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लूट का हथियार है देश की अवधारणा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 12, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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लूट का हथियार है देश की अवधारणा

मुझे देश, राष्ट्र, देशप्रेम आदि का विचार थोड़ा परेशान करता है. दूसरे आपके लिए ये महज़ विचार नहीं बल्कि भाव हैं. ऐसे में मेरा ये कहना कि ये विचार मुझे परेशान करते हैं, आपके दुःख का कारण हो सकता है. लेकिन ये भी जानना ज़रूरी है कि मुझे ये विचार परेशान क्यों करते हैं ?

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आप किसी भी मुल्क में रहते हों, आपका मुल्क किन्हीं दूसरे देश की सीमाओं से लगा हुआ है. इन सीमाओं को हमारे और आपके जैसे कुछ लोगों ने कुछ साल पहले बनाया है. अगर इन सीमाओं पर तैयार की गयी दीवार, लगाये गये कांटे या खड़े किये गये सिपाही हटा दिए जाएँ और आप दूसरी तरफ़ जाकर देखें तो पायेंगे कि उधर भी आपके ही जैसे लोग रहते हैं.

यहां तक कि उनका पहनावा और बोली तक हमारे जैसी हो सकती है. उनकी धरती, उनके बाग़, उनके खेत, उनके दुःख, उनके सुख, उनका प्रेम यहां तक कि उनके सपने तक हमारे जैसे हैं. ऐसे में क्या ये सवाल नहीं उठना चाहिए कि फिर हमारे बीच ये दीवार, ये कांटे, ये सिपाही किसने खड़े किये ?

हम सब खेती करते हैं, नहीं करते हैं तो कम से कम खेती करने को जानते हैं या फैक्ट्रियों में काम करते हैं. काम से दाम या मज़दूरी मिलती है, इसी तरह से खेती से फ़सल हासिल होती है. क्या कभी आपने सोचा के देशों के निर्माण के बाद जो हजारों मील की सीमा रेखाएं बनी हैं, ये भी किसी की खेती हैं ?शायद न सोचा हो, लेकिन अब सोचिये, पहले बता देता हूं कैसे ?

दुनिया भर के देशों की ज़्यादातर सीमाओं पर सैनिक खड़े हैं. ये सैनिक अपने-अपने देश के मजदूरों और किसानों के बेटे बेटियां हैं. इनके हाथ में बंदूकें हैं. इनके आसपास हथियारों के बड़े-बड़े ज़खीरे हैं. इन हथियारों की कीमत लाखों डॉलर में होती है. ये हथियार कुछ कंपनियां बनाती हैं, जिनको सभी देश खरीदते हैं.

हथियारों की कीमत में खरीदने वाले देश के नेताओं, अफ़सरों और दलालों का कमीशन होता है. कमीशन का ये पैसा दुनिया के कुछ देश मैनेज करते हैं. इसे काला धन कहा जाता है. ये काला धन मुट्ठी भर लोगों की विलासिता पर खर्च होता है. हथियार तीन काम करते हैं – लोगों की जान लेते हैं, पर्यावरण का सत्यानाश करते हैं और दुनिया के आम लोगों को कंगाल करते हैं. अब सोच कर देखिये, देशों के बीच सीमायें न हों तो क्या हथियार उद्योग का कोई उपयोग रह जायेगा ?

हथियार, हथियार उठाने वाले सैनिक और इन पर होने वाले खर्च को जायज़ ठहराया जा सके, इसके लिए भी दो महत्वपूर्ण काम किये जाते हैं. पहला, सीमाओं पर हमेशा तनाव बनाये रखना पड़ता है. इसके लिए दोनों तरफ के मजदूरों और किसानों के बेटे-बेटियों को मारते रहना पड़ता है और दूसरा, देश के भीतर सेना और सैनिक के गुणगान के साथ-साथ देशप्रेम की पिपिहरी बजाते रहनी पड़ती है, वरना लोग अपने बेटे-बेटियों की मौत पर नाराज़ हो जायेंगे और ये पूरा धंधा ही चौपट हो जायेगा.

देशप्रेम की पिपिहरी का ये परिणाम होता है कि जिसका बच्चा अपने जैसे दूसरे देश के बच्चों के ज़रिये मारा जाता है, वो इसे गर्व का विषय मानता है. और कहता है कि हमारे और भी बच्चे होते तो उन्हें भी देश की सीमाओं पर भेज देते. जब कोई ऐसा कहता है तो मीडिया में उसे खूब हाई लाइट किया जाता है. क्या कभी आपने देखा कि किसी पूंजीपति ने अपने बच्चों को फौज़ में भेजा हो ? पूंजीपति तो छोड़िये जो नेता देशप्रेम के नाम पर आपका रस निचोड़ते हैं वो भी अपने बच्चों को फौज़ी नहीं बनाते.

पहले और दूसरे आलमी जंग में ऐसे देश जिनकी फौज़ी ताक़त ठीक-ठाक थी, उन्होंने दुनिया के कमज़ोर देशों को लूटने के लिए आपस में बाँट लिया, लेकिन ये अन्यायपूर्ण बटवारा नयायपूर्ण नहीं था, इसलिए जिन देशों को लगता था कि उन्हें लूटने के लिए उतने मुल्क नहीं मिले जितने मिलने चाहिए थे, उनकी वजह से दूसरा आलमी जंग हुआ.

इस बीच रूस में समाजवादी हुकूमत बन गयी थी. उसने सैन्य ताकता वाले देशों के लूट के लिए किये गये युद्ध का भंडाफोड़ कर दिया. दूसरे किसी देश का अपहरण करके लूटने के लिए अब माहौल न था, इसलिए अब पैसे और तकनीक के आधार ये काम किया जाता है.

इस बीच आपने गौर किया होगा कि पहले की तरह लड़ाइयाँ कम ही होती हैं, लेकिन हथियार उद्योग तो लड़ाई के बिना चल नहीं सकता. ऐसे में पूरी दुनिया में नस्ल, भाषा, धर्म आदि के आधार पर सैकड़ों आतंकवादी संगठन खड़े किये गये. ये आतंकवादी संगठन कोई भावनात्मक मुद्दा पकड़ते हैं और उसी के इर्द गिर्द लोगों को भड़काते हैं. मीडिया कलात्मक ढंग से इसका प्रचार करती है.

धार्मिक, साहित्यिक और राजनीतिक संगठन स्क्रिप्ट के अनुसार इन आतंकी संगठनों का या तो विरोध या समर्थन करते हैं या दोनों के बीच किन्तु परन्तु करते रहते हैं. इन सबकी वजह से आतंकी संगठन फलते फूलते हैं और हथियार बनाने वाली कंपनियां इन्हें हथियार बेचती हैं.

इन संगठनों को बहुत से देश डिप्लोमैटिक लड़ाई के नाम पर पैसे भेजते हैं, जैसे कश्मीर में सरगर्म गिरोहों को फंड करने का आरोप पाकिस्तान पर लगता रहता है, और भी देश इसी तरह का कुछ न कुछ करते हैं. इसके साथ धर्म, नस्ल आदि के आधार पर आम जनता भी इन गिरोहों को पैसे देती है. ये आतंकी संगठन कई जगहों में अपनी स्थाई या अस्थाई सरकार भी चलाते हैं, नशे का करोबार करते हैं, इससे मिलने वाला पैसा भी हथियार उद्योग के पास जाता है.

इस तरह आपका देशप्रेम और राष्ट्रवाद हथियार उद्योग का टूल बन जाता है. वरना तो आप भले हजारों किलोमीटर में फैले देश से मुहब्बत का दावा करते हों, सच तो यही है कि आप पड़ोसी को एक कटोरी चीनी या तेल नाप कर देते हैं और उसका बुरा करने का कोई मौका कभी नहीं छोड़ते. आपके घर के चार घर बाद किसका घर है, आपको पता नहीं होता और आपके चार गांव बाद कौन सा गाँव है आप नहीं जानते.

देश के लिए जान देने का दावा करने वाला किसान अपने पड़ोसी किसान के खेत की मेड़ काट लेता है. शिकायत पर उसे मारता भी है. पुलिस आती है लड़ाई और बढ़ जाती है. इस तरह चार अंगुल ज़मीन हड़पने के लिए किसान चार पीढ़ी कोर्ट में लड़ता है और इस बीच लाखों रूपये बर्बाद कर देता है.

क्या ये बात आपको हैरान नहीं करती कि जो इन्सान अपने पड़ोसी की नाली नहीं बर्दास्त करता, अपने पड़ोसी की अच्छी फसल नहीं बर्दास्त करता, अपने पड़ोसी की अच्छी ज़िन्दगी नहीं बर्दास्त करता, वो एक विशाल देश से प्रेम का दावा कैसे कर लेता है ?

एक स्त्री अपनी निश्चित भूमिकाओं से बाहर चली जाए, दलित जाति का आदमी बराबरी और सम्मान की मांग कर बैठे, दूसरे धर्म का कोई अपने तरह से रहने का हक़ मांगने लेगे, तो उसकी हत्या तक कर जाती है. जबकि ये सब हैं तो देश ही. ऐसे में देशप्रेम का भाव और इसके लिए लड़ने मरने का जज्बा बनावटी नहीं लगता ? मुझे पढ़ते हुए कुछ लोग गलियाँ भी दे रहे होंगे, लेकिन सोचने की ज़रूरत है कि हमारी भावनाएं कितनी बनावटी हैं !

अब ये भी सोचिये कि देश की ज़रूरत किसको है ? मेरी समझ है कि आज की सूरत में देश बिना सीमाओं के नहीं हो सकते और सीमाओं से कम से कम आम लोगों को कोई फायदा नहीं है. हाँ इन सीमाओं का खर्च जरूर आम लोग उठाते हैं जो कि बहुत ज़्यादा है. सिर्फ़ दुनिया का सैन्य खर्च ख़त्म कर दिया जाये तो दुनिया की लगभग सभी मुख्य समस्याओं का समाधान हो सकता है.

अब इसका एक और पक्ष सोचिये. दुनिया को जितना भोजन चाहिए, वो इस धरती पर पर्याप्त से भी ज़्यादा है. जितना कपड़ा चाहिए, वो भी पर्याप्त से ज़्यादा है. मकान, परिवहन, शिक्षा, सेहत हर ज़रूरत हर किसी की पूरी की जा सकती है. इसके लिए इन सीमाओं को बनाये रखने की नहीं मिटा देने की ज़रूरत है. सच तो ये है कि दुनिया को हुक्मरां नहीं, मेनेजर्स की ज़रूरत है. सीमायें, हुक्मरां, हथियार उद्योग आदि एक साथ मिटाने होंगे. अभी तो इनका मिटना नामुमकिन लगता है लेकिन ये मिटेंगे और बहुत जल्द मिटेंगे.

  • डॉ. सलमान अरशद

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