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जवानों के नौकरी छोड़ने की रफ्तार में अप्रत्याशित बढ़ोतरी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 30, 2018
in ब्लॉग
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गृह मंत्रालय से राज्यसभा में पूछे गए प्रश्न कि ”क्या वर्ष 2015 की तुलना में वर्ष 2017 में अपनी नौकरी छोड़ने वाले अर्धसैनिक बलों के अधिकारियों और जवानों की संख्या में लगभग 500% की वृद्धि देखी गई है ?” के जवाब में गृह मंत्रालय ने लिखित जानकारी देते हुए बताया कि ”वर्ष 2017 में अपनी नौकरी छोड़ने वाले केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और असम राइफल्स के अधिकारियों और जवानों की संख्या वर्ष 2015 में 3,425 की तुलना में 14,587 है.”

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सेना और अर्द्ध-सेना के शहादत – हलांकि भारत सरकार मारे गये जवानों को शहीद नहीं मानता – के नाम पर देश भर के लोगों के मन में आतंक भर देने वाली भाजपा और कुप्रचार और दुश्प्रचार करने में माहिर उसके विस्तृत आई टी सेल के ट्रॉल्स भाजपा के शासनकाल में सेना के जवान भारी संख्या में नौकरी छोड़ रहे हैं. इसके पीछे के कारणों के पड़ताल की जाये तो सेना के अंदर व्याप्त घोर कुव्यवस्था और सामंती ढ़ांचे के अलावे राजनीतिक कारण ज्यादा दीख रहे हैं.

सीमा पर जवानों के शहीद होने की तादाद में लगातार हो रही बढ़ोतरी, जवान तेजबहादुर द्वारा खराब खाने की शिकायत करने पर नौकरी से बर्खास्त करना, मुठभेड़ में घायल एक जवान अपनी फटी आंत को प्लास्टिक की थैली में लेकर घूम रहा है लेकिन इलाज का नहीं होना, अफसरों और सरकार की जी-हजूरी अनिवार्य, आदि जैसे कारण हो सकता है.

सेना किसी भी देश का अनिवार्य अंग है, ठीक उसी तरह जिस तरह किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान, पत्रकार, वैज्ञानिक आदि हैं. परन्तु देश की मोदी सरकार जिस प्रकार किसानों, मजदूरों, छात्रों, नौजवानों, आदिवासियों, महिलाओं के खिलाफ एक से बढ़कर एक कदम उठा रही है, और विरोधियों को सेना के नाम पर डरा कर देशद्रोहियों के झूठे आरोप से नवाजते रहे हैं, उसकी परिणति अंततः इसी रूप में ही होनी थी. जिस सेना-अर्द्धसेना के जवानों को यह सरकार शहीद का दर्जा तक नहीं देती, उस जवानों के मनोबल का टुटना लाजिमी ही है.

जरूरत है सैन्य जवानों के लिए बेहतर वातावरण दिया जाये, अफसरशाही-नौकरशाही के बूटों तले उसे कुचलने की प्रवृत्ति पर रोक लगे. बेहतर वेतनमान और उचित पेंशन की राशि मिले और सबसे बढ़कर पूंजीपतियों के हितों खातिर सैन्य जवानों का इस्तेमाल देशवासियों के ही विरुद्ध “मुर्गे लड़ाने की प्रवृत्ति” पर रोक लगे.

इससे इतर किये गए कोई भी प्रयास सैन्य जवानों के मनोबल को तोड़ने का ही काम करेगी, जिसकी परिणति जवानों के नौकरी छोड़ने के ही रूप में हो सकती है.

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