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यह क्रोनोलॉजी 164 साल पुरानी है : ‘बांटो और राज करो’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 27, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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यह क्रोनोलॉजी 164 साल पुरानी है : ‘बांटो और राज करो’

यह क्रोनोलॉजी 164 साल पुरानी है. आज ऐसे ही पढ़ते हुए एक हाथ लगी. इस क्रोनोलॉजी के तार अंग्रेजों से जुड़े हैं. समझ लें, काम आएगी.

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साल था 1857. यही आज वाली दिल्ली थी. शायर मिजाज बादशाह बहादुर शाह जफर दिल्ली की गद्दी पर हुआ करते थे. मंगल पांडेय के साथ भारतीय सैनिकों ने अंगरेज बहादुर से विद्रोह कर दिया. विद्रोही सैनिक मिलकर बादशाह के पास पहुंचे कि आप हमारी अगुआई करें. बादशाह ने अगुआई कबूल की. फिर क्या था, हिन्दू-मुसलमान दोनों मिलकर लामबंद हो गए.

यह अलग बात है कि इसमें मुट्ठी भर लोग ही शामिल थे लेकिन जो भी थे वे अंगरेजों के खिलाफ एकजुट थे. एक ही सेना में एक साथ ‘हर-हर महादेव’ और ‘अल्लाह-हो-अकबर’ गूंजने लगा. अंगरेज बहादुरों ने कभी सोचा नहीं था कि अइसा भी हो जाएगा. देख के अलबला गया सब.

फिर जब गदर शांत हुआ तो इसका तोड़ निकाला गया. दिल्ली में पकड़े गए विद्रोही हिंदू सैनिकों को छोड़ दिया गया लेकिन मुसलमान सैनिकों को सजा दी गई. कहते हैं कि दिल्ली में एक ही दिन 22 हज़ार मुसलमान सैनिकों को फांसी दे दी गई. पूरे देश में ऐसा ही प्रयोग किया गया.

मुसलमानों को सजा देने के साथ-साथ हिंदुओं को बड़े-बड़े पद दिए गए. इसके दो दशक बाद इसी पॉलिसी को उलट दिया गया. अब मुसलमानों को ऊंचे पदों पर बैठाया जाने लगा और हिन्दुओं को प्रताड़ित किया जाने लगा. ऐसा इसलिए किया गया ताकि हिंदू और मुसलमानों में फूट पड़े. यह संयोग नहीं, अंगरेजी प्रयोग था.

अब 164 साल बाद की दिल्ली में आ जाइए. दिल्ली में सीएए विरोधी आंदोलन चल रहा है. आंदोलन में मुस्लिमों के साथ बड़ी संख्या में हिंदू शामिल हैं. इसी बीच सरकार का एक आदमी जाकर पुलिस की मौजूदगी में खुद प्रदर्शन खत्म कराने की धमकी देता है. इसके बाद दंगा शुरू होता है.

दंगा होता है ​तब तक गृहमंत्री और गृह-मंत्रालय गायब रहता है. दंगा शांत हो जाता है तब गृह-मंत्रालय का काम शुरू होता है. दंगा भड़काने वाले नेता पर सवाल उठाने वाले जज का रात में ही ट्रांसफर कर दिया जाता है. उसे कोई छूता तक नहीं. जो लोग सीएए जैसे घटिया कानून के विरोध में थे, जो लोग सांप्रदायिकता के विरोध में थे, जो लोग दंगों के विरोध में थे, उन्हीं को पकड़-पकड़ कर केस दर्ज होता है और सैकड़ों लोगों को मुकदमे में फंसा दिया जाता है.

ऐसा पूरे देश में कई घटनाओं में किया जाता है. हर लिंचिंग की घटना में लिंच मॉब को सम्मान और पीड़ित को प्रताड़ित किया जाता है. भीड़ किसी निर्दोष को पीटती है, फिर पार्टी के लोग प्रदर्शन करके उसे छुड़ा लाते हैं.

इंदौर वाली घटना में जिस चूड़ी वाले को पीटा गया, उसके बारे में कहा गया कि वह भेष बदल कर घूम रहा था. दो आधार कार्ड था. संदिग्ध आदमी है. खबर आ रही है कि सरकारी आवास लेना था. आधार पर नाम गलत था तो उसने नाम सुधार कर दूसरा कार्ड बनवाया था. उसका घर, परिवार, गांव, सब इसी हिंदुस्तान की धरती पर मौजूद है.

वह गरीब आदमी है लेकिन वही दोषी है. एक नेता सरेआम जंतर मंतर पर एक समुदाय को काटने का नारा लगवाता है, लेकिन वह आराम से छूट जाता है. एक गरीब आदमी पीटकर भी जेल चला जाता है. अपराधी को सजा मिलनी चाहिए, निर्दोष को आंच नहीं आनी चाहिए लेकिन यहां अपराध और दंड सब हिंदू और मुसलमान के आधार पर तय हो रहा है. यह संयोग नहीं, यह न्यू इंडिया का संघी प्रयोग है.

‘बांटो और राज करो’ की यह क्रोनोलॉजी डेढ़ सौ साल पुरानी है. आप कुछ रिलेट कर पा रहे हैं ? एक तरफ कंपनी राज आ रहा है, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के लिए बनी व्यवस्थाएं खत्म की जा रही हैं. दूसरी तरफ, समाज में अन्याय और भेदभाव को सरकारी स्तर पर बढ़ाया जा रहा है.

क्या मुझे ये लिखने की जरूरत है कि ‘बांटो और राज करो’ की ऐसी नीति का क्या अंजाम इस देश ने भुगता है ? आपके इस खूबसूरत देश को नरक में धकेला जा रहा है. इस बार अंगरेज बहादुर नहीं हैं, इस बार देसी अंगरेज हैं. हम उम्मीद करते हैं कि भारत की जनता यानी आप अपने अतीत से सीख लेंगे और आपस में लड़ने से इनकार कर देंगे.

2

खानवा जंग में बाबर से हारने के बाद राणा सांगा जख़्मी हालत में भागने में सफल हुए, जंग में मुग़लों से तो बच गए लेकिन राणा सांगा को उनके ही राजपूत सामंतों ने ज़हर देकर मार डाला.

राणा सांगा की मौत के बाद उनके पत्नी रानी कर्णावती ने बेटे उदय सिंह को गद्दी पर बैठाकर सत्ता संभालने की कोशिश की लेकिन ज़्यादा दिन शासन नहीं कर सकी. राजपूत सामन्तों ने रानी कर्णावती को सत्ता से हटाने के लिए गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह को निमन्त्रण भेजा. सुल्तान बहादुर शाह चित्तौड़ पर हमले के निकल पड़ा, ये ख़बर रानी कर्णावती को भी पहुंच गयी.

रानी कर्णावती ने राखी भेजकर मुग़ल बादशाह हुमायूं से मदद मांगी. चिट्ठी मिलते ही हुमायूं ने अपना बंगाल अभियान अधूरा छोड़कर चित्तौड़ का रुख किया. वह जमाना हाथी-घोड़ों की सवारी का था. सेना को साथ लेकर सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करना आसान नहीं था और उसमें वक्त लगना लाज़मी भी था.

हुमायूं चित्तौड़ पहुंचे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. 8 मार्च 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़गढ़ के किले पर हमला कर दिया था. रानी कर्णावती जौहर कर आग में समा चुकी थीं. जब यह खबर बादशाह हुमायूं तक पहुंची तो उन्हें रानी कर्णावती को न बचा पाने का बहुत दुःख हुआ. हुमायूं ने बहादुर शाह पर हमला किया, फ़तह हासिल की और पूरा शासन रानी कर्णावती के उत्तराधिकारी विक्रमजीत सिंह को सौंप दिया.

लेकिन कुछ वक़्त के बाद फिर से राजपूत सामन्तों जिसमें राणा सांगा के भाई बनवीर सिंह भी शामिल थे, उन्होंने अपने भतीजे विक्रमजीत सिंह का क़त्ल कर दिया. इस ऐतिहासिक घटना में आखिर कौन देशभक्त, कौन वफादार, कौन दुश्मन, कौन जेहादी ? कौन लुटेरा, कौन गद्दार और कौन आतंकी ? प्रमाणित इतिहास तो यही है.

  • कृष्ण कांत एवं अन्य

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