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Home कविताएं

अकविता

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 15, 2023
in कविताएं
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सुनसान पड़े खंडहर केे
बचे हुए अकेले दरवाजे पर
सांकल चढ़ाकर
गुम हो गये सपने
किसी बियाबान में
अकविता बनती रही

जबसे तुमने डरना सीखा है
उन भारी बूटों की आवाज़ से
संगीनों की चमक से
जबसे तुमने
सौ दिनों की मज़दूरी से
पेट पालना सीखा है साल भर
जबसे तुम
इच्छा के विरुद्ध जाकर
पदार्पण होते आये हो
इस संसार में
अकविता
प्रकट होती रही

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स्वप्न

तुह्मारे टेढ़ी मेढ़ी ऊंगलियों में
मिट्टी को दांतों से पकड़े
शिराओं में बहते सपनों से मुंह फेरते
तुह्मारी वनवासी प्रतिबद्धता
वनस्पति के साथ
एकात्म होने में
अकविता
बनती रही
जब जब उस मटमैले दीवार पर
उभर आयी है छाया
दो पशुओं के संभोग का ।

अकविता बनती रही
जब जब मसीहा की तलाश में
रहा है आदमी.

2

जब भी
और जिस किसी ने भी
तुम्हें अपनी कोहनियों
और घुटनों के बल पर चल कर
एक लाल निशान पर
निशाना साधने की ट्रेनिंग दी है
सबसे पहले उसने तुम्हें
एक सरीसृप बनने की
ट्रेनिंग दी है.

  • सुब्रतो चटर्जी

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