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मंदिर-मस्जिद विवाद गुलामी की निशानी है – गांधी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 29, 2022
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मंदिर-मस्जिद विवाद गुलामी की निशानी है - गांधी
मंदिर-मस्जिद विवाद गुलामी की निशानी है – गांधी

अंग्रेजों की जासूसी संस्था (आरएसएस) का बच्चा संगठन भाजपा पिछले आठ साल से देश की सत्ता पर काबिज है. इस संगठन का मुख्य कार्य है देश के बहुसंख्यक समुदाय को, जिसमें शुद्र, महिलाएं, आदिवासी और अल्पसंख्यक आते हैं, को शिक्षा से दूर करना. इसके लिए भाजपा शासित केन्द्र सरकार की ओर से दो प्रधान कार्य हाथ में लिये गये हैं –

पहला, इन बहुसंख्यक समुदाय की पहुंच वाले शिक्षण संस्थानों को बंद करना, अगर तत्काल बंद न कर सके तो बदनाम करना ताकि फिर भी बंद किया जा सके. दूसरा, मस्जिद के नीचे मंदिर ढ़ूंढ़ना और ‘मस्जिद गिराओ, मंदिर बनाओ’ अभियान लगातार चलाते रहना ताकि बुनियादी समस्याओं से लोगों का ध्यान हटाये रखा जा सके. हलांकि इन्हीं मंदिरों के आगे इन शुद्रों, महिलाओं, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का प्रवेश निषेध का बोर्ड भी टंगा होता है.

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मस्जिद के नीचे मंदिर तलाशने की इस संघी कोशिश कोई आज की बात नहीं है, यह सौ साल पुरानी कोशिश है, दरअसल, ब्राह्मणवादियों ने अपने सम्पूर्ण अस्तित्व काल में समाज को गुलामी देने के अतिरिक्त और कोई भी काम नहीं किया है, जिस कारण लज्जित यह ब्राह्मणवादियों ने पिछले सौ साल में एक नया हथकंडा अपनाया है, वह है तमाम प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों पर अपना कब्जा सिद्ध करना, जिसके लिए फर्जी इतिहासकारों द्वारा फर्जी इतिहास लिखवाया जा रहा है.

इस फर्जी इतिहास का दुश्चक्र इस हालत में पहुंच गया है कि पौराणिक साहित्यिक ग्रंथों मसलन, रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, वेदों में भी छेड़छाड़ कर इतिहास बदलने का कार्य बकायदा सरकारी स्तर पर किया जा रहा है, ताकि लोक स्थापित गाथाओं के माध्यम से इन बहुसंख्यक तबकों को शिक्षा से दूर किया जा सके, और इसके लिए मस्जिद के नीचे मंदिर ढ़ूंढने का कार्य तेज किया जा रहा है.

मस्जिद के नीचे मंदिर ढूंढने की इस परंपरा पर महात्मा गांधी का अपना विचार है, जिसे उन्होंने ‘गुलामी का प्रतीक’ बताते हुए 1937 ई. में एक पत्र के माध्यम से श्रीराम गोपाल ‘गोयल’ को भेजा था. इस पत्र को तत्कालीन अखबार नवजीवन ने 27 जुलाई, 1937 ई. में छापा था. उस पत्र में प्रकाशित मजमून के अनुसार –

किसी भी धार्मिक उपासना गृह के ऊपर बलपूर्वक अधिकार करना बड़ा जघन्य अपराध है. मुगलकाल में धार्मिक धर्मांधता के कारण मुगल शासकों ने हिंदुओं के बहुत से धार्मिक स्थानों पर कब्जा कर लिया, जो हिंदुओं के पवित्र आराधना स्थल थे. इनमें से कई को लूटा गया और कई को मस्जिदों में तब्दील कर दिया गया. हालांकि मंदिर और मस्जिद दोनों ही भगवान की पूजा करने के पवित्र स्थल हैं और दोनों में कोई अंतर नहीं है. मुसलमानों और हिंदुओं के पूजा करने का तरीका अलग है.

धार्मिक नजरिए से देखें तो मुस्लिम कभी यह बर्दाश्त नहीं करेंगे कि हिंदू उस मस्जिद में लूटपाट करें, जहां वह इबादत करते हैं. इसी तरह हिंदू भी यह बर्दाश्त नहीं करेंगे कि जहां वह राम, कृष्ण, विष्णु और अन्य भगवानों की पूजा करते हैं, उसे ध्वस्त कर दिया जाए. जहां भी ऐसी घटनाएं हुई हैं, वे गुलामी की निशानी हैं. जहां विवाद हैं, हिंदू और मुस्लिमों को आपस में इनको लेकर तय करना होगा. मुसलमानों के वे पूजा स्थल जो हिंदुओं के कब्जे में हैं, हिंदुओं को उन्हें उदारता से मुसलमानों को देना चाहिए. इसी तरह हिन्दुओं के जिन धार्मिक स्थलों पर मुसलमानों का कब्जा है, उन्हें खुशी-खुशी हिन्दुओं को सौंप देना चाहिए. इससे आपसी भेदभाव दूर होगा और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता बढ़ेगी, जो भारत जैसे देश के लिए वरदान साबित होगी.

गांधी ने अपने इस संक्षिप्त पत्र में मंदिर-मस्जिद विवाद के बीच एक शानदार समाधान सुझाया है, जिसका इमानदारी से पालन होना चाहिए. लेकिन मौजूदा संघी निजाम भारतीय राजसत्ता का अवैध इस्तेमाल करते हुए हर मस्जिद के नीचे मंदिर तलाश कर रहा है और न्यायालय पर अपने दल्लों को बिठाकर खुदाई करवाने की कुचेष्टा कर रहा है ताकि देश में साम्प्रदायिक तनाव पैदा कर शिक्षा को खत्म किया जा सके.

यह मंदिर-मस्जिद विवाद तब पैदा किया जा रहा है जबकि पूर्ववर्ती सरकार ने बकायदा संसद में कानून बनाया है कि किसी भी ऐतिहासिक धरोहरों में छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता है. विदित हो कि संघ-भाजपा भारत के किसी भी कानून को नहीं मानता है और न ही किसी संवैधानिक संस्थाओं को. यहां तक कि वह भारत के संविधान को भी नहीं मानता है. ऐसे में विवाद पैदा करने के लिए उसपर कोई अंकुश नहीं लगा सकता है, सिवाय आम जनता के.

मोदी के दक्षिणपंथी अतीतजीवी सत्ता के आगे नतमस्तक हो चुके देश के संवैधानिक संस्थाओं के इस अंधकारपूर्ण में आम जनता को मशाल जलाना होगा. जागरूकता के केवल इस मशाल की रौशनी ही देश को नई दिशा दे सकती है और सत्ता के आगे नतमस्तक हो चुके रीढ़विहीन संवैधानिक संस्थाओं को खड़ा होने की हिम्मत मिल सकेगी.

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