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संयुक्त किसान मोर्चा : लखीमपुरखीरी की घटना और सुप्रीम कोर्ट के रवैये पर जवाब

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 5, 2021
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संयुक्त किसान मोर्चा : लखीमपुरखीरी की घटना और सुप्रीम कोर्ट के रवैये पर जवाब

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे किसानों पर एक क्रूर और अमानवीय हमले में भाजपा के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी, उनके बेटे, उनके चाचा और अन्य गुंडों से जुड़े वाहनों का काफ़िला कई प्रदर्शनकारियों को कुचल गया. बताया जा रहा है कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष (मोनू) मिश्रा ने एक किसान की गोली मार कर हत्या कर दी. इस घटना में कम से कम दो अन्य किसानों की भी मौत हो गई (एक मौके पर और दूसरा अस्पताल में) और करीब दस अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए. तराई किसान संगठन के नेता और एसकेएम नेता तजिंदर सिंह विर्क भी गंभीर रुप से घायल हुए हैं मृतकों और घायलों के बारे में अधिक जानकारी की प्रतीक्षा है.

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खबर है कि इस क्रूर हमले के बाद किसानों को जवाबी कार्रवाई के लिए उकसाया भी गया और भाजपा नेता के वाहनों को तोड़ दिया गया. संयुक्त किसान मोर्चा की मांग है कि उत्तर प्रदेश सरकार अजय मिश्रा टेनी की तरफ से शामिल सभी लोगों के खिलाफ हत्या के आरोपों के साथ तुरंत मामला दर्ज करे. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री को तुरंत बर्खास्त किया जाए. एसकेएम ने उत्तर प्रदेश के भाजपा नेताओं को राज्य के किसानों को ललकारने से रोकने की भी चेतावनी दी है.

जैसा कि पूर्व में घोषित किया गया था, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री द्वारा जनसभा में किसान नेता के खिलाफ जारी खुली धमकी के विरोध में सुबह से ही बड़ी संख्या में किसान काला झंडा दिखाने के लिए जमा होने लगे. उपमुख्यमंत्री को वहां उतरने से रोकने के लिए हजारों की संख्या में किसान आज सुबह महाराजा अग्रसेन ग्राउंड स्थित हेलीपैड पर काले झंडों के साथ क़ाबिज़ हो गए.

जैसा कि पहले बताया गया था, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्री अजय मिश्रा टेनी ने हाल ही में एक जनसभा में किसान नेताओं को खुली धमकी जारी की थी. बताया जाता है कि किसानों पर क्रूर हमला तब हुआ जब किसान तितर-बितर हो रहे थे और विरोध स्थल से निकल रहे थे. सूचना के अनुसार श्री टेनी के बेटे, चाचा और अन्य गुंडों ने तब प्रदर्शनकारियों, जो काले झंडे के साथ सड़कों पर खड़े थे को कुचल दिया, जिसमें दो किसानों के मौके पर ही मारे जाने की सूचना है. कई अन्य को अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

एक पूरी तरह से अस्वीकार्य और आपत्तिजनक घटनाक्रम में, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को एक वीडियो क्लिप में (भाजपा-आरएसएस) कार्यकर्ताओं को लाठियों को उठाने और किसानों पर हमला करने के लिए, भले ही इसका मतलब कुछ महीनों के लिए जेलों में समाप्त होना ही क्यों न हो, प्रोत्साहित करते हुए सुना जा सकता है.

यह स्पष्ट है कि आयुष सिन्हा जैसे अधिकारियों को यह छूट कहां से मिलती है जबकि किसान आंदोलन ने शांति और अहिंसा को अपना मूल बना लिया है. यह स्पष्ट है कि सरकार अपने ही नागरिकों पर जानलेवा मंशा से व्यवहार कर रही है. एसकेएम भाजपा के मुख्यमंत्री के हिंसक इरादे की कड़ी निंदा करता है और मांग करता है कि वह तुरंत माफी मांगे और अपने संवैधानिक पद से इस्तीफा दें.

कल, सरकारी एजेंसियों द्वारा धान खरीद में देरी के खिलाफ एकजुट, समन्वित संघर्ष के माध्यम से किसानों की बड़ी जीत हुई. यह एक सत्याग्रह था जिसके तुरंत परिणाम सामने आए. किसानों ने दिखाया कि कम अवधि की किस्मों के इस्तेमाल और चावल की सीधी बुवाई (डीएसआर) के कारण, फसल वास्तव में समय पर तैयार हो गई है, और अब बारिश खेतों में तैयार फसलों को नष्ट कर देगी. वे अनाज को अपने घरों और बाद में मंडी तक ले जाने का खर्च वहन नहीं कर सकते थे, और भंडारण के लिए जगह की भी भारी कमी थी.

धान की कटाई और बिक्री में देरी से पराली प्रबंधन के लिए उपलब्ध समय कम हो जाएगा और अधिक पराली जलाने का कारण बनेगा. किसानों ने अनाज के सबूत दिखाए जो मंडियों में पहुंच गए थे और भीग रहे थे. भारत सरकार ने त्वरित यू-टर्न लिया और शाम तक घोषणा की कि पहले की घोषणा के अनुसार 11 अक्टूबर की बजाय आज, रविवार से खरीद शुरू की जाएगी.

एसकेएम भाजपा सरकार से कहना चाहता है कि इस तरह का यू-टर्न लेना काफी आसान है, और इसे शालीनता से किया जा सकता है. इस बात के पुख्ता सबूतों के सामने कि किसानों की आजीविका पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा सरकार को किसानों की मांग माननी पड़ी. वर्तमान ऐतिहासिक किसान आंदोलन की मुख्य मांगों के साथ भी ऐसा ही होना चाहिए. एसकेएम ने मोदी सरकार से किसान आंदोलन की जायज़ मांगों को तत्काल पूरा करने की मांग की.

राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में सिंचाई के लिए नहरों के पानी की मांग को लेकर दस हजार से अधिक किसानों का एक बड़ी सभा के बाद कल शाम विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. घड़साना में नहरी सिंचाई के पानी की आपूर्ति के अभाव में अपनी फसल बर्बाद होने से डरे किसान कई दिनों से इसकी मांग कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन ने किसानों की जायज़ मांग को अनसुना कर दिया. किसानों का गुस्सा और रोष एसडीएम कार्यालय के बाहर हजारों किसानों की एक विशाल सभा में बदल गया, जहां उन्होंने घेराबंदी कर ली है. यह प्रेस नोट के जारी होने के वक्त भी घेराबंदी जारी है.

इस बीच, कर्नाटक के गन्ना उत्पादकों ने 5 अक्टूबर को बैंगलोर में विधानसभा घेराव की घोषणा की है. वे राज्य में एसएपी के रूप में कम कीमतों की पेशकश का विरोध कर रहे हैं और कीमत में कम से कम 350 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की मांग कर रहे हैं. केंद्र ने केवल आगामी पेराई सत्र के लिए 290 रुपये प्रति क्विंटल के अल्प एफआरपी (उचित और लाभकारी मूल्य) की घोषणा की थी, जबकि कर्नाटक एसएपी भी 320 रुपये प्रति क्विंटल के कम है.

कल यमुनानगर (हरियाणा) अलीपुर गांव में स्थानीय किसानों ने पीएम संवाद कार्यक्रम में शामिल गांव के सरपंच के खिलाफ धरना दिया. स्थानीय विरोध के कारण कार्यक्रम में हड़कंप मच गया. पंजाब के लुधियाना में भाजपा का कोई कार्यक्रम नहीं होने दिया गया.

चंपारण से वाराणसी तक लोकनीति सत्याग्रह पदयात्रा आज दूसरे दिन में प्रवेश कर गई. कल भारी बारिश के बावजूद, हजारों लोग महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के उपलक्ष्य में 2 अक्टूबर को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पदयात्रा पर निकले. यात्रा आज सुबह चंद्रहिया से रवाना हुई और पिपराकोटी से होते हुए आज रात रात्रि प्रवास के लिए कोटवा पहुंचेगी.

पंजाब के मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि मौजूदा आंदोलन के हिस्से के रूप में रेलवे पटरियों पर कब्जा कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस ले लिए जाएंगे. एसकेएम की मांग है कि हरियाणा में भी किसानों के खिलाफ सभी मामले वापस लिए जाएं. हरियाणा सरकार ने विरोध कर रहे किसानों को तितर-बितर करने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल करने के अलावा किसानों के खिलाफ कई मामले दर्ज किए थे. इन मामलों को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए.

उत्तर भारत के कपास उगाने वाले क्षेत्रों के कई जिलों में कपास की फसल को गुलाबी बॉलवर्म के नुकसान के बाद से किसानों की आत्महत्याएं बढ़ रही हैं. एसकेएम बीज उत्पादकों और आपूर्तिकर्ताओं के दायित्व को देखने के अलावा, सरकारों द्वारा मुआवजे के शीघ्र भुगतान की मांग करता है.

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बीती रात संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा किए गए आह्वान पर आज चार प्रमुख मांगों को लेकर आज पूरे देश में आज सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक देश भर में अनेक स्थानों पर डीसी/डीएम कार्यालयों और अन्य स्थानों पर विरोध प्रदर्शन किया गया. इन विरोध प्रदर्शनों के बारे में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, बिहार, झारखंड, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, और अन्य राज्यों से रिपोर्टें आई हैं. सिंघू मोर्चा पर भी मौन विरोध मार्च निकाला गया.

इन विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वाले नागरिकों ने भाजपा नेताओं के हिंसा फैलाने और उकसाने वाले बयानों तथा किसान विरोधी रवैये और व्यवहार पर सवाल उठाया. उन्होंने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री को तत्काल बर्खास्त करने, मंत्री के बेटे और उसके साथियों की तत्काल गिरफ्तारी, सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश द्वारा जांच, और हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर के इस्तीफे की भी मांग की.

रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि आशीष मिश्रा टेनी और 15 अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है हालांकि, किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. एसकेएम ने सभी नागरिकों से शांति और अहिंसा बनाए रखने की अपील की है, जैसा कि किसानों के संघर्ष का इतिहास रहा है. संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रदर्शनकारियों से कहा कि वे हिंसा और सांप्रदायिक राजनीति द्वारा आंदोलन को पटरी से उतारने के भाजपा द्वारा बिछाए जा रहे जाल में न फंसें.

एसकेएम नेताओं के साथ स्थानीय प्रदर्शनकारी किसानों और मृतक के परिवारों, और राज्य प्रशासन के बीच एक समझौता हुआ, जिसके चलते पोस्टमॉर्टम के बाद शहीद किसानों के अंतिम संस्कार का मार्ग प्रशस्त किया. चार किसानों के शवों को तिकुनिया के कॉलेज मैदान में सैकड़ों किसानों और उनके परिवारों ने रात भर पहरे पर रखा था. मारे गए किसानों के परिवारों को सरकार 45-45 लाख रुपये और एक-एक सरकारी नौकरी देगी. घायलों को 10-10 लाख रुपये दिए जाएंगे.

आशीष मिश्रा टेनी और 15 अन्य के खिलाफ धारा 302, 120 बी और अन्य आरोपों के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है, और सरकार ने कहा कि वह एक सप्ताह के भीतर सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लेगी. मंत्री अजय मिश्रा टेनी के खिलाफ भी 120बी जैसी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. सरकार उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की देखरेख में मामले की जांच के लिए भी सहमत हो गई है. अजय मिश्रा टेनी को केंद्र सरकार से बर्खास्त करने की मांग निश्चित रूप से लंबित है.

चश्मदीद गवाह बताते हैं कि कैसे यह जानलेवा हमला पूर्व नियोजित लगता है, जिसे यूपी पुलिस द्वारा सुनियोजित तौर पर क्रियान्वित किया गया था. यह बताया जा रहा है कि प्रदर्शनकारियों को अंधाधुंध तरीके से कुचलने के लिए पुलिस ने मंत्री के बेटे, जो खुद थार वाहन चला रहे थे, के वाहनों को अनुमति देने के लिए बैरिकेड हटा दिए. पुलिस ने आशीष मिश्रा टेनी को मौके से भगाया और बताया जा रहा है कि उसने भागते हुए गोली चला दी. चश्मदीद गवाह एसकेएम नेता तजिंदर सिंह विर्क को विशेष रुप निशाना बनाने के बारे बताते हैं.

दिन भर की रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने विभिन्न लोगों को, चाहे वह सामाजिक कार्यकर्ता हों या राजनीतिक नेता, सभी को लखीमपुर खीरी जाने से रोकने के लिए कई अलोकतांत्रिक तरीके अपनाए. धारा 144 लगाई गई और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं. यूपी सरकार ने कुछ लोगों को विशेष हवाई अड्डों से आने और जाने से रोक दिया, और पंजाब सरकार को भी लिखा कि पंजाब के किसी भी व्यक्ति को लखीमपुर खीरी में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाए.

इस प्रेस नोट के जारी होने के समय तक प्राप्त, रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि गुरनाम सिंह चढूनी और बूटा सिंह बुर्जगिल जैसे एसकेएम नेताओं को यूपी पुलिस द्वारा लखीमपुर खीरी पहुंचने से रोका गया है. दरअसल, खबर है कि गुरनाम सिंह चढूनी को मेरठ से गिरफ्तार किया गया है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पंजाब और छत्तीसगढ़ के मौजूदा मुख्यमंत्रियों, और एक उप मुख्यमंत्री को रोकने सहित विपक्ष के नेताओं को रोकना स्पष्ट रूप से दिखाता है कि यूपी सरकार कुछ छिपा रही है, और दोषियों को बचाना चाहती है. इस तरह के कठोर उपाय अभूतपूर्व हैं और कई वैध प्रश्न खड़े करते हैं. एसकेएम उत्तर प्रदेश भाजपा सरकार के इन सभी अलोकतांत्रिक उपायों की निंदा करता है.

संयुक्त किसान मोर्चा एक बार फिर स्पष्ट करता है कि उसने किसानों के आंदोलन के मुख्य मुद्दों – 3 किसान विरोधी केंद्रीय कानूनों या एमएसपी वैधानिक गारंटी – के समाधान के लिए कभी भी सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाया है. एसकेएम का हमेशा से मानना ​​रहा है कि केंद्र सरकार द्वारा अपनाए गए किसान-विरोधी नीति निर्देशों को दर्शाने वाले तीन केंद्रीय कानूनों को केंद्र सरकार द्वारा ही निरस्त किया जा सकता है. इस दिशा में संयुक्त किसान मोर्चा ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बातचीत फिर से शुरू करने की मांग की है.

एसकेएम ने संवैधानिकता के मामले पर भी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया – जबकि यह महत्वपूर्ण है कि कृषि पर राज्य सरकार के संवैधानिक अधिकार को बहाल और मजबूत किया जाए. यह महसूस करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कृषि कानूनों के मुद्दे केवल संवैधानिकता या उसके अभाव के बारे में नहीं हैं, यह किसानों पर कृषि कानूनों के प्रभाव और उनकी आजीविका हमले के बारे में भी है. हालांकि कानूनों को अभी के लिए स्थगित कर दिया गया है, एसकेएम जानता है कि इस स्थगन को किसी भी दिन हटाया जा सकता है. इसलिए, आंदोलन ने कानूनों के पूर्ण निरसन (निरस्त किये जाने) पर जोर दिया है.

जब जंतर-मंतर पर भी किसान संसद के आयोजन की बात आई तो एसकेएम ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया और इसके आयोजन के लिए दिल्ली पुलिस की अनुमति और सहयोग की शर्तों को पूरी तरह से पूरा किया. इसलिए, किसानों के आंदोलन का न्यायालयों में प्रवेश करने और न्याय की मांग करने और एक ही समय में विरोध करने का कोई सवाल ही नहीं है. इस मामले में याचिकाकर्ता का एसकेएम से कोई लेना-देना नहीं है.

हाईवे जाम करने के मामले में खबर है कि सुप्रीम कोर्ट ने 43 नेताओं को नोटिस जारी किया है. संयुक्त किसान मोर्चा ने हमेशा कहा है कि किसानों ने सड़कों पर कोई बैरिकेडिंग या नाकेबंदी नहीं की है. हरियाणा, यूपी और दिल्ली पुलिस ने ऐसा किया है. दरअसल, किसानों ने मोर्चा स्थलों पर दोनों तरफ यातायात के लिए सड़कें खाली रखी हैं. राजमार्गों पर बैरिकेडिंग के कारण यदि कोई सार्वजनिक असुविधा हो रही है तो वह पुलिस के कारण है.

किसानों ने यह भी कहा है कि यदि केंद्र सरकार अहंकारी, अड़ियल और अनुचित तरीके से व्यवहार नहीं करती है, तो समाधान निकाला जा सकता है. समाधान स्पष्ट रूप से मोदी सरकार के हाथ में है जो इस बात का कोई पुख़्ता सबूत नहीं दे पाई है कि वह किसान विरोधी कानूनों को क्यों नहीं निरस्त करेगी ? या सभी उपजों और किसानों के लिए लाभकारी एमएसपी की गारंटी के लिए कानून क्यों नहीं बनाएगी ?

रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक साक्षात्कार में विपक्षी राजनीतिक दलों की तीखी आलोचना की, और आरोप लगाया कि विपक्षी दल कृषि कानूनों का विरोध करते हुए राजनीतिक छल और नैतिक बेईमानी कर रहे हैं. उन्होंने कथित तौर पर कहा है कि जिन पार्टियों ने अपने चुनावी वायदों और यहां तक ​​कि अपने घोषणापत्र में कुछ सुधारों का वायदा किया था, उन्होंने बाद में यू-टर्न ले लिया और अपने वायदों को पूरा करने का साहस नहीं किया.

संयुक्त किसान मोर्चा प्रधानमंत्री को याद दिलाना चाहता है कि ये तथाकथित ‘सुधार’ किसानों के लिए फ़ायदेमंद नहीं हैं, भले ही कोई भी पार्टी इनका प्रस्ताव दे रही हो. ये ‘सुधार’ देश के लाखों किसानों की कीमत पर कृषि-निगमों के व्यवसाय को सुविधाजनक बनाने के लिए हैं. किसानों ने ऐसे सुधारों की मांग नहीं की. इसके अलावा, एसकेएम श्री मोदी और भाजपा को याद दिलाना चाहता है कि आज किसान जो मांग कर रहे हैं, वह भाजपा द्वारा किए गए वायदों और अतीत में श्री मोदी और भाजपा द्वारा समर्थित दृष्टिकोणों के अनुरूप है.

2011 में श्री मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और एक कार्यकारी समूह के अध्यक्ष थे तब उन्होंने भारत सरकार के ‘उपभोक्ता मामलों पर कार्य समूह की रिपोर्ट’ में सिफारिश की थी कि एमएसपी प्रवर्तन को वैधानिक प्रावधानों के माध्यम से अनिवार्य किया जाना चाहिए. इसके अलावा, इससे पहले, 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में ‘दीर्घकालिक अनाज नीति पर उच्च स्तरीय समिति’ की एक रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि सीएसीपी को उत्पादन की सी2 लागत के आधार पर तय किया जाना चाहिए.

कमिटी ने यह भी सिफारिश की कि एमएसपी को वैधानिक दर्जा मिलना चाहिए. इस समिति को तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा दीर्घकालिक अनाज नीति के लिए सिद्धांत और दिशानिर्देश निर्धारित करने के लिए कहा गया था. यह भी सर्वविदित है कि श्री नरेंद्र मोदी और भाजपा ने किसानों के लिए सुधार का वायदा करते हुए 2014 में एमएसपी के मुद्दे पर पार्टी के चुनाव अभियान के लिए प्रचार किया था.

2018 में, मोदी सरकार ने संसद के पटल पर एक प्रतिबद्धता की कि एमएसपी को सभी किसानों के लिए एक वास्तविकता बनाया जाएगा, इसमें से कोई भी अमल में नहीं आया. अब समय आ गया है कि भाजपा किसानों से वायदे करने और फिर उनसे मुकरने की अपनी राजनीतिक बेईमानी पर गौर करे. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान आंदोलन में किसानों की मांगों को पूरा करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसा नहीं करने के निहितार्थ देश के लाखों अन्नदाता के जीवन और मृत्यु से जुड़ा हैं.

गांधी जयंती पर चंपारण में शुरू हुई चंपारण-वाराणसी लोकनीति सत्याग्रह पदयात्रा यात्रा का आज तीसरा दिन है। कल रात कोटवा में रात बिताने के बाद यात्रा बेलवा होते हुए आज रात रामपुर खजुरिया पहुंचेगी। स्थानीय लोगों का समर्थन और आतिथ्य के साथ यात्रा को अपने पूरे मार्ग में बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है.

संयुक्त किसान मोर्चा लगातार अपनी मांगों और सरकारी व सुप्रीम कोर्ट के दुश्प्रचार के खिलाफ अपना स्पष्टीकरण देता रहता है. विगत दिनों की घटनाओं पर भी संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से हस्ताक्षरित बलबीर सिंह राजेवाल, डॉ दर्शन पाल, गुरनाम सिंह चढूनी, हन्नान मोल्ला, जगजीत सिंह डल्लेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां, शिवकुमार शर्मा (कक्का जी), युद्धवीर सिंह, योगेंद्र यादव ने अपना स्पष्टीकरण दिया है.

उनका स्पष्टीकरण यह बताता है कि केन्द्र की यह फासीवादी मोदी सरकार जो असलियत में अंबानी-अदानी जैसी औद्योगिक घरानों का लठैत बनकर रह गई है. लगातार किसानों और किसान आन्दोलनकारियों पर शारीरिक हमले संगठित कर रही है. अगर केन्द्र सरकार की यह रवैया बरकरार रही तो निःसंदेह वह दिन दूर नहीं जब देश गृहयुद्ध की आग में जल उठेगा. अपनी जमीन को किसान कभी भी और किसी भी कीमत पर छीनने नहीं दे सकता, भले ही कुछ भी हो जाये.

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