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मोदी के प्रचार अभियान की विशेषताएं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 26, 2022
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मोदी के प्रचार अभियान की विशेषताएं
मोदी के प्रचार अभियान की विशेषताएं
जगदीश्वर चतुर्वेदी

मोदी का प्रचार अभियान रेसकार में भाग लेने वाली कार की तेज गति से चला रहे हैं. यह कार इतनी तेज गति से दौड़ती है कि इसमें एक्सीडेंट भी उतना ही तेज होता है जितना तेज वह दौड़ती है. यह एक तरह का इनफार्मेशन शॉक पैदा करती है. मोदी ने भी यही किया है. उसने अनेक को इनफार्मेशन शॉक दिया है.

मोदी ने जिस गति से गुजरात को चलाया है उसमें कार रेस की तरह लगातार तगड़े एक्सीडेंट होते रहे हैं, किंतु उनके एक्सीडेंट की खबरें तो खबरें ही नहीं बन पायीं क्योंकि कार रेस का एक्सीडेंट कोई खबर नहीं होता बल्कि उसे सामान्य एक्सीडेंट के रूप में पेश किया जाता है. उसे सामाजिक खतरा नहीं माना जाता.

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मोदी के शासन में जिस तरह की कार रेस चली है उसने यह बोध निर्मित किया है कि मोदी से कोई सामाजिक खतरा नहीं है क्योंकि मोदी हाइपररीयल है, कार रेस का हिस्सा है. कार रेस में एक्सीडेंट होना सामान्य बात है, इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है.

मोदी की हाइपरीयल राजनीति की विशेषता है कि किसी को भी नहीं मालूम होता कि सूचनाएं जनता में कैसे जा रही हैं. हम सब जानते हैं कि कोई रिमोट कंट्रोल है, जो सूचनाओं और प्रचार को नियंत्रित कर रहा है किंतु कौन है इसका किसी को पता नहीं है. मोदी का नया रूप ट्रांसप्लांटेशन की पद्धति की देन है.

अभी तक हम संप्रेषण के जिस रूप के आदी थे वह रूप परिवहन और संचार के जरिए प्राप्त हुआ था. ठोस रूप हुआ करता था. किन्तु, पीएम मोदी हाइपररीयलिटी की देन है. उनका संप्रेषण ट्रांसप्लांटेशन की देन है. मुखौटा संस्कृति की देन है. वह वास्तव समय और स्थान के साथ जल्दी एकीकृत हो जाता है.

मोदी की हाइपररीयल प्रचार रणनीति मूलत: मैग्नेटिक निद्राचारी की रणनीति है. हाइपररीयल प्रौपेगैण्डा वातावरण बनाता है. यह निर्मित वातावरण है, स्वाभाविक वातावरण नहीं है. इसमें दाखिल होते ही इसकी भाषा बोलने के लिए मजबूर होते हैं. इसके स्पर्श में बंधे रहने के लिए अभिशप्त होते हैं.

एक बार इस वातावरण में दाखिल हो जाने के बाद वही करते हैं जो वातावरण निर्देश देता है. आप बातें नहीं करते, बहस नहीं करते सिर्फ निर्मित वातावरण के निर्देशों के अनुसार काम करते हैं. इस क्रम में धीरे-धीरे आपकी चेतना भी बदलनी शुरू हो जाती है. इसी को चुम्बकीय प्रचार अभियान का जादुई असर कहते हैं. इसी को ‘मोदी लहर’ और ‘मोदीमीनिया’ कहते हैं.

मोदी की मीडिया लहर एक तरह का ‘माइक्रोवेब डिसकम्युनिकेशन’ है. इलैक्ट्रिक संवेदना और भावों का निर्माण है. इसमें आंकड़े चकाचौंध करने वाले हैं. भाषण भ्रमित करने वाले हैं. प्रौपेगैण्डा के जरिए ‘सिंथेटिक कल्ट’ पैदा किया गया है. इसके परिणामस्वरूप बौने लोग बड़े नजर आने लगते हैं. महानायक नजर आने लगते हैं. यही वजह है कि बिना किसी ठोस सकारात्मक योगदान के बिना मोदी महानायक नजर आ रहा है.

मोदी की रणनीति है सोचो मत मानो ! बोलो मत मुझे कहने दो ! सच वह है जो मैं कहता हूं ! इस भावबोध को उसने कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों से उपजे असंतोष के आख्यानों में लपेटकर गले उतारने की कोशिश की है.

मोदी की मीडिया रणनीति यह है कि मैं मैदान में हूं तो सिर्फ़ मेरे बारे में सोचो ! इसके लिए सबसे पहले मीडिया में समय और स्थान को घेरा गया, फिर बहसों को टीवी टाॅक-शो के ज़रिए अपदस्थ किया गया. फलत: चुनाव हो रहा है लेकिन ज़मीनी स्तर पर बहस नहीं हो रही. मीडिया निर्मित मोदी फेक है और उसे ही असली सच मानने के लिए बाध्य किया जा रहा है.

मीडिया निर्मित संघी सच ही एकमात्र सच है ! मीडिया के पब्लिक शो में संघी सच से भिन्न बोलोगे तो सुनियोजित जत्थों के हमलों और हंगामेबाजी के लिए तैयार रहो. मोदी सच के अलावा सार्वजनिक जीवन में अन्य सच कहोगे तो पिट सकते हो. बोलना है तो मोदी के पक्ष में बोलो वरना गाली खाओ, चांटे खाओ, कालिख झेलो, लात खाओ !

यानी मोदी की मीडिया प्रस्तुतियों के पूरक के तौर पर हर गली – मुहल्ले में संघ के आक्रामक जत्थे परंपरागत आतंक भाव के साथ सक्रिय हैं. यही वजह है कि एक तरफ़ मीडिया आक्रमण दूसरी ओर संघ के ‘ख़ाकी बटुकों’ के शारीरिक हमले जारी हैं.

नरेन्द्र मोदी की लहर ने एक काम किया है उसने ग़ैर-समस्यामूलक मध्यवर्गीय मन को आकर्षित किया है. जो लोग समस्याओं की जटिलताओं और देश के परिप्रेक्ष्य में सोचने के आदी नहीं हैं, उनको मोदी के मीडिया प्रचार ने आकर्षित किया है. नव्य-आर्थिक उदारनीति ने बड़े पैमाने पर जिस मध्यवर्ग की मनोदशा बनायी थी, उसका नायक मनमोहन न होकर मोदी है.

मनमोहन नीति ने ‘खाओ पीओ मौज करो’ की मनोदशा पैदा की, साथ ही परजीविता को मूल्यवान बनाया. इस परजीविता का मोदी ने बड़ी चतुराई के साथ दोहन किया है और परजीविता को आश्वासन दिया है – तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हारा काम करुंगा.’

परजीविता को विकास की चाशनी में कुछ इस तरह परोसा गया है कि सब कह रहे हैं मोदी मीठा है ! परजीविता और समस्याहीन मन का इस क़दर दोहन पहले कभी नहीं हुआ था. अब गौतम अदानी कह रहे हैं देस में कोई भूखा नहीं सोएगा. पूछो अदानी किस हैसियत से बोल रहा है ? देस को सरेआम सत्ता की मदद से लूटने वाला शख्स यह सब बोल रहा है. यानी भुखमरी आपके घर आने वाली है. आप मोदी को वोट दें, अदानी आपको राशन देगा. अदानी दानी, आप भिखारी और मोदी जी भिखारी और अदानी के संरक्षक.

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