Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

नरेंद्र मोदी सरकार अब तक बेरोजगार हर नौजवान की विफलताओं का जीता-जागता स्मारक है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 3, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

नरेंद्र मोदी सरकार अब तक बेरोजगार हर नौजवान की विफलताओं का जीता-जागता स्मारक है

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार संसद में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने मनरेगा को पिछली सरकार की ‘विफलताओं का स्मारक’ बताया था और साथ में यह भी जोड़ा था कि वे इस कार्यक्रम को बंद नहीं करेंगे क्योंकि वे इसे अपने पूर्ववर्त्ती की विफलताओं की याद दिलाने के लिये जारी रखना चाहते हैं.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

वे सत्ता में बिल्कुल नए थे, संसद में और टीवी स्क्रीन पर यह सब बोलते हुए वे देश की आकांक्षाओं के प्रतीक लग रहे थे. खास कर यह देखते हुए कि उन्होंने दो करोड़ नौकरियां सालाना पैदा करने के वादे के साथ सत्ता संभाली है, उनके द्वारा मनरेगा का मजाक उड़ाया जाना लोगों को खला भी नहीं.

एक वह दिन था और एक आज का दिन है. साढ़े सात वर्ष बीत चुके. मोदी सरकार अब तक मनरेगा का कोई भी विकल्प सामने नहीं ला सकी है. पिछले वर्ष के मुकाबले 25 प्रतिशत की कटौती के साथ इस वर्ष भी इसके लिये बजट में राशि का प्रावधान किया गया है.

मनरेगा अगर विफलताओं का स्मारक है तो इस पर अब नरेंद्र मोदी सरकार का नाम भी खुदवाया जाना चाहिये. हालांकि, रोजगार पैदा करने के मामले में नरेंद्र मोदी की विफलताएं इतनी बड़ी हैं कि किसी एक स्मारक पर उनके उल्लेख से काम नहीं चल सकता.

बड़े शहरों की तंग गलियों में एक-एक कमरे में चार-पांच की संख्या में रहते हुए, बैंक, रेलवे और एसएससी आदि की परीक्षाओं की तैयारियों में दिन-रात एक करते हुए नौजवानों के टूटते सपनों की तमाम कब्रगाहों पर भी इतिहास नरेंद्र मोदी सरकार का नाम लिखता जा रहा है.

18 वर्ष की उम्र पार करने के बाद पहली बार वोटर बनने वाले नौजवानों के बड़े तबके ने 2014 में मोदी जी को वोट किया था. वे उनके ‘नए भारत’ के सपने के सहयात्री बन कर खुद के भविष्य के प्रति भी आशान्वित थे. उन नौजवानों को नौकरियां देने की जगह संकीर्ण राष्ट्रवाद और धर्मवाद की घुट्टी पिलाई जाने लगी.

पुलवामा और बालाकोट ने ऐसे नौजवानों के देश प्रेम को चुनावी मैदान में ‘एक्सप्लॉइट’ करने का मौका दिया और नरेंद्र मोदी सरकार को दूसरी बार सत्ता तक पहुंचाने में इस आयु वर्ग के वोटरों की बड़ी भूमिका रही. लेकिन, रोजगार ऐसा सच है जिसकी उपेक्षा की ही नहीं जा सकती क्योंकि यह किसी के दैनंदिन जीवन की जरूरतों से जुड़ा है, किसी की ‘आइडेंटिटी’ से जुड़ा है.

अपनी जरूरतों से, अपनी पहचान के संकटों से जूझते पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवानों की एक पूरी पीढ़ी की हताशा में नरेंद्र मोदी का नाम शामिल है क्योंकि, इतिहास में दर्ज हो चुका है कि निजीकरण के अंदेशों से जूझते बैंकिंग सेक्टर, रेलवे और सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य इकाइयों ने बीते वर्षों में उम्मीदों के मुकाबले बेहद कम रिक्तियां घोषित की हैं और जो घोषित की भी हैं उनकी भर्त्ती-प्रक्रिया इतनी मंथर गति से चल रही है कि कितनों की तो उम्र भी खत्म होने के कगार पर पहुंचने लगी है.

2014 के बाद नौकरी की लाइन में लगा और अब तक बेरोजगार ही रह जाने को अभिशप्त हर नौजवान नरेंद्र मोदी सरकार की विफलताओं का जीता-जागता स्मारक है. दो करोड़ नौकरियां सालाना पैदा करने का वादा कोई मामूली बात नहीं थी. इसने नौजवानों की आकांक्षाओं को जैसे नए पंख लगा दिए थे.

लेकिन 5 वर्ष के बाद अगले चुनाव में मोदी जी ‘पुलवामा के शहीदों’ के नाम पर वोट मांगते नजर आए, उनके गृहमंत्री समुदायों को विभाजित करने वाली भाषा बोल-बोल कर वोट मांगते नजर आए.

मतलब, अगला चुनाव आते-आते योजनाबद्ध तरीके से कोलाहल को इतना कर्कश बना दिया गया कि नौकरियों की मांग नौजवानों के हलक में ही अटक कर रह गई और ‘देश खतरे में है’ से ‘धर्म खतरे में है’ टाइप के विमर्श माहौल पर हावी हो गए.

जिनके लिये मनरेगा की शुरुआत की गई थी उनकी संख्या इस देश में सर्वाधिक है. साढ़े सात वर्षों के अपने कार्यकाल में मोदी सरकार उनके लिये कोई वैकल्पिक प्रभावी कार्यक्रम लाने में विफल रही है. मुफ्त नमक और अनाज आदि जैसे कार्यक्रम कोई समाधान नहीं हो सकते.

मध्य वर्ग को चूस कर, नौकरी पेशा वालों पर टैक्स लाद-लाद कर आप विशाल निर्धन आबादी के लिये ‘मुफ्त’ वाले कार्यक्रम कब तक चलाते रह सकेंगे ? अंततः उनके हाथों को काम ही उनकी आर्थिक मुक्ति का जरिया बन सकता है. लेकिन, इस विशाल निर्धन तबके की आर्थिक मुक्ति के लिये नरेंद्र मोदी सरकार अब तक कोई ठोस और प्रभावी कार्यक्रम नहीं ला पाई है.

इन अर्थों में मुफ्त के अनाज की लाइन में लगा निर्धनों का हर झोला मोदी सरकार की विफलताओं का स्मारक है जिस पर उनका नाम उकेरा जाना चाहिये.

कोई भी सरकार वृद्धों, असहायों आदि को मुफ्त राशन दे कर व्यवस्था को मानवीय चेहरा दे सकती है लेकिन अगर काम करने में सक्षम और रोजगार के जरूरतमंद लोगों को काम की जगह मुफ्त का झोला हाथों में पकड़ा दिया जाए तो यह पूरी व्यवस्था की विफलताओं का स्मारक है.

मनरेगा कार्यक्रम चल रहा है तो अब यह किसी पूर्ववर्त्ती सरकार की विफलताओं का स्मारक नहीं बल्कि इस दुःकाल में भी निर्धन बेरोजगारों को फौरी रोजगार देने की दिशा में एक सार्थक पहल का प्रतीक है.

विफल है तो नरेंद्र मोदी सरकार, जिसने देश को आर्थिक कंगाली के उस कगार पर पहुंचा दिया है कि इस नए बजट में मनरेगा की राशि में भी एक चौथाई कटौती करनी पड़ी है, जो अंततः इस देश के सबसे निर्धन बेरोजगारों पर ही भारी पड़ने वाली है.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें]

Previous Post

पर्यावरण और जीवों को बचाने की बात करने वाले मानवता को बचाने की कोशिश कर रहे हैं

Next Post

गांधी की शहादत के 75 साल

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

गांधी की शहादत के 75 साल

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

आरएसएस का बेशर्म राजनीतिक मुखौटा भाजपा और मोदी

March 28, 2021

दुर्गा-महिषासुर पर लिखी गई कहानियां कोरी गप्प है ?

October 2, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.