Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

अफगानिस्तान के लिए तालिबान लाख बुरा सही, अमेरिकन साम्राज्यवाद के चंगुल से छूटा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 23, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

अफगानिस्तान के लिए तालिबान लाख बुरा सही, अमेरिकन साम्राज्यवाद के चंगुल से छूटा है

रिजवान रहमान

देश की एक बड़ी पत्रकार शक्ल से पहचान रही हैं कि कौन क्या बोल सकता है और उन्हें हैरत है कि अंग्रेजीदां, आधनिक दिखने वाले मर्द खासकर वामपंथी उनकी तरह बात नहीं कर रहे हैं. खैर मुझे इस पर मोदी का उल्लेख नहीं करना चाहिए लेकिन उसने भी करीब डेढ़ साल पहले कपड़े से पहचानने का दावा किया था.

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

बहरहाल मुझे समझ नहीं आता कि किसी को प्रतिक्रियावादी बताने के लिए उसकी वेश-भूषा, दाढ़ी-टोपी पर जाना कहां तक सही ठहरता है ? याद रखिए जब भी कपड़े और दाढ़ी पर जजमेंटल होकर पूरे समाज को कटघड़े में खड़ा करते हैं, प्रतिक्रियावादी विचार की कतार वहीं से शुरू हो जाती है.

इंदौर में एक मुसलमान चूड़ी वाले की लिन्चींग की मुखालफत में उसे तालिबानी आतंक करार दिया जाएगा लेकिन ये तालिबानी आतंक नहीं, आरएसएस का आतंक है. विशुद्ध भगवा आतंक है जो राह चलते किसी भी गरीब-पिछड़े मुसलमान की लिन्चींग के लिए दौड़ पड़ता है.

भारत में चल रहे आतंक को तालिबानी आतंक करार देकर उसकी पर्दापोशी बंद होनी चाहिए. तालिबानी आतंक अफगानिस्तान में है और वहीं तक है. भारत में चल रहा आतंक हिंदू राष्ट्र निर्माण की घोषणा है, मनुस्मृति लागू करने की कोशिश है.

अफगानिस्तान में अफरा-तफरी के आलम के बीच वेस्टर्न मीडिया और Reuters Pictures दुनिया भर में अमेरिकन आर्मी का मानवतावादी चेहरा दिखा कर अमेरिका के युद्ध अपराध को छुपाने की कोशिश में लगी है. इस मतलब यह नहीं है कि अमेरिकन आर्मी के ये इंडिविजुअल दिल के अच्छे नहीं हो सकते. बहुत मुमकिन है तस्वीरों में दिखने वाले आर्मी पर्सन सख्त दिल न हो, उनके मन में अफगानी बच्चों के लिए बेपनाह प्यार हो, लेकिन स्ट्रकचर उन्हें जल्लाद बना देता है, इंसानियत छीन लेता है, अंतरात्मा से अजनबी कर देता है.

अगर हम अमेरिका द्वारा दुनिया भर में मारे गए लोगों के डेटा पर गौर करें तो पता चलता है सभी अमेरिकन प्रेसिडेंट वॉर क्रिमिनल हैं. इंसानियत के दुश्मन हैं. यहां तक की बहुत लिबरल छवि वाला बाराक ओबामा भी जिसके युद्ध अपराधों से चर्चा करने से वेस्टर्न मीडिया बचती ही नहीं रही है बल्कि छुपाती भी रही है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रम्प के शासन में अमेरिका ने इस धरती पर हर 12वें मिनट में एक बम गिराया है. यानी एक दिन में 121 बम और एक साल में 44,096 बम गिराया है. पेंटागन (यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ डिफेन्स का हेडक़्वार्टर) के डेटा के मुताबिक जॉर्ज बुश ने अपने शासनकाल में प्रतिदिन के हिसाब से 34 बम गिरवाए थे. ‘The Bureau of Investigative Journalism’ की रिपोर्ट के मुताबिक ओबामा ने अपने शासन में ड्रॉन से 563 हमले करवाए थे, जिसमें मुख्यतः पाकिस्तान, सोमालिया और यमन को टारगेट किया गया था.

अमेरिका के इन युद्ध अपराधों पर पत्रकार Witney Webb लिखती हैं, ‘यह चौंकाने वाला है कि इन हमलों में मारे गए 80 फीसदी लोगों की कभी पहचान नहीं हो सकी. यहां तक की CIA ने भी अपने डोक्यूमेंट में माना है कि उन्हें पता नहीं होता था कि वे किसे मार रहे हैं.’ इसे दूसरे तरीके से कहें तो इन अमेरिकन बमबारी में मरने वाले लगभग सिविलियन थे.

एक और रिपोर्ट में पत्रकार और एक्टीविस्ट David DeGraw लिखते हैं, ‘CIA डोक्यूमेंट के मुताबिक ड्रोन हमले में मारे गए लोगों में से सिर्फ 2% ही ऐसे थे जो उनके द्वारा मारने वाली लिस्ट यानी Kill List में थे, बाकी मारे गए 98% निर्दोष सिविलियन थे.’

इसलिए ये तस्वीरें क़ोफ्त पैदा करने वाली है. अमेरिका के क्रुर चेहरा पर पर्दा डाल रही है. लेकिन हम यह नहीं भूल सकते कि अमेरिका अपने इकोनोमिक हित को साधने के लिए इंसानियत को कुचलता आया है. जापान के हिरोसीमा पर एटोमिक बमबारी से लेकर वियतनाम, लैटिन अमेरिका, इराक, अफगानिस्तान में युद्ध अपराध किए हैं, जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता.

हम ह्यूमेन राइट्स का वही पाठ पढ़ते हैं जो साम्राज्यवादी ताकतें हमें पढ़ाना चाहती है. अमेरिका इसमें माहिर है. उसने अफगानिस्तान को रौंद कर भी दुनिया भर के लोगों से खुद को व्हाइट वॉश करवा लिया. और दिलचस्प है कि हम तालिबान को गाली देने में अमेरिकन साम्राज्यवाद की सहलाते रहे. मानवाधिकार हनन की आशंका के बीच अफगानिस्तान को 20 साल तक रौंदे जाने को दरकिनार कर गए.

तालिबान का इतिहास डरावना है. महिला-अल्पसंख्यक पर जुल्म ढ़ाए हैं. उनका क़त्ल किया गया, उन्हें घर की चारदीवारी में क़ैद कर दिया लेकिन पिछले 20 साल में अमेरिका ने जो किया, हमें नज़र नहीं आ रहा है. 2001 के बाद से अमेरिकन एयर स्ट्राइक में 50 हजार से अधिक आम अफगानी की हुई मौत ‘अच्छे दिन’ लग रहा है या शायद उन आम अफगानी की मौत को भी तालिबानी में गिन लिया गया.

यूएन के मुताबिक 2005 से 2019 के बीच अमेरिकन एयरस्ट्राइक में 26000 से अधिक बच्चों की जान चली गई और पिछले 5 सालों में करीब 1600 बच्चे हर साल मारे गए हैं. 2017 के बाद से अफगानियों की मौत में 330 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लेकिन हम इस पर सवाल नहीं करेंगे क्योंकि हमें लत है गर्व करने की. हमें मानवाधिकार हनन की ऐसी घटनाएं कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व और झारखंड से लेकर छत्तीसगढ़ में भी नहीं दिखती. फिर अमेरिका द्वारा किया गया ह्यूमेन राइट्स वायलेशन कहां से दिखेगा ?

बहुत संभव है कि मेरे ऐसा लिखने के बाद कुछ लोग मन ही मन मुझे तालिबान समर्थक करार दे. कुछ लोग कमेंट में भी लिख दें. फिर भी मैं यह बोलना चाहता हूं, अफगानिस्तान के लिए तालिबान लाख बुरा सही, अमेरिकन साम्राज्यवाद के चंगुल से छूटा है.

कुल जमा बात है कि कॉलोनाइज्ड होकर रहने से बेहतर घर के दुश्मन के बीच रहना. इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि अब से तालिबान अफगानिस्तान की नियति है. अफगानी जनता लड़ना-भिड़ना जानती है. वे एक दिन इसे भी परास्त कर देगी, जिसकी शुरुआत हो चुकी है.

खबर है कि कुछ अफगानी स्टूडेंट्स ने जेएनयू प्रशासन से आग्रह किया है कि वे उन्हें वापस बुला लें. ऐसे में अगर आप अब भी तालिबान को समर्थन दे रहें हैं तो थोड़ा ठहर कर सोचिए की आप क्या कर रहे हैं ? तालिबान से अफगानी खुश नहीं है तो किसी और को खुश होने का हक़ बिल्कुल भी नहीं है.

Read Also –

भारत के लिए तालिबान क्या है ? भारत ट्रोल आर्मी की कान में बता दे
भारतीय मुस्लिम तालिबानी आतंकवाद का विरोध क्यों नहीं करते ?
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की जीत का प्रभाव
अफ़ग़ानी कविताएं
धर्म के नाम पर शासन करना मूलत: विकास विरोधी विचार है
प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह किसी भी मानवीय संवेदना और जिम्मेदारी से शून्य पशु है ?
जांबाज पत्रकार दानिश सिद्दीकी के मौत पर प्रधानमंत्री की चुप्पी, आईटीसेल का जश्न

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

पेगासस और जनद्रोही सरकारें

Next Post

क्रूर शासक अहमद शाह अब्दाली के जुल्मोसितम की दर्द भरी दास्तान

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

क्रूर शासक अहमद शाह अब्दाली के जुल्मोसितम की दर्द भरी दास्तान

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

दिल्ली विधानसभा चुनाव में गूंजता हिंसा का पाठ

January 28, 2020

जर्मनी में फ़ासीवाद का उभार और भारत के लिए कुछ ज़रूरी सबक़

June 3, 2018

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.