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बोलने की आज़ादी हमारा मूल अधिकार है – श्याम मीरा सिंह

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 20, 2021
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PMO और Home ministary के कोड ऑफ़ कंडक्ट का शिकार यानी सत्ता का दलाल आजतक न्यूज चैनल ने श्याम मीरा सिंह को बाहर निकाल दिया है. जिस देश का प्रधानमंत्री हर रोज़ संविधान की ली हुई अपनी शपथ की धज्जियां उड़ाता हो. उस देश के विश्वविद्यालयों में छात्रों के लिए और मीडिया संस्थानों में पत्रकारों के लिए कोड ऑफ़ कंडक्ट ऊपर से लागू करवाए जाते हैं. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कई मर्तबा अपने जजमेंट्स में कहा है कि जो भी नियम, एक्ट, बिल, प्रथा, कोड ऑफ़ कंडक्ट इस देश के नागरिकों के बोलने की आज़ादी का हनन करेगा वो Null and Void माना जाएगा.

बोलने की आज़ादी हमारा मूल अधिकार है - श्याम मीरा सिंह

आज से ‘आजतक’ के साथ पत्रकारिता का मेरा सफर खत्म हुआ. प्रधानमंत्री मोदी पर लिखे मेरे दो ट्वीट की वजह से मुझे ‘आजतक’ से निकाल दिया गया है. मुझे इस बात का दुःख नहीं है, इसलिए आप भी दुःख न करें. जिन दो ट्वीट का हवाला देते हुए मुझे निकाला गया है, वे ये दो ट्वीट हैं –

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  • Who says Respect the Prime Minister. They should first ask Modi to respect the post of Prime Minister post. (हिंदी अनुवाद- जो कहते हैं कि प्रधानमंत्री का सम्मान करो, उन्हें सबसे पहले मोदी से कहना चाहिए कि वे प्रधानमंत्री पद का सम्मान करें)

  • यहां ट्विटर पर कुछ लिखता हूं तो कुछ लोग मेरी कंपनी को टैग करने लगते हैं. कहते हैं इसे हटाओ, इसे हटाते क्यों नहीं. मैं अगला ट्वीट और अधिक दम लगाकर लिखता हूं. पर इसे लिखने से पीछे नहीं हटूंगा कि ‘Modi is a shameless Prime Minister.’

ये दो बातें हैं जिन पर मुझे निकाला गया या निकलवाया गया. सात महीने पहले जब मैंने ‘आजतक’ JOIN किया, तब भी मुझे इस बात का भान था कि मुझे क्या लिखना है, किन लोगों के लिए बोलना है. तब ही से सत्ताधारी दल के समर्थकों द्वारा कंपनी को टैग कर-कर के लिखा जाने लगा था कि ‘इस आदमी (मुझे) को आजतक से निकाला जाए, क्योंकि ये मोदी विरोध में लिखता है.

बीते कुछ दिनों से भी कंपनी पर सोशल मीडिया के माध्यम से एक वर्ग के द्वारा ये दवाब बनाया जा रहा था. अंततः इन दो ट्वीट के बाद मुझे आजतक से निकाल दिया गया है. मुझे किसी से शिकायत नहीं है. जो मैंने लिखा मैं उसके लिए स्टैंड करता हूं. ये वो बातें हैं जो एक पत्रकार के रूप में ही नहीं, एक नागरिक के रूप में मुझसे अपेक्षित थी कि –

  • मैं एक ऐसे शेमलेस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूं, जो एक खिलाड़ी के अंगूठे की चोट पर ट्वीट कर सकता है मगर विदेश में शहीद हुए एक ईमानदार पत्रकार पर एक शब्द भी नहीं बोलते.
  • मुझसे एक नागरिक के रूप में ये अपेक्षित था कि मैं उस प्रधानमंत्री को ‘शेमलेस’ कहूं जिसकी लफ्फाजी और भाषणबाजी ने मेरे देश के लाखों नागरिकों को कोरोना में मरने के लिए अकेला छोड़ दिया.
  • मुझसे ये अपेक्षित था कि ऐसे प्रधानमंत्री और उसकी सरकार को बेशर्म कहूं जिसकी वजह से इस देश का एक बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग हर रोज भय में जीता है, जिसे हर रोज डर लगता है कि शाम को सब्जी लेने जाऊंगा तो घर लौट भी पाऊंगा या नहीं या दाढ़ी और मुसलमान होने के कारण मारा जाऊंगा.
  • मुझसे ये अपेक्षित था कि मैं उस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूं जो लद्दाख में शहीद हुए 21 सैनिकों की शहादत की खबर को दबाए, और अपनी गद्दी बचाने के लिए ये कहकर दुश्मन देश को क्लीनचिट दे दे कि सीमा में कोई नहीं घुसा, न कोई विवाद हुआ है. देश को बाकी लोगों से पता चले कि हमारे जवानों की हत्या कर दी गई है.
  • किसी भी पार्टी, छात्र, मजदूर, शिक्षकों, शिक्षामित्रों, दलितों के संगठन अपना विरोध करने के लिए सड़क पर आएं और पुलिस लाठियों से उनकी कमर तोड़ दे. तब मुझसे ये अपेक्षित किया जाता है कि उस पुलिसिया जुल्म के शीर्ष पर बैठे प्रधानमंत्री को मैं कहूं कि वे ‘शेमलेस’ हैं.
  • हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर आठ महीने तक सड़कों पर पड़े रहें, उनमें से सैंकड़ों बुजुर्ग धरनास्थल पर ही दम तोड़ दें, और प्रधानमंत्री कहें कि मैं केवल एक कॉल दूर हूं, तब एक नागरिक के रूप में मुझसे उम्मीद की जाती है कि मैं उस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूं.

ऐसी हजार बातें और सैंकड़ों घटनाएं हैं जिन पर इस देश के प्रधानमंत्री को शेमलेस ही नहीं, धूर्त, चोर और निर्दोष नागरिकों के अधिकारों को कुचलने वाला एक कायर तानाशाह कहा जाए. इसलिए मुझे अपने कथन का, अपने कहे का कोई दुःख नहीं है.

इस बात का भान मुझे नौकरी के पहले दिन से था कि देर सबेर मुझसे इस्तीफा मांगा जाएगा या किसी भी मिनट पीएमओ आवास की एक कॉल पर निकाल दिया जाऊंगा. हर ट्वीट करते हुए जेहन में ये बात आती थी कि इसके बाद कहीं FIR न हो जाए, कहीं नोटिस न भेज दिया जाए. कैसे निपटूंगा उससे ? ये जोखिम मन में सोचकर भी लिख देता था.

मैंने वही बातें कहीं जो मुझसे एक पत्रकार के रूप में ही नहीं एक सिटीजन के रूप में भी अपेक्षित थीं, जिसकी उम्मीद सिर्फ मुझसे नहीं की जाती, बल्कि एक दर्जी से भी की जाती है कि वर्षों में कमाए इस देश की स्वतंत्रता के लुटने पर तुम बोलोगे. ये अपेक्षा मुझसे ही नहीं की जाती, प्राइमरी में पढ़ाने वाले टीचर से भी की जाती है.

विश्वविद्यालयों के कुलपति, मकान बनाने वाले राजमिस्त्री, सड़क पर टेंपो चलाने वाले ड्राईवर, पढ़ने वाले छात्रों, कंपनियों में काम करने वाले हर कर्मचारी से ये उम्मीद की जाती है कि हर रोज हो रही भीड़ हत्याओं पर वे बोलेंगे. मैंने अपना काम चुकाया, जहां रहा हर उस जगह कोशिश की कि आम इंसानों की बेहतरी के लिए कुछ लिख सकूं.

चूंकि उम्र और तजुर्बें में बच्चा हूं. करियर के शुरुआती मुहाने पर हूं. जहां से आगे का मुझे पता नहीं. शुरुआत में ही मेरे लिखे के बदले मेरा रोजगार छीन लिया गया तो अंदर से कभी कभी कुछ इमोशनल हो जाता हूं. ऐसे लगता है जैसे कोई छोटी-सी चिड़िया किसी जंगल में आई और उड़ने से पहले ही उसके पंख कुतर दिए गए हों. पर ये भी जरूरी है. उस नन्हीं चिड़िया के पास ये विकल्प था कि वो कुछ दिन बिना उड़े ही अपने घोंसले में रहे, चुप बैठे, कहीं भी उड़ने न जाए. पर उस चिड़िया ने अपने पंख कुतर जाना स्वीकार लिया, लेकिन ये नहीं कि वो उड़ना छोड़ देगी.

जमीन पर पड़े उसके पंख इस बात के रूप में दर्ज किये जाएंगे कि कोई ऐसा शासन था जिसमें पंछियों के पंख कुतर लिए जाते थे. अगर वो चिड़िया उड़ना बंद कर घोसले में ही बैठी रहती तो ये पंख कभी दर्ज नहीं होते और पंख कुतरने वाले शासन का नंगा चेहरा कभी नजर नहीं आता.

ऐसी नन्हीं चिड़ियों के कुतरे हुए पंख, उस जंगल पर राज करने वाले राजा का चेहरा दर्ज करने के लिए कागजात हैं. इसलिए मुझे दुःख नहीं, अफ़सोस नहीं, संतुष्टि जरूर है कि मैं अपना हिस्सा चुका के जा रहा हूं. बाकी अपने हर अच्छे बुरे में इन पंक्तियों से हिम्मत मिलती रहती है कि

हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियां उट्ठें, वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं.

कोड ऑफ़ कंडक्ट यानी PMO और Home ministary के कोड ऑफ़ कंडक्ट

एक सवाल मुझे पूछा जा रहा है कि अगर आपने कंपनी के कोड ऑफ़ कंडक्ट (Guidelines) पर साइन किए तो आपको उसका पालन भी करना था, अन्यथा साइन नहीं करने थे. कंपनी के कोड ऑफ़ कंडक्ट कहते हैं कि आप खुद के सोशल मीडिया हैंडल्स पर कुछ भी नहीं लिख सकते. पहली बात ये ही कितना हास्यास्पद है कि मीडिया कंपनियां guidelines जारी कर रही हैं कि बोलना मना है. लेकिन इसे कंपनियों के इतर बड़े परिदृश्य में देखने की ज़रूरत है.

मीडिया संस्थानों और विश्वविद्यालयों में लगाए जाने कोड ऑफ़ कंडक्ट, इनके संपादकों और कुलपतियों द्वारा नहीं लगाए जा रहे, बल्कि लगवाए जा रहे हैं. कौन बोलने वाली हर आवाज़ को कुचल रहा है वो इस देश का बच्चा बच्चा जानता है. मीडिया संस्थानों के कोड ऑफ़ कंडक्ट, मीडिया संस्थानों के कोड ऑफ़ कंडक्ट नहीं हैं बल्कि PMO और Home ministary के कोड ऑफ़ कंडक्ट हैं.

जिस देश का प्रधानमंत्री हर रोज़ संविधान की ली हुई अपनी शपथ की धज्जियां उड़ाता हो. उस देश के विश्वविद्यालयों में छात्रों के लिए और मीडिया संस्थानों में पत्रकारों के लिए कोड ऑफ़ कंडक्ट ऊपर से लागू करवाए जाते हैं. जब भी वे प्रश्न करेंगे कि इस देश में संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, तभी उनसे कह दिया जाए कि आपने कोड ऑफ़ कंडक्ट का उल्लंघन किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कई मर्तबा अपने जजमेंट्स में कहा है कि जो भी नियम, एक्ट, बिल, प्रथा, कोड ऑफ़ कंडक्ट इस देश के नागरिकों के बोलने की आज़ादी का हनन करेगा वो Null and Void माना जाएगा. यानी बोलने की आज़ादी के अधिकार पर अंकुश लगाने वाले नियम और क़ानून असंवैधानिक माने जाएंगे, चाहे वो सरकार ने बनाए हों, चाहे किसी प्राइवेट संस्थान ने बनाएं हों या किसी खाप पंचायत ने बनाए हों.

अपने एक जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि सरकारी कर्मचारी होने से किसी के बोलने की आज़ादी नहीं छीनी जा सकती. सरकारी कर्मचारी होकर भी आदमी के बोलने का अधिकार उतना ही है, जितना बाक़ी नागरिकों का. इसलिए केवल इंडिया टुडे या आजतक, NDTV ही नहीं, कोई भी सरकारी या प्राइवेट संस्थान कोड ऑफ़ कंडक्ट के नाम पर बोलने का अधिकार नहीं छीन सकते.

रही बात उस कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन करने की तो जिस मीडिया संस्थान से मैंने पढ़ाई की है, उस IIMC में भी इस तरह के कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन किए थे, जिसके अनुसार मैं IIMC के ख़िलाफ़ नहीं लिख सकता था. सरकार के ख़िलाफ़ बोल नहीं सकता था. अगर मैं उस कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन नहीं करता तो गेट से ही लौटा दिया जाता. मैंने उस पर साइन करके संस्थान में एडमिशन लिया. उसके बाद उसी कोड ऑफ़ कंडक्ट के विरोध में जमकर लिखा, उस संस्थान के बीच आंगन में खड़े होकर बोला.

कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन कर संस्थानों में घुसना पढ़े-लिखे बच्चों की मजबूरी है और फिर उसका विरोध करते हुए बोलना न केवल आपका अपना अधिकार है बल्कि ज़िम्मेदारी भी है. यही काम मैंने किया.

जिस कोड ऑफ़ कंडक्ट का मैंने कथित तौर पर उल्लंघन किया दरअसल वे इस सरकार द्वारा पत्रकारों और नागरिकों की आवाज़ दबाने के लिए लगाए गए प्रतिबंध हैं. मैंने कंपनी के नियमों का उल्लंघन नहीं किया, PMO, गृहमंत्रालय, आइटी मिनिस्ट्री द्वारा पूरे देश के विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों में लगाए जा रहे आलोकतंत्रिक कोड ऑफ़ कंडक्ट का उल्लंघन किया. कोड ऑफ़ कंडक्ट सरकार की तारीफ़ करने वालों पर लागू नहीं होते. फिर ये किसके लिए लाए गए हैं ?

अगर इन कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन न करें तो हज़ारों लोग IIT, IIM, IIMC और तमाम विश्वविद्यालयों में दाख़िला नहीं ले पाते. गेट पर से ही लौटा दिए जाते. कंपनियों के कथित कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन न करें तो कंपनियों के अंदर नहीं जा पाते. हम सब डिज़र्व करते हैं कि हमें ऐसी यूनिवर्सिटियां, कॉलेज, कंपनियां मिलें कि हम पढ़ भी सकें, बोल भी सकें, लिख भी सकें और सुना भी सकें.

जिस कोड ऑफ़ कंडक्ट के उल्लंघन का आरोप मुझ पर है, वो कोड ऑफ़ कंडक्ट अपने आप में छात्रों, पत्रकारों के अधिकारों का उल्लंघन है. अन्यथा जो परिपक्व लोकतंत्र हैं वे अपने प्रधानमंत्री ही नहीं अपनी न्यायपालिका, जजों और संसद के ख़िलाफ़ बोलने की आज़ादी देने की ओर बढ़ चुके हैं. और हम नागरिकों की छोड़िए पत्रकारों की आज़ादी छीनने के लिए भी नियम ला रहे हैं. इसलिए कह रहा हूं कंपनियों और विश्वविद्यालयों के कोड ऑफ़ कंडक्ट, मैनेजर या कुलपतियों द्वारा लगाए जा रहे कोड ऑफ़ कंडक्ट नहीं हैं बल्कि PMO, IT ministry, Home ministry के छुपे हुए कोड ऑफ़ कंडक्ट हैं. जिन्हें तोड़ने का अधिकार इस देश के प्रत्येक नागरिक को है.

अगर किसी देश में नियम बना दिया जाए कि एक वर्ग की हत्याएं करना एक क़ानून है इसकी कोई सजा नहीं मिलेगी. उसके बाद क़ानूनविद और संविधान पढ़ने वाले आगे से यही कहेंगे कि लिखे हुए नियम के हिसाब से एक वर्ग के लोगों की हत्या करना अपराध नहीं है, नियम तो यही कहता है. तब कुछ लोग ये भी कह सकते हैं चुनी हुई सरकार ने नियम बनाया है, देश में रहना है तो नागरिकता पर साइन क्यों किए ? लेकिन वे ये नहीं कहेंगे कि इस प्रकार के नियम क्यों हैं, अगर हम लोकतंत्र में हैं.

जिन्हें लोकतंत्र, बोलने की आज़ादी, मानवाधिकारों, शासन पद्धति की थोड़ी भी समझ होगी वो कहेंगे कि बोलने की आज़ादी हमारा मूलाधिकार है, सरकार के नियम, किसी पंचायत के फ़रमान, किसी कंपनी के कोड ऑफ़ कंडक्ट उसपर अंकुश नहीं लगा सकते.
पत्रकारिता संस्थानों में ही नहीं, इस देश के स्कूलों, छात्रावासों, कंपनियों, दुकानों, शोरूमों, किसी भी जगह पर इस तरह के कोड ऑफ़ कंडक्ट नहीं होने चाहिए जो किसी नागरिक को उसके बोलने के अधिकार से रोकते हों.

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