार्ड्स और ई-मेल की जांच के बाद पाया है कि किसी हैकर के ज़रिए इन दोनों के कंप्यूटर में आपत्तिजनक सामग्री डलवाई गयी थी. आर्सेनल की यह तीसरी रिपोर्ट है. पिछली रिपोर्ट में ही यह बात बताई गयी थी कि रोना विल्सन के लैपटॉप में हैकर्स ने तीस आपत्तिजनक फाइलें डाल दी थी.

हैकर ने एक ही सर्वर का इस्तेमाल करते हुए ई-मेल के ज़रिये ‘नेटवायर’ नामक मैलवायर रोना और सुरेन्द्र के लैपटॉप में पहुंचाए. सुरेन्द्र के कंप्यूटर में यह मैलवायर दो साल पहले ही पहुंचा दिया गया था. ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की इस रिपोर्ट पर एन.आई.ए. प्रवक्ता अदालती कार्रवाई का हवाला देकर चुप्पी साधे हुए है. यहां यह याद दिलाना ज़रूरी है कि गिरफ़्तारी से ठीक पहले फादर स्टेन ने यही कहा था कि ‘उनके कंप्यूटर को हैक करके आपत्तिजनक सामग्री डाली गयी थी.’ ठीक ऐसा ही बात गौतम नवलखा और आनंद तेलतुम्बडे ने भी कही थी लेकिन गोदी मीडिया के सनसनीखेज ‘देशद्रोह-देशद्रोह’ के क़ातिलाना शोर में इन बातों पर किसी का ध्यान नहीं गया. आर्सेनल की तीन रिपोर्टें आ चुकी हैं, पर भारतीय कुत्ती मीडिया में इनकी कोई चर्चा नहीं हुई.

‘वाशिंगटन पोस्ट’ की आज की खबर की भी कहीं कोई चर्चा नहीं है. आगे इन साक्ष्यों पर अदालत में क्या होगा, यह अभी बताया जा सकता है. न्यायमूर्तिगण यही कहेंगे कि एक विदेशी फर्म की रिपोर्ट को प्रामाणिक नहीं माना जा सकता, इसलिए भारत की किसी मान्यता-प्राप्त फोरेंसिक एजेंसी द्वारा जांच कराई जाये. जिस देश में चुनाव आयोग, ई.डी., सी.बी.आई. – सभी सरकारी इशारों पर नाच रही हों, जहां एन.आई.ए. जैसी एजेंसी भाड़े के हत्यारों के गिरोह की तरह काम करती हो, जहां न्यायपालिका सीधे-सीधे फ़ासिस्ट सत्ता की गुलाम बन चुकी हो और जजों के सामने भी बस दो ही विकल्प हों – लोया या गोगोई; उस देश में किसी भी सरकारी या निजी फोरेंसिक फर्म से ईमानदार रिपोर्ट की उम्मीद कोई गावदी, जाहिल या अहमक ही करेगा.

फासिस्ट प्रचारतंत्र का प्रभाव इतना वर्चस्वकारी है कि प्रिंट मीडिया, डिजिटल मीडिया और विशेषकर फेसबुक और व्हाट्सअप्प की सूचनाओं के आम उपभोक्ता यह जानते भी नहीं कि भीमा कोरेगांव मामला है क्या और कितने हास्यास्पद और फर्जी तरीके से देश के उनलोगों को इसमें फंसाया गया है, जो वहां मौजूद होना तो दूर, कभी गए भी नहीं थे. किस तरह हिंसा भड़काने वाले दो हिन्दुत्ववादी फासिस्ट गुंडों को बेदाग़ छोड़कर ऐसे लोगों को पकड़ा गया जो नागरिक अधिकारों के लिए लम्बे समय से आवाज़ उठाते रहे थे. ‘न्यूज़क्लिक’ और ‘वायर’ जैसे कुछ वैकल्पिक पोर्टल्स पर आयी चंद-एक रिपोर्टें कितने लोगों ने पढ़ी होंगी ? और जिनके पास ऐसी रिपोर्ट्स पढ़कर शंका करने लायक विवेक है, उन्हें ही तो कुछ बोलने के साथ ही ‘अर्बन नक्सल’ जैसे विशेषणों के साथ समाज में अलग-थलग करने, संदेह के घेरे में ला खड़ा करने और आतंक के साए में जीने के लिए सुनियोजित ढंग से विवश कर दिया जा रहा है.

इस सत्ता के पास आतंक, दमन और यंत्रणा की अत्याधुनिक मशीनरी के साथ ही नयी डिजिटल तकनोलोजी से लैस’ गोएबेल्स के झूठ-तंत्र से कई-कई गुना अधिक शक्तिशाली और प्रभावी प्रचार-तंत्र है. और साथ ही यह एक ऐसी फासिस्ट सत्ता है जो संसद, न्यायपालिका और तथाकथित निष्पक्ष जांच-एजेंसियों के पूरे आबे-काबे के साथ अपने खूनी मंसूबों को अंजाम दे रही है. चंद जर्मन इजारेदार पूंजीपति घरानों के प्रति हिटलर की वफ़ादारी जितनी नंगी थी, अम्बानी-अदानी-टाटा आदि के प्रति मोदी की वफ़ादारी उससे कई गुना अधिक खुली अंधेरगर्दी भरी है.

बुर्जुआ और सोशल डेमोक्रैट संसदीय विपक्ष अब रस्मी विरोध लायक भी नहीं बचा. ऐसे में मोदी सरकार सीधे-सीधे बुर्जुआ वर्ग की मैंनेजिंग कमेटी के रूप में काम कर रही है. कोई पर्दा नहीं ! कौड़ियों के मोल जल-जंगल-ज़मीन-खदानें और सार्वजनिक संपत्ति पूंजीपतियों को सौंपी जा रही हैं. इसके लिए सालाना करोड़ों लोगों को दर-बदर किया जा रहा है और बेरोज़गार बनाया जा रहा है. जनता की बचत को लूटने के लिए बैंकों के दरवाज़े खोल दिए गए हैं. एक के बाद एक काले क़ानूनों के बनाए जाने का सिलसिला लगातार जारी है. फासिस्टों के लिए एक राहत की बात यह भी है कि बिखरी हुई (और ज्यादातर दिशाहीन) क्रांतिकारी शक्तियों की ओर से फ़िलहाल उनके सामने कोई आसन्न चुनौती नहीं है और छोटे-मोटे, या इलाकाई चौहद्दियों में सिमटे प्रतिरोधों को वे खून के दलदल में डुबो देने या जेल-फांसी-क़ैदखाना-फर्जी एनकाउंटर आदि के सुसंगठित तंत्र के बूते बखूबी निपट रहे हैं. इस आतंक-राज के आगे आपातकाल के उन्नीस महीने तो कुछ भी नहीं हैं.

इस बात को बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि आतंक के ऐसे अंधेरे में जो चंद लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में वंचित-उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ बन रहे हैं, सरकारी साज़िशों को, काले क़ानूनों के असली चरित्र को, पूंजीपतियों को हर तरीके से पहुंचाये जाने वाले फ़ायदों को बेनकाब कर रहे हैं, राजनीतिक बंदियों के लिए लड़ रहे हैं. नागरिक और जनवादी अधिकारों की बात कर रहे हैं, न्याय तथा पुलिस-तंत्र पर सवाल उठा रहे हैं, कश्मीर के आम लोगों के खूनी दमन, आदिवासियों के बीच निरंतर जारी ‘उजाड़ो और मारो’ मुहिम की सच्चाइयां सामने ला रहे हैं.

दंगों, धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और सुनियोजित नरसंहारों की बात कर रहे हैं. रफाएल, व्यापम आदि-आदि की बातें कर रहे हैं, वे सभी लोग फासिस्ट सत्ता के टारगेट हैं. जो आतंकित नहीं हो रहे हैं, झुक नहीं रहे हैं, उन्हें एक-एक करके ठिकाने लगाया जा रहा है. फर्जी मुक़दमे थोपे जा रहे हैं, उन्हें काल-कोठरी में ठूंसा जा रहा है, और सरकारी या भाड़े के गुंडों द्वारा उनकी ह्त्या की साजिशों को अंजाम दिया जा रहा है.

जो भी आज नागरिक और जनवादी अधिकारों की बात करेगा, उजाड़े जा रहे आदिवासियों और गरीबों की बात करेगा, काले क़ानूनों का विरोध करेगा, साम्प्रदायिक उन्माद की राजनीति का विरोध करेगा, कैम्पसों पर कसते फासिस्ट शिकंजे का विरोध करेगा, राजनीतिक बंदियों के अधिकारों की बात करेगा, वह ‘अर्बन नक्सल’ है. ऐसे ही ‘अर्बन नक्सलों’ को निपटाने का एक सबसे बड़ा प्रोजेक्ट भीमा कोरेगांव काण्ड का फर्जी मुक़दमा है. सौभाग्य से मैं भी एक ‘अर्बन नक्सल’ हूं और इसी नाते अपने सभी ‘अर्बन नक्सल’ साथियों से ये बातें कर रही हूं.

कल फादर स्टेन स्वामी की शहादत से फासिस्टों की आंखों का एक कांटा निकल गया. वयोवृद्ध वरवर राव बड़ी मुश्किलों से जर्जर शरीर लिए जेल से जमानत पर बाहर आ सके, पर कब उन्हें कुछ नये आरोप लगाकर ये हत्यारे फिर भीतर कर दें, कुछ कहा नहीं जा सकता. शरीर से अस्सी प्रतिशत विकलांग जी.एन. साई बाबा अंडा सेल में मौत की दहलीज़ पर खड़े हैं. गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, शोमा सेन, वेर्नन गोंजालेस, रोना विल्सन, अरुण फरेरा, सुरेन्द्र गाडलिंग आदि – इनमें से कुछ को छोड़कर सभी साठ या सत्तर की उम्र के पार हैं और अधिकांश किसी न किसी ‘टर्मिनल डिजीज़’ के मरीज़ हैं.

संजीव भट्ट के केस को भी नहीं भूला जा सकता. जेल की विकट परिस्थितियां इन सभी के लिए एक धीमी मौत के समान हैं. और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर से लेकर छत्तीसगढ़ और उत्तर-पूर्व तक – पूरे देश में हज़ारों बेक़सूर लोग यू.ए.पी.ए. जैसी संगीन धाराओं में सीखचों के पीछे हैं. पिछले दो वर्षों के भीतर देशद्रोह और आतंकवाद जैसे संगीन आरोपों के जितने भी मुक़दमों के फैसले आये, उनमें से 97 प्रतिशत से अधिक आरोपी बेक़सूर पाये गए. पचासों ऐसे मामले हैं जिनमें दस से बीस साल तक बिना जमानत या पेरोल के जेल में सड़ने के बाद कई युवा जब बूढ़े होकर बाहर निकले तो उनकी पूरी दुनिया उजड़ चुकी थी.

जाहिर है कि हर फासिस्ट और तानाशाह सत्ता मुख्यतः अपने आतंक के सहारे चलती है. वह डरती रहती है कि लोग कहीं उससे डरना न बंद कर दें. वह डरती है कि लोग इस बात को जान न लें कि संगठित जन-शक्ति के सामने वह एक कागजी बाघ से अधिक कुछ भी नहीं. इसी भय से ग्रस्त भारत के हिन्दुत्ववादी फासिस्ट मुखर आवाज़ों पर ‘टार्गेटेड’ चोट कर रहे हैं. इसके ज़रिये वे जनता में एक सन्देश देना चाहते हैं.  लेकिन हर चुनौती सामना करने के लिए आती है. हर समस्या समाधान का टास्क बनकर हमारे सामने आती है. हर रात की सुबह होती है और रात के अंधेरे में भी इधर-उधर कुछ मशालें जलती ही रहती हैं.

आज जब मोदी-शाह की सरकार नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकार के लिए उठने वाली हर आवाज़ का गला घोंट देने के सुनियोजित प्रोजेक्ट पर काम कर रही है तो हमें भी ऐसी आवाज़ों को और बुलंद और ताक़तवर बनाने के प्रोजेक्ट पर नये सिरे से, सुनियोजित ढंग से काम करना होगा.

1970 के दशक में भारत में जनवादी अधिकार आन्दोलन ने जो गति पकड़ी थी, वह अगले दशक के अंत तक ही सिमटने-बिखरने और संकुचित होने लगी थी. आज यह इतिहास का तक़ाज़ा है कि नयी ज़मीन पर नागरिक और जनवादी अधिकारों के आन्दोलन को फिर से खड़ा किया जाए और एक व्यापक जन-समर्थन वाले ज़मीनी आन्दोलन के रूप में खड़ा किया जाए. ऐसे बौद्धिकों की एक भारी संख्या मौजूद है. ज़रूरत उन्हें एक साझा लक्ष्य और साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर एक साथ खड़ा करने की है.

तमाम विचारधारात्मक और राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद बने रहेंगें अभी, बहसें चलती रहेंगी अभी (और वे ज़रूरी भी हैं), अलग-अलग राजनीतिक-सामाजिक प्रयोग होते रहेंगे, लेकिन जनवादी अधिकारों का सवाल एक ऐसा सवाल है जिस पर एक साझा लड़ाई लड़ी जा सकती है और ज़रूर लड़ी जानी चाहिए. इस मायने में कोई भी राजनीतिक-सांगठनिक संकीर्णता आत्मघाती होगी.

  • कात्यायनी

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