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मेहनतकशों की ज़िंदगी मौत का इंतजार बन कर रह गयी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 29, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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मेहनतकशों की ज़िंदगी मौत का इंतजार बन कर रह गयी
प्रतीकात्मक तस्वीर
रितेश विद्यार्थी

चंदौली में ‘शंकर मोड़’ नाम की दलितों की एक बस्ती में 45 वर्ष के एक मजदूर रामबिलास रहते हैं. रामबिलास एक बेहद स्वाभिमानी व संवेदनशील खाटी मजदूर हैं और चमार जाति से आते हैं. उनके तीन या चार बच्चे हैं. टूटे-फूटे घर को छोड़कर उनके पास और कोई संपत्ति नहीं है. बीएचयू में पढ़ने के वक़्त ‘गांव चलो अभियान” के दौरान 2015 में हमलोगों के संपर्क में आये थे. संपर्क में आने के बाद हमलोगों ने उनकी मुलाकात चंदौली में ही सक्रिय ‘मजदूर किसान एकता मंच’ से करा दिया था.

रामबिलास जिनको पहले से ही शोषण व अन्याय बर्दाश्त नहीं होता था, हमलोगों की विचारधारा से जुड़ने के बाद संगठन में सक्रिय हो गए लेकिन कुछ ही दिनों में मजदूरों व भूमिहीनों की जिंदगी के बारे में हद से ज्यादा सोच देने की वजह से उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया और धीरे-धीरे यहां तक बिगड़ गया कि नींद से पहले व नींद में भी उन्हें हर पल व हर तरफ शोषण व जुल्म ही दिखाई पड़ने लगा.

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हमलोगों ने बीएचयू में उनका इलाज शुरू कराया. 3 साल इलाज चलने के बाद वो ठीक हो गए. इस दौरान उनकी पत्नी मेहनत मजदूरी करके घर का खर्च चलाती रही. 10 प्रतिशत मासिक ब्याज पर पैसा लेकर उन्होंने अपनी बेटी की शादी किया. ठीक होने के तुरंत बाद ब्याज और कर्ज चुकाने के लिए रामबिलास ने एक बार फिर हाड़तोड़ मेहनत शुरू कर दिया.

वो सीमेंट, गिट्टी, सरिया वगैरह को ट्रक पे चढ़ाने और उतारने का काम करते थे. इस तरह के काम करने वालों को पोलदार कहते हैं. कोरोना की शुरुआत से पहले ट्रक से एक बोरा उतारते समय उनकी गर्दन अकड़ गयी. पैसे के अभाव की वजह से कुछ दिनों तक उन्होंने घरेलू उपचार किया लेकिन घरेलू उपचार का कोई असर नहीं हुआ. धीरे-धीरे वो चलने-फिरने व शौच जाने में भी असमर्थ होने लगे. फिर उन्होंने यहां वहां से कुछ कर्ज लेकर अस्पताल में इलाज कराने की सोचा, लेकिन तभी लॉक डाउन लगा दिया गया, जिसकी वजह से सरकारी अस्पताल बंद हो गए.

प्राइवेट अस्पताल में इलाज करा पाने में सक्षम न होने की वजह से वो कई महीनों तक घर पर पड़े रहे. 6 महीने बाद जब फिर से सरकारी अस्पताल खुलना शुरू हुए तो हमलोगों ने उनको बीएचयू के न्यूरोलॉजी विभाग में दिखाया.

एमआरआई वगैरह की रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर ने बताया कि उनके रीढ़ की हड्डी के नीचे एक नस दब गई है, जिसका जल्द से जल्द ऑपरेशन कराना जरूरी है. ऑपरेशन से भी ठीक होने की पूरी गारंटी नहीं है, अगर ठीक हो भी गए तो भी वो दुबारा श्रमसाध्य काम नहीं कर सकते. फिर जब हमलोगों ने पूछा कि ऑपेरशन में कितना खर्च आएगा तो डॉक्टर ने बताया कि कम से कम एक लाख. प्राइवेट अस्पताल में ऑपरेशन कराने का मतलब है कि कम से कम 5 लाख आपके पास होने चाहिए.

डॉक्टर के सुझाव पर हमलोगों ने बीएचयू से गरीब लोगों के सरकारी मदद के लिए एक फॉर्म लेकर डॉक्टर से इलाज का पूरा इस्टीमेट बनवाकर चंदौली के विधायक के यहां चक्कर लगाना शुरू किया. चंदौली की विधायक साधना सिंह ने जो भारतीय जनता पार्टी से विधायक हैं रामबिलास को फोन पर कहा कि वोट तो बसपा को देते हो तो फिर मैं तुम्हारी मदद क्यों करूं ? जाओ बसपा से ही मदद मांगों.

खैर बहुत भागदौड़ और गुजारिश करने के बाद विधायक साधना सिंह ने इलाज हेतु आर्थिक मदद वाले फॉर्म को पास कर दिया. उसके बाद महीनों तक जिलाधिकारी व लेखपाल तक कागजी कार्यवाही के लिए हमलोग चक्कर लगाते रहे. फिर एक दिन जिलाधिकारी कार्यालय से सूचना मिली कि आपके कागजात मुख्यमंत्री कार्यालय, लखनऊ के लिए भेज दिए गए हैं. जब काम हो जाएगा तो मुख्यमंत्री कार्यालय से आपके घर पर एक कागज आएगा.

तब से अब तक 10 महीने से ज्यादा समय बीत चुका है लेकिन अब तक न तो कोई चिट्ठी आयी और न ही कोई संदेश. साथी रामबिलास की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है. रामबिलास अपनी चारपाई पर लेटे-लेटे मौत का इंतज़ार कर रहे हैं.

रामबिलास मजदूर तो हैं ही साथ-साथ दलित वर्ग से आते हैं. आज भारत की राजनीति में बहुजन राजनीति एक मजबूत धारा है. तमाम पार्टियां हैं जो बहुजनों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ का ढिंढोरा पीटती रहती हैं लेकिन उनका सामाजिक न्याय केवल सरकारी नौकरियों में आरक्षण तक ही सीमित रहता है. आज भी करीब 90% दलित भूमिहीन किसान या मजदूर की जिंदगी जी रहे हैं और कमोबेश रामबिलास की तरह ही उनमें से ज्यादातर की जिंदगी मौत का इंतजार करने तक सीमित है.

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