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संयुक्त किसान मोर्चा और किसान आंदोलन के अग्रगति का सवाल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 18, 2024
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किसान अन्नदाता हैं, आतंकी नहीं
किसान अन्नदाता हैं, आतंकी नहीं

किसानों ने दिल्ली कूच क्या किया, मोदी सरकार ने किसानों के खिलाफ जंग छेड़ दिया है. सड़कों पर बड़े बड़े अवरोधक,.कीलें गाड़ दी गई है. पुलिसकर्मियों की भीड़ बढ़ा दी गई है जो किसानों पर लाठी, गोली, आंसू गैस के गोले, ड्रोन से हमले जैसी संगठित हमला शुरु कर दिया है. इसके अलावा मीडिया, सोशल मीडिया पर बैठे दलालों ने किसानों के खिलाफ अनर्गल प्रलाप करना शुरू कर दिया है. किसानों को असली-नकली बताने से लेकर आतंकवादी तक बताया जा रहा है.

श्याम सुन्दर लिखते हैं – हाय रे हुकूमत ! वोट के लिए भारत रत्न देंगे, लेकिन नहीं मानेंगे उनकी एक भी बात. तभी तो भारत रत्न डा. एम. एस. स्वामीनाथन की बेटी को कहना पडा- ‘दिल्ली आ रहे किसान अन्नदाता हैं, आतंकवादी नहीं. इनके साथ आतंकवादियों की तरह बर्ताव क्यों ?’ दिल्ली आ रहे किसान एम. एस. स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की बात कर रहे हैं, जिससे किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाये. खेती-किसानी घाटे का सौदा नहीं, बल्कि मुनाफे का सौदा हो. जिसे एमएसपी कहा जा रहा है.

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संयुक्त किसान मोर्चा ना तो खालिस्तानों का संगठन है और ना ही माओवादियों का, यह विशुद्ध किसानों का संगठन है. लेकिन दमनात्मक कार्रवाई करने के लिए सरकार किसानों के साथ प्रपंच रच रही है. धरती का सीना चीर अन्न उपजाने वाले किसानों को मजबूर किया गया और आंदोलन को बातचीत के बजाय सत्ता संरक्षित हिंसक कार्रवाई से दबाने का प्रयास हुआ तो देश को खूनी लोकतंत्र में बदलते देर नहीं लगेगा !

खूबसूरत लोकतंत्र का परिचय देते हुए किसानों का जत्था दिल्ली कूच करना चाहता था लेकिन सरकार किसानों को अछूत समझ सारे रास्ते बंद कर दी है. सड़कों की बैरिकेडिंग, कंटीले तारों से घेराबंदी, आंसू और टियर गैस के गोलों से घायल किसान, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अबतक चार किसान और दारोगा की मौत, स्थिति की भयावहता बताने के लिए काफी है.

क्या हरित क्रांति के जनक स्वामीनाथन का यही सपना था ? फिर नीति-सिद्धांत, कथनी और करनी में दोगलापन क्यों ? बहरहाल, आज चौधरी चरण सिंह जीवित होते तो अपने पोते जयंत चौधरी की सोच पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे होते ? आप खुद सोचिए. उनकी पहचान किसानों से थी, कुर्सी से नहीं.

लेकिन अफसोस, बदले वक्त में नेतागिरी का मतलब संघर्ष नहीं, सत्ता होती जा रही है इसलिए किसानों की हकमारी हो रही है. मजदूर बेहाल हैं. नाउम्मीदी में जी रहा नौजवान सेक्स, हिंसा और धार्मिक मतांधता में जीने को आतुर हैं. बुद्ध की बात कौन करे, यहां तो ओबीसी का दंभ भरने वाले माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी रैदास, फूले, पेरियार, बाबा साहेब का समता मूलक समाज का सपना दिवास्वप्न दिखता है !

वोट के लिए जननायक कर्पूरी ठाकुर माननीय प्रधानमंत्री जी की नजर में भारत रत्न तो हैं, लेकिन जिन तपे-तपाये रास्तों पर चलकर कर्पूरी ठाकुर जननायक बनें, उन रास्तों पर देश को ले जाने की कुव्वत शायद प्रधानमंत्री जी नहीं रखते.

उत्तरप्रदेश के अखिल भारतीय किसान महासभा के प्रदेश अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण ‘संयुक्त किसान मोर्चा और किसान आंदोलन के अग्रगति का सवाल’ पर एक वर्ष पूर्व (3 नवम्बर, 2022) एक बेहतरीन विश्लेषण किया था, उसे हम यहां अपने पाठकों और आंदोलनकारी किसानों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं.

लगभग दो साल पहले मोदी ने एक तरफा घोषणा करके तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया. कानूनों की वापसी की घोषणा के साथ लगभग 1 साल से चल रहे किसान आंदोलन ने बड़ी विजय दर्ज की. इस आंदोलन की अगुवाई संयुक्त किसान मोर्चा कर रहा था, जो देश भर के लगभग साढ़े 500 किसान संगठनों ने मिलकर बनाया था.

आंदोलन की जीत से संयुक्त किसान मोर्चा और भारत के किसानों की एकता और साख सम्मान भारत सहित पूरी दुनिया में बहुत बढ़ गया है. विश्व भर में भारत के किसानों के संघर्ष की विशिष्टता को स्वीकारा गया और शिक्षा लेने की बातें उठने लगी. नोट करने की बात है कि उदारीकरण की नीतियों के खिलाफ यह पहली महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय विजय थी, जिसमें बिखरे हुए कृषक समाज की एकजुटता ने भारत के अब तक के सबसे क्रूर और कारपोरेट परस्त सरकार को पीछे हटने को मजबूर किया था.

कानून वापसी के बाद सरकार ने संयुक्त किसान मोर्चा को लिखित पत्र देकर बाकी सवालों के समाधान का आश्वासन दिया था ‌और कहा था कि समय बद्ध ढंग से शेष मुद्दे हल किये जाएंगे. लेकिन अभी तक आंदोलन के बाकी सभी मुद्दे अपनी जगह पर जस के तस पड़े हैं. आंदोलन से बनी हुई किसान एकता क्षतिग्रस्त हो चुकी है. उसमें अनेक तरह के उतारचढ़ाव आ जा रहे हैं. अगर थोड़े शब्दों में कहा जाए तो संयुक्त किसान मोर्चा की साख को धक्का लगा है.

इस समय किसान आंदोलन सुरक्षात्मक स्थिति में पहुंच गया है. आंदोलन के रंग बिरंगे प्रवक्ता जगह जगह दिखाई दे रहे हैं. कई बड़े नेता मोर्चा से बाहर जा चुके हैं. नौ सदस्यीय संयुक्त मोर्चा की कमेटी सिकुड़ कर 4 पर आ गई है . इस परिस्थिति का लाभ उठाकर भारत सरकार योजनाबद्ध तरीके से कारपोरेटपरस्त नीतियां कृषि पर थोप रही हैं. वन अधिनियम में संशोधन का खतरनाक खेल हुआ है. साथ ही सरसो के उत्पादन में जीएम बीजों को मान्यता दे दी गई है. सरकार एक मुश्त कृषि को कारपोरेट के हाथ सौंपने की नीतियों से पीछे हट कर टुकड़े टुकड़े में उन्हें लागू करने में जुटी है.

दूसरी तरफ आन्दोलन के दौरान निर्मित सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सद्भाव को विखंडित करने में पूरी ताक़त से जुटी है.
चूंकि वर्तमान राज्य तकनीकी रूप से वृहदाकार राज्य मशीनरी और प्रचार तंत्र से लैस संगठित समूह है इसलिए वह अपने नीतियों और कृत्यों के दुष्प्रभाव से जन सामान्य को भटकाने में कामयाब हो जाता है. ऐसी स्थिति में किसान आंदोलन की अग्रगति के लिए गंभीरतापूर्वक विचार विमर्श की जरूरत है –

  1. किसान आंदोलन की अग्रगति के लिए पहला सवाल है कि किसान संगठनों की एकता को कैसे पुनः कायम किया जाए.
  2. दूसरा सवाल यह है कि सरकार द्वारा टुकड़े-टुकड़े लागू की जा रही नीतियों के विरोध को किसान आंदोलन के समग्र परिपेक्ष के साथ कैसे जोड़ा जाए.
  3. तीसरा सवाल है कृषि क्षेत्र में मौजूद वर्ग विभाजन को देखते हुए नीतियों को इस तरह सूत्र बद्ध किया जाए कि छोटे मझोले किसान ग्रामीण गरीब कृषि मजदूर और आदिवासियों सहित विस्तृत समाज आंदोलन के दायरे में खिंच आए क्योंकि इस समय सरकार की नीतियों की तीखी मार इन्हीं वर्गों को झेलनी पड़ रही है.
  4. चौथी बात देश में बढ़ रही बेरोजगारी, महंगाई और सरकारी नीतियों के दुष्प्रभाव बहुत नीचे तक दिखाई देने लगे हैं. किसान मोर्चा को इन आंदोलनों के साथ एकता बढानी होगी.

शिक्षित बेरोजगार नौजवानों के रोजगार के साथ शिक्षा के ढांचे जैसे प्राथमिक विद्यालयों, आईआईटी, सरकारी पालीटेक्निक और विश्वविद्यालयों के निजीकरण की तेज गति और घटते रोजगार ने भारत के युवाओं में आंदोलनात्मक चेतना को उन्नत किया है.
सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकतर नौजवान ग्रामीण गरीब कृषक परिवारों से आते हैं इसलिए छात्र नौजवान वह सेतु हैं जिससेग्रामीण समाज से जुडा जा सकता है.

तीनों कृषि कानून वापसी के बाद सरकार का एकमात्र लक्ष्य हिंदुत्व एजेंडे को चरम पर पहुंचाना और मुस्लिम विरोधी आक्रामक उन्माद पैदा कर सांप्रदायिक विभाजन को तेज करना है. दूसरा, इस बीच में महिलाओं और दलितों पर हमले हुए हैं, जिसमें लंपट और सामंती ताकतों का उन्मादी चेहरा दिख रहा है, जो किसान आंदोलन के समय कुछ हद रूक गया था, जिससे महिलाओं, दलितों और आदिवासियों में आक्रोश और विरोध का बढ़ रहा है.

आरएसएस और भाजपा द्वारा पैदा किए जा रहे सांप्रदायिक और जातिवादी टकराव आंदोलन को कमजोर करेगा इसलिए किसान आंदोलन को सांप्रदायिक सद्भाव जातीय टकराव को रोकने के सवाल को अपने झंडे में ले आना होगा.

संयुक्त किसान मोर्चा के समक्ष भारतीय कृषि के संकट को हल करने के लिए ठोस कार्यक्रम तैयार करना समय की मांग है इसलिए कृषि के संकट के कारपोरेट समाधान की जगह पर (एगेरियनपाथ) कृषक मार्ग का एजेंडा तैयार करना होगा.

पूंजी निवेश की प्राथमिकता की दिशा को बदलने से लेकर छोटे-छोटे भू-खंडों मे बट रही खेती को संबोधित करने के लिए नए तरह के भूमि संबंधों (छोटी जोत परिघटना) पर भी विचार करना होगा.

आजादी के प्रारंभिक काल में जमीदारों के हाथ से भूमि छीन कर भूमि हीन किसानों को वितरित करने के साथ कोआपरेटिव जैसा प्रयोग हुआ था. विनोबा भावे के नेतृत्व में भूमि दान का आंदोलन भी चला था, जो नौकरशाही और सामंती दखल के कारण असफल हो गया और कोआपरेटिब माफिया सहित कई तरह से भूमि लूटने वाली नई प्रजाति जन्म ले ली है.

कृषि के नए स्वरूप ‘जो जनतांत्रिक होने के साथ सभी तरह के कृषक वर्ग की सामूहिक भागीदारी पर आधारित हो’ उस पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है. सरकारी आंकड़े के अनुसार 90% जोतें 4 एकड़ से कम की हैं, जिसमें तीन चौथाई से ज्यादा किसान सीमांत किसान की श्रेणी में आते हैं.

छोटी जोतों के होने पर न रोजगार का सृजन होगा और न कृषि की उत्पादकता बढ़ेगी, जिस कारण कांट्रैक्ट फार्मिंग या कारपोरेट के लिए कृषि में प्रवेश का तार्किक आधार मिलेगा है. बड़े किसान खासतौर से नव धनाढ्य जोतदार किसानों का हरित क्रांति के सघन क्षेत्रों के बाहर एक ऐसा समूह है जो उत्पादकता के महत्व को नहीं समझता और उत्पादन के संबंधों के जनवादी करण में बाधक है.

संयुक्त किसान आंदोलन में मूलतः पंजाब, हरियाणा के किसान संगठनों की नेतृत्वकारी भूमिका थी, उसमें राजस्थान व पश्चिमी उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिनकी छवि बड़े किसानों के आंदोलन की बन गई थी. जिस कारण से शेष भारत के छोटे मझोले किसानों, ग्रामीण मजदूरों दलितों में आंदोलन को लेकर उस तरह का उत्साह नहीं था जैसा कि इस संकट के दौर में होना चाहिए था.

खासतौर से पूर्वी भारत के ग्रामीण इलाकों में मौजूद छोटी जोत परिघटना ने किसान आंदोलन को पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में आक्रामक शक्ल लेने में बाधा पहुंचाई. इन क्षेत्रों में मंडी सिस्टम और एमएसपी पर खरीद का ढांचा कमजोर होना भी एक कारण रहा है.

उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में बटाईदारी विकास मान परिघटना है. बटाईदारों में आम तौर पर ग्रामीण मजदूर छोटे मझोले किसान शामिल हैं, जिसमें अधिकांश दलित पिछड़ी जातियों से आते हैं। बटाईदार किसान ही मुख्य रूप से खेती किसानी की रीढ़ हैं. उनके अधिकारों का सवाल आज किसान आंदोलन के लिए बड़ा सवाल है.

बटाईदारों को किसान के रूप में मान्यता दिलाने सरकारी योजनाओं के लाभ के दायरे में लाने बटाईदारों का पंजीकरण और उनके लिए विशेष सरकारी योजनाएं बनाने के एजेंडे को आगे लाना होगा क्योंकि इस समय खेती में मुख्य उत्पादनकर्ता बटाईदार किसान ही है.

इन इलाकों में मुख्यत: वाम क्रांतिकारी धारा किसान आंदोलन की अगुवाई कर रही थी. उनका जनाधार ग्रामीण मजदूरों छोटे मझोले किसानों बटाईदारों और मध्यम किसानों में है. इसलिए इन इलाकों में क्रांतिकारी बाम संगठनों को एमएसपी पर कानूनी गारंटी और खाद्य सुरक्षा के सवाल के साथ बटाईदार किसानों के हक की लड़ाई को जोड़कर आंदोलन को नीचे तक ले जाने का एजेंडा तैयार करना होगा.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब आदि में भिन्न तरह की स्थिति थी. एक बात विशेष रूप से नोट की जानी चाहिए कि पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों में सिख धर्म के अनुयाईयों की बहुत बड़ी तादाद है, जो इस आंदोलन की रीढ़ थे.

दूसरा हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतों के रूप में संगठित सामाजिक ढांचा आंदोलन के लिए मजबूत आधार था. सिख धर्म की सामाजिक चेतना समानता सेवा और गुरुद्वारे के रूप में संगठित शक्तिशाली ढांचा ऐसी संरचना है, जिसने किसान आंदोलन के लिए भौतिक आधार तैयार करने में अहम भूमिका निभाई.

13 महीने तक जिस मनोवेग से हजारों कृषक नर नारी सेवादारों ने भोजन से लेकर अन्य जिम्मेदारियों को संभाला और एकता को बनाए रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसने आंदोलन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण रोल अदा किया था.

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि इलाकों में मुख्यतः हिंदू धर्म की वर्णवादी व्यवस्था का प्रभाव और सामाजिक सहयोग सेवा समन्वय की परंपरा का अभाव होने से आंदोलन में सभी तबको को संगठित होने में बाधा है. जाति विभाजन और आपसी दूरी इस इलाके की बड़ी राजनीतिक समस्या है, जिसे आक्रामक रूप से बनाए रखने में जाति के रूप में संगठित राजनीतिक पार्टियों का अपना स्वार्थ है, जो मूलतः यथास्थिवादी और आंदोलन विरोधी हैं.

इसलिए किसान आंदोलन भाग -2 के लिए संयुक्त किसान मोर्चे को राजनीतिक तिकड़म जोड़ तोड़ कर किसी तरह से बृहद समन्वय कायम करने की जगह पर वर्तमान ग्रामीण जीवन की ठोस परिस्थितियों के साथ जोड़कर भावी किसान आंदोलन का ठोस एजेंडा तैयार करना होगा.

कृषि विशेषज्ञों के तरफ से ढेर सारे सुझाव आ रहे हैं. वन संशोधन अधिनियम और जीएम बीजों की मंजूरी जैसे सवाल आने वाले समय में किसान आंदोलन के बड़े मुद्दे बन सकते हैं.

एमएसपी और खाद्य सुरक्षा के जुड़वा सवालों के साथ पूंजी निवेश, कृषि में भूमि सुधार और कृषि संरचना के नए स्वरूप के निर्धारण और ग्रामीण समाज के अंदर फैल रहे दरिद्रीकरण के कारणों की शिनाख्त कर आंदोलन के मुद्दे को तय करने पड़ेंगे, तभी जाकर संभवतः भविष्य में किसान आंदोलन का कोई स्वरूप खड़ा हो सकेगा.

वर्ण व्यवस्था जनित विभाजन पर कड़ी चोट आंदोलन द्वारा की जा सकती है. साथ ही आरक्षण, रोजगार, शिक्षा जैसे बुनियादी सवालों से नौजवानों को जोड़कर इस विभाजित समाज को एकताबद्ध किया जा सकता है.

यह हमें याद रखना चाहिए किसान आंदोलन भाग-2 के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश सहित दक्षिण भारत और बंगाल के विस्तृत इलाके में किसान आंदोलन को खड़ा करना अति आवश्यक है, जो फासीवाद के गढ़ भी हैं और उसके खिलाफ प्रतिरोध की लहरें भी यहां से उठ रही है इसलिए इन लहरों को और तेज करने की जरूरत है.

कुछ खतरे दिखाई दे रहे हैं – जैसे ही हिंदुत्व कारपोरेट गठजोड़ संकट में फंसता है वैसे ही धर्म आधारित विमर्श को तेज कर दिया जाता है. एक तरफ जिसका नेतृत्व आरएसएस के अनुषांगिक संगठन और सवर्ण ताकतवर हिस्से करते हैं वहीं दूसरी तरफ दलित पिछड़े समाज का मध्यवर्गीय बौद्धिक समूह उस एजेडे को लपक लेता है.

जैसे जैसे हिंदुत्व आक्रामक होता जाता है उसके विकल्प का दावा पेश करने के लिए भी आक्रामक पहचानवादी तत्व खड़े होने लगते हैं लेकिन ये नेतृत्वकारी लोग यह समझने में असमर्थ है कि 21वीं सदी के पहले चतुर्थांश में हिंदुत्व का विकल्प कोई आक्रामक पहचानवादी विमर्श नहीं हो सकता. आस्था जन्य चेतना के विकल्प के रूप में तार्किक वैज्ञानिक जनवादी विकल्प ही एकमात्र रास्ता है.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सत्ता के खोल में सिमटी हुई दलितों, पिछड़ों और अस्मिता के नाम पर सक्रिय राजनीतिक और बौद्धिक ताकतें वैज्ञानिक तार्किक चेतना के रास्ते को बंद कर रही हैं और 90 के दशक के पुराने विमर्शों को पुनर्जीवित कर अन्ततोगत्वा हिंदुत्व का ही खेल खेल रही हैं. इसमें कुछ इस्लाम के नाम पर काम करने वाले राजनीतिक दल भी भूमिका निभाते हैं.

वस्तुतः ये ताकतें अपने वर्ग चरित्र के कारण आंदोलन विरोधी हैं. अपने संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में आरएसएस-भाजपा के साथ ही खडी है, जो किसी बड़े जन आंदोलन के लिए सबसे बड़ी बाधा है. इसलिए किसान आंदोलन या किसी भी जनवादी आंदोलन के लिए जातिवादी हमलों का तीखे प्रतिवाद के साथ जाति विनाश के एजेंडे को आगे ले जाना, इसे भूमि सुधारों के साथ जोड़ना और रोजगार महंगाई खाद्य सुरक्षा एमएसपी और काम का अधिकार जैसे मुद्दों को आगे कर किसान आंदोलन के व्यापक परिप्रेक्ष्य को विकसित करने का जोरदार प्रयास करना होगा.

समय थोड़ा कठिन है. किसान आंदोलन की अग्रगति थम चुकी है. पूरा आंदोलन कुछ कर्मकांडी प्रतीकवादी दिशाओं में मुडता जा रहा है इसलिए क्रांतिकारी और जनवादी तत्वों के कंधे पर बड़ी जिम्मेदारी आ गई है कि वे किसान आंदोलन को दिल्ली के इर्द-गिर्द की परिधि से बाहर ले जाकर नये मैदानों, जंगलों में संघर्षरत आदिवासी, किसानों, ग्रामीण मजदूरों, छात्र नौजवानों, औद्योगिक क्षेत्र के मजदूरों के साथ जोड़े. लोकतंत्र और मानवाधिकार के लिए चलने वाले सभी संघर्षों के साथ किसान आंदोलन को जोड़ें.

एक बात हर समय याद रखना चाहिए कि नागरिक समाज के समर्थन के बिना किसान आंदोलन को इतना बड़ा सामाजिक और राजनीतिक समर्थन और आधार नहीं मिल सकता था. इसलिए हमें नागरिक समाज के ऊपर हो रहे हर हमले का प्रतिवाद करना होगा.
हिमांशु कुमार जैसे गांधीवादियों ने हमें एक नया रास्ता दिखाया है और संभावनाओं के नये दरवाजे खोले हैं, जिस संघर्ष के ताप में नये लोकतांत्रिक भारत के निर्माण की झलक दिखाई दे रही है, जो भावी किसान आंदोलन के नए नायकों की सूची में शायद अग्रिम पक्ष में होंगे.

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