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नौकरी, भाजपा की सबसे दुखती रग है…और तेजस्वी यादव की पूंजी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 15, 2024
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नौकरी, भाजपा की सबसे दुखती रग है...और तेजस्वी यादव की पूंजी
नौकरी, भाजपा की सबसे दुखती रग है…और तेजस्वी यादव की पूंजी
हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

नौकरी, भाजपा की सबसे दुखती रग है. तेजस्वी यादव की सबसे बड़ी यूएसपी है. भाजपा सरकारी नौकरियों के खिलाफ है. केंद्र सरकार में रिक्त लाखों सरकारी पदों पर बहाली करने के बदले उन पदों को ही खत्म करने का रिकार्ड उसने कायम किया है. जबकि, प्राइवेट नौकरियों के अवसर बढ़ाने में भाजपा की विफलता ऐतिहासिक है. दो करोड़ नौकरियों के अवसर प्रतिवर्ष उत्पन्न करने का नरेंद्र मोदी का वादा सदी के सबसे बड़े झूठ के रूप में स्थापित हो चुका है.

नीतीश कुमार के लिए रोजगार कभी प्रमुख मुद्दा नहीं रहा. न वे सरकारी भर्तियों के प्रत्यक्ष विरोधी हैं, न प्राइवेट नौकरियों के अवसर बढ़ाने के प्रति उनकी उल्लेखनीय सक्रियता रही. नीतीश कुमार के अठारह वर्षों के शासन काल में बिहार ने विकास के कई मुकाम तय किए, लेकिन रोजगार के लिए बिहारियों का पलायन बदस्तूर जारी रहा. बेहिसाब बढ़ती आबादी के साथ पलायन का ग्राफ भी बढ़ता ही गया. बिहारी श्रमिकों के अपमान, शोषण और उत्पीड़न की कहानियां अब बिहारियों के लिए भी आदत में शामिल हो चुकी हैं, जो यहां के जनमानस में कोई खास स्पंदन पैदा नहीं करती.

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नीतीश कुमार की सरकार ने छोटी मोटी सरकारी भर्तियों में भी कई बार चार-चार साल, पांच-पांच साल, यहां तक कि सात-आठ साल तक लगाए. अप्लाई करने और ज्वाइन करने के बीच न जाने कितने अभ्यर्थियों के बाल काले से खिचड़ी जैसे हो गए. नीतीश कुमार की अपनी राजनीतिक सफलताएं हैं, लेकिन नौकरी-रोजगार के मुद्दे उनके एजेंडे में कभी शीर्ष पर नहीं रहे. वे अपने वोट बैंक तैयार करने और राजनीतिक समीकरण साधने में ही अपनी अधिकतम ऊर्जा लगाते रहे. जातीय राजनीति के दुष्चक्र में अपने अस्तित्व को बचाए-बनाए रखने के लिए नीतीश की यह विवशता हो सकती है लेकिन यही उनकी सीमा भी है.

विधान सभा में दिए भाषण में तेजस्वी ने तफसील से बताया कि नीतीश जी के साथ सरकार बनाने में नौकरियों के मुद्दे पर आपस में किस तरह के विमर्श, किस तरह के कमिटमेंट किए गए. आखिरकार, कई तरह की बहालियों का सिलसिला शुरू हुआ. महज सत्तर दिनों में दो चरणों में करीब दो लाख शिक्षकों की बहालियां हुई. आगे की बहालियों की योजनाओं पर भी काम आगे बढ़ा.

जब तक नीतीश-तेजस्वी साथ रहे, इन नौकरियों के क्रेडिट की छीना झपटी के अंतर्विरोध खुल कर सामने नहीं आए. अलग होते ही इन अंतर्विरोधों को सामने आना ही था. आया भी. खुद नीतीश जी ने इस पर अपनी बात रखी और भाजपा के साथ फिर से सरकार बनाने के बाद कई बार दुहराया कि ‘वे लोग’ नौकरियों का क्रेडिट लेना चाहते थे. क्रेडिट जनता देती है और जनता के उस हिस्से में भी, जो तेजस्वी को वोट नहीं देता, यह सोच आम है कि इतनी सरकारी नौकरियों का पिटारा खुलने का बड़ा कारण तेजस्वी यादव ही हैं. यह क्रेडिट तेजस्वी यादव की पूंजी बन गई है.

यह अच्छी बात है कि नौकरियों के क्रेडिट की होड़ में खुद को आगे रखने के लिए नीतीश-भाजपा की सरकार आगे भी बहालियों के सिलसिलों को चलाते रहने की बातें कर रही है. कुछ लाख और बेरोजगारों को सरकारी नौकरियां मिल जाएंगी. लेकिन, धारणाओं की राजनीति के इस दौर में सरकारी भर्तियों को लेकर जो छवि तेजस्वी यादव ने बना ली है, वह भविष्य की उनकी राजनीति में सकारात्मक भूमिका निभाएगा.

भाजपा को बिहार में आगामी सरकारी भर्तियों को हरी झंडी देने में कितने अंतर्द्वंद्व झेलने पड़ रहे होंगे, यह सहज ही समझा जा सकता है. एक ऐसी पार्टी, जो वैचारिक और सैद्धांतिक रूप से स्थायी सरकारी नौकरियों की विरोधी है, जिसके लिए रोजगार का मुद्दा राजनीतिक लफ्फाजियों की लहरों में बहा देने की चीज है, वह लाखों पदों पर स्थायी सरकारी भर्तियों को कैसे अपनी चुनावी सभाओं में भुनाएगी ? अगर वह बिहार में ऐसा करती है तो अन्य राज्यों में भी उसे बेरोजगार नौजवानों को जवाब देना होगा. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि में बेरोजगारी की कमी थोड़े ही है ? वहां भी बड़ी संख्या में सरकारी पद रिक्त हैं लेकिन बुलडोजर के सांस्कृतिक शोर में बेरोजगार नौजवानों के कान बहरे और मस्तिष्क सुन्न होते जा रहे हैं.

यह तेजस्वी यादव की बड़ी सफलता है कि उन्होंने रोजगार के मुद्दे को, सरकारी भर्तियों के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बना दिया. आज बिहार में अगर नीतीश कुमार और भाजपा इसके लिए हाथ-पांव मार रहे हैं तो इसका भी पहला क्रेडिट तेजस्वी को ही जाएगा.

सवाल उठ रहे हैं कि आखिर रिक्त सरकारी पद भरे क्यों नहीं जाएं. उनके भरने से जनता के काम ही होंगे. बेरोजगारों को रोजगार भी मिलेंगे और जनता की सुविधाएं भी बढ़ेंगी. आरक्षण का लाभ भी जरूरतमंदों को मिलेगा. आखिर क्यों वर्षों-वर्षों तक सरकारी पद रिक्त रहें ? आर्थिक संसाधनों का दोहन विकास के नाम पर सिर्फ कारपोरेट हितों के लिए ही क्यों हो ? बाकी तो, सारा देश देख रहा है कि केंद्रीय स्तर पर सरकारी भर्तियों का क्या हाल है.

रेलवे, जो सबसे बड़ा नौकरी प्रदाता था, आज कर्मियों की कमी से कराह रहा है. स्थायी भर्तियों को हतोत्साहित कर निजीकरण, आउटसोर्सिंग आदि के रास्ते बढ़ चले रेलवे के विभिन्न स्तरों के कर्मी आज बढ़ते वर्कलोड से कितने परेशान हैं, इसकी रिपोर्ट्स अक्सर आती ही रहती हैं. कभी रेलवे की नौकरियों के लिए देश भर के युवा और तमाम कोचिंग संस्थान स्पेशल तैयारियां करते करवाते थे. आज वे टूट चुके हैं क्योंकि रेलवे का रवैया बदल चुका है. अभी कल परसों ही हमने देखा कि रेलवे की किसी खास वैकेंसी में उम्मीदों से बेहद कम पदों की रिक्तियां निकलने से युवा सड़कों पर कितने आक्रोशित और आंदोलित थे.

केंद्र सरकार के लाखों रिक्त पदों पर नियुक्तियों के मामलों को फ्रीज कर दिया गया है, कितने लाख पद ही खत्म कर दिए गए हैं, प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करते युवाओं का समूह कितना निराश है…न जाने कितनी ऐसी रिपोर्ट्स आते आते अब तो उनका आना भी कम हो गया है. लोग मान कर चलने लगे हैं कि मोदी राज में सरकारी नौकरियों की तो बात ही क्या, रोजगार मात्र की भी बातें उठाना बेकार की कवायद है.

कोई कह सकता है, पूछ सकता है कि फिर मोदी की भाजपा को झोली भर भर कर वोट क्यों मिल रहे हैं ? तो इसका जवाब हमें इतिहास में ही मिल जाता है, वह भी महज पिछली सदी के इतिहास में ही. वह भी एक नहीं, कई देशों और कई नेताओं के इतिहास में… कि धारणाओं की राजनीति के उबाल में, जब विकृतियां स्थायी भाव बन जाने का आभासी माहौल बनाती हैं.

किन नेताओं ने कैसी कैसी लोकप्रियता, कैसी कैसी सफलताएं हासिल की, कितनी कितनी बार हासिल की…लेकिन जब जीवन की वास्तविकताओं से धारणाओं की कृत्रिम निर्मिति का टकराव हुआ तो कैसे तमाम कृत्रिमताएं, तमाम शोशेबाजियां देखते ही देखते धराशायी हो गईं और उन देशों, उन पार्टियों के साथ ही उन नेताओं का क्या हाल हुआ.

किसी भी देश और समाज में विकृतियों के उभरने, उनके पकने और फिर मवाद का रूप लेने में कुछ वक्त लगता है. इस बीच के अंतराल में कृत्रिमताएं उत्साह के अतिरेक में उछाल मारती हैं, वास्तविकताएं नेपथ्य में धकेली जाती हैं. लेकिन, जीवन के व्यावहारिक सत्य से जुड़े सवाल जब जवाब पाने की जिद ठान लेते हैं तो महज धारणाओं की राजनीति हवा हो जाती है और सुनियोजित निर्मिति के शिखर जमीन सूंघते नजर आते हैं. लफ्फाजियों की उम्र लंबी नहीं होती. दौर को आना ही है जब रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा की ठोस बातें करने वाला आगे आएगा, चाहे वह जिस भी पार्टी का हो, चाहे वह जो भी हो.

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