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नेहरू परिवार से नफरत क्यों करता है आरएसएस और मोदी ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 13, 2018
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कांग्रेस से भारी वैचारिक मतभेद के बावजूद यह कहना चाहूंगा कि देश की आजादी में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में महात्मा गांधी और नेहरू की भूमिका अब्बल रही है. वहीं आरएसएस देश की इस प्रगतिशील ताकतों का हमेशा से विरोध करती रही और अतंतः आजादी के तुरंत बाद ही गांधी की हत्या कर अपनी चिरपरिचित मंशा को जगजाहिर कर दिया. गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता जवाहर लाल नेहरू थे और उनके दाहिने हाथ के बतौर काम कर रहे थे सरदार बल्लभ भाई पटेल. इसलिए बार-बार आरएसएस सहित अन्य ताकतें भी जवाहर लाल नेहरू और सरदार बल्लभ भाई पटेल के बीच दरार कृत्रिम तौर पर दरार पैदा करने का प्रयास करती रही है.

कहा जाता है कि जब तक महात्मा गांधी जिन्दा रहे, सरदार बल्लभ भाई पटेल और नेहरू में यदा-कदा बहसें होती रहती थी. परन्तु महात्मा गांधी की हत्या के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल वह सख्सियत थे जो हमेशा जवाहर लाल नेहरू के हर कदम पर साथ रहे और किसी भी तरह के मतभेदों को हमेशा के लिए खारिज कर दिया. सरदार बल्लभ भाई पटेल ही वह सख्सियत थे जिन्होंने बतौर गृह मंत्री आरएसएस पर प्रतिबंध लगाये थे.

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तब सवाल उठता है कि फिर आरएसएस आखिर सरदार बल्लभ भाई पटेल को अपना क्यों मानता है और हमेशा नेहरू की ओर निशाना क्यों साधते रहता है ? वजह है आरएसएस हमेशा ही जवाहर लाल नेहरू के विराट व्यक्तित्व से घबराता है, और नेहरू के विराट व्यक्तित्व के सामने आपने अन्य किसी को खड़ा न कर पाने की सूरत में वह सरदार बल्लभ भाई पटेल की शरण में जाता है और सरदार बल्लभ भाई पटेल का आड़ लेकर नेहरू को खारिज करना चाहता है.

देश की सत्ता पर काबिज आरएसएस के कार्यकर्ता नरेन्द्र मोदी देश की सर्वाधिक प्रतिगामी ब्राह्मणवादी ताकतों का प्रतिनिधित्व करने के कारण देश की विशाल आम जनता को लूट-खसोट कर औद्यौगिक घरानों और ब्राह्मणवादी ताकतों का हित कर रही है, जिस कारण देश की विशाल आबादी कंगाली के खाई में धकेल दी गई है. ऐसे में देश की जनता को बेवकूफ बनाने और जनता के बीच अपनी उपस्थिति को मान्य बनाने के लिए एक फर्जी मुद्दे की तालाश में जुटा हुआ है, जिसके सर पर अपनी ‘‘नाकामियों’’ का ठीकरा फोड़ा जा सके. ऐसे में उसके सामने देश के सर्वाधिक मान्य प्रधानमंत्री नेहरू, इंदिरा, राजीव का सर ज्यादा मुफीद लगता है क्योंकि अपने बचाव में नेहरू, इंदिरा और राजीव नहीं आ सकते और उनके राजनैतिक विरासत ढ़ोने वाले कमजोर पड़ गये लगते हैं.

देश में व्याप्त आराजकता और कमियों के बावजूद अंग्रेजों की वापसी के बाद नेहरू के हाथ आये देश को संवारने और विश्व में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराने का श्रेय नेहरू ही थे. देश जानता है भारी वैचारिक मतभेदों के बावजूद जवाहर लाल नेहरू देश की वह सख्सियत हैं, जिन्होंने देश की तथाकथित आजादी के दौर में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया और 15 साल तक जेल में काटे. जवाहर लाल नेहरू के पिता मोती लाल नेहरू स्वयं स्वतंत्रतासेनानी थे. आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पूरी काबिलियत दिखाई और उनके उपरांत उनकी पुत्री जो स्वयं देश के आजादी के दौर में पिता के साथ सहयोगी थी, देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनी. उनकी असामयिक हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. इस प्रकार देश की गुलामी के दौर से लेकर भारत की आजादी के बाद तक नेहरू के इस घराने ने उनकी राजनैतिक विरासत को चलाया, और अभी उनके जीवित बचे सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी उनके राजनैतिक विरासत को संभालने का कोशिश कर रहे हैं.

देश में व्याप्त अराजकता और दुर्दशा के बावजूद यह देश अपनी लोकतांत्रिक विरासत उन हाथों में कतई नहीं सौंप सकता जिनका इतिहास कायरता, अंग्रेजों के मुखबिरी और देश के क्रांतिकारियों के खून से रंगा हो. नेहरू के विरासत को थामे उनके कांग्रेस और उनकी पीढ़ी को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस की विरासत वह थामे हुए है जो नेहरू खानदान का वारिश है. अगर नेहरू खानदान लगातार कांग्रेस की विरासत को थाम रही है तो इसका पीछे उनका ऐतिहासिक बलिदान और देश के लिए चाहे जिस रूप में भी हो, एक समर्पण रहा है. इसके पीछे एक कारण संभवतः यह भी है कि नेहरू खानदान से अधिक योग्य नेतृत्व देश के सामने नहीं है. परन्तु इसका यह अर्थ लगाया जाना बेहद खतरनाक है कि नेहरू खानदान को विरमित करने के लिए एक हत्यारे और गुंडों के हाथ में जिसका इतिहास कायरता और गद्दारी से भरा हुआ हो, के हाथों में देश की बागडोर सौंपा दिया जाये.

परन्तु, 2014 में कांग्रेस के अराजकता और भ्रष्टाचार से उबी देश की जनता ने कांग्रेस को हटाने के नाम पर ऐसे ही एक हत्यारों और गुंडों के हाथ में देश की बागडोर सौंप दी है, जिसे न तो इतिहास की सटीक जानकारी है और न ही वह अपनी जानकारी दुरूस्त ही करना चाहता है. ऐसे में देश की उन तमाम संस्थाओं ने जिसपर देश के लोकतंत्र का दारोमदार टिका हुआ है, उसे एक-एक कर मिटाना शुरू कर दिया है. इसने जांच एजेंसियों के अलावा देश के सर्वोच्च न्यायालय तक को खरीदने या मिटाने पर तुल गया है. देश के बैंकिंग प्रणाली का सर्वोच्च निकाया आरबीआई में अपने एक एजेंट उर्जित पटेल को नियुक्त कर देश की बैंकिंग प्रणाली को तहस-नहस कर दिया और देश की जनता पर नोटबंदी जैसी काले नियम लाद दिये और एक ही रात में देशवासियों को भिखारी बना दिया. जिस कारण तकरीबन डेढ़ सौ से अधिक लोगों की जान चली गई.

ये अराजक हत्यारे और गुडें अपनी उपस्थिति लगातार बनाये रखने के लिए देश भर में हिन्दु-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के बाद दलितों-पिछड़ों-आदिवासियों-औरतों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया. जिस कारण देश भर में दलितों-पिछड़ों पर हमले बढ़ गये. छात्रों को अशिक्षित रखने के लिए शिक्षण संस्थानों पर हमले तेज कर दिये, गौरी लंकेश जैसी बुद्धिजीवी महिला तक की हत्या कर दी गई ताकि सवाल उठाने वाला कोई न बचे. इसके अतिरिक्त चुनाव के माध्यम से उसे कभी बेदखल नहीं किया जा सके इसके लिए उसने चुनाव प्रणाली में अपने एजेंट घुसा दिये और चुनाव आयोग को अपना हथियार बना लिया, जिसने ईवीएम में छेड़छाड़ कर इसके चुनावों में जीत की सुनिश्चिता को पुख्ता कर दिया. देश भर में ईवीएम के खिलाफ उठ रहे सवालों के बावजूद ईवीएम को तब तक इस्तेमाल करेगा जब तक आम जनता पूरी तरह इसके खिलाफ न उठ खड़ी हो.

संभवतः अपराधकर्मियों और हत्यारों की उपस्थिति को रोकने खातिर नेहरू खानदान ने देश में लोकतंत्र की नींब को मजबूती से बिठाया था, जिस कारण इन अपराधियों और हत्यारों को इस लोकतंत्र में घुटन महसूस हो रही है, वह अपनी मनमाफिक देश में तानाशाही लागू नहीं कर पा रहा है, विरोध के स्वर हर दिन उठ रहे हैं, इसके बावजूद कि उसने देश की तमाम संस्थानों को या तो ध्वस्त कर दिया है अथवा उसे अपना जरखरीद गुलाम बना लिया है. विरोध का यह स्वर बढ़ता ही जा रहा है बावजूद इसके कि उसने देश की प्रमुख मीडिया घरानों को खरीद लिया है, देश की जनता अपनी सवालों पर एकजुट हो रही है. रोज सड़कों पर उतर रही है. इन हत्यारे-अपराधकर्मियों के गिरोह के खिलाफ नारे लगा रही है. यही कारण है कि ये अपराधियों-हत्यारे लोगों का गिरोह नेहरू से नफरत करता है, उसके खानदान से नफरत करता है और दिन-रात उसके खिलाफ आग उगलता रहता है.

इस लोकतंत्र कि कमियों के कारण ही इन अपराधकर्मियों के गिरोहों ने देश की सत्ता पर कब्जा जमा लिया है और देश को तानाशाही की ओर ले जा रहा है. इन कमियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ईवीएम के जरिये मतदान करना है, जिस कारण चुनाव परिणामों को बड़े पैमाने पर मनोनुकूल बदला जा सकता है और बदला जा भी रहा है. एतएव लोकतंत्र को बचाने कि यह प्राथमिक मांग है कि देश में चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए ईवीएम को हटाया जाये और बैलेट पेपर के माध्यम से चुनाव होने को सुनिश्चित बनाया जाये.

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