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संशोधनवादी चीनी कम्युनिस्ट सत्ता द्वारा शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सड़कों पर चीनी जनता

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 5, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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संशोधनवादी चीनी कम्युनिस्ट सत्ता द्वारा शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सड़कों पर चीनी जनता
संशोधनवादी चीनी कम्युनिस्ट सत्ता द्वारा शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सड़कों पर चीनी जनता

चीन के पूंजीवादी शासकों द्वारा की गई 20वीं कांग्रेस के केवल एक महीने बाद ही आम जनता का ग़ुस्सा फूट पड़ा. नवंबर 2022 के आख़िरी हफ़्ते, हेनान राज्य के झेंगझोउ शहर में मौजूद फ़ॉक्सकान महा-कारख़ाने में मज़दूरों और पुलिस के बीच ज़ोरदार झड़प की ख़बर सामने आई, जिसके बाद मज़दूरों के इस संघर्ष के समर्थन में चीन के कई अन्य शहरों में बड़े विरोध प्रदर्शनों की ख़बरें आई हैं. टकराव की इन ख़बरों से स्पष्ट हो रहा है कि चीन में पूंजीवाद के गहराते संकट के ख़िलाफ़ वहां की मेहनतकश जनता ने सक्रिय होना शुरू कर दिया है.

मज़दूरों की भयंकर लूट के अड्डे – फ़ॉक्सकान कारख़ाने

हेनान में मौजूद फ़ॉक्सकान कारख़ाना असल में एक छोटा शहर है, जहां काम की तेज़ी के समय तीन लाख तक मज़दूर रहते हैं. इस दैत्याकार कारख़ाने में ही विश्व के 70% आइफ़ोन बनाने वाली कंपनी फ़ॉक्सकान के उत्पादों को असेंबल किया जाता है. यहां के मज़दूरों ने प्रति महीना 3,000 रेनमिनबी (चीनी मुद्रा) पर कंपनी के साथ समझौते किए थे, जिस पर इतना ही बोनस और मिलना था. पर जल्द ही फ़ॉक्सकान के प्रबंधकों ने दिए जाने वाले बोनस में हेरफेर करके इससे अपना पल्ला झाड़ा लिया.

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इस वेतन चोरी के ख़िलाफ़ स्थानीय मज़दूरों का ग़ुस्सा बढ़ने लगा और वे 22 नवंबर को प्रबंधकों के इस फै़सले के ख़ि‍लाफ़ इकट्ठा हुए, लेकिन उनके विरोध प्रदर्शन पर कारख़ाने के सुरक्षा गार्डों ने बर्बर लाठीचार्ज किया, जिसके बाद हालात बेक़ाबू हो गए. मज़दूरों ने भी जवाबी हमला किया. हालात बिगड़ते देख स्थानीय पुलिस बुलाई गई, लेकिन जब वह भी हालात क़ाबू में नहीं कर पाई तो आस-पास के शहरों से भारी संख्या में फ़ौज बुलाकर मज़दूरों का संघर्ष कुचला गया.

मज़दूरों के आक्रोश के बाद फ़ॉक्सकान प्रबंधकों ने थोड़ी ढील देते हुए मज़दूरों को 10,000 रेनमिनबी बोनस देना स्वीकार किया. यह मज़दूरों के संघर्ष की आंशिक कामयाबी थी. फ़ॉक्सकान के मज़दूरों की संघर्ष की चिंगारी आग की तरह चीन के अन्य शहरों में भी फैल गई. इस संघर्ष ने दिखा दिया कि कैसे अपने जायज़ अधिकारों के लिए संघर्ष करके मज़दूरों ने कुछ अधिकार हासिल किए हैं. साथ ही इसने कम्युनिस्टों के भेष में छुपे हुए पूंजीपतियों के सेवकों के चेहरे भी चीन के मज़दूरों-मेहनतकशों के सामने नंगे कर दिए.

कोरोना प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ आक्रोश

मज़दूरों-मेहनतकशों को क़ाबू में करने के लिए चीन के शासकों द्वारा थोपी गईं कोरोना पाबंदियों के ख़िलाफ़ चीन की मेहनतकश जनता का आक्रोश तब बेक़ाबू हो गया, जब ज़िनज़ियांग राज्य की राजधानी उरुमकी में 24 नवंबर को एक इमारत में आग लगने के कारण 10 मज़दूरों की मौत हो गई. कुछ लोगों के मुताबिक़ मरने वालों की संख्या इससे ज़्यादा है. इस दर्दनाक घटना के लिए लोगों ने स्थानीय प्रशासन की कोरोना पाबंदियों की नीति काे दोषी बताया, जिसके कारण मज़दूर एक ही इमारत में ठुसे हुए थे और राहत कार्य टीम को भी घटना स्थल पर पहुंचने में देर लगी.

प्रशासन की लापरवाही के ख़िलाफ़ ऑनलाइन शुरू हुआ यह आक्रोश जल्द ही सड़कों पर भी फैल गया, जिसकी शुरुआत कुछ ही लोगों द्वारा प्रशासन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से हुई. जल्द ही घटना स्थल के बाहर सैकड़ों और फिर हज़ारों की संख्या में इकट्ठा हुए लोगों ने प्रशासन की इस दमनकारी नीति के ख़िलाफ़ बोलना शुरू कर दिया. मारे गए मज़दूरों की याद में चीन के अन्य शहरों में शोक सभाओं के अलावा ज़बरदस्त रोष प्रदर्शन भी किए गए.

जानकारी के मुताबिक़ नानजिंग, चोंगक्विंग, चेंगदू, शंघाई, ग्वांगझू, वुहान और बीजिंग में ऐसे रोष प्रदर्शन हुए. इस अन्याय के ख़िलाफ़ नौजवानों में भी ग़ुस्सा सुलग रहा था. इसी चीन के 15 राज्यों के 79 उच्च शिक्षा संस्थानों में इस घटना के बाद रोष प्रदर्शन किए गए, जिनमें से 14 केवल राजधानी बीजिंग में हुए बताए जाते हैं.

चीन का गहराता आर्थिक संकट

चीन में मज़दूरों में फैल रही बेचैनी की जड़ का कारण इसकी ग़ैर-बराबरी पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था है. चाहे पूंजीवाद के ‘चीनी माॅडल’ को कामयाब मॉडल के तौर पर दिखाया जाता है, पर असल में यह मॉडल भी उसी तरह मुनाफे़ और ग़ैर-बराबरी पर खड़ा पूंजीवादी मॉडल है, जैसा पश्चिमी देशों में मौजूद है. बल्कि चीन में भी अब वही आर्थिक संकट दस्तक दे रहा है, जिस संकट से आज सारा पूंजीवाद लड़ रहा है.

2020 से पहले ही यह बड़ा सवाल बन गया था कि जो चीन दशकों से 10% से भी ज़्यादा वृद्धि दर हासिल करता आ रहा था, वह केवल 5% दर भी प्राप्त नहीं कर सकेगा ? और अब हक़ीक़त यह है कि चीन के शासकों को 5% से भी कम वृद्धि दर पर सब्र करना पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2023 के लिए चीन की वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 4.4% और ख़ुद चीन के विभाग काइज़िन ने 2022 के लिए केवल 2.2% और 2023 के लिए 4.6% का अनुमान लगाया है.

अब चीन की वृद्धि दर भी अगर पश्चिमी पूंजीवादी देशों की तरह 2-3% तक ही रहती है, तो इसका सीधा मतलब होगा – चीन में बड़े स्तर पर मज़दूरों की छंटनी और ग़ैर-बराबरी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की साख को बड़ा झटका. गिरता आर्थिक विकास और क़र्ज़ चीन की अर्थव्यवस्था के लिए आज बड़ी चुनौती है. गुज़रे साल सामने आया एवरग्रांडे का क़र्ज़ संकट चीनी अर्थव्यवस्था में बढ़ रहे गंभीर क़र्ज़ संकट की केवल एक छोटी-सी तस्वीर थी. नवंबर 2022 तक चीन में कुल क़र्ज़ इसके कुल घरेलू उत्पादन का 230% हो चुका है.

पिछले दशक से चीन का आर्थिक विकास ज़्यादा-से-ज़्यादा रियल इस्टेट क्षेत्र पर निर्भर होता गया है, लेकिन आज इस क्षेत्र में भी क़र्ज़ दर 75% हो चुकी है. यानी लगभग उतना ही क़र्ज़ जितना 2008 में संयुक्त राज्य अमेरिका (आगे केवल अमेरिका) के आर्थिक संकट के समय उसके रियल इस्टेट बाज़ार का था. घरों की बिक्री घटने के कारण कई कंपनियां पिछले साल दिवालिया हो चुकी हैं. इसके चलते इन कंपनियों को ज़मीन बेचकर मोटी कमाई करने वाली स्थानीय सरकारों की कमाई बुरी तरह प्रभावित हुई थी.

एक समय में, चीन के इस प्राॅपर्टी बाज़ार ने संसार को 2008 की आर्थिक मंदी से वक़्ती तौर पर उभरने में मदद की थी, पर अब यह खुद ही चीन के लिए सरदर्दी बन गया है. पूंजीवादी व्यवस्था के चलते बढ़ते क़र्ज़ और आर्थिक संकट से कोई छुटकारा नहीं मिल सकता, चाहे राजनीतिक तौर पर कितनी भी केंद्रीकृत व्यवस्था खड़ी की जाए.

संघर्षों भरे भविष्य का संकेत

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नया कार्यकाल अमेरिका से इसकी बढ़ती कलह के बीच शुरू हो रहा है. अमेरिका द्वारा चीन के तकनीकी उद्योग पर चोट करने के लिए अक्टूबर 2022 से माइक्रोचिपों पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसके जवाब में चीन माइक्रोचिपों के क्षेत्र में निर्भरता ख़त्म करने के लिए बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है. तकनीक पूर्ति पर पश्चि‍म पर निर्भरता को ख़त्म करने की चीन की कोशिश इसकी आम पश्चिमी निर्भरता से ख़ुद को अलग करने की ही कोशिश का हिस्सा है.

इस तरह कूटनीति के स्तर पर ज़ी कार्यकाल में चीन अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी साम्राज्यवादी कूटनीति के ख़िलाफ़ ज़्यादा तीखा होता नज़र आ रहा है. मतलब अमेरिका और चीन दोनों महाशक्तियों की राजनीति यही कह रही है कि दो साम्राज्यवादी गुटों के बीच अस्थाई समझौते का दौर बीत चुका है और हर दिन दोनों की कलह ज़्यादा तीखी, ज़्यादा ख़ुुख़्वार होती जाएगी, जो एक तरफ़ आर्थिक और फ़ौजी युद्धों के रूप में विश्व-भर के मेहनतकशों पर क़हर बरपाएगी और वहीं यह कलह अपने-अपने देशों के मज़दूरों-मेहनतकशों की ज़्यादा-से-ज़्यादा लूट करेगी.

इसलिए आने वाले समय में चीन का मज़ूदर वर्ग भी इस बढ़ती साम्राज्यवादी कलह और दमनकारी हो रही चीन की हुकूमत का शिकार बनेगा. मज़दूरों के इस ताज़ा आक्रोश ने चीन के विकास का ढक्कन उठाकर यह दिखा दिया कि चीन का आर्थिक विकास वहां के करोड़ों मेहनतकशों की भयंकर लूट पर टिका हुआ है. चीन के पिछले चालीस सालों के पूंजीवादी विकास ने विश्व के सबसे बड़े और क्रांतिकारी मज़दूर वर्ग को पैदा किया है, जिसकी संख्या करोड़ों में है. और अब यह ताक़त उठने लगी है, जिसके कारण चीन के पूंजीवादी शासकों के लिए तो नई चिंता शुरू हो गई है, लेकिन दुनिया-भर की मेहनतकश जनता के लिए यह एक बेहतर भविष्य की उम्मीद की किरण है, एक स्वागतयोग्य क़दम है.

  • मानव (मुक्ति संग्राम)

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