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मुनाफाखोरी की होड़ से औद्योगिक हादसों में तबाह होते मज़दूर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 15, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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मुनाफाखोरी की होड़ से औद्योगिक हादसों में तबाह होते मज़दूर

2022 की 8 जनवरी को सुबह 5 बजे उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जि़ले के सहजनवां औद्योगिक इलाक़े की क्रेजी ब्रेड फ़ैक्टरी में भयंकर आग लगने से फ़ैक्टरी में मौजूद सैकड़ों मज़दूर उसके चपेटे में आ गए. बाहर निकलने और अपनी जान बचाने के लिए फ़ैक्टरी में फंसे मज़दूरों में अफ़रा-तफ़री मच गई और आग के डर से दो मज़दूरों ने छत से छलांग लगा दी, जिससे दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए. बताया जाता है कि यहां आग बुझाने से लेकर मज़दूरों की सुरक्षा संबंधी किसी तरह के कोई इंतज़ाम नहीं थे.

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2022 की 6 जनवरी को गुजरात के सूरत जि़ले के सचिन औद्योगिक क्षेत्र में एक डाइंग फ़ैक्टरी में ज़हरीली गैस रिसने से 6 मज़दूरों की दर्दनाक मौत हो गई और 22 मज़दूर गंभीर रूप से ज़ख़्मी हो गए. बताया जा रहा है कि अवैध रूप से रसायन को निकालने के दौरान टैंकर से ज़हरीली गैस रिस गई और वह आसपास के इलाक़े में फैल गई. आसपास डरावना माहौल था.

नए साल 2022 का पहला ही दिन भिवानी जि़ले के मज़दूरों के लिए क़हर बनकर आया, जब सुबह आठ बजे तोशाम इलाक़े में पहाड़ के दरकने से करीब दो दर्जन मज़दूर दब गए. अनेकों मज़दूरों की लाशें निकाली गईं. बताया जा रहा है कि एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा 2 महीने की रोक के बाद यहां फिर से खनन की इजाज़त दी गई थी. काम शुरू होने के दूसरे ही दिन यह हादसा हुआ. इस और इसके आसपास के पूरे इलाक़े में ग़ैर-क़ानूनी और सुरक्षा प्रबंधों को दरकिनार करके, अंधाधुंध और अवैज्ञानिक पद्धतियों से खनन किया जाता है.

2021 की 26 दिसंबर को बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जि़ले के बेला औद्योगिक इलाक़े में एक नूडल्स फ़ैक्टरी में बॉयलर फटने से 10 मज़दूरों की मौत हो गई. बॉयलर फटने का धमाका इतना भयानक था कि मारे गए मज़दूरों की लाशों की पहचान तक नहीं हो सकी. इसकी आवाज़ करीब 5 किलोमीटर दूर तक सुनाई दी. चार किलोमीटर के दायरे वाले घरों-मकानों-भवनों के खिड़की-दरवाज़े़ तक हिल गए. बग़ल की दो-तीन फ़ैक्टरियों तक में भारी नुक़सान होने और मज़दूरों के घायल होने की ख़बरें हैं.

यह रपट लिखे जाने तक पिछले 10-15 दिनों में औद्योगिक हादसों की ये कुछ बड़ी दुर्घटनाएं हैं, जिन्हें मुख्य मीडिया कवर करने को मजबूर हो गया. असलीयत में, मज़दूरों के साथ ऐसी ही अनेकों दुर्घटनाएं आए दिन होती रहती हैं – कहीं छोटी, तो कहीं बड़ी.

रोज़ाना होने वाले इन औद्योगिक हादसों में मज़दूरों के साथ भयानक त्रासदी घटती है. किसी की आंख चली गई, तो किसी की बांह नहीं रही, तो किसी की टांग. किसी के हाथ की उंगली/उंगलियॉं कट गईं, तो किसी के पैर का अंगूठा. किसी के माथे पर कटे का निशान है, तो किसी के गाल पर, तो किसी की ठोड़ी पर. किसी का होंठ कटा है, तो किसी के दांत टूटे हैं. हाथों पर कटे-फटे-जले के निशान तो जैसे आम बात हो.

किसी भी मज़दूर बस्ती में चले जाइए, औद्योगिक दुर्घटनाओं के निशानों की मज़दूरों के शरीरों पर भरमार मिलेगी. इन दुर्घटनाओं में जो अपनी ज़िंदगियां गंवा देते हैं, उनके परिवार वालों, साथियों के दिलों में इन दुर्घटनाओं के निशान नासूर की तरह ही दुखते हैं.

ऐसा नहीं है कि मज़दूरों के साथ ऐसी दुर्घटनाएं सिर्फ़ भारत जैसे विकासशील देशों में ही होती हैं. 2021 की 27 नवंबर को रूस के साइबेरिया की एक कोयला खदान में लगी आग से 52 मज़दूरों और बचावकर्मियों की मौत हो गई थी. पिछली सदी की दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना – भोपाल गैस कांड – के ज़ख़्म अभी ही हरे हैं.

औद्योगिकीकरण ने औद्योगिक ख़तरों और दुर्घटनाओं में वृद्धि की है. थोड़ी-सी भी लापरवाही के कारण किसी भी समय दुर्घटना घट सकती है. भारी पहियों के नीचे किसी मज़दूर का कचूमर निकल जाता है, तो कहीं मज़दूर उबलते हुए किसी तरल पदार्थ में गिर पड़ता है या क्रेन टूट जाने से एक साथ कई मज़दूर दबकर मर जाते हैं या बॉयलर फट जाता है और मज़दूरों के चिथड़े उड़ जाते हैं, या आग लग जाती है और मज़दूर ज़िंदा जल जाते हैं. ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए हादसों को रोकने वाले प्रबंधों की ज़रूरत होती है.

लेकिन पूंजीपतियों की मुनाफ़े की हवस के कारण सुरक्षा के प्रबंधों की ओर उचित ध्यान नहीं दिया जाता. ज़रूरी ख़र्च नहीं किया जाता. पूंजीपति मज़दूरों को कीड़े-मकोड़े, मशीनों के पुर्जे समझते हैं. इस संबंध में श्रम क़ानूनों का पालन भी नहीं किया जाता. कारख़ाना क़ानून 1948 के प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. सरकारें और प्रशासन इस क़ानून को लागू कराने के लिए कोई कार्रवाई नहीं करते हैं. पुलिस हादसों के लिए जि़म्मेदार पूंजीपतियों को सज़ा दिलाने के लिए कार्रवाई नहीं करती. मौजूदा समाज की पूरी आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, जिसका ख़ामियाज़ा मज़दूरों को भुगतना पड़ रहा है.

पूंजीपतियों द्वारा, सुरक्षित न होने पर भी मज़दूरों से मशीनें चलवाई जाती हैं, क्योंकि उन्हें ठीक करवाने के लिए पैसा ख़र्च करना पड़ेगा. पॉवरप्रेस और अन्य मशीनों पर से आमतौर पर लगे हुए सेंसर हटा दिए जाते हैं, क्योंकि सेंसर से मशीन की रफ़्तार धीमी हो जाती है. मज़दूरों को ज़्यादा-से-ज़्यादा तेज़ी के साथ, यहां तक कि थकावट-बीमारी की हालत में भी काम करने के लिए मजबूर किया जाता है.

ऐसे ही हालातों में दुर्घटनाएं होती हैं. अनेकों हादसों में यह बात सामने आई है कि मालिक चलते हुए कारख़ाने के दौरान ही गेट को बाहर से ताला लगाकर अपने घर चले जाते हैं. ऐसे में आग लगने की हालत में मज़दूरों के बचके निकलने का कोई रास्ता नहीं बचता. अवैज्ञानिक तरीक़ों से खनन किया जाता है, पहाड़ों से ख़तरनाक छेड़छाड़ की जाती है.

सस्ती-से-सस्ती, जल्द-से-जल्द, ज़्यादा-से-ज़्यादा उत्पादन के लिए मज़दूरों-कारीगरों का प्रशिक्षण, आवश्यक कौशल से समझौता किया जाता है. अकुशल मज़दूरों तक को बॉयलर, गैस टैंकर आदि चलाने-संभालने जैसे काम तक करने को दे दिए जाते हैं. नतीजा भयानक दुर्घटना के रूप में सामने आता है.

कुल मिलाकर मौजूदा पूंजीवादी समाज में रोज़ाना होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाएं नासूर बन चुकी हैं. इनके ख़िलाफ़ मज़दूरों को जागरूक और संगठित करना होगा. कारख़ानों में सुरक्षा के इंतज़ामों के लिए संघर्ष करना पड़ेगा. यदि मज़दूर एकजुट होकर संघर्ष करते हैं, तो अवश्य ही बहुत सारे सुधार करवाए जा सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि भयानक औद्योगिक हादसों से समाज को छुटकारा दिलाने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को मौत की नींद सुलाना पड़ेगा.

  • विमला (मुक्ति संग्राम से)

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