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Home पुस्तक / फिल्म समीक्षा

‘दी सेंटीपीड’ : आज के दौर के ‘दुःस्वप्न’ का यथार्थ…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 15, 2022
in पुस्तक / फिल्म समीक्षा
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दी सेंटीपीड'

‘दी सेंटीपीड’ : आज के दौर के ‘दुःस्वप्न’ का यथार्थ…’

‘एक सपने में मैंने देखा कि सड़क पर खून फैला हुआ है और एक व्यक्ति जिसने महंगा सूट व सभी उंगलियों में हीरे की अंगूठी पहनी हुई है, वह ताज़े करेंसी नोटों से इस खून को ढंक रहा है.’

यह पावरफुल बिम्ब ‘ब्रेव् न्यू इंडिया’ की तस्वीर है. और इसी की कहानी कहता है यह उपन्यास ‘दी सेंटीपीड’ (The Centipedes). पीयूष श्रीवास्तव का यह उपन्यास पिछले साल ‘Notion Press’ से छपा है.

यह उपन्यास शुरू में एक राजनीतिक निबंध की तरह शुरू होता है लेकिन धीरे-धीरे अपनी गति पकड़ता है और उस ‘ताकतवर’ क्लास की कहानी बहुत बेबाकी से कहता है, जो न सिर्फ भ्रष्ट है बल्कि ‘मिडास टच’ (Midas touch) की तरह जिसे भी छूता है, उसे अनिवार्यतः भ्रष्ट बना देता है.

‘फूको’ द्वारा बार-बार दोहरायी गयी उक्ति याद आ जाती है- ‘Power corrupts and Absolute power corrupts absolutely.’ लेकिन यहां पावर भ्रष्ट ही नहीं करती, बल्कि अमानवीय (dehumanize) भी बनाती है. ‘बद्रेश्वर’ की कहानी इसका उदाहरण है जो उपन्यास की मुख्य विषयवस्तु भी है. यह कहानी वास्तव में ‘निर्भया कांड’ की कहानी है, जिसे लेखक छुपाने का प्रयास भी नहीं करता.

‘बद्रेश्वर’ की कहानी कहते हुए लेखक बेहद सजग है और यह साफ उभर कर आता है कि ‘बद्रेश्वर’ का ‘मेटामारफोसिस’ (metamorphosis) इसी व्यवस्था के चंगुल में घटित होता है. यह स्पष्टता बनी रहे, इसके लिए लेखक लिख भी देता है – ‘…Who had unwittingly become the victim of monsters.’

ऐसे कम उपन्यास होते हैं, जो अपने शीर्षक से भी कहानी में एक अर्थ भर रहे होते हैं. ‘सेंटीपीड’ यानी कनखजूरा के दर्जनों पैर होते है. 2-4 पैर यदि क्षतिग्रस्त हो भी गए तो भी उसे आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता.

आज जो सत्ता में है, उसके पीछे जिस संगठन की ताकत है, उसके भी दर्जनों पैर हैं. उसके बारे में किसी ने लिखा था कि वह समाज में एक संगठन नहीं है, बल्कि समाज का संगठन है. सत्ता में आने से पहले उसकी बेचैनी को लेखक ने बहुत पावरफुल तरीके से यों रखा है – ‘like the desperate movement of a centipede in the gutter.’

पूरी कहानी एक पत्रकार के नज़रिए से बयां की गयी है, इसलिए यहां पत्रकारिता की दुनिया के उन अंधेरे कोनों पर भी रोशनी पड़ती है, जिसके बारे में आम लोगों को आमतौर पर जानकारी नहीं रहती.
अखबार के मालिक का यह कहना कि ‘उसे संपादक की कुर्सी पर ‘हिजड़े’ चाहिये’, सिहरन से भर देता है. बिना ज्यादा कुछ कहे लेखक अखबार के मालिकों का गलीजपन पाठक के सामने ला देता है.

पूरे उपन्यास में लेखक काफी सजग है. उसकी वैचारिक सजगता इस ‘ब्रेव् न्यू वर्ल्ड’ के रंगीन कालीन को उठा कर उसके अंदर की गंदगी को देखने का साहस मुहैया कराती है, लेकिन एकाध जगह लेखक चूक भी गया है. जाहिर है, वहां थोड़ी निराशा होती है.

पृष्ठ 32 पर जब लेखक यह कहता है कि पहले जो आतंकवाद जम्मू-कश्मीर, नॉर्थईस्ट तक सीमित था, अब वह पूरे भारत में पसर रहा है, तो वह अनजाने ही आतंकवाद और वहां चल रहे राष्ट्रीयता के आंदोलन की स्पष्ट सीमारेखा को धुंधला कर देता है.

इसी तरह पेज 102 पर लेखक पहले यह वस्तुगत सूचना देता है – ‘My editor was a homosexual.’ उसके बाद उसके उस व्यवहार का विवरण देता है, जिसके कारण लेखक ने उसे थप्पड़ जड़ दिया. यहां अनजाने ही लेखक उसके आपत्तिजनक व्यवहार के लिए उसके सेक्सुअल ओरिएंटेशन (sexual orientation) को जिम्मेदार ठहरा रहा है, जो कि गलत है. LGBTQ+ के आज के समय में यह और भी आपत्तिजनक है.

बहरहाल, अंत में लेखक इस ‘ब्रेव् न्यू वर्ल्ड’ की सदस्यता से ‘इस्तीफा’ दे देता है. अब वह किस दुनिया की सदस्यता लेगा ? यह पाठक के सामने भी एक खुला लेकिन महत्वपूर्ण सवाल है, जिसका जवाब उसे खुद ढूंढना है.

इसकी भाषा बहुत ही सरल और प्रवाहपूर्ण है. हम जैसे हिंदी पाठक बिना डिक्शनरी देखे पूरा उपन्यास एक सांस में पढ़ सकते हैं.

  • मनीष आजाद

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