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Home कविताएं

स्वतंत्र जांच

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 14, 2024
in कविताएं
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युद्ध से समतल हुए शहर में
जहां पर ज़मीन तीन महीने के
गर्भ से दिखी
वहीं पर एक सामूहिक कब्र निकला

इस सामूहिक कब्र की खोज
किसी देश के पुरातत्व विभाग ने
नहीं किया था

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इसकी खोज
लाश सूंघने वाले कुत्तों ने किया था
जो अपने गले में लगे पट्टों से खींचते हुए
कुछ सत्यान्वेषियों को यहां तक ले आए

उन लोगों को विश्वास था कि
बारूद के अंदर ठूंसी रहती है प्रज्ञा
और युद्ध से तटस्थ लोगों के आस पास से
गुज़र जाती हैं गोलियां
ठीक उसी तरह से जैसे
आंखों पर पट्टी बांधे चाकू बाज़ की छुरियां
दीवार पर जीसस बनी लड़की के सरापा
पैटर्न उभार देती हैं उसके देह का
बिना किसी रक्त पात के

इसलिए जब सत्यार्थियों ने
सामूहिक कब्र के अंदर
अनगिनत लाशों को देखा तो
हैरान रह गए

उन लाशों के बीच
एक मेरी भी लाश थी
मेरे हाथ पीछे बंधे हुए थे
और मेरे सिर के पीछे लगी थी
बस एक गोली

निश्चित ही वह गोली
किसी स्वचालित मशीन गन से नहीं निकली थी
सेल्फ़ लोडिंग रायफल से भी नहीं
परीक्षण में पता चलेगा कि वह गोली
किसी देसी कारख़ाने में बनी
एक कट्टे से भी निकल सकती थी

ख़ैर, अब स्वतंत्र जांच का समय आ गया था

दुनिया भर के नामी गिरामी स्वतंत्र पर्यवेक्षक
लाशों के मानवाधिकार के रक्षक
(क्योंकि लाशों को ससम्मान अंतिम क्रिया देना भी मानवाधिकार का अंतिम कर्तव्य है)
प्रेस, फ़ोटोग्राफ़र, सारे खड़े थे
अंतर्वीक्षा स्थल के बाहर

ज़ाहिर तौर पर
ये लोग भी दो गुटों में बंटे थे
एक गुट का कहना था कि
दुश्मनों ने पहले मेरे दोनों हाथों को
पीछे से बांधा
और फिर ले आए मुझे वध स्थल तक
औरों के साथ साथ

दूसरे गुट का कहना था कि
नहीं, पहले उन्होंने मेरी हत्या की
और उसके बाद उन्होंने मेरे हाथों को
पीछे से बांध कर कब्र में लुढ़का दिया

उन्हें डर था कि
अगर मैं पूरी तरह से नहीं मरा
और मेरे हाथ खुले रह गए तो
संभव है कि मैं अपने उपर की मिट्टी हटा कर
बाहर निकल आऊंगा अपने कब्र से
और पीछा करूंगा उनका

दोनों गुट बेवकूफ थे
ठीक मेरे हत्यारों की तरह
जैसे मेरे हत्यारों को मालूम नहीं था कि
हम सब तो ज़िंदगी भर
एक हाथ पीछे बांधे ही
मुक्केबाज़ी के रिंग में उतरते रहे
ताकि पीछे बंधे हाथ की मुट्ठी में
भींच कर रख सकें
आत्मसमर्पण के सफ़ेद ध्वज को

उसी तरह
इन स्वतंत्र जांचकर्ताओं को भी
नहीं मालूम था कि
शत्रु को बदनाम करने के लिए भी
हमारे मित्र हमारी सामूहिक हत्या कर सकते हैं
और, पाल सकते हैं कुत्ते
सही समय पर हमारे कब्र को
सूंघ कर निकालने के लिए

स्वतंत्र जांच की परतंत्रता पर
जब हम तय नहीं कर पा रहे थे कि
हंसे या रोएं
उस समय पृथ्वी सीजरीयन के ज़रिए
अनगिनत मुर्दों को जन्म देने के दुःख में
छुपा रही थी अपना शर्मसार चेहरा
एक चांदनी रात की अमावस में

2

सड़ी हुई लाश
सामने से गुजरने वाली है
सुबह सुबह सड़ांध से भर गया है शहर
दस बजकर दस मिनट पर
गिरा था अणु बम
और थम गए थे घड़ी के हाथ
किसी विशाल पेड़ के
आत्मसमर्पण में उठे दो हाथ
दूर से अक्सर
प्रार्थना में उठे हुए लगते हैं
इस मुबारक दिन में
बहुत कुछ हुआ था कभी
एक घुमक्कड़ महर्षि का जन्म
गणतंत्र की चमकदार प्लाज़ा के जनक
और किसी महाकाव्य सा खुलते
शस्य श्यामला नया संसार

चुनाव तुम्हारा है
महाकवि का बैशाख अभिनंदन
तुम्हारे बैशाख नंदन की पूजा से
तनिक भी मेल नहीं खाता

प्रार्थना में खड़े पेड़ों पर
अब सुर्ख़ाब के घोंसले बनाओ

  • सुब्रतो चटर्जी

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