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आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 2

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 5, 2026
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आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 2
आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 2

संघ अपनी सार्वजनिक व्याख्याओं में ऐसे आयोजनों को समान विचारधारा वाले संगठनों का ढीला-ढाला गठबंधन बताता है जो हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सामाजिक सेवा की समान भावना से जुड़े हैं. किंतु वास्तविकता में, ये संयुक्त आयोजन, साझा कार्यालय और समान पदाधिकारी इस ओर संकेत करते हैं कि यह एक केंद्रीकृत नौकरशाही ढांचा है. इस ढांचे में भूमिकाएं और पद बहुत औपचारिक हैं और समन्वय बैठकों जैसी और भी केंद्रीकृत मीटिंग्स होती हैं. इसके साथ ही ‘अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल’ ऐबीपीएस एबीपी जैसी नेतृत्व बैठकों में मेंगी जैसे पदाधिकारी शामिल होते हैं, जो इस केंद्रीकरण को और स्पष्ट बनाता है.

वेद मंदिर परिसर इस प्रकार संघ की व्यापक रणनीति का एक सूक्ष्म प्रतिरूप है, ऐसी रणनीति जिसमें वह अनेक संगठनों को जन्म देता है जो एक जटिल नौकरशाही तंत्र के माध्यम से संचालित होते हैं. ऊपर से देखने पर ये 20 से अधिक संस्थाएं अलग-अलग लगती हैं गोया वे भिन्न क्षेत्रों और उद्देश्यों में कार्यरत स्वतंत्र इकाइयां हों, पर वास्तव में ये एक घनी, सुव्यवस्थित और एक-दूसरे की पुनरावृति करती संस्थाओं का समूह हैं. जब निर्णय लेने वाले वही लोग हों, उद्देश्य वही हों, संगठनात्मक ढांचा एक जैसा हो, नेतृत्व एक ही दिशा से आता हो और अनुशासन एक ही केंद्र से संचालित हो, तो संघ को किसी ढीले-ढाले समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक एकीकृत नेटवर्क के रूप में ही समझा जा सकता है.

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यह संरचना संघ की पारदर्शिता और जवाबदेही पर कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है. उदाहरण के लिए, इस समूह की सात संस्थाएं अपने-आप को एक ही कार्य में लगी बताती हैं : किसी विद्यालय या छात्रावास के संचालन में. जबकि उतनी ही सेवा-संस्थाएं भी समान गतिविधियों का दावा करती हैं. कुछ संस्थाएं देश के भीतर सहानुभूति-आधारित ट्रस्टों या कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के माध्यम से धन जुटाती हैं, जबकि अन्य संस्थाएं विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम 2010 के तहत विदेशी निधि प्राप्त करती हैं. इन सभी का लेखा-जोखा रखना किसी भी पर्यवेक्षक के लिए उलझनभरा है और संघ का यही उद्देश्य है.

लेकिन मुद्दा सिर्फ़ इतना नहीं है कि संघ ढेरों नाममात्र की संस्थाओं के एक उलझे हुए संजाल के ज़रिए काम करता है. वेद मंदिर का उदाहरण और व्यापक रूप से हमारा पूरा शोध एक और गहरी, बुनियादी बात सामने लाता है. अगर मोटे अनुमान से देखें, तो जम्मू-कश्मीर जैसे पूरे राज्य में संघ की आधे से अधिक मौजूदगी सिर्फ़ 10 एकड़ की एक संपत्ति से जुड़ी हुई निकलती है, तो फिर संघ को समझने के हमारे मूल आधार और वह स्वाभाविक जन-उभार जिसकी प्रेरणा देने का वह दावा करता है, उन पर नए सिरे से विचार करने की ज़रूरत है. हमें संघ की बुनियादी संरचना, उसके पूरे ढांचे की जड़ों तक लौट कर उसे फिर से परखना होगा.

जैसे-जैसे हमने संघ के संबंधों की परतें खोलीं, यह स्पष्ट होता गया कि वेद मंदिर कोई अपवाद नहीं था. जम्मू में जो संरचना हमने देखी, वैसी ही लगभग संघ के प्रत्येक 46 प्रांतों (प्रांत = प्रांतीय इकाई) में मौजूद है. ये प्रांत 11 क्षेत्रों में विभाजित हैं और इन पर विभिन्न नौकरशाही पदों वाले अधिकारी नज़र रखते हैं जैसे प्रांत प्रचारक (संघ के मिशनरी), प्रांत कार्यवाह (सामान्य सचिव) और प्रांत संघचालक (क्षेत्रीय प्रमुख). हर प्रांत में संघ की प्रमुख शाखाओं के स्थानीय रूपांतर भी मौजूद हैं. मसलन, ‘विद्या भारती’ पंजाब में ‘सर्वहितकारी शिक्षा समिति’ के रूप में कार्य करती है, ‘सेवा भारती’ दक्षिण कर्नाटक में ‘हिंदू सेवा प्रतिष्ठान’ बन जाती है और ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ झारखंड में ‘वनवासी कल्याण केंद्र’ के रूप में काम करती है.

इन सहयोगी संगठनों को आगे नई सहायक संस्थाएं बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जो स्वयं भी अपनी उप-संस्थाएं बनाती हैं. उदाहरण के लिए, हमने ‘12 राणा स्मारक छात्रावास’, सितारगंज (उत्तराखंड) को संघ से चार स्तरों के संबंधों के माध्यम से जुड़ा पाया. यह ‘12 राणा स्मारक समिति’ द्वारा स्थापित था, जिसे ‘सेवा प्रकल्प संस्थान’ ने शुरू किया था, जो ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ की उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इकाई का नाम है और ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ स्वयं आरएसएस की औपचारिक रूप से मान्य लगभग तीन दर्जन शाखाओं में से एक है.

सिविल सोसाइटी का एक इतना व्यापक नेटवर्क बनाने का यह तरीका सामान्य राजनीतिक नेटवर्क से बिल्कुल अलग है. आमतौर पर राजनीतिक संगठन पहले से मौजूद संस्थाओं के साथ गठबंधन बनाते हैं, लेकिन यहां रणनीति उलटी है. यहां नेटवर्क फैलाने के लिए नई-नई संस्थाएं जानबूझ कर बनाई जाती हैं और साथ ही यह सुनिश्चित किया जाता है कि उनका नाता एक केंद्रीय नेतृत्व से मज़बूती से जुड़ा रहे. मैंने इसे अपने अन्य लेखन में ‘संगठनात्मक प्रसार’ कहा है यानी बड़ी संख्या में ऐसे प्रॉक्सी सिविल सोसाइटी संगठनों का रणनीतिक निर्माण, जिनके ज़रिए केंद्रीय नेतृत्व गोपनीय रूप से एक जटिल तरह के कामों के बंटवारे को संचालित कर सके.

यह संगठनात्मक प्रसार संघ के लिए स्नोबॉल प्रभाव पैदा करता है : नेटवर्क लगातार फैलता जाता है पर नियंत्रण संघ के हाथों में ही रहता है. परिणामस्वरूप, एक ऐसा तंत्र बनता है जिसमें सैकड़ों संस्थाएं मौजूद हैं, पर उनकी सीमाएं धुंधली या अदृश्य हैं. जैसे जम्मू के मामले में ये सीमाएं ग़ायब थीं, वैसे ही हमने भारत के लगभग हर हिस्से में यह प्रवृत्ति देखी. जैसे बेंगलुरु में ‘अभ्युदय’ (जिसे ‘केशव कृपा संवर्धन समिति’ भी कहा जाता है) का कार्यालय सेवा भारती, यूथ फॉर सेवा और विद्या चेतना के साथ साझा है, वहीं अकोला में ‘आदर्श संस्कार मंडल’ का कार्यालय ‘डॉ. हेडगेवार रक्तपेढ़ी’ (ब्लड बैंक सेवा) के साथ एक ही परिसर में है. कुछ मामलों में तो यह पूरी तरह स्पष्ट है जैसे ‘छिन्न्ना भंडारा जनकम्मा संजीव राव एजुकेशनल चैरिटेब ट्रस्ट’, ‘सेवा भारती ट्रस्ट’, और ‘देश सेवा समिति कदथनाड’ सभी के कार्यालय उनके अपने स्थानीय संघ कार्यालयों के भीतर ही स्थित हैं.

वास्तव में, ये पैटर्न हज़ारों किलोमीटर दूर तक समान रूप से दिखाई देते हैं संयुक्त राज्य अमेरिका के टेक्सस राज्य के ह्यूस्टन के पश्चिमी उपनगरों तक, जहां ‘स्टार पाइप प्रोडक्ट्स’ नामक एक कंपनी के स्वामित्व वाला एक वेयरहाउस, जो अमेरिका में संघ से घनिष्ठ रूप से जुड़ी भूतड़ा परिवार की संपत्ति है ‘केशव स्मृति’ के नाम से जाना जाता है. संघ की शाखा हिंदू स्वयंसेवक संघ के पैम्फलेटों के अनुसार, ‘केशव स्मृति’ ‘एचएसएस का दक्षिण-पश्चिम ह्यूस्टन कार्यालय है अर्थात आरएसएस की प्रवासी इकाई का मुख्य केंद्र. इस संस्था के उपाध्यक्ष लंबे समय से रमेश भूतड़ा हैं. लेकिन यही पता वीएचपी ऑफ अमेरिका के आधिकारिक पते के रूप में भी ऑनलाइन निर्देशिकाओं में सूचीबद्ध है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका में संघ की ये दो सबसे बड़ी इकाइयां वास्तव में अलग-अलग संगठन भी मानी जा सकती हैं?

मामला इससे भी अधिक जटिल है. ‘4018 वेस्टहॉलो पार्कवे’ वाला यह पता कम-से-कम आधा दर्जन अन्य संघ-संबद्ध संगठनों से जुड़ा हुआ है यह एसवीवाइएएसए (एक योग संस्था, जिसकी सह-स्थापना भूतड़ा ने की थी और जो मोदी से निकट संबंध रखती है) का पता है. यही पता ‘हिंदुज़ ऑफ़ ग्रेटर ह्यूस्टन’ नामक स्थानीय संघ-नियंत्रित संस्था का मुख्यालय भी है, यही स्थान वीएचपी अमेरिका और हिंदू स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित अनेक युवा शिविरों का स्थल रहा है जहां भारत से आए संघ नेताओं, जैसे निवेदिता भिड़े के भाषण भी हुए हैं. और यही पता ‘सेवा इंटरनेशनल’ का भी है जो एक ऐसी फंडरेज़िंग संस्था है, जिसे हिंदू स्वयंसेवक संघ गुप्त रूप से संचालित करता है, जो अनजान दानदाताओं से करोड़ों डॉलर जुटाती है. इन्हीं में से एक दान 2021 में पूर्व ट्विटर प्रमुख जैक डोरसी का 25 लाख डॉलर का अनुदान था जो बाद में भारत में संघ-संबंधित परियोजनाओं तक पहुंचा.

भूतड़ा परिवार के प्रभाव के निशान संघ नेटवर्क में भौगोलिक सीमाओं से परे तक फैले हुए हैं. उदाहरण के लिए, गुजरात के राजकोट में स्थित ‘स्टार पाइप फाउंड्री’ जो भूतड़ा परिवार की ही कंपनी है, संघ-संबद्ध ‘विज़न इंडिया फाउंडेशन’ (जिसका नाम अब ऋषिहुड यूनिवर्सिटी है) का प्रमुख प्रायोजक है. यह संस्था अपने ‘इंटीग्रल ह्यूमनिज़्म इनिशिएटिव’ के माध्यम से संघ विचारक दीनदयाल उपाध्याय के ‘दर्शन के प्रसार’ का काम करती है.

‘केशव स्मृति’ का पता ही भूतड़ा फ़ैमिली फाउंडेशन का पता भी है जो कई अन्य संघ-संबद्ध संगठनों को भारी वित्तीय सहायता देता है. यही धनराशि अमेरिका की राजनीति में भी ‘हिंदू अमेरिका पोलिटिकल एक्शन कमिटी’ के माध्यम से लगाई जाती है, जो संघ-संबद्ध नेताओं को चुनावी चंदा देती है. हिंदू अमेरिका पॉलिटिकल एक्शन कमिटी की सिस्टर संस्था हिंदू अमेरिका फाउंडेशन है, एक लॉबिंग समूह जिसने लंबे समय से संघ के हितों के लिए पैरवी की है. रमेश भूतड़ा के बेटे ऋषि भूतड़ा और उनकी चचेरी बहन कविता पलोड़ दोनों इस फाउंडेशन के लंबे समय से बोर्ड सदस्य हैं.

रमेश स्वयं कई अन्य संस्थाओं के निदेशक हैं : ‘परम शक्ति पीठ ऑफ़ अमेरिका’ (जो संघ विचारक साध्वी ऋतंभरा के लिए धन एकत्र करती है), ‘हिंदू सोसाइटी ऑफ़ अमेरिका’ (जिसे वह अन्य एचएसएस अधिकारियों के साथ चलाते हैं) और ‘पतंजलि योगपीठ फाउंडेशन’ (जो स्वामी रामदेव की प्रवासी शाखा के रूप में कार्य करती है).

रमेश भूतड़ा का भारत आकर ‘विश्व संघ शिविर’ में भाग लेना, जो प्रवासी स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण के लिए आयोजित होता है, यह दर्शाता है कि आरएसएस का समन्वय तंत्र वैश्विक स्तर तक फैला हुआ है. भूतड़ा परिवार का यह जाल कोई अमेरिकी अपवाद नहीं है. हमारे डेटा सेट ने यह बार-बार दिखाया कि बहुत सीमित संख्या में व्यक्ति ख़ासतौर पर प्रचारक संघ नेटवर्क में अत्यधिक प्रभाव रखते हैं. उदाहरण के लिए, भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस), जो संघ की मज़दूर शाखा है, मुख्यतः दत्तोपंत ठेंगड़ी की देन है जो आज भी हर बीएमएस इकाई में सम्मानपूर्वक याद किए जाते हैं. बीएमएस जैसे अनेक संघ-संगठन मूलतः वामपंथी श्रमिक आंदोलनों के जवाब में बनाए गए प्रतिक्रियात्मक संगठन थे. परंतु इन पर अभी भी बहुत कम शोध हुआ है और इनकी वास्तविक शक्ति अस्पष्ट है. उदाहरण के तौर पर बीएमएस अपने 5,000 संबद्ध यूनियनों में एक करोड़ सदस्यों का दावा करता है, परंतु इस दावे के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है.

केरल में भी यह संरचना स्पष्ट दिखती है. प्रचारक पी. परमेश्वरन, जिन्होंने 25 वर्षों तक ‘विवेकानंद केंद्र’ का नेतृत्व किया, और न केवल केसरी (संघ का मुखपत्र) की स्थापना की, बल्कि भारतीय विचार केंद्रम (थिरुवनंतपुरम स्थित संघ थिंक टैंक), उसकी त्रैमासिक पत्रिका प्रगति, इंटरनेशनल फोरम फॉर इंडिया’ हेरिटेज (एक और थिंक टैंक) और गीता स्वाध्याय समिति (भगवद्गीता प्रचार हेतु मंच) सभी की स्थापना और नेतृत्व में भूमिका निभाई

इन सभी उदाहरणों और इनके बीच के घने संबंध हमें एक ही निष्कर्ष की ओर लेकर गए कि संघ हमेशा से एक एकीकृत राजनीतिक जीव की तरह कार्य करता रहा है, जिसे उसी नेतृत्व ने सावधानीपूर्वक निर्मित किया, जो बाहर की दुनिया में इसे ‘विकेंद्रीकृत’ बताता है. बेशक, इस इकाई के भीतर विविधताएं, प्रतिस्पर्धाएं और अलग-अलग स्वार्थ मौजूद हैं पर जब आप सतही धुंध को हटाकर देखें, तो संघ की उंगलियों के निशान हर जगह मिलते हैं, ‘केशव’ जैसे नामों में, प्रमुख पदों पर आरएसएस अधिकारियों में और प्रवासी निधियों के उन प्रवाहों में, जो संघ तक लौटते हैं.

संघ स्वयं भी यह भली-भांति जानता है कि वह क्या है और स्वयं को कैसे देखता है. यदि हम उसके बाहरी दिखावे से ध्यान हटा कर, उसके आंतरिक प्रकाशनों की भाषा पर ग़ौर करें, तो स्पष्ट होता है कि वह स्वयं को संघ समर्थक की एकल राजनीतिक इकाई के रूप में देखता है. जयप्रसाद लिखते हैं :

‘ये सभी संबद्ध संगठन आरएसएस के नियंत्रण में हैं. इनका दोहरा उद्देश्य है, पहला, आरएसएस के विचारों का प्रसार और दूसरा, अपने-अपने वर्गों के हितों की रक्षा. ये संगठन अपने दैनिक कार्यों में स्वतंत्र प्रतीत होते हैं, परंतु ये सभी आरएसएस के निर्देशन और नियंत्रण में कार्य करते हैं.’

इसी तरह, आरएसएस के आदिवासी राजनीति के साथ संबंध पर चर्चा करते हुए संघ विश्लेषक एम. जी. चितकारा हमें बताते हैं :

‘वनवासी कल्याण आश्रम कोई ग़ैर-राजनीतिक एनजीओ नहीं, बल्कि इसे ईसाई धर्मांतरण रोकने के लिए स्थापित किया गया था. यह अन्य सभी की तरह एक आरएसएस संगठन है, जो प्रशिक्षित आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा संचालित होता है.’

संघ स्वयं को समाज के एक ‘सजीव जैविक अंग’ के रूप में देखता है. यह ऑर्गेनिसिज़्म एक कट्टर दक्षिणपंथी विचारधारा है जिसमें समाज को एक प्राकृतिक, एकीकृत जीव माना जाता है और जिसमें अल्पसंख्यक’ या ‘विदेशी तत्व’ अवांछनीय और निष्कासन योग्य माने जाते हैं. इस जीव को अक्सर बीमार बताया जाता है जिसे ‘राष्ट्रीय पुनर्जागरण’ हेतु उपचार की आवश्यकता है. चाहे वह रानाडे के ‘दूषित रक्त’ की बात हो, चितकारा के ‘घाव’ की, या गोलवलकर के ‘फोड़े’ की, संघ स्वयं को इस ‘शरीर’ की प्रतिरक्षा प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करता है, जो इसे शुद्ध कर सकता है. संघ का उद्देश्य है इस शरीर को शुद्ध करना और अंततः स्वयं उसी शरीर में परिवर्तित हो जाना. संघ के नेताओं के लिए ‘संगठन’ मात्र साधन नहीं, बल्कि लक्ष्य है और हिंदू राष्ट्र की प्राप्ति का मार्ग भी.

इसलिए यह ‘जैविक दृष्टिकोण’ केवल रूपक नहीं है. यह संघ की संगठनात्मक व्यवस्था और उसकी सोच का एक केंद्रीय सिद्धांत है, जो इसके घोषित लक्ष्य ‘संघ समाज बनेगा’ का हिस्सा है यानी संघ स्वयं समाज का रूप लेगा. संघ यह समझता है कि विभिन्न संगठनों को जन्म देना संगठनात्मक एकता के साथ असंगत नहीं है.

यह बात आरएसएस के नेताओं द्वारा बार-बार दोहराई गई है, जैसे कि संस्थापक डॉक्टर के.बी. हेडगेवार ने कहा :

‘समय के साथ, आरएसएस का उद्देश्य यह होना चाहिए कि आरएसएस समाज के भीतर एक संगठन न हो, बल्कि समाज स्वयं का संगठन बने.’

गोलवलकर के अनुसार, ‘संघ ने कभी भी समाज से अलग या स्वतंत्र कोई संगठन खड़ा करने का विचार नहीं किया. अपने आरंभ से ही संघ ने स्पष्ट रूप से यह लक्ष्य तय किया था कि वह केवल समाज के किसी एक हिस्से को नहीं, बल्कि पूरे समाज को एक संगठित रूप में ढालना चाहता है.’

वर्तमान आरएसएस प्रवक्ता सुनील अंबेकर के अनुसार, ‘संघ नेटवर्कों का एक जाल है. समाज में जिन कई मुद्दों के लिए हस्तक्षेप आवश्यक है, उनका समर्थन करने के लिए कितने भी संगठनों की स्थापना की जा सकती है, इसकी कोई सीमा नहीं है.’

  • फीलिक्स पाल यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लेक्चरर हैं.
    कारवां पत्रिका से साभार

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