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ऑस्ट्रेलिया में धार्मिक व नस्लीय नफरत/पूर्वाग्रह बनाम समाज व देश के लोगों का माइंडसेट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 26, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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ऑस्ट्रेलिया में धार्मिक व नस्लीय नफरत/पूर्वाग्रह बनाम समाज व देश के लोगों का माइंडसेट

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री की लगातार गिरती छवि

मई 2022 में ऑस्ट्रेलिया संसद का चुनाव होना है, मतलब वर्तमान सरकार का कार्यकाल खतम होना है. ऑस्ट्रेलिया में केंद्र सरकार का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है, संसद का चुनाव तीन साल में होता है. पिछला चुनाव मई 2019 में हुआ था, अब मई 2022 में होना है. इस बात की संभावना है कि सत्तारूढ़ पार्टी मई के पहले ही प्रधानमंत्री बदल दे, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के लोगों के बीच प्रधानमंत्री की छवि लगातार गिरती जा रही है.

लोग प्रधानमंत्री को झूठा मानते हैं, अगंभीर मानते हैं, भाषण/बयान वीर मानते हैं (एक निकनेम ही ‘ब्रोशर प्रधानमंत्री’ धर दिए हैं). छवि क्यों गिर रही है ? कुछ कारणों पर नजर डालते हैं.

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कारण – 1

कोविड में ऑस्ट्रेलिया सरकार ने बेरोजगारों, वृद्धों, स्टार्ट-अप वालों, युवा-छात्रों, नौकरी छूट जाने वालों, आम-दुकानदारों का व्यापार कम होने वालों इत्यादि-इत्यादि को पौने-दो लाख रुपए महीना लगभग का भत्ता लगभग एक वर्ष तक दिया. अब भी दे रही है (एक-लाख रुपए महीना के लगभग). बिजली, पानी, गैस, पेट्रोल/डीजल इत्यादि पर छूट दी. बैंक-लोन के लिए पूरा साल ही निष्क्रिय कर दिया गया. मकान-मालिकों को करों में छूट दी ताकि किराएदारों का किराया कम हो सके. आयकर में कई वर्षों तक के लिए छूट दे दी गई है, इसके लिए संसद में विशेष नियम तक पारित किया गया. कोविड टेस्टिंग, इलाज व वैक्सिनेशन पूरी तरह से मुफ्त है.

इसके बावजूद लोग नाराज क्यों ?

क्योंकि लोगों को यह अच्छा नहीं लगता जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि उन्होंने यह किया, वह किया. लोगों का कहना है कि वे देश के प्रधानमंत्री होने के मोड में कम, पार्टी के प्रवक्ता के मोड में अधिक रहते हैं, जबकि प्रधानमंत्री देश के सभी लोगों का होता है, न कि किसी पार्टी का. लोग कहते हैं कि देश की संपत्ति देश के लोगों की मेहनत से आती है, यदि देश की संपत्ति देश के लोगों के लिए नहीं प्रयोग होगी तो किस पर प्रयोग होगी ? सरकार ने जो किया वह तो करना सरकार का दायित्व है. लोगों ने इसी कारण तो संविधान बनाकर प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार को सौंपी है.

कारण – 2

फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ जो हुआ, उसके कारण ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को अविश्वसनीय माना जाने लगा है. ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री ने अपनी गलती मानने की बजाय ऑस्ट्रेलिया के लोगों से यह कहना शुरू कर दिया कि फ्रांस के राष्ट्रपति ऑस्ट्रेलिया को झूठा कह कर ऑस्ट्रेलिया का अपमान कर रहे हैं.

ऑस्ट्रेलिया के लोगों का कहना है कि फ्रांस के राष्ट्रपति ऑस्ट्रेलिया को नहीं, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को झूठा कह रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री का व्यवहार ऑस्ट्रेलिया के लोगों को शर्मिंदा करता है. देश के प्रधानमंत्री की यह जिम्मेदारी होती है कि उसके किसी क्रियाकलाप से देश के लोगों को शर्मिंदा नहीं होना पड़े.

ऑस्ट्रेलिया के लोगों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया मूर्खों की समाज नहीं है जो कोई धार्मिक या सांप्रदायिक या राष्ट्रगौरव का चूरन देकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर बेवकूफ बनाया जा सके इसलिए कि वे प्रधानमंत्री के सच-झूठ की पहचान करना जानते हैं.

कारण – 3

क्लाइमेट-चेंज मुद्दे पर ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री की अगंभीरता, फर्जी बयानबाजी इत्यादि पसंद नहीं आ रही है. लोगों का कहना है कि क्लाइमेट-चेज-एक्शन के लिए देश के लोगों व विशेषज्ञों से चर्चा करनी होती है, गंभीर नीतियां बनानी होती हैं, न कि बयानबाजी या ब्रोशर छापना या बयानबाजी का प्रचार करना. लोगों का कहना है कि एक समय क्लाइमेट-चेंज-एक्शन पर विश्व का नेतृत्व करने वाला देश, इन प्रधानमंत्री के जमाने में इस संदर्भ में बहुत कुछ ठोस नहीं कर पाया है.

कोई बड़ी बात नहीं कि घटती लोकप्रियता देखकर, सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव के पहले प्रधानमंत्री बदल दे. वैसे भी यहां यह सब होना आम बात है. यहां व्यक्ति पार्टी या देश से बड़ा नहीं होता है, न ही किसी व्यक्ति को देश का ईश्वर माना जाता है.

वैसे तो सत्तारूढ़ पार्टी पिछले लगभग नौ साल से सत्ता में है, लेकिन लगभग साल, दो-साल ढाई-साल में प्रधानमंत्री बदलती रही है, जबकि वर्तमान प्रधानमंत्री तीन साल पूरे कर चुके है. देखते हैं कि इस बार सत्तारूढ़ पार्टी किस तरह की योजना पर चलती है, जबकि लगभग 6 महीनों बाद देश में चुनाव होने हैं.

ऑस्ट्रेलिया में मीडिया

लगभग सात साल पहले दिसंबर 2014 में सिडनी में स्थित दुनिया के सबसे महंगे व्यवसायिक इलाकों में से एक इलाके के एक रेस्त्रां में एक मुस्लिम-अतिवादी ने 18 लोगों को होस्टेज बना लिया. उसने अपनी कई तरह की मांगे रखी. लगभग 16 घंटे चली इस घटना में अतिवादी सहित तीन लोगों की मृत्यु हुई, कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए.

  • मीडिया चैनलों में एंकरों या पत्रकारों ने चीखने-चिल्लाने जैसा काम नहीं किया.
  • कोई एंकर या पत्रकार आतंकवाद विशेषज्ञ बनते हुए ज्ञान नहीं बाटा.
  • कोई एंकर या पत्रकार पुलिस या आतंकवादी-निरोधी दस्ता इत्यादि विशेषज्ञ बनते हुए ज्ञान नहीं बाटा.
  • हंगामे भरी पैनल-चर्चाएं नहीं हुईं.
  • सोशल मीडिया व मीडिया में किसी धर्म या धर्म के अनुयायियों के प्रति नफरत भरे मैसेज वायरल नहीं हुए.
  • मॉब लिचिंग नहीं हुई,
  • लोगों ने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ प्रदर्शन नहीं किए.
  • इस प्रकार व इस प्रकार से मिलते-जुलते चरित्र व मानसिकता का और भी बहुत कुछ नहीं हुआ.

मैंने उस दिन व उसके कुछ दिनों बाद तक जिस किसी भी ऑस्ट्रेलियन व्यक्ति से इस मुद्दे पर बात की. बिना किसी अपवाद सभी का यही कहना रहा कि हमारे देश की व्यवस्था जानबूझकर देश के लोगों का शोषण नहीं करती, लोगों के साथ मानसिक, भावनात्मक, शारीरिक, आर्थिक हिंसा नहीं करती इसलिए यदि इस तरह की घटनाएं होती हैं तो इसका मतलब यही है कि ऐसी घटना को करने वाला मानसिक रूप से बीमार है.

जितने लोगों से मैंने बात की, बिना अपवाद सभी लोगों का कहना रहा कि दुनिया का कोई धर्म हिंसा करना नहीं सिखाता. ऑस्ट्रेलिया में कई सौ वर्षों से मुस्लिम रह रहे हैं. देश के विकास व अर्थ-व्यवस्था में उनका योगदान रहा है. हम लोगों ने एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा समझा है. मानसिक रूप से कुछ बीमार लोगों के कारण किसी धर्म के अनुयायी लोगों को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता है. दुनिया के हर धर्म में अच्छे बुरे सभी तरह के लोग होते हैं. हम पूर्वाग्रह के आधार पर अपने समाज व देश का माइंडसेट नहीं बना सकते हैं.

हम लोगों का सिडनी वाला घर इस रेस्त्रां से लगभग दो-ढाई किलोमीटर की सीधी दूरी पर है. मैं इस घटना के दिन सिडनी में ही था. इस पोस्ट को लिखने का कारण, यह चर्चा करना है कि उस दिन आम लोगों व मीडिया इत्यादि का चरित्र क्या रहा, क्या मानसिकता रही. सात साल हो चुके हैं, इस तरह की घटना दुबारा नहीं हुई.

ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी

किसी समाज व देश के लोगों का माइंडसेट, विचारशीलता, मानसिकता, दृष्टिकोण इत्यादि बहुत अधिक मायने रखता है. दृष्टिकोण व विचारशीलता का ही परिणाम है कि परिपक्वता यहां तक आ पहुंची है कि ऑस्ट्रेलिया समाज आदिवासियों को उनकी जनसंख्या-प्रतिशत के आधार पर आरक्षण देता है और कोई भी आरक्षण का विरोध नहीं करता है बल्कि समय के साथ जनसंख्या बढ़ने पर आरक्षण भी बढ़ जाता है.

ऑस्ट्रेलिया में आदिवासियों को हिकारत से नहीं देखा जाता. आदिवासियों को बहुत अधिक भत्ते व सुविधाएं मिलतीं हैं. यह उनका सामाजिक न्याय अधिकार माना जाता है. उन्हें भिखारी या खैरात पाने वाला नहीं माना जाता, न ही इन सब बातों के आधार पर उनका तिरस्कार ही किया जाता है.

आदिवासियों के लिए बहुत बड़े-बड़े क्षेत्रफल वाले विशिष्ट आदिवासी क्षेत्र हैं. इन क्षेत्रों को आदिवासी अपने पारंपरिक तरीकों से संचालित करते हैं. इन आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों को इतने अधिक अधिकार हैं कि सरकारी नौकरशाहों तक को भी आदिवासियों से अनुमति लेकर ही प्रवेश करना पड़ता है. यहां तक कि संसदीय चुनावों में मतदान करवाने वाली टीम भी अनुमति लेकर प्रवेश करती है.

चूंकि आदिवासी मूल-निवासी हैं, इसलिए उनको संसद परिसर के अंदर संसद भवन के सामने आदिवासियों को स्वतंत्र देश जैसा मानते हुए उनको अपना तंबू दूतावास स्थापित करने का विशेषाधिकार भी दिया गया है. दूतावास तंबू में रहेगा यह निर्णय आदिवासी समाज द्वारा लिया गया था.

ऑस्ट्रेलिया में मुस्लिम

ऑस्ट्रेलिया में एक प्रधानमंत्री रहीं जूलिया गिलार्ड, उनके नाम से भारतीय मीडिया में अनेक फर्जी पोस्टें वायरल की गई हैं, कहा कुछ, उसका मतलब कुछ और निकाल कर फर्जी पोस्टें वायरल कई गईं. फर्जी पोस्टों के कारण भारत में लोगों को लगता है कि ऑस्ट्रेलिया में मुस्लिम लोगों को अपने धर्म की परंपराओं का पालन करने का अधिकार नहीं है जबकि सच यह है कि मुस्लिम सहित किसी भी धर्म के अनुयाई को ऑस्ट्रेलिया में परंपराओं का पालन करने का अधिकार है.

ऑस्ट्रेलिया में पहली मुस्लिम मस्जिद 1860 में बनी. ऑस्ट्रेलिया में कुल जनसंख्या का लगभग 3% मुस्लिम हैं. ऑस्ट्रेलिया में मुस्लिम लोगों की संख्या लगभग 6—7 लाख है, और मस्जिदों की संख्या लगभग 350-400 है. औसतन पौने-दो हजार मुस्लिमों पर एक मस्जिद है. मुस्लिमों की शादी व अंतिम-संस्कार इत्यादि मुस्लिम तौर-तरीकों से होते हैं. लोग नमाज पढ़ते हैं, ईदगाह जाते हैं. खूबसूरत ईदगाहें होती हैं, मदरसे होते हैं. लगभग 50 मदरसे हैं, जिनमें लगभग 40 हजार बच्चे पढ़ते हैं. दारुल उलूम का मदरसा भी है.

परिमार्जित व सामाजिक-न्याय लोकतांत्रिक देश एक संयुक्त-परिवार जैसा

ऑस्ट्रेलिया में सरकारी अस्पताल, सरकारी स्कूल, सरकारी पुस्तकालय, सरकारी सेवाएं इत्यादि नहीं होते, बल्कि पब्लिक अस्पताल, पब्लिक स्कूल, पब्लिक पुस्तकालय, पब्लिक सेवाएं इत्यादि होते हैं.

सरकारी प्राइमरी स्कूल को पब्लिक प्राइमरी स्कूल कहा जाता है. सरकारी हाईस्कूल को पब्लिक हाईस्कूल कहा जाता है. सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल को पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल कहा जाता है. इनका नियंत्रण भी लोगों के हाथ में होता है.

सरकारी अस्पताल को पब्लिक अस्पताल कहा जाता है. सरकारी पुस्तकालय को पब्लिक पुस्तकालय कहा जाता है. लोगों के लिए सरकारी सेवा/सुविधाओं को पब्लिक सेवा/सुविधाएं कहा जाता है. इनका नियंत्रण भी लोगों के हाथ में होता है.

ऑस्ट्रेलिया में यह माना जाता है कि सरकारी सुविधा जैसा कुछ नहीं होता है, न ही सरकार किसी को कोई खैरात देती है. न ही देश में कोई भी व्यक्ति सरकार से खैरात लेता है. देश की संपत्ति देश के लोगों द्वारा बनाई जाती है, देश के हर एक व्यक्ति का योगदान होता है, योगदान के प्रकार भले ही भिन्न-भिन्न हो सकते हैं.

इसलिए जो भी सरकारी सुविधाएं हैं वे देश के लोगों की ओर से देश के लोगों के लिए होती हैं. जिन पर सामाजिक न्याय के आधार पर सबका अधिकार है. जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनका अधिकार अधिक है क्योंकि उनको दूसरे लोगों के समकक्ष खड़ा करने का दायित्व भी देश के लोगों का ही है.

यहां तक ऑस्ट्रेलिया उन लोगों को भी अपना मानता है, जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया को बनाने में कोई योगदान नहीं किया लेकिन ऑस्ट्रेलिया का ऐश्वर्य भोगने के लिए नागरिक बन जाते हैं. ऑस्ट्रेलिया के लोग नफरत नहीं करते हैं बल्कि उनको भी अपना मानकर समाहित कर लेते हैं, इन लोगों का भी देश पर अधिकार मान लेते हैं. ऐसा केवल ऑस्ट्रेलिया ही नहीं है, दुनिया के कई देशों का ऐसा ही चरित्र है.

यह वैसे ही है जैसे किसी संयुक्त परिवार में कोई सदस्य अधिक कमाता है तो कोई कम कमाता है या कोई नहीं भी कमाता है। लेकिन मूलभूत सुविधाओं का भोग बराबर होता है, सम्मान का अधिकार होता है, पारिवारिक निर्णयों में भागीदारी का अधिकार होता है। कोई सदस्य केवल इसलिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो जाता है क्योंकि चार पैसे अधिक कमाता है या कमाता है। उसे केवल कमाने के आधार पर दूसरे सदस्यों का अपमान करने या गाली-गलौच करने का अधिकार नहीं मिल जाता है।

ऐसा होना ही लोकतंत्र है, समाजवाद है, साम्यवाद है. मैं हमेशा कहता रहता हूं कि दुनिया में ऐसे भी देश हैं जो लगातार परिमार्जित हो रहे हैं. ऐसे देशों की आंतरिक व्यवस्था का कागज में नाम भले ही लोकतंत्र हो लेकिन वे लोकतंत्र भी हैं, समाजवादी भी हैं, साम्यवादी भी हैं. परिपक्व लोकतंत्र ही समाजवाद व साम्यवाद का लक्ष्य होता है. समाजवाद व साम्यवाद मार्ग हैं लक्ष्य नहीं.

दुनिया में ऐसे देश भी हैं, जो अपनी संस्कृति की महानता का अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनते ढिंढोरा पीटते नहीं अघाते हैं. संयुक्त-परिवार संयुक्त-परिवार, सामाजिकता सामाजिकता, पारिवारिक-मूल्य पारिवारिक-मूल्य, जीवन-दर्शन जीवन-दर्शन चीखते चिल्लाते रहते हैं.

लेकिन जब बात सामाजिक न्याय की आती है तो अपने ही देश के उन लोगों से ही नफरत करते हैं, जिनके साथ सैकड़ों सालों से रहते आ रहे हैं, जिनके साथ मिलकर देश बनाया है. जो लोग चार पैसे कमाते हैं (भले ही भ्रष्टाचार से कमाते हों) वे लोग गरीबों को टूटे-फूटे तरीके से मिलने वाली सड़ी-गली सुविधाओं तक का मजाक उड़ाते हैं. अपने ही देश के लोगों को भिखारी मानते हैं, जमकर अपमान करते हैं, गाली-गलौच करते हैं.

ऐसा करने वाले लोगों में अधिसंख्या वे लोग होते हैं तो संस्कृति की महानता व सामाजिकता इत्यादि का ढिंढोंरा पीटते नहीं अघाते हैं. यूं लगता है कि इन जैसे लोगों के लिए संस्कृति, संस्कार, राष्ट्र-गौरव, संस्कृति-गौरव, सहिष्णुता, महानता व सामाजिकता इत्यादि-इत्यादि का मतलब छिछोरापन, नीचता, टुच्चई, क्रूरता, बर्बरता, घृणा, असंवेदनशीलता, सामाजिक-अन्याय व भ्रष्टाचार इत्यादि-इत्यादि ही है.

  • विवेक उमराव

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