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गुजरात में ट्रंप से असलियत छुपाते मोदीज

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 16, 2020
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गुजरात में ट्रंप से असलियत छुपाते मोदीज

Ravish Kumarरविश कुमार, मैग्सेस अवार्ड प्राप्त जनपत्रकार

भारत में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्या 6 करोड़ से अधिक है. झुग्गियां हमारे शहरी जीवन की क्रूर सच्चाई हैं. जहां बग़ैर पानी नाली की सुविधा के लाखों लोग ज़िंदगी बसर करते हैं और अपने सस्ते श्रम से मुंबई दिल्ली या अहमदाबाद  जैसे शहरों को सींचते हैं. अभी-अभी दिल्ली चुनाव खत्म हुआ है. बीजेपी का नारा था जहां झुग्गी वहीं मकान. 20 लाख लोगों को मकान देने के नारे के साथ बीजेपी मैदान में उतरी थी तो केजरीवाल वहां सीवर लाइन पहुंचाने और सड़क बनाने के काम के दावे के साथ मैदान में उतरे थे. एक तरह से राजधानी दिल्ली में झुग्गी बस्ती एक बड़ा मुद्दा था. मुंबई की झुग्गी बस्ती पर तो फिल्म बन चुकी है स्लम डॉग मिलनेयर. ऑस्कर भी मिल चुका है इस फिल्म को.

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तो सबको पता है भारत के शहरों के बीच में या पीछे बसी झुग्गियों की सच्चाई. फिर अहमदाबाद की एक झुग्गी न दिखे इसके लिए दीवार न बनाई जाए. नई बन रही आधी किलोमीटर लंबी यह दीवार अहमदाबाद एयरपोर्ट से गांधीनगर की ओर बनाई जा रही है. इस दीवार के पीछे सरानियावास नाम की एक झुग्गी बस्ती है. यहां के लोग अचानक से दीवार बनते देख हैरान भी हैं और चिन्तित भी. उनके आने जाने का रास्ता एक तरफ से बंद हो जाएगा. यह दीवार इसलिए बनाई जा रही है कि जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आएं तो उन्हें यह झुग्गी न दिखे.

2014 में चीन के राष्ट्रपति आए थे तब उनके रूट में पड़ने वाली बस्तियों को हरे पर्दे से कवर कर दिया गया था. इस बार दीवार बनाई जा रही है. यहां रहने वाले 2000 से अधिक लोग अलग-अलग हुनर के हैं. बस्ती में बिजली तो है मगर शौचालय से लेकर स्नान घर में पानी का कनेक्शन नहीं है. दूर से पानी लाना पड़ता है. बिजली है इनके यहां. घरों की छतें टिन की है. यहां के लोगों का कहना है कि सच्चाई छिपाने के लिए दीवार ही बनानी थी तो उनके घर ही पक्के बन जाते. फिर छिपाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. इस दीवार के बारे में मेयर को कितना पता है आप भी जान लें.

अहमदाबाद के आसमान में जब ट्रंप का विमान उतर रहा होगा और उस वक्त वे खिड़की से नीचे मौजूद झुग्गियों को देख लेंगे तो क्या हो जाएगा? तब तो दीवार बनाने का खर्चा पानी में डूब जाएगा. यही तर्क दिया जाएगा कि सुरक्षा कारणों से हो रहा है लेकिन जब चीन के राष्ट्रपति आए थे तब अस्थायी चीज़ों से ढंकने का प्रयास किया गया था. कब तक हम इन झुग्गियों को छिपाते रहेंगे. इन्हें दिखाने लायक ही बना दिया गया होता. सोचिए ट्रंप अगर ये कह दें कि वे भारत की किसी झुग्गी में जाना चाहते हैं तब क्या होगा? अमरीका के राष्ट्रपति 24 फरवरी को भारत आ रहे हैं. उनके आने से पहले अमरीका के चार सांसदों ने उन्हें पत्र लिखा है. अमरीका में इन्हें सिनेटर कहते हैं. इन चारों ने अमरीकी विदेश सचिव माइक पोम्पियो को पत्र लिखा है कि कश्मीर में छह महीने से इंटरनेट बंद है. धारा 370 हटाए जाने के बाद जम्मू कश्मीर में राजनेताओं को हिरासत में रखा गया है. नागरिकता संशोधन कानून के कारण देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं.

पत्र लिखने वाले दो सिनेटर विपक्षी दल डेमोक्रेट के हैं और दो सिनेटर सत्तारूढ़ दल रिपब्लिकन के हैं. पत्र में लिखा है कि भारत ने 70 लाख लोगों को इंटरनेट से वंचित कर रखा है, जिसका असर उनकी पढ़ाई, कारोबार और स्वास्थ्य सुविधाओं पर पड़ रहा है. पत्र लिखने वालों में से एक लिंडसे ग्राहम ट्रंप के करीबी माने जाते हैं. पत्र में लिखा गया है कि अमरीका हालात का जायज़ा ले. गिरफ्तारियों और इंटरनेट शटडाउन के क्या असर हुए हैं, इनका मूल्यांकन करे. एक सिनेटर ने लिखा है कि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स एनआरसी के कारण बड़ी संख्या में लोगों के राज्यविहीन हो जाने का अंदेशा है.

दूसरी तरफ यूपी के स्पेशल टास्क फोर्स ने डॉ. कफील खान को मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लिया था. 29 जनवरी को गिरफ्तारी हुई थी. डॉ. कफील खान को 10 फरवरी के दिन ही अलीगढ़ के सीजीएम कोर्ट ने ज़मानत का आदेश दे दिया था परंतु 72 घंटे के बाद भी डॉ. कफील की मथुरा जेल से रिहाई नहीं हुई थी. डॉ कफील के भाई ने इस मामले में मीडिया से मदद मांगी है. यूपी से ही एक और खबर है. गाज़ीपुर से है.

प्रदीपिका सारस्वत. इन्हें और इनके नौ साथियों को गाज़ीपुर में गिरफ्तार कर लिया है. गिरफ्तारी 11 फरवरी को हुई है. प्रदीपिका सत्याग्रह डॉट स्क्रॉल डॉट इन नामक हिन्दी समाचार वेबसाइट के लिए काम भी करती थीं और बाद में अलग होकर स्वतंत्र रूप से लिखती रही हैं. सत्याग्रह के संपादक संजय दुबे ने बताया कि प्रदीपिका ऐसी पत्रकार हैं कि कश्मीर को जानने समझने के लिए वहां किराये का मकान लेकर रहने लगीं. बेहद कम खर्चे में वहां रहते हुए कश्मीर पर कई रिपोर्ट फाइल कीं जो हिन्दी पत्रकारिता के लिए बिल्कुल अलग तरह की और नई रिपोर्टिंग है. प्रदीपिका ने कश्मीर पर एक उपन्यास भी लिखा है ग़र फिरदौस. प्रदीपिका आगरा की रहने वाली हैं और दिल्ली में रहती हैं. हाल ही में फिरोज़ाबाद गईं थी, जहां दिसंबर 19 के बाद नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन के दौरान जो हिंसा हुई उसकी सच्चाई ने प्रदीपिका को विचलित कर दिया. प्रदीपिका सत्याग्रहियों की उस टोली में शामिल हो गईं जिसने यूपी के चौरीचौरा से मार्च करते हुए राजघाट आने का फैसला किया है. प्रदीपिका इस यात्रा के बारे में सत्याग्रह पर लिख भी रही थीं. क्या किसी सत्याग्रही से पुलिस को इतना खतरा हो सकता है? प्रदीपिका ने अपने शामिल होने के बारे में लिखा है कि जब उसने पुलिस हिंसा पर फैक्ट फाइडिंग टीम की रिपोर्ट पढ़ी और पाया कि मारे गए 23 लोगों में चार ऐसे थे जिनकी पत्नियां गर्भवती थीं. पुलिस हिंसा की कहानी ने प्रदीपिका को झकझोर दिया.

जब उन्हें पता चला कि हिन्दू-मुस्लिम नफरत के खिलाफ सत्याग्रहियों की एक टोली बनी है तो उन्होंने उसका हिस्सा बनने का फैसला कर लिया. आज के ज़माने में जब न्यूज़ एंकर स्टूडियो में हिंसा भड़काने की भाषा बोलते हैं, कोई प्रदीपिका जैसी युवा पत्रकार भी है जो चुपचाप सत्याग्रह के रास्ते पर चल रही हैं. पत्रकारिता स्टूडियो से नहीं बचती है, वो सड़कों पर जाने से बचती है. कितनी अच्छी बात है कि प्रदीपिका और उसके जैसे नौजवान सत्याग्रह के रास्ते पर चलने का फैसला करते हैं. कहां तो डीएम को माला लेकर स्वागत करना चाहिए था, जो वो न कर सकते तो किसी और को करते देख हौसला बढ़ाना था तो उल्टा इन सत्याग्रहियों के पीछे पुलिस लगा दी गई. 2 फरवरी को यह यात्रा चौरीचौरा से शुरू हुई थी. सुबह नौ बजे से लेकर शाम तक यात्रा करते थे. शाम को आस पास के गांव में जाकर रुकते थे. ग्राम प्रधान से बात करते थे. स्कूल में रूकते थे.

गांव के लोगों का समर्थन भी मिलता था. इस दल की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि पूरी यात्रा के दौरान हर थाने से सिपाही आते थे और इनकी रिकॉर्डिंग करते थे. 11 फरवरी को गाज़ीपुर के बराही बाज़ार से इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. पहले कहा गया कि इन्हें डिटेन किया जा रहा है, लेकिन अब जेल भेज दिया गया है. खबर है कि गिरफ्तार सभी सत्याग्रही आमरण अनशन पर बैठ गए हैं. प्रियेश, मुरारी, राज अभिषेक, अनंत प्रकाश, नीरज राय, अतुल यादव, मनीष शर्मा, शेष नारायण ओझा, रविंद कुमार रवि हैं. बरही बाज़ार में ये सभी पर्चे बांट रहे थे. खुद को गांधीवादी बताते हैं. इनके साथी इन्हें छुड़ाने का प्रयास कर रहे हैं मगर कोई सफलता नहीं मिली है. ज़िलाधिकारी से मिलते हैं तो जवाब नहीं मिलता है. पुलिस से पता करते हैं तो पता नहीं चलता है.

हमने 12 फरवरी को नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के बारे में एक खबर दिखाई थी. वहां भी ऐसे शानदार छात्र सफाई कर्मचारियों की लड़ाई लड़ रहे हैं. लॉ यूनिवर्सिटी के ये छात्र 40 दिनों से इन कर्मचारियों की लड़ाई में साथ दे रहे हैं. उनके लिए पोस्टर बैनर लिखते हैं, नारे गढ़ते हैं और नैतिक समर्थन देते हैं. 13 फरवरी की शाम को वे दिल्ली सरकार के पूर्व श्रम मंत्री गोपाल राय से मिलने गए हैं. यह बात आश्वस्त करने वाली है कि कानून के ये विद्यार्थी किसी की आवाज़ बन रहे हैं. मीडिया के शोर से दूर 39 दिनों तक किसी धरने में शामिल होना बताता है कि इन नौजवानों में लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी को लेकर किस तरह से समझ बन रही है. हमने तब भी कहा था कि कॉलेज का पक्ष नहीं है. लॉ यूनिवर्सिटी की तरफ से ई मेल आया है कि उनका पक्ष न होने का खेद है. जीएन बाजपेई ने लिखा है कि एक तो 39 दिनों से पूर्ण रूप से प्रदर्शन नहीं चल रहा है. दिन में एक दो घंटे के लिए प्रदर्शन होता है. क्लास भी समय से हो रहे हैं. यह कहना कि सफाई कर्मचारियों को निकाल दिया गया. उनकी जगह किसी और को रख लिया गया सही बात नहीं है. इसमें पूरे तथ्य नहीं आए हैं. यूनिवर्सिटी ने कहा है कि कभी भी किसी हाउसकीपिंग स्टाफ को टर्मिनेट नहीं किया गया है. इन्हें सर्विस प्रोवाइट ने काम पर रखा था. यूनिवर्सिटी सर्विस प्रोवाइडर की सेवा लेती है. तो निकालने की बात जहां तक है वो सर्विस प्रोवाइडर यानी ठेकेदार ने निकाला. यूनिवर्सिटी ने किसी भी सफाई कर्मचारी को नियुक्त नहीं किया है. नियुक्ति पत्र नहीं दी है. इसलिए यह प्रश्न नहीं उठता कि यूनिवर्सिटी उन्हें नोटिस जारी करेगी.

तय प्रक्रियाओं का पालन करते हुए नए कॉन्ट्रैक्टर को रखा गया है. नए कॉन्ट्रैक्टर की कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वो पुराने सफाई कर्मियों को काम पर रखे. फिर भी यूनिवर्सिटी ने नए कॉन्ट्रेक्टर से कहा है कि पुराने लोगों में से कम से आधे को काम पर रख ले. यूनिवर्सिटी चाहती है कि किसी तरह से पुराने सफाई कर्मियों को काम दे दिया जाए. यही चुनौती है. कॉन्ट्रैक्टर सिस्टम वो सिस्टम है जिसके लिए सिस्टम ज़िम्मेदार नहीं होता. वो बस कॉन्ट्रैक्टर को ठेका देता है या कॉन्ट्रैक्टर बदल देता है. सफाई के काम की तो रोज़ ज़रूरत होती है तो फिर अस्थायी तौर से रखने का क्या मतलब? लेकिन यह प्रश्न यूनिवर्सिटी और सरकार के स्तर पर उनसे भी है जो ऐसी नीतियां बनाते हैं. जिससे लाखों लोग परेशान हैं. उनकी लड़ाई कोई नहीं लड़ता है. इस बीच जेएनयू में हुई हिंसा के 40 से भी ज़्यादा दिन बीत गए हैं, लेकिन तमाम वीडियो और तस्वीरों में हथियार लेकर दिख रहे लोगों के बावजूद अभी तक दिल्ली पुलिस किसी को गिरफ़्तार नहीं कर पाई है..

कोरोना वायरस के कारण इस बुधवार को चीन में 242 लोगों की मौत हो गई. एक दिन में 242 लोगों की मौत. मंगलवार यानी 11 फरवरी को 121 लोगों की मौत हुई थी. दिसंबर के आखिरी हफ्ते से लेकर अभी तक 1355 लोगों की मौत हो चुकी है. चीन में ही इस वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 60,000 से अधिक हो चुकी है. चीन के अलावा यह वायरस दुनिया के 25 देशों में पहुंच चुका है. चीन के बाहर फिलिपिन्स, हांगकॉन्ग और जापान में एक-एक लोगों की मौत हुई है. चीन से आने वाली खबरों की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

वुहान प्रांत से रिपोर्ट करने वाला सिटिजन जर्नलिस्ट गायब हो गया है. इसके पहले एक और पत्रकार के गायब होने की खबर आई थी, जिसने अपने रिस्क में जानकारी देने का प्रयास किया था. फांग बिन कपड़ा व्यापारी है. पहले इन्होंने वीडियो पोस्ट किया था, लेकिन अचानक अब इनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है. शुक्रवार को भी एक सिटिजन जर्नलिस्ट वीडियो पोस्ट करने के बाद से लापता हो गया. वुहान प्रांत में ही कोरोनो वायरस का कहर टूटा था. यह शहर अब भुतहा हो गया है. यहां से आने वाली खबरें अब थम चुकी हैं. चीन के सरकारी मीडिया के अनुसार 1400 मिलिट्री स्वास्थ्य कर्मियों को वुहान भेजा गया है. इन्हें 11 विमानों में भरकर लाया गया था. चीन भले ही खबरों को रोक रहा हो, लेकिन जो संख्या बाहर आ रही है वो भी कम चिन्ताजनक नहीं है. 10 लाख आबादी वाला शहर ख़ाली है. आप कल्पना करें इस आबादी का कोई शहर पूरा खाली हो जाए. 1 करोड़ 11 लाख की आबादी वाले शहर की सड़कें सुनसान हो चुकी हैं. लोगों को घर में बंद किया गया है, ताकि वे बाहर न आएं और संक्रमण के शिकार न हों.

चीन इस वायरस से कैसे लड़ रहा है, इसके डिटेल बहुत ज़्यादा नहीं हैं लेकिन बाकी दुनिया किस तरह से भयभीत है इसकी बात समझ आती है जब आप चीन से आने वाले समुदी जहाजों की कहानी के बारे में पढ़ते हैं. बीमारी का खौफ इतना ज़्यादा है कि समुद्री सीमा से सटे देश अपने बंदरगाहों से चीन की तरफ से आने वाले जहाज़ों को शरण नहीं दे रहे हैं. वेस्टरडम नाम के इस जहाज़ को पांच-पांच देश ने अपने बंदरगाह से लगने की इजाज़त नहीं दी. यह जहाज़ 1 फरवरी को हॉन्गकॉन्ग से चला था. इस पर कई देशों के पर्यटक सवार हैं. यहां तक कि फिलिपिन्स ने इसे अपनी सीमा में आने से मना किया, जबकि इस पर फिलिपिन्स के भी नागरिक सवार हैं. थाईलैंड, ताईवान, जापान और गुआम ने भी मना किया है. जहाज़ चलाने वाली कंपनी का कहना है कि सभी यात्री ठीक हैं और किसी को वायरस का संक्रमण नहीं हुआ है. यात्रियों ने वीडियो भेजा है कि वे पूरी तरह से मस्ती कर रहे हैं. कॉमेडी शो देख रहे हैं. व्यायाम कर रहे हैं. संगीत सुन रहे हैं. हर तरह का एहतियात भी बरत रहे हैं. पांच देशों के मना करने के बाद कंबोडिया ने कहा है कि वह इस जहाज़ को अपने बंदरगाह पर ठिकाना देगा. इस जहाज़ पर कुल 2257 लोग सवार हैं.

लेकिन डायमंड प्रिंसेस नाम के जहाज़ पर यह संक्रमण तेज़ी से यात्रियों को चपेट में ले रहा है. इस जहाज़ को जापान के बंदरगाह शहर योकोहामा में डॉक किया गया है यानी रोका गया है. यह जहाज़ भी वेस्टरडम की तरह हॉन्गकॉन्ग से चला था. इस पर सवाल एक अस्सी साल के बुजुर्ग को संक्रमण हो गया था. कुल मिलाकर इस पर सवाल 219 लोगों को संक्रमण हो गया है. जिसमें 15 लोग चालक दल के भी सदस्य हैं. आधे स्टाफ फिलिपिन्स के हैं. जिस तेज़ी से यात्रियों के बीच संक्रमण बढ़ रहा है ज़ाहिर है उनकी परेशानियां भी बढ़ रही होंगी. जापान की हेल्थ अथॉरिटी का कहना है कि 44 और नए लोगों को संक्रमण हो गया है. जहाज़ पर 2670 यात्री और 1100 चालक दल सवार है. जहाज़ को क्वारेनटाइन किया गया है. चालक दल के परिवार वाले भी चिन्तित हैं कि अगर इस रफ्तार से बीमारी फैलती रही तो उनके परिजनों का क्या होगा? यात्री मदद मांग रहे हैं. जिन यात्रियों का टेस्ट पॉजिटिव निकला है उन्हें जापान के अस्पताल में रखा गया है. इस जहाज़ पर एक भारतीय महिला भी है, सोनाली. मोनीदीपा ने सोनाली से बात की है. सोनाली इस जहाज़ पर सुरक्षा अधिकारी हैं. सोनाली के बारे में पहले गलत खबर आई थी कि इनका टेस्ट पॉजिटिव निकला है, मगर सोनाली कहती हैं कि उनकी जांच तो हुई है, लेकिन पॉजिटिव नहीं निकला है. यानी कोरोना वायरस नहीं हुआ है. सोनाली ठक्कर मुंबई की रहने वाली हैं. हमारी सहयोगी मोनीदीपा ने सोनाली से बात की है. सोनाली का कहना है कि तीन भारतीय की भी जांच हुई है.

विदेश मंत्री ने एस जयशंकर ने ट्वीट किया है इस जहाज़ पर सवार भारतीयों से संपर्क हो गया है. उन्हें हर तरह की मदद देने की कोशिश हो रही है. भारत सरकार ने ढाई लाख से अधिक लोगों की स्क्रीनिग की है. बाहर के देशों से आने वाले खासकर चीन की तरफ से आने वाले यात्रियों की जांच की जा रही है. भारत के विदेश मंत्री ने ट्वीट किया है कि दो लोगों के टेस्ट पॉजिटिव निकले हैं. यानी उन्हें संक्रमण हुआ है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को किसी भी आतंकवादी हमले से ज़्यादा घातक है.

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