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मोदी की पेशानी पर छलका पसीना अकारण नही है !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 14, 2018
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मोदी की पेशानी पर छलका पसीना अकारण नही है !

आज नरेन्द्र मोदी “बहुसंख्यक हिन्दू हृदय की धड़कन” हैं. एक ऐसे राजनेता हैं, जो अपनी ही पार्टी के नाम का पर्याय बन चुके हैं. कमल के निशान का बटन दबाने वाला वोटर, मतदान केंद्र के बाहर आकर कहता है उसने मोदी को वोट दिया है. भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी पार्टी के रूप में स्थापित हो चुकी है जिसे हिन्दू अपनी पार्टी बताता है. मोदी के मुकाबले देश में न कोई राजनेता है, न बीजेपी के मुकाबले कोई पार्टी.

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”हमने चुनाव लड़ने के लिए एक भी मुसलमान को टिकट नही दिया है!” छाती ठोंक कर यह कहने की हिम्मत किस राजनैतिक पार्टी में है ? भारतीय जनमानस के मन में, गोल्ड/सोने के प्रति जैसी आसक्ति है, वैसी ही चाहना उसके मन में भारत को “हिन्दू राष्ट्र” बनने की है. हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बटवारे के बाद से मन में दबी पड़ी इस चाहना को, आरएसएस की “हिन्दू राष्ट्र” निर्माण की अवधारणा ने सुहागा लगाने का काम किया है. ये सत्य है, अब चाहे कितना भी कड़ुआ क्यों न लगे.

तमाम दुःख और तकलीफ सहते हुए भी मोदी जी को इस देश का बहुसंख्यक हिन्दू जन मानस आज उगलने की स्थिति में नही है. क्यों ? क्योंकि देश में, पकिस्तान के जन्म के साथ ही बहुसंख्यक हिन्दुओं के मन-मस्तिष्क के एक कोने में कहीं यह चाहना घर कर गई थी कि उसे भी हिन्दू राष्ट्र बनना है. इसके लिए उसे “जिन्ना जैसे एक हिन्दू नेता” की तलाश थी, जो भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सके. घर कर गयी इस चाहना को सड़कों पर लाने का प्रयोग गुजरात की जमीन पर कर के देखा और अनुकूल पाया गया.

यूंं तो केंद्र में अटल जी के नेतृत्व में भी बीजेपी गठबंधन की सरकार रही पर अटल जी कभी भी, मोदी को राष्ट्रधर्म सिखाने वाली बन गई अपनी छबि से न खुद बाहर निकल पाए, न आम हिन्दू जन-मानस, हिन्दूराष्ट्र बनाने को ही राष्ट्रधर्म समझने की मानसिकता से बाहर आ पाया. इसके चलते, आम हिन्दू जनमानस में यह धारणा मजबूती पकड़ती गयी कि उसकी इस चाहना को सिर्फ मोदी ही पूरा कर सकते हैं; गुजरात में उनके क्रियाकलापों को देख चुके देश के बहुसंख्यकों का ऐसा विश्वास उन पर जमने लगा था.

अब यह विश्वास इतना अटूट बन गया है कि उसे न मंहगाई की मार, न युवाओं में सुरसा की तरह मुंंह फाड़ती बेरोजगारी, न बैंक खजानों की लूट, न ध्वस्त होते शिक्षा संस्थान, न चरमराती स्वास्थ सेवायें, न आत्महत्या करते किसान, न अपनी आबरू और जान की सलामती मांगती बेबस नारी की चीत्कार, न जीएसटी और नोटबंदी से कराहते व्यापारी संगठन, न रुपये की गिरती कीमत, न चढ़ते पेट्रोल-डीजल के दाम, न दानव की तरह पांव पसारता भ्रष्टाचार, न सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक रूप से तबाह होता कश्मीरी युवकों का भविष्य, न सीमाओं पर रोज शहीद होते अनगिनत सैनिक, न उजड़ते सीमावर्ती गांंव, न उन गांंव से पलायन करते परिवार, आदि आदि कोई भी विषम परिस्थिति, जिनके ढ़ोल विपक्ष दिन-रात पीट रहा है, ढ़ोल पीटने के बाद भी उस विश्वास को तोड़ तो क्या, डिगा भी नही पाया है. मोदी को सत्ता की कुर्सी से उतारने की जुगत में लगे, राजनेताओं को भी क्या ये बात समझ आ गई है ? मुझे तो इस पर शक है.

मोदी को सत्ता की कुर्सी से उतारने की जुगत में लड़ती दिख रही, बीजेपी की अधिकांश सहयोगी पार्टियांं और उनके नेता, अपने-अपने समर्थकोंट की नजर में, बीजेपी से लड़ते तो दिखना चाहते हैं पर, मोदी को सत्ता की कुर्सी से बेदखल करने का उनका कोई इरादा नहीं है. वे बीजेपी के साथ सत्ता में ज्यादा भागीदारी के लिए, अपने विरोध को हथियार बनाने की हद से बाहर जा उसे कभी चलाएंगे, ऐसा मुझे तो प्रतीत नही होता.

उ०प्र० में अभी हाल ही में, तीन संसदीय सीटों, फूलपुर और गोरखपुर, कैराना में हुए उपचुनावों में, बीजेपी को हराने के श्रेय का सेहरा अपने सर बांंधने वाली सपा और बसपा भविष्य में अन्य राज्यों में होने वाले आम चुनावों में भी साथ रहेंगे ? अभी इस पर संशय बरकरार है. बिहार में उपेन्द्र कुशवाह और राम विलास पासवान एनडीए में खुश नही हैं, महाराष्ट्र में शिवसेना खुश नहीं है, आंध्र प्रदेश में चन्द्र बाबू नायडू खुश नहीं हैं, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) के चन्द्र शेखर राव का पैतरा भी चंद्रबाबू नायडू से भिन्न नहीं है, वगैरह-वगैरह, ऐसी खबरें हवा में तैराई जाती हैं. धन, राजनीति और मीडिया का गठजोड़ इस काम को अंजाम देता है. ऐसी स्थितियां कई और राज्यों में भी हैं.

मोदी जी राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं. वो जानते हैं किस समय, कितनी चोट कहांं मारनी है, या कितना छोटा टुकड़ा डालने से किसकी नारजगी कब दूर करनी है. इस लिए ऐसे मसलों पर वो कतई चुप रहते हैं, जिसको जो कहना है, कहते रहो.

आज ये देश उतना ही जान कर संतुष्ट है जितना सत्ता उसे बताना चाहती है, उससे ज्यादा जानने की तलब उसे नहींं है. और जिन्हें बताने की तलब है, जनून है, उन्हें भ्रम है, कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक मौलिक अधिकार उनकी सुरक्षा करेगा. वो सत्ता के निशाने पर हैं. सत्ताधारी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले ये जानने के बाद भी जान से मारने की धमकियां देते रहते है, कि उनके साथ हो रहा सारा वार्तालाप रिकॉर्ड किया जा रहा है.

एनडीटीवी के रवीश ने खुद को मिल रही अलंकृत गालियों और जान से मारने की अनेकों धमकियों के प्रमाण सहित शिकायतों का पुलिंदा पुलिस अधिकारियों की टेबल तक तो पहुंचा दिया, पर वहां कारवाही की प्रतीक्षा में उबासियांं ले रहा है. रवीश ने प्रधानमन्त्री, गृह मंत्री सहित पुलिस के उच्चाधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी है. सब के सब मौन हैं. संकेत स्पष्ट है- अतीत से सीखो, बेमुला से सीखो, दाभोलकर से सीखो, पंसारे से सीखो, कलबुर्गी से सीखो, गौरी लंकेश वगैरह-वगैरह से सीखो.

मोदी जानते हैं 1000 से 12000 रुपये मासिक तक कमाने वाले देश के 78 करोड़ लोग कूट-रचित झूठ-सच, छल-कपट आदि को कसौटी लगाने में कतई विश्वास नहीं रखते. वे जिन पर आस्था रखते हैं उसकी बात को तर्क की कसौटी पर न तो खुद कसना चाहते हैं न कसकर दिखाने वाले पर यकीन करते हैं. सांंपों को देवता मान उसे दूध पिलाने वालों के देश में सड़क किनारे, घुचडू के डंडे से रुपईया निकालने वाले बाजीगरों का तमाशा भी, बड़ी तल्लीनता से, खड़े होकर देखने वालों में पढ़े-लिखे भी होते हैं. दर्शक जानते हैं कि ये छल है, फरेब है, झूठ है, पर तमाशा देखते हैं और बाजीगर की झोली में नोट डालते हैं. चुनाव के समय लच्छेदार भाषणों पर यकीन कर यही लोग अपना वोट भी डालते हैं.

मोदी जी अपने सामने खड़े-बैठे हज़ारों श्रोताओं से सम्वाद करने की कला में माहिर हैं. इसी सम्वाद के माध्यम से अपने उठाये गए कदम को, उसकी भलाई के लिए उठाया गया है, ऐसा यकीन भी दिला देते हैं और श्रोताओं की भीड़ की स्वीकृति भी ले लेते है. मानों रायशुमारी हो रही हो. यानी अपनी कही बात पर मोहर भी लगवा लेते हैं. वे यही नहीं रुकते, यह भी कहते हैं कि इस कदम को उठाने के कारण उनके विरोधी तरह-तरह से उन पर कीचड़ भी उछाल रहे हैं. मोदी जी कहते हैं, ”आखिरी सांस तक वो तो ग़रीबों का, किसानों का, पिछड़ों का, दलितों का, वंचितों का भला करते रहेंगे. जब विरोधी उन्हें वैसा नहीं करने देंगे, अपना झोला उठा कर वापस चले जायेंगे.”

एक बानगी बड़ी दिलचस्प है. मोदी जी के सम्वाद करने की कला का स्पष्ट बोध कराने वाला अनुपम उदाहरण है –

मोदी जी – क्या भ्रष्टाचार ने देश को बर्बाद कर दिया है ? क्या इसकी वजह से लूट हुयी है ? क्या इसने सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को पहुंचाया है ? क्या इसने ग़रीबों के अधिकारों को छीना है ? क्या भ्रष्टाचार ही सारी समस्याओं की जड़ है ?

भीड़- हांं, हांं.

मोदी जी – अब आप ही मुझे बताएं भ्रष्टाचार रहना चाहिए या जाना चाहिए ? भाईयों-बहनों रहना चाहिए या जाना चाहिए ?

भीड़ – जाना चाहिए, जाना चाहिए.

मोदी जी – भाईयों-बहनों, क्या ये अपने आप चला जाएगा ? क्या ये कहेगा कि मोदी जी अब आप आ गये हैं; मै डर गया हूंं, मैं जा रहा हूंं.

भीड़ – नहीं, नहीं.

मोदी जी – भाईयों-बहनों आप ही बताएं हमें भ्रष्टाचार को भगाने के लिए डण्डे का उपयोग करना चाहिए या नहीं ? क्या हमें क़ानून का सहारा लेना चाहिए या नहीं ? क्या हमें भ्रष्टाचार से निबटना चाहिए या नहीं ?

भीड़ – हांं, हांं, निबटना चाहिए.

मोदी जी – क्या भ्रष्टाचार से लड़ना अपराध है ?             

भीड़ – नहींं.

अब मोदी जी थोड़ा अपना लहजा बदलते हैं. आक्रामकता के अपने सारे कदमों पर भीड़ की आम स्वीकृति लेने के बाद बलिदानी मुद्रा ओढ़ते हैं. भीड़ के दिल-ओ-दिमाग में अपनी ऐसी तस्वीर उकेरते हैं, जो भीड़ को अपनी-सी लगे.

मोदी जी – मैं आपके लिए लड़ाई लड़ रहा हूंं. ज्यादा से ज्यादा ये लोग मेरा क्या कर सकते हैंं ? आप बताईये, ये लोग मेरा क्या कर सकते हैंं ? (अब थोड़ी खामोशी. भीड़ को सोंचने का मौक़ा कि मोदी विरोधी उनके काम में कैसे कैसे अड़ंगे डाल सकते हैं और ऐसे समय उसे उनकी ढाल बन कर खड़े रहना है.) मैंं तो एक फकीर हूंं, अपना थैला उठाकर चला जाऊंगा.

भीड़ – मोदी-मोदी (के गगन भेदी नारों से पूरा माहौल गुंजायमान कर देती है).

मोदी जी – जब मैंने जनधन खाते खोलने का अभियान शुरू किया तो लोगों ने मेरा मजाक बनाया. परन्तु आज उन्हीं खातों की बदौलत सारी सुविधाएं गरीबों की झोपड़ियों के दरवाजे पर पहुंंच रही हैं कि नहींं पहुच रहीं ?

भीड़ – मोदी, मोदी, – – – चिल्लाने लगाती है.

भाजपा के हाथों चुनावों में लुटने-पीटने वाली पार्टियां, एक दूसरे की पराजय से यह सोच कर संतुष्ट हो लेती है कि पराजय का मुंंह देखने वाली वो अकेली नहीं हैं. मोदी जी भी जानते हैं कि अपने राजनैतिक अस्तित्व को बिखरता हुआ देख, वे अकेले भाजपा से लड़ते दिखने के बजाय ताकतवर भाजपा के साथ खड़ा दिख कर लोगों की नजर में, उनकी राजनैतिक हैंसियत मटियामेट होने से बची रहेगी. नीतीश और लालू ने हाथ मिलाकर बिहार में भाजपा को पराजित किया पर, अपना राजनैतिक भविष्य बनाने की चाहना के वशीभूत, लालू की पीठ में छुरा घोंपने में नीतीश को तनिक भी लज्जा का एहसास नहीं हुआ. वो भूल गए कि उन्होंने कभी बाढ़ग्रस्त बिहार की मदद के लिए, गुजरात के मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर बैठे जिस मोदी की आर्थिक मदद की पेशकश को बड़ी निर्ममता से लौटाया था, लालू को बेइज्जत करने के लिए, उसी मोदी के चरणों में नतमस्तक होने जा रहे हैं क्योंकि आज मोदी देश के प्रधानमन्त्री बन चुके हैं.

अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए पड़ोसी राजा की पीठ में छुरा घोंपने का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष लम्बा है. इसी मानसिकता की नब्ज पकड़ विदेशी आक्रान्ताओं ने एक के बाद दूसरे राज्यों को अपने अधीन कर लिया था. भाजपा ने भी उन राज्यों में सत्ता की बागडोर थाम ली जहांं वह सबसे बड़ी पार्टी बन कर नहीं उभरी थी.

चार वर्ष शान से केंद्र की सत्ता सम्भालने वाली भाजपा ने देश के 21 राज्यों में अपने साम्राज्य का विस्तार किया है. पर अब कुछ बेचैन नजर आने लगी है. प्रधानमन्त्री की हत्या, राजीव गान्धी की तरह करने की ख़बरों को जिस गम्भीरता से लिए जाने की उम्मीद थी, देश ने नहीं लिया. अन्य कारणों के अतिरिक्त, बेचैनी का एक कारण यह भी हो सकता है. मोदी के हत्या की साजिश में, महाराष्ट्र के कुछ दलित युवकों को माओवादी बताया जा रहा है, गठबंधन की भारतीय रिपब्लिकन पार्टी से मंत्री और दलित नेता रामदास आठवले, उन्हें माओवादी मानने को तैयार नहीं हैं. उनका मानना है, इसके पीछे “कोरे गांंव भीमा” मामले में उन युवकों की भूमिका को लेकर सत्ता पक्ष नाराज  हो सकता है. कुछ लोगों का यह मानना है कि मामला, दलित बनाम भाजपा न बन जाय, इसलिए उन्हें माओवादी बताया जा रहा है.

भाजपा के खिलाफ दलित, मुस्लिम और पिछड़ों के संगठित होने, कर्नाटक में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद मुख्यमन्त्री की कुर्सी एक झटके में छोड़ देने के फैसले के बाद, भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी रखते हुए तीसरे मोर्चे में, कांग्रेस की अचानक बनी स्वीकार्यता आदि भी बीजेपी में बढ़ी बेचैनी के कारण माने जा रहे हैं.

जो भी हों, कांंग्रेस मुक्त भारत की रटंत, सत्ता में पूरे चार साल पूरी हनक के साथ बैठा होने के बावजूद, हर छोटी-बड़ी कमी के लिए कांंग्रेस को दोष देते रहने को लोग कतई स्वीकार नही कर पा रहे हैं. अपनी तारीख में सबसे बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस और राजनीति में अनुभवहीन युवा के हाथ आया नेतृत्व, कांग्रेस की कमजोरी न बनकर ताकत बन रहा है. बेचैनी के कारणों में एक अहम् कारण ये भी है.

– विनय ओसवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ
सम्पर्क नं. 7017339966

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