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TRIPURA IS BURNING

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 8, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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Tripura Is Burning

अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में त्रिपुरा में एक रैली निकाली गयी. रैली में उग्र सांप्रदायिक नारे, जो नारे की शक्ल में गाली-गलौच जैसे थे, लगाए गए. यूं कहा तो गया कि रैली बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुई हिंसा के खिलाफ थी. लेकिन हिंसा का विरोध करने के नाम पर हुई रैली के जरिये उत्तर त्रिपुरा के पानीसागर इलाके में हिंसा का तांडव किया गया. मस्जिद, दुकाने और घर, इस हिंसा का निशाना बने. हिंसा के तथाकथित विरोध के नाम पर यह हिंसक रैली विश्व हिन्दू परिषद द्वारा आयोजित की गयी थी.

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This video from Eastern Mojo. Hindu nationalists torch Muslim houses, mosques, take rallies chanting ‘Jai Shri Ram’ ,vandalise Muslim businesses in #Tripura . If this hate that has engulfed the entire nation is not a precursor to a genocide, I do not know what is #TRIPURAMUSLIMS pic.twitter.com/xyZ1wZEWPh

— Rana Ayyub (@RanaAyyub) October 27, 2021

अंग्रेजी न्यूज़ पोर्टल- द वायर में छपी रिपोर्ट के अनुसार त्रिपुरा के अपर पुलिस महानिरीक्षक सुब्रत चक्रवर्ती ने उक्त हिंसा की बात स्वीकार की थी. उक्त हिंसा और भड़काऊ सांप्रदायिक नारे लगाने वालों पर क्या कार्यवाही हुई यह तो पता नहीं परंतु इस हिंसा के वास्तविक तथ्य जानने और सोशल मीडिया पर हिंसा की निंदा करने वालों पर तत्काल कार्यवाही करने के लिए त्रिपुरा पुलिस मैदान में उतर पड़ी है.

‘लॉंयर्स पर डेमोक्रेसी’ की ओर से त्रिपुरा में हिंसा की घटना के तथ्यों को जानने के लिए उच्चतम न्यायालय के वकीलों का दल त्रिपुरा गया. इस दल ने जो भी कहा, उसके आधार पर उक्त दल में शामिल दो अधिवक्ताओं मुकेश और अंसार इंदौरी के विरुद्ध आतंकवाद निरोधक अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

यह जैसे कुछ कम था तो त्रिपुरा पुलिस ने 102 सोशल मीडिया हैंडल्स के विरुद्ध भी यूएपीए के तहत नोटिस जारी कर दिया. पत्रकार श्याम मीरा सिंह ने ट्विटर पर – त्रिपुरा इज़ बर्निंग – लिखा तो उन्हें भी यूएपीए के तहत नोटिस भेज दिया गया.

त्रिपुरा में चल रही घटनाओं को लेकर, मेरे तीन शब्द के एक ट्वीट पर त्रिपुरा पुलिस ने मुझ पर UAPA के तहत मुक़दमा दर्ज किया है, त्रिपुरा पुलिस की FIR कॉपी मुझे मिल गई है. पुलिस ने एक दूसरे नोटिस में मेरे एक ट्वीट का ज़िक्र किया है. ट्वीट था- Tripura Is Burning. त्रिपुरा की भाजपा सरकार ने मेरे तीन शब्दों को ही आधार बनाकर UAPA लगा दिया है.

पहली बार में इस पर हंसी आती है, दूसरी बार में इस बात पर लज्जा आती है, तीसरी बार सोचने पर ग़ुस्सा आता है. ग़ुस्सा इसलिए क्योंकि ये मुल्क अगर उनका है तो मेरा भी. मेरे जैसे तमाम पढ़ने-लिखने, सोचने और बोलने वालों का भी. जो इस मुल्क से मोहब्बत करते हैं, जो इसकी तहज़ीब, इसकी इंसानियत को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. अगर अपने ही देश में अपने नागरिकों के बारे में बोलने के बदले UAPA की सजा मिले तब ये बात हंसकर टालने की बात नहीं रह जाती.

बोलने और ट्वीट करने भर पर UAPA जैसे चार्जेस लगाने की खबर पढ़ने वाले हर नागरिक को एक बार ज़रूर इस बात का ख़्याल करना चाहिए कि अगर पूरे मुल्क में एक नागरिक, एक समूह, एक जाति, एक मोहल्ला या एक धर्म असुरक्षित है तो उस मुल्क का एक भी इंसान सुरक्षित नहीं है. लेट अबेर, एक न एक दिन इंसानियत और मानवता के हत्यारों के हाथ का चाकू आपके बच्चे के गर्दन पर भी पहुँचेगा।

मेरा इस बात में पक्का यक़ीन है कि अगर पूरा मुल्क ही सोया हुआ हो तब व्यक्तिगत लड़ाइयाँ भी अत्यधिक महत्वपूर्ण बन जाती हैं. कुछ भी बोलने कहने से पहले हज़ार बार विचार किया कि मैं अपनी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हूँ कि नहीं. संविधान और इसके मूल्यों के लिए लड़ने वाली लड़ाई किसी ख़ास समाज को बचाने की लड़ाई नहीं है बल्कि अपने खुद के अधिकार, घर, परिवार, खेत खलिहानों, पेड़ों, बगीचों, चौराहों को बचाने की लड़ाई है। इसलिए अगर सामूहिक रूप से लड़ने का वक्त अगर ये देश अभी नहीं समझता है तो व्यक्तिगत लड़ाई ही सही.

नफ़रत के ख़िलाफ़ संवैधानिक तरीक़े से बात रखना भी अगर जुर्म है, जोकि नहीं है…पर फिर भी अगर इंसानियत, संविधान, लोकतंत्र और मोहब्बत की बात करना जुर्म है तो ये जुर्म बार-बार करने को दिल करता है. इसलिए कहा कि UAPA लगने की खबर सुनते ही पहली दफ़ा यही ख़्याल आया कि अगर इंसानियत की बात रखना जुर्म है तो ये जुर्म मैं बार बार करूँगा इसलिए मुस्कुरा दिया.

मुझ पर लगाए निहायत झूठे आरोपों को मैं सहर्ष स्वीकारूँगा. अपने बचाव में न कोई वकील रखूँगा, न कोई अपील करूँगा और माफ़ी तो कभी न माँगूँगा. लड़ाई सिर्फ़ मेरी नहीं है, मैं उन लाखों-अरबों लोगों में से एक हूँ जिन्हें एक न एक दिन लड़ते-भिड़ते मर ही जाना है, फिर किसी बात का दुःख करने का जी नहीं करता. लेकिन ऐसे तमाम निर्दोष लोग हैं जो बीते वर्षों में UAPA के तहत फँसाए जा रहे हैं.

ये शृंखला बढ़ती जा रही है, जिसकी डोर एक दिन अदालतों के दरवाज़ों से होती हुई अदालत में रखी ‘न्याय की देवी’ तक पहुँच ही जाएगी. जिसे बचाने की ज़िम्मेदारी संविधान ने अदालतों में बैठने वाले न्यायाधीशों को दी है, जिन्होंने शपथ लेते हुए कहा था ‘मैं इस संविधान और इस देश के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करूँगा.’ अगर इन न्यायाधीशों को लगता है कि इस मुल्क के साथ कोई भारी गड़बड़ है तो वो सोचेंगे और संविधान प्रदत्त अपनी ताक़तों का इस्तेमाल इस मुल्क को बचाने के लिए करेंगे. इससे अधिक कुछ नहीं कहना. सत्यमेव जयते !

लगता है त्रिपुरा पुलिस कानून विहीनता (lawlessness) की नई मिसाल करना चाहती है. त्रिपुरा में हुए सांप्रदायिक दंगे के खिलाफ लिखने, बोलने वालों पर जिस तरह से आतंकवाद निरोधक कानून थोपा जा रहा है,उसका क्या संदेश है ? क्या किसी दंगाई के विरुद्ध यूएपीए थोपा गया है ?

अगर किसी दंगाई के विरुद्ध, थोड़फोड़ और आगजनी करने वाले के विरुद्ध, ऐसी संगीन धाराओं में कार्यवाही नहीं की गयी है और सिर्फ सांप्रदायिक हिंसा के विरुद्ध बोलने वालों के खिलाफ ही कार्यवाही की जा रही है तो संदेश साफ है कि दंगे और सांप्रदायिक हिंसा से कोई तकलीफ नहीं है, लेकिन उसका खुलासा किए जाने, उस पर लिखने-बोलने से भारी तकलीफ है !

और कोई त्रिपुरा के पुलिस अफसरों को न्यूनतम कानून भी समझाओ कि अपराध और सजा का अनुपात भी एक चीज है, खबर लिखना, प्रसारित करना, किसी भी रूप में आतंकी कार्यवाही नहीं है !

रात के दो बजे ट्विटर से एक मेल मिला है. ट्विटर ने कहा है कि त्रिपुरा सरकार की पुलिस ने मेरे एकाउंट पर एक्शन लेने के लिए कहा है. त्रिपुरा सरकार ने कहा है कि मेरा ट्वीट Tripura is Burning भारत के एक क़ानून (IT Act) का उल्लंघन है. लेकिन ट्विटर को ऐसा नहीं लगता कि मैंने कोई अपराध किया है. इसलिए ट्विटर ने कहा है कि वो अपने यूज़र्स के साथ खड़ा है और उनकी आवाज़ डिफ़ेंड करने और सम्मान करने में विश्वास रखता है. इसलिए उसने त्रिपुरा सरकार के कहने पर भी मेरे एकाउंट पर एक्शन नहीं लिया है.

ट्विटर ने त्रिपुरा की भाजपा सरकार के आगे अपनी रीढ़ की हड्डी झुकाने से इनकार कर दिया है. अब सुप्रीम कोर्ट की बारी है कि वो अपने नागरिकों के अधिकार के लिए कितना खड़ा होती है.

त्रिपुरा की भाजपा सरकार और उसकी पुलिस को यह समझना होगा कि अगर उसे सांप्रदायिक हिंसा की खबरों के देश-दुनिया में प्रसारित होने से तकलीफ होती है तो इन खबरों को रोकने का तरीका सांप्रदायिक हिंसा पर अंकुश लगाना है. हिंसा होगी तो उसकी खबर यूएपीए से नहीं दबाई जा सकेगी ! त्रिपुरा पुलिस भले ही यह संदेश दे रही है कि ‘ त्रिपुरा जलते हुए देखो पर मुंह न खोलो, मुंह खोलोगे तो यूएपीए लग जाएगा.’ ऐसा करके दंगाइयों की मिजाजपुर्शी तो की जा सकती है पर हकीकत नहीं छुपाई जा सकती.

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