Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

सिंघु बार्डर पर बर्बरतापूर्ण हत्या : किसानों को बदनाम करने की नाकाम चाल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 18, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

15 अक्टूबर की सुबह सिंघु बार्डर जो कि दिल्ली की सीमा से सटा हुआ हरियाणा में आता है, वहां जहां 10 महीनों से किसान तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ धरने पर बैठे हैं, संयुक्त किसान मोर्चे के मंच से तकरीबन 50 मीटर की दूरी पर ये बर्बरतापूर्ण हत्या हो जाती है. किन्तु यह भी देखा जा सकता कि जहां ये जघन्य हत्या हुई पुलिस का अस्थाई कैम्प तो मंच से भी कम दूरी पर है, लगभग 20 मीटर की दूरी पर है.

ये घटना रात के सुबह 3 बजे के आस पास का है, तो जाहिर है कि मंच का संचालन नहीं हो रहा था, ना ही वहां संयुक्त किसान मोर्चे के लोग थे और ना ही इन निहंग सिक्खों का संयुक्त किसान मोर्चे का कोई लेना-देना है.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

दो महीने पहले किसान नेता बलवीर सिंह राजेवाल ने सिंघु बॉर्डर से निहंगों को चले जाने को कहा था, अब यह बात योगेंद्र यादव ने दुहराई है. योगेंद्र यादव ने कहा कि किसान आंदोलन कोई धार्मिक मोर्चा नहीं है. इसमें निहंगों की कोई जगह नहीं है, लेकिन कोई हटने को तैयार नहीं है.

यह धरना संयुक्त किसान मोर्चे की व्यक्तिगत प्रापर्टी नहीं है, वह खुली सार्वजनिक सड़क पर है. वहां पर हर तरह के लोग उपस्थित हैं, और आते जाते भी हैं. कुछ तो संयुक्त किसान मोर्चे के विरोधी हैं और कुछ लोग तो संयुक्त किसान मोर्चे के समानान्तर मोर्चा भी चला रहें हैं. इनमें वे लोग भी हैं जो 26 जनवरी की लाल किले की घटना में इन्वाल्व थे, जिन्हे 26 जनवरी के बाद प्रशासन ने पक्का बैरिकेट लगाकर संयुक्त किसान मोर्चे से अलग कर दिया है.

संयुक्त किसान मोर्चा ने कई बार शासन/प्रशासन को बताया है कि उन लोगों से हमारा कोई लेना देना नहीं है तो फिर शासन/प्रशासन उन लोगों को क्यूँ धरने पर बैठाए हुए है ? अब उस सार्वजनिक सड़क पर कोई भी घटना घटे तो क्या सारी जिम्मेदारी संयुक्त किसान मोर्चे की होगी ? क्या शासन/प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं ? यदि नहीं तो फिर पुलिस वहां क्यूँ तैनात की गयी है ?

संयुक्त किसान मोर्चा कई बार निहँगो को लेकर बयान दे चुका है कि इन निहँगो से हमारा कोई लेना देना नहीं. वैसे भी संयुक्त किसान मोर्चा की किसी भी बैठक में किसी एक भी निहंग शामिल नहीं होता है क्योंकि वो संयुक्त किसान मोर्चे का हिस्सा नहीं हैं तो फिर शासन/प्रशासन क्यों उनको वहां ठहराए हुए है ?

सिंघु बार्डर पर हुई इस घटना पर कई सवाल उठते हैं. उत्तर प्रदेश में आम चुनाव होने वाले हैं और उसको प्रभावित करने के लिए बीजेपी सरकार दलित बनाम सिक्ख कार्ड खेल रही है. निश्चित ही यूपी चुनाव को प्रभावित करने के लिए इस घटना को अंजाम भी इन्ही लोगों ने दिया होगा. वैसे भी किसान आन्दोलन को कमजोर और बदनाम करने के लिए 26 जनवरी को गंदा खेल खेल चुकी है और अभी कुछ दिन पहले तिकुनिया जैसा कांड को अंजाम दिया और अब ये जघन्य हत्या.

पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत किसान आन्दोलन को बदनाम करने के लिए सारा का सारा ठीकरा संयुक्त किसान मोर्चे पर डाल दिया जा रहा है. इस बर्बरतापूर्ण हत्याकांड का निष्पक्ष तरीके से जाँच हो तो दूध का दूध और पानी की तरह साफ हो जाएगा.

जिस व्यक्ति की बर्बरतापूर्ण हत्या हुई उस की पहचान लखबीर सिंह के तौर पर हुई है. वह पंजाब के तरण तारण जिले के चीमा खुर्द का रहने वाला था. मजदूरी कर वह पेट पालता था. इस व्‍यक्ति की उम्र 35 साल के आसपास है. जब लखबीर छह महीने का था, तब उसे हरनाम सिंह नाम के एक व्‍यक्ति ने गोद लिया था.

बताया जाता है कि हरनाम लखबीर के फूफा हैं. लखबीर के असली पिता का नाम दर्शन सिंह था. उसकी बहन का नाम राज कौर है. लखबीर शादीशुदा था. उसकी पत्‍नी जसप्रीत उसके साथ नहीं रहती थी. उनके तीन बेटियां भी हैं.

लखबीर की हत्‍या की जिम्मेदारी निहंग समूह निर्वैर खालसा-उड़ना दल ने ली है. इसका कारण पवित्र ग्रंथ सर्बलोह की बेअदबी बताई है. निहंग समूह के एक सदस्‍य बलविंदर ने यहां तक कहा है कि आगे भी जो कोई बेअदबी का दुस्‍साहस करेगा, उसके साथ भी यही किया जाएगा.

सुबह लखबीर का शव एक बैरिकेड से बंधा लटका हुआ मिला. उसका बायां हाथ और दायां पांव कटा था. शरीर पर कई घाव थे. उसके बाजुओं को बैरिकेड से रस्‍सी से बांधा गया था, वह उसी से लटका हुआ था. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए सोनीपत सिविल अस्पताल भेजा है.

हत्या के आरोपी ने पुलिस के पास आत्मसमर्पण किया है. निहंग सरबजीत ने हत्या की जिम्मेदारी ली है. पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया है. बाद में तीन और निहंग गोविंद सिंह, भगवंत सिंह और नारायण सिंह ने आत्मसमर्पण किया.

ऐसी घटनाओं के बाद समाज दो वर्गों में बंट जाता हैं – एक, जो शासक वर्ग के साथ में होता है. दूसरा, बहुसंख्यक गरीब जनता के साथ में होता है.

शासक वर्ग के साथ के लोग झूठे नरेटिव के सहारे अपने हित साधने वाले लोगों की फौज खड़ी कर देते हैं. ये लोग उस दिन फ़र्ज़ी सेक्युलर और नास्तिक बन जाते हैं और फिर उस घटना के सहारे उस पूरे के पूरे धर्म को टारगेट पर ले लेते हैं. साथ में ये भी बताते हैं कि उनका बहुसंख्यक धर्म (भारत के मामले में हिन्दू) कितना सहिष्णु है.

मुस्लिमों के मामले में हम देख चुके हैं कि अगर अमानवीय घटना को अंजाम देने वाला मुस्लिम है तो पूरे के पूरे मुस्लिम धर्म को टारगेट पर ले लिया जाता है. अब निहंग सिक्खों के इस मामले में भी दिख रहा है कि इस घटना के सहारे कैसे ये लोग सिक्खों को टारगेट कर रहे हैं, दलाल मीडिया और उसके दलाल पत्रकारों के सहारे.

एक ऐसी जमात जो बर्बरतापूर्ण हत्या को सर्बलोह ग्रन्थ की बेअदबी से जोड़कर जायज ठहराने में लगे हैं, वह लोग उस इस मॉब लींचिंग के हक में खड़े हो गए, जिसमें आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने का एक मौका तक नहीं मिला. यह ट्रेंड इतना खतरनाक है कि दस-बीस-तीस लोग किसी को भी पकड़कर पीट-पीट कर मार दें और फिर कह दें कि यह गुरु ग्रन्थ साहिब या गीता-कुरान-बाइबल…. पवित्र धर्मग्रंथ की बेअदबी कर रहा था या फलां देवी/देवता/मूर्ति को खंडित या फलां धर्म की भावना के खिलाफ बोला है.

तो फिर क्या पीट-पीट कर मारने वालों को उस मरने वाले के कृत्य के सबूत देने की जरूरत भी नहीं पड़ती कि उसने किया भी है या नहीं ? और यदि किया है तो क्यूँ ? और उसके पीछे कोई षडयंत्र तो नहीं ? फिर लोगों का एक हुजूम उन मॉब लिंचर्स के हक में खड़ा हो जाता है. वे इतिहास से फूहड़ तर्क निकाल-निकाल कर मॉब लींचिंग की घटना को जस्टिफाई करने लगते हैं और जायज ठहराने की पूरी कोशिश करते हैं.

शासन/प्रशासन भी उनकी पूरी मदद करता है इसलिए अब तक मॉब लींचिंग में हुई घटनाओं में मॉब लिंचर्स को कोई भी सजा नहीं मिली. इसीलिए ऐसे लोग सीना तानकर ये दुष्कृत्य करते हैं.

आप इस घटना के वायरल विडियो को देखेंगे तो वो निहंग सिक्ख पंजाबी में गर्व से कहता है कि ‘ये हत्या हमने किया है और इसका पूरा क्रेडिट हमको मिलना चहिए.’ आगे खुले आम सीना चौड़ा कर धमकी भी देता है कि ‘जो कोई बेअदबी का दुस्‍साहस करेगा, उसके साथ भी यही किया जाएगा.’ अब आप स्वयं सोचें कि ये हिम्मत ऐसे लोगों को कहां से आती है ?

दूसरी जमात, जो शासक वर्ग द्वारा चले गए चाल में फंस जाते हैं, उनमें से कुछ लोग जान-समझकर और कुछ लोग नासमझी में शासक वर्ग की दी हुई जातिवादी लाइन पर चलने लगते हैं और उसमें जातिवाद ढूंढकर उस घटना में जातिवादी एंगेल घुसेड़कर पूरी घटनाक्रम को एक नया रूप-रंग दे देते हैं और हमारी भोली-भाली जनता जातिवाद के चंगुल में फंसकर उस घटना को जातिवादी एंगेल से देखने लगती है.

कुछ लोग अपनी पोलिटिकल करेक्टनेस के हिसाब से तथ्यों को पेश कर और जरूरत पड़ने पर छिपाकर और कुछ झूट का मसाला भी जोड़कर और अपनी जातिवादी दुकानदारी चलाते हैं. जैसे इस घटना में दलित जातिवादी एंगेल खोजकर दलित बनाम सिक्ख बना रहे हैं और अपने आपको दलित हितैषी घोषित कर चुके शासक वर्ग के कई लोग और शासक वर्ग की दलाल मीडिया और उनके दलाल पत्रकार कह रहे हैं कि लखबीर सिंह को इसलिए मार दिया गया कि वह दलित था और इसने धार्मिक ग्रन्थ को छू लिया.

इसमे कोई दो राय नहीं कि लखबीर सिंह दलित थे किन्तु शासक वर्ग समर्थित दलाल मीडिया और दलाल जातिवादी संगठन एक तथ्य यह छुपा गए कि लखबीर को मारने वाले भी दलित ही थे. उनका काम शासक वर्ग के हिसाब से सिलेक्टेड तथ्यों को बरतना है ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे और हमें यूं ही आपस में सवर्ण बनाम दलित यानी 15 बनाम 85 में उलझाकर आपसा में लडाती रहे और शासक वर्ग निश्चिंत होकर यूं ही हमें लूटती रहे.

आखिर में बस यही कहूंगा कि सब के अपने पाले तय हैं. अंधभक्तों को तो किसी के सही और गलत होने से मतलब नहीं. उन्हें तो शासक वर्ग द्वारा फेंके गए पोलिटिकल करेक्टनेस की चाशनी में बने जातिवादी राजनीति से किसान आन्दोलन को बदनाम करने से मतलब है. उनकी दलाल मीडिया को भी अपनी दुकानदारी चलाने के लिए आधे-अधूरे, झूठे और जातिवादी तथ्यों के जरिए शोषक वर्ग का पक्ष लेने से मतलब है.

एक तरफ किसानों का शांतिपूर्ण आंदोलन दूसरी तरफ शोषक वर्ग की बर्बर दमनकारी नीति. अन्धभक्तों व दलाल मीडिया ने तो अपना पाला तय कर लिया है, अब आम जनता को तय करना है कि आप किस पाले में हैं ? शासक वर्ग के पाले में या फिर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे किसानों के पाले में ?

  • अजय असुर

Read Also –

 

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट बनाम अंबानी घराने का पेंडोरा पेपर्स

Next Post

हमारा विकास और ज्ञान विज्ञान

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

हमारा विकास और ज्ञान विज्ञान

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

साम्प्रदायिक और जातिवादी कचरे का वैचारिक स्रोत क्या है ?

April 26, 2019

सुब्रतो चटर्जी की पांच कविताएं

February 21, 2025

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

March 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

March 7, 2026

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.