Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home ब्लॉग

सड़क और पुलिसिया कैम्प निर्माण के खिलाफ आदिवासियों के आंदोलन पर पुलिसिया कहर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 4, 2023
in ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
सड़क और पुलिसिया कैम्प निर्माण के खिलाफ आदिवासियों के आंदोलन पर पुलिसिया कहर
सड़क और पुलिसिया कैम्प निर्माण के खिलाफ आदिवासियों के आंदोलन पर पुलिसिया कहर . तस्वीर – लिंगाराम कोडोपी से साभार

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में पेटी ठेकेदार समेत 4 लोग पिछले 9 दिन से लापता हैं. बताया जा रहा है कि ये सभी सड़क निर्माण के काम में लगे हुए थे. इन सभी का 24 दिसंबर से अब तक कोई सुराग नहीं मिला है. बताया जाता है कि भाकपा माओवादी का सैन्य विभाग पीएलजीए के प्लाटून ने इनको गिरफ्तार कर लिया है. ऐसी आशंका जताई जा रही है. खबरों के अनुसार फिलहाल इस मामले की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

जानकारी के मुताबिक, कोंडागांव निवासी निमेंद्र कुमार दीवान और नीलचंद नाग, लोहंडीगुड़ा निवासी टेमरू नाग के साथ ही बारसूर निवासी चापड़ी बत्तैया लापता है. ये सभी गए 24 दिसंबर को जिले के भाकपा माओवादी के प्रभावित गोरना इलाके में गए थे, जिसके बाद वहां से लौटे ही नहीं. इनके परिजनों ने रविवार को मीडिया को इसकी जानकारी दी है.

You might also like

रोज़ गाय काटकर खाने वाला शैतान इजराइल दुनिया के पेट पर लात मारा है !

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

अब इनके परिजन भाकपा माओवादी से अपील कर रहे हैं कि ‘यदि उनके परिवार के सदस्य उनके के कब्जे में हैं तो वे उनकी सकुशल रिहाई कर दें.’ सोचिये जरा, कितनी आसानी से इनके परिजन भाकपा माओवादी से अपील कर रहे हैं, मीडिया इनकी रोती सुरतो को छाप रहा है, अगर यही लोग पुलिस के कब्जे में होता तो क्या इनकी इतनी हिम्मत होती कि वह पुलिस से अपील कर पाती ? इतना ही नहीं मीडिया को भी इतनी हिम्मत होती कि वह रोती सूरतों की तस्वींरें छाप पाता ?

इसी इलाके में कुछ दिन पूर्व सड़क निर्माण के काम का जायजा लेने के लिए पहुंचे सब इंजीनियर और उनके साथ विभाग के प्यून को पीएलजीए के गुरिल्लों ने गिरफ्तार कर लिया था. 12 नवंबर की देर शाम भाकपा माओवादी ने प्यून को रिहा कर दिया. रिहा हुए प्यून ने बताया कि ‘रात लगभग 8:30 बजे उसे लौकी की सब्जी और भात (चावल) खिलाया था. आंखों में पट्टी बांध कर यहां वहां घुमाते रहे. उसके बारे में पूछताछ भी की लेकिन किसी तरह से उसे प्रताड़ित या फिर पीटा नहीं गया था.’ क्या आप यही व्यवहार की उम्मीद पुलिसिया गिरोह से कर सकते हैं कि बिना अपशब्द कहे, खाना खिलाये और पीटे भी नहीं ?

सड़क और कैम्प निर्माण के खिलाफ आदिवासियों का आन्दोलन

अब आते हैं सड़क निर्माण के खिलाफ पिछले लगभग डेढ़ साल से शांतिपूर्ण आन्दोलन कर रहे आदिवासियों के सवाल पर. इसी बीजापुर जिले के ग्राम पंचायत बुर्जी में 7 अक्तूबर, 2021 से आदिवासी समुदाय के युवाओं द्वारा आंदोलन चलाया जा रहा है. इस आंदोलन की मांगों इस प्रकार है –

  1. अड्समेटा नरसंहार पर न्याय करने,
  2. गंगालूर से पुसनार नये रोड के निर्माण पर रोक लगाने,
  3. पुलिस कैम्प की स्थापना पर रोक,
  4. महिलाओं के साथ अत्याचार, हत्या और बलात्कार की घटनाओं पर रोक लगाने
  5. नक्सली बताकर आदिवासियों को फर्जी केसों में जेल में बंद करने और
  6. फर्जी एनकाउंटर पर रोक लगाने

इस बेहद ही शांतिपूर्ण आंदोलन पर ‘सुरक्षा’ बलों ने आदिवासियों पर बड़ा हमला कर दिया है. इस हमले में कई आदिवासी गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. तकरीबन 200 लोगों को चोटें आयी हैं जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. खबर के अनुसार, मूलवासी बचाओ मंच द्वारा संचालित इस आंदोलन पर इसी 15 दिसंबर की रात एक बजे डोजियर गाड़ी और जेसीबी समेत अन्य गाड़ियों के साथ पुलिसिया गिरोह मौके पर पहुंचे और आंदोलनकारियों को उकसाना शुरू कर दिया.

ग्रामीण व मूलवासी बचाओ मंच के अध्यक्ष सोनी पुनेम व उपाध्यक्ष बिन्तु उइके ने बताया कि फोर्स के पहुंचते ही आंदोलनकारी सुरक्षा बलों के वाहनों के सामने खड़े हो गए और उन्होंने पुलिसिया गिरोह से सवाल पूछना शुरू कर दिया कि आखिरकार जवान किस अधिकार के साथ गांव में कैम्प लगाने आये हैं ? गांव में न ग्राम सभा की बैठक हुई है और न ही किसी ने पुलिस कैम्प की मांग की है. ऐसे में बगैर अनुमति के सड़क का निर्माण कर नये पुलिस कैम्प को क्यों स्थापित किया जा रहा है ?

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि इसी बीच पुलिस के जवानों ने कुछ महिलाओं को धक्का मार दिया जिससे एक महिला गढ्ढे में गिर गई. महिला को गढ्ढे में गिरा देख कर आंदोलनकारी भड़क उठे और उन्होंने वाहनों को चारों तरफ से घेर लिया. आंदोलनकारी कुछ करते उससे पहले ही सुरक्षा बल के जवानों ने उन्हें खदेड़ना शुरू कर दिया. और इसके साथ ही जवानों ने लाठियों से आंदोलनकारियों की पिटाई शुरू कर दी, जिसमें एक लाठी ग्रामीण और मूलवासी बचाओ मंच के उपाध्यक्ष बिंतु उइके के सिर पर लगी और उनका सिर फूट गया और उससे खून की धार फूट पड़ी. चोट लगते ही वह जमीन पर गिर पड़े. इस घटना में उनके घुटने और कलाई में भी गहरी चोट आयी है.

आंदोलन में तकरीबन 1000 से 1200 तक लोग शामिल थे. पुलिस के दौड़ा-दौड़ा कर मारने व भगदड़ मचने से करीब 200 लोगों को चोटें आयी हैं. किसी का सिर फटा है तो किसी का घुटना छिल गया है. इस घटना में कुछ लोगों के पैर भी टूटे हैं. उनमें छोटू पुनेम, सुक्का पुनेम, सोना पुनेम, हुंगा कुंजाम, पोदीया पुनेम, सुकराम कुंजाम, मनकी कुंजाम, मुन्ना पुनेम, तुलसी पुनेम, सावित्री पोटम, मिटकी पोटम समेत कई लोग शामिल थे. खबर के अनुसार, ग्रामीणों ने बताया कि पुलिस की गोलियों के डर से ढेर सारे आंदोलनकारियों ने अपना घर छोड़ दिया है और वे जंगल में जाकर छिप गए हैं.

हालांकि पुलिस के इस बर्बर रवैये से भी आंदोलनकारियों के हौसले नहीं टूटे. भले ही रात के अंधेरे में आंदोलनकारियों को मार पीट कर धरना स्थल से हटा दिया गया था लेकिन उसके अगले ही दिन यानी 16 दिसंबर, 2022 को सुबह फिर से आंदोलनकारी उस स्थान पर जमा हो गए जहां से उनका आंदोलन चल रहा था. लोगों का कहना है कि फोर्स फिर आई और उसमें गंगालूर थाना इंचार्ज पवन वर्मा भी शामिल थे. आंदोलनकारियों की मानें तो थाना इंचार्ज ने कहा कि सड़क व नया पुलिस कैम्प स्थापित होकर रहेगा. उनके पास भारत सरकार का आदेश है. इतना बोलकर आंदोलनकारियों को संयुक्त फोर्स ने दौड़ाना शुरू कर दिया.

आखिर आदिवासी सड़क और कैम्प निर्माण का विरोध क्यों करते हैं ?

भारत सरकार आदिवासियों के ‘विकास’ के लिए कृतसंकल्पित है. वह आदिवासियों के ‘विकास’ के लिए पूरी ताकत झोंके हुए है. आदिवासी ‘विकास’ नहीं चाहते हैं और वह अपनी पूरी ताकत से इस ‘विकास’ को रोकने के लिए कृतसंकल्पित है. तब सवाल यही उठता है कि यह कौन सा और कैसा विकास है, जो भारत सरकार करना चाहती है और आदिवासी नहीं चाहते ?

आदिवासी क्षेत्रों में भारत सरकार के विकास का पैमाना है – सड़क और पुलिसिया कैम्प. सड़क इसलिए कि आदिवासियों के पहाड़ी इलाकों के नीचे खनिज संपदा का विशाल भंडार है. खनिज संपदा के दोहन के लिए सड़क चाहिए जिससे होकर इन निकाले गये खनिजों को बड़ी-बड़ी गाडियों में ढोकर देशी-विदेशी कम्पनियों को बेचकर यह कम्पनियां अकूत मुनाफा कमा सके. और पुलिसिया कैम्प इसलिए कि मुनाफा कमाने की इस मशीनरी की सुरक्षा सुनिश्चित हो.

आदिवासी इस ‘विकास’ का विरोध क्यों करते हैं ? तो जवाब है इसलिए कि सरकार के इस विकास में आदिवासी कहीं भी नहीं आते. मसलन,

  1. खनिज उत्खनन के लिए बड़े पैमाने पर आदिवासियों को उनके जमीन से खदेड़ दिया जाता है, और उनके पुनर्वास का कोई इंतजाम नहीं किया जाता.
  2. खनिज उत्खनन से निकले अपशिष्ट पदार्थों का कोई समायोजन नहीं किया जाता, जिससे उसके आसपास का हवा, पानी और जमीन बड़े पैमाने पर प्रदूषित होता है, जिससे बड़े पैमाने पर आदिवासी मौत के शिकार होते हैं
  3. उत्खनन और परिवहन कार्य में बाहर से आये लोगों द्वारा आदिवासियों की सम्पत्ति (मुर्गा, खस्सी वगैरह) छीन ले जाते हैं.
  4. बाहर से आने वालों के कारण आदिवासियों की संस्कृति पर सबसे घातक प्रभाव पड़ा है.
  5. आदिवासी युवतियों के साथ छेड़छाड़, बलात्कार की घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी दर्ज होती है, जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती क्योंकि इस कुकर्म में कैम्प लगाये पुलिसिया गिरोह की सबसे बड़ी भूमिका होती है.
  6. किसी प्रकार के विरोध करने पर सीधे हत्या कर दी जाती है, चाहे वह कैम्प के अंदर हो या बाहर.
  7. आदिवासियों के संगठित प्रतिरोध को सीधे माओवादी का नाम देकर क्रूरतापूर्ण हत्या इन तथाकथित सुरक्षा बलों द्वारा की जाती है.
  8. सबसे गौरतलब यह है कि आदिवासियों के विकास की सरकारी योजनाओं में स्कूल, अस्पताल, बिजली, पानी नहीं आता है, केवल और केवल सड़क और फौज आता है, इसके सिवा और कुछ भी नहीं.

ये तो चंद उदाहरण हैं, जिस कारण आदिवासी विरोध करते हैं. आदिवासी छोड़िये, हम शहरों यें रहने वाले क्या पुलिसिया गिरोह के कुख्यात कारनामों के बारे में नहीं जानते ? क्या हम नहीं जानते किस तरह यह पुलिसिया गिरोह लोगों को परेशान करता है, जहां शिक्षित लोग और जागरूक समाज मौजूद है ? फिर तो आदिवासियों के बीच तो घनघोर अशिक्षा, अज्ञानता और पिछड़ापन मौजूद है, वहां यह दुष्कर्मी पुलिसिया गिरोह किस कदर आतंक मचाता है, सिहरन भर देने के लिए काफी है.

आदिवासियों के असली हितैषी हैं माओवादी और उनकी गुरिल्ला सेना

आदिवासी इलाकों की आज सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा, मेडिकल, विस्थापन झेल रहे आदिवासियों के पुनर्वास है, जिसे यह सरकार स्थापित करने के बजाय केवल सड़क बनाती है और फौज के सहारे आतंक मचाती है, जिसका समुचित प्रतिरोध केवल और केवल भाकपा माओवादी ही कर रही है.

भाकपा माओवादी ही वह सत्ता का नया आयाम है जो आदिवासियों के समुचित विकास, उसके शिक्षा, मेडिकल, विस्थापन की समस्या का सभी समाधान प्रस्तुत कर रहा है. यही कारण है कि माओवादी और उसकी गुरिल्ला आर्मी आदिवासियों ही नहीं देश की तमाम मेहनतकश आवाम के हृदय में बसता है, जिसे उखाड़ फेंकना किसी पुलिसिया गिरोह के किसी भी आतंक के बूते से बाहर की चीज है, इसके उलट यह माओवादी ही वह वैकल्पिक सत्ता है जो आदिवासियों के साथ साथ देश के तमाम लोगों की समस्याओं का वास्तविक हल प्रस्तुत करेगा.

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

ढपोरशंख – ‘मितरों…तुम्हें पहले वाला शंख खोना नहीं चाहिए था !’

Next Post

संशोधनवादी चीनी कम्युनिस्ट सत्ता द्वारा शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सड़कों पर चीनी जनता

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

ब्लॉग

रोज़ गाय काटकर खाने वाला शैतान इजराइल दुनिया के पेट पर लात मारा है !

by ROHIT SHARMA
March 22, 2026
ब्लॉग

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

by ROHIT SHARMA
December 22, 2025
ब्लॉग

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

by ROHIT SHARMA
November 25, 2025
ब्लॉग

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

by ROHIT SHARMA
November 20, 2025
ब्लॉग

‘राजनीतिक रूप से पतित देशद्रोही सोनू और सतीश को हमारी पार्टी की लाइन की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है’ : सीपीआई-माओवादी

by ROHIT SHARMA
November 11, 2025
Next Post

संशोधनवादी चीनी कम्युनिस्ट सत्ता द्वारा शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सड़कों पर चीनी जनता

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

गुटनिरपेक्ष देशों के गुट से बाहर आकर मोदी ने भारत को दुनिया का फुटबॉल बना दिया

August 29, 2023

कार्ल मार्क्स (1857) : भारतीय सेना में विद्रोह

September 17, 2019

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.