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क्रांतिकारी नेताओं का तब और अब का आत्मसमर्पण…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 10, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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हाल ही में, मैंने माओवादी पार्टी के कुछ ‘शीर्ष’ नेताओं के सरकार के सामने आत्मसमर्पण करने के कुछ दृश्य और समाचार देखे. उन्हें देखकर, मार्क्सवाद में एकता की भावना रखने वाले एक व्यक्ति के रूप में, मैं अपने मन की बात कहना चाहता था.

जब 2000 और 2004 में माओवादी पार्टी के नेता बुर्जुआ सरकार से बातचीत करना चाहते थे, तो मैंने अखबार में पांच लेख लिखे थे. उन लेखों का सार था – ‘बातचीत सरकार से नहीं, बल्कि साथी क्रांतिकारी समूहों से होनी चाहिए.’

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इसी तरह, जब भी कोई फ़र्ज़ी मुठभेड़ हुई है – चाहे पहले हुई हो या हाल ही में – मैंने सरकार की निंदा की है; फिर से, माओवादियों के विचारों और गतिविधियों में जो गलतियां नज़र आती हैं, उन पर मैंने 5-6 लेख लिखे हैं. अब जबकि चर्चा करने के लिए बहुत सी बातें हैं, जब बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण हो रहे हैं, तो मैं सिर्फ़ उन बदलावों की बात करना चाहूंगा जो क्रांतिकारी नेताओं के आत्मसमर्पण में दिखाई दे रहे हैं.

(1) पहले जब बड़े-बड़े नेता सरेंडर करते थे, तो उनके चेहरे पर शर्म के भाव आ जाते थे. अब तो कोई शर्म ही नहीं रही – मुख्यमंत्री और पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होकर तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं, हाथ मिला रहे हैं और लाल सलाम कर रहे हैं !

इतना ही नहीं – जिस संविधान को वे ‘शोषक वर्ग का संविधान’ कहते थे – उसे अब ‘शोषक वर्ग के प्रतिनिधियों’ के हाथों से विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया जा रहा है !

(2) पहले वे कहते थे, ‘मैं बीमारी के कारण आत्मसमर्पण कर रहा हूं.’

तब यह सवाल ही नहीं उठता कि – ‘अगर यह सिर्फ बीमारी है, तो पार्टी और लोगों को बता दीजिए और समस्या हल हो जाएगी.’ सरकार के पास क्यों जाएं ?

अब वह और भी बेशर्मी से कह रहे हैं: ‘यह आत्मसमर्पण नहीं है, हम सार्वजनिक जीवन की मुख्यधारा में लौट आए हैं. हमने माओवादी विचारधारा को नहीं छोड़ा है, अब हम लोकतांत्रिक रास्ते पर लड़ेंगे.’

तो सवाल यह है- यदि आप इतने लम्बे समय से स्वदेशी लोगों के बीच काम कर रहे हैं, तो क्या वे लोग नहीं हैं ? एक भी पत्रकार यह सवाल नहीं पूछ रहा है.

(3) पहले आत्मसमर्पण के बाद इनाम की राशि बहुत देर से मिलती थी. अब ?

सरकार केवल डिमांड ड्राफ्ट सौंप रही है, यह कहते हुए कि बैंक को चेक की प्रक्रिया करने में समय लगता है.

हाहा! तो पैसे के लिए आत्मसमर्पण ? अब लोग सोच रहे हैं- ‘पैसे के लिए खरीद-फरोख्त करने वाले सिर्फ बुर्जुआ नेता ही नहीं हैं, आजकल ‘क्रांतिकारी’ नेता भी बिकने को तैयार हैं ?’

(4) पहले, जंगल में दल के सदस्य अपने हथियार छोड़कर खाली हाथ आत्मसमर्पण कर देते थे.

अब ?

अपने हथियार साफ़ किए, गुरिल्ला वर्दी पहने, मुस्कुराते हुए, वह अपना सिर झुकाता है और हथियार मुख्यमंत्री को सौंप देता है.

(5) ऐसे नेता जिन्होंने अतीत में और अब भी आत्मसमर्पण किया कहा-

‘हम लंबे समय से ग़लत थे. अब सशस्त्र संघर्ष सही रास्ता नहीं है, हम पार्टी से असहमत हैं.’

लेकिन कोई भी पत्रकार यह नहीं पूछता – ‘अगर यह गलती थी, तो इसे सुधारा जा सकता था, दूसरा रास्ता अपनाया जा सकता था. सरकार के सामने समर्पण क्यों ?’

(6) अगर वे समर्थक जिन्होंने मैदान में क्रांतिकारियों का साथ दिया और सरकार का दमन सहन किया, पूछें कि ‘यह क्या है, साथी ? इतने दिनों तक क्रांति का आह्वान करने के बाद आज आप आत्मसमर्पण कर रहे हैं ?’

पहले, जो लोग आत्मसमर्पण करते थे, वे चुप रहते थे. इसके विपरीत, वर्तमान नेता गुस्से में कह रहे हैं – ‘हैदराबाद में बैठकर यहां की समस्याओं को जाने बिना बात मत करो !’

किसी ने उन्हें आंदोलन में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया. तो अगर आप पूछें, तो यह गुस्सा क्यों ?

वे नियमित रूप से माओत्से तुंग की यह पंक्ति उद्धृत करते थे:

‘क्रांति कोई भोज नहीं है.’

इतने वर्षों के संघर्ष, बलिदान और तूफानों के लिए – जिनके लिए क्रांतिकारी उनका सम्मान करते थे – आज उन्होंने शोषक वर्ग के पैरों तले सब कुछ कुचल दिया है – यही पीड़ा है.

(7) अब वे कहते हैं:

‘कगार (ऑपरेशन) का दमन बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. हम मज़दूरों को बचाने के लिए सशस्त्र संघर्ष छोड़ रहे हैं, लेकिन हम माओवाद नहीं छोड़ रहे हैं.’

इस कथन के प्रत्युत्तर में कई प्रश्न हैं.

क्या पिछली सरकार ने ‘ग्रीन हंट’ नहीं चलाया था ? 1969 से अब तक कितने हजार मजदूर फर्जी मुठभेड़ों में मारे गये हैं ? फिर भी, क्या आत्मसमर्पण ही एकमात्र रास्ता था ?

कवि शकील बदायुनी ने लिखा: ‘आप सिर काट सकते हैं, लेकिन उसे झुका नहीं सकते.’

उमर मुख्तार – लीबियाई स्वतंत्रतासेनानी. मुसोलिनी के दमन के दौरान उन्होंने क्या किया ? उन्होंने कहा, ‘आत्मसमर्पण ? इसका कोई सवाल ही नहीं है.’ उन्हें 73 वर्ष की आयु में फांसी दे दी गयी.

वह वहां माओवादी भी नहीं था- एक आम आदमी, बस आजादी के लिए लड़ रहा है. तो क्या आज इन नेताओं को आत्मसमर्पण के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है ?

अंत में, मैं आज माओवादी पार्टी से वही कहना चाहूंगा जो मैंने 25 साल पहले (2000 में) कहा था :

मैंने लिखा-

‘जो नेता अब तक खुद को महान क्रांतिकारी के रूप में स्थापित कर रहे थे, वे अब पुलिस को अपने हाथों में सौंप रहे हैं, पैसा ले रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, ब्याज का धंधा कर रहे हैं – वे अब अपने बच्चों के कानों तक ‘मार्क्सवाद’ शब्द भी नहीं पहुँचने देते, और जन्मदिन की पार्टियां देकर उनका मनोरंजन कर रहे हैं. खुद ही पता लगाइए कि इस पतन की जड़ें कहां हैं.’

‘समझें कि आपके कार्यकर्ताओं के अनगिनत बलिदान, साहस और मौतें क्यों विफल हो रही हैं. जहां गलतियां हैं, उन्हें स्वीकार करें. उन्हें सुधारें. अहंकार, आत्म-प्रशंसा, अहंकार और व्यक्ति-पूजा किसी भी क्रांति को एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने देते.’

‘सभी क्रांतिकारी समूहों का एक ही लक्ष्य, एक ही मंज़िल है. उस लक्ष्य के लिए समर्पित लोगों का एक बड़ा वर्ग है. ज़रूरत है एकता की. चर्चा करें, फिर से करें, असफल होने पर भी फिर से करें. क्रांतिकारियों की एकता ही एकमात्र रास्ता है. आगे न बढ़ पाना कोई अपराध नहीं है, लेकिन पीछे रह जाना एक अपराध है.’

  • रंगनायकम्मा
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