
पंकज कुमार जाट
साहब कहते हैं कि हमने 2014 के 74 एयरपोर्ट्स को 2026 में 160+ कर दिया, लेकिन ये जनता की आंखों में धूल झोंकने वाली ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ है. सीएजी (CAG) की ताजा रिपोर्ट इस झूठ की धज्जियां उड़ाती है.
CAG के मुताबिक इनकी बहुप्रचारित ‘उड़ान’ योजना के तहत आवंटित 52% रूट्स कभी शुरू ही नहीं हो पाए और जो शुरू हुए, उनमें से केवल 30% ही 3 साल टिक सके.
जनता की जेब से ₹1,089 करोड़ लूटने के बाद भी 83 एयरपोर्ट और हेलीपैड आज खंडहर बन चुके हैं क्योंकि वहां कोई फ्लाइट नहीं चलती, इन्होंने बस बंद पड़ी पट्टियों और वाटर एयरोड्रम्स को कागजों पर एयरपोर्ट दिखाकर अपनी पीठ थपथपा ली.
70 साल में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे असली विश्व-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे बने थे, जिन्हें आज इस सरकार ने ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के तहत चुपचाप अडानी समूह जैसे अपने खास मित्रों की झोली में डाल दिया है.
सड़कों के मामले में भी 2014 के 1,000 किमी से 2026 में 6,700 किमी एक्सप्रेसवे का दावा पूरी तरह से एक फ्रॉड है, जो सिर्फ ‘लेन-किलोमीटर’ की नई परिभाषा गढ़ने से पैदा हुआ है. पहले जहां मुख्य हाईवे की लंबाई मापी जाती थी, वहीं अब एक ही सड़क की चारों लेनों को अलग-अलग गिनकर आंकड़ों को चार गुना फुलाकर दिखाया जा रहा है.
सामान्य 4-लेन नेशनल हाईवे को ‘एक्सप्रेस-वे’ का फर्जी टैग दिया जा रहा है. देश गवाह है कि बिना किसी प्रोपेगेंडा के ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ जैसी विशाल और मजबूत योजनाएं पहले लागू की गई थीं, जबकि आज के ये कथित आधुनिक बुंदेलखंड और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पहली ही बारिश में धंस जाते हैं और बीच सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे हो जाते हैं.
विकास के नाम पर आज भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) पर ₹3.4 लाख करोड़ से अधिक का कर्ज है, और जनता से प्रतिदिन रिकॉर्ड ₹150+ करोड़ का टोल टैक्स वसूल कर उनकी जेबें सरेआम काटी जा रही हैं.
मेट्रो नेटवर्क को 5 शहरों से बढ़ाकर 20+ शहरों में पहुंचाने का दावा भी महज एक राजनीतिक छलावा और फीता काटू संस्कृति का उदाहरण है. छोटे-छोटे टियर-2 शहरों में चुनाव जीतने के लिए महज 2 से 5 किलोमीटर के टुकड़ेनुमा और अधूरे रूट बनाकर केवल वोट बटोरने के लिए उद्घाटन कर दिए गए हैं.
असलियत यह है कि भारत में मेट्रो की मजबूत और व्यावहारिक नींव पहले ही रखी जा चुकी थी, और आज जो 390 किलोमीटर से ज्यादा लंबी दिल्ली मेट्रो देश की लाइफलाइन है, वह पूर्ववर्ती सरकारों की दूरदर्शी सोच का ही नतीजा है, जिसने मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसी मेगा परियोजनाओं को मंजूरी और हजारों करोड़ का फंड दिया था. आज के छोटे शहरों की ये अधूरी मेट्रो प्रणालियां भारी आर्थिक घाटे में चल रही हैं, जहां पैसेंजर फुटफॉल न के बराबर है और ये सिर्फ प्रधानमंत्री की राजनीतिक रैलियों और विज्ञापनों के लिए बैकड्रॉप का काम कर रही हैं.
डिफेंस एक्सपोर्ट को ₹700 करोड़ से ₹23,000 करोड़ पहुंचाने का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार इस सच को छुपा जाती है कि भारत आज भी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक (Arms Importer) बना हुआ है और कुल रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों को जाता है.
इस ₹23,000 करोड़ के निर्यात में कोई स्वदेशी फाइटर जेट, पनडुब्बी या मिसाइलें शामिल नहीं हैं, बल्कि यह निजी कंपनियों द्वारा सप्लाई किए जाने वाले छोटे कलपुर्जे (Sub-components), बुलेटप्रूफ जैकेट और विदेशी हथियारों के गिने-चुने पार्ट्स का कुल योग है.
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की असली रीढ़ यानी एचएएल (HAL), डीआरडीओ (DRDO) और इसरो (ISRO) जैसी संस्थाएं हैं, जिन्होंने देश को क्रायोजेनिक इंजन से लेकर सुखोई और तेजस तक की क्षमता दी. वर्तमान सरकार ने इन सरकारी संस्थानों के बजट में कटौती की और इन्हें पंगु बनाकर रक्षा सौदों का ठेका भी निजी उद्योगपतियों की नई-नवेली कंपनियों को दे दिया.
इस पूरे प्रोपेगेंडा का सबसे सफेद झूठ यह है कि 2014 से पहले डिजिटल पेमेंट ‘नहीं था’, जबकि देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि 2014 से पहले आरटीजीएस (RTGS), एनईएफटी (NEFT), आईएमपीएस (IMPS) और करोड़ों डेबिट-क्रेडिट कार्ड्स के जरिए रोजाना अरबों का लेनदेन हो रहा था.
जिस यूपीआई (UPI) के दम पर आज भारत दुनिया में नंबर 1 होने का दावा करता है, उसे बनाने वाली संस्था एनपीसीआई (NPCI) की स्थापना साल 2008 में ही कर दी गई थी और इसका पूरा आर्किटेक्चर पहले ही तैयार था.
8 नवंबर 2016 को बिना किसी तैयारी के लागू की गई तुगलकी ‘नोटबंदी’ की भयानक आर्थिक तबाही, जिसमें बेकसूर लोग लाइनों में मर गए और देश की जीडीपी को 2% का सीधा नुकसान हुआ, उसी विफलता और काले धन को वापस लाने के झूठे वादे को छिपाने के लिए सरकार ने मजबूरी में यूपीआई को अपनी राजनीतिक ढाल बना लिया.
सोलर क्षमता को 2.5 GW से बढ़ाकर 150+ GW करने का दावा भी कागजों पर तो चमकता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि भारत आज भी अपनी 70% से ज्यादा बिजली की जरूरतों के लिए प्रदूषण फैलाने वाले कोयले (Coal) पर ही निर्भर है.
भारत में सौर ऊर्जा की वास्तविक और नीतिगत शुरुआत साल 2010 में ‘जवाहरलाल नेहरू नेशनल सोलर मिशन’ के साथ 22,000 मेगावाट के लक्ष्य से हुई थी, जिसका मौजूदा सरकार ने सिर्फ नाम बदला.
इस सौर क्षमता के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि देश में लगे 80% से अधिक सोलर पैनल और सेल आज भी सीधे चीन (China) से आयात किए जा रहे हैं, जिससे हमारी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पूरी तरह बर्बाद हो गई है. मेक इन इंडिया का नारा लगाने वालों ने घरेलू उद्यमियों को दरकिनार कर पिछले कुछ सालों में चीन की कंपनियों की जेबें भरने के लिए अरबों डॉलर बाहर भेज दिए हैं.
पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग को 1.5% से बढ़ाकर 20% करने का दावा सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा (Food Security) और पर्यावरण के साथ एक खतरनाक खिलवाड़ है. एथेनॉल बनाने के लिए आज भारी मात्रा में गन्ने, मक्के और यहां तक कि भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों से मिलने वाले सब्सिडी वाले चावल जैसे खाद्यान्नों को डायवर्ट किया जा रहा है, जिससे देश में अन्न का संकट पैदा हो सकता है.
पूर्ववर्ती सरकारों की प्राथमिकता हमेशा देश के 140 करोड़ लोगों की खाद्य सुरक्षा और पेट भरना रही थी, लेकिन इस 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग की जिद के कारण देश का ग्राउंडवाटर (भूजल) खतरनाक स्तर पर दोहा जा रहा है क्योंकि गन्ने की खेती में बेहिसाब पानी लगता है.
जो अनाज इंसानों और मवेशियों के निवाले के काम आना चाहिए था, उसे गाड़ियों के ईंधन में जलाकर चंद बड़ी चीनी मिलों और कॉर्पोरेट घरानों को मोटा मुनाफा कमा कर दिया जा रहा है.
सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में 0 से 10+ यूनिट्स लगाने का दावा एक और बड़ा झूठ है, क्योंकि 2026 तक जिन 12 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है, उनमें से अधिकांश केवल पैकेजिंग, असेंबलिंग और टेस्टिंग (OSAT/ATMP) यूनिट्स हैं, जो असली चिप मैन्युफैक्चरिंग नहीं हैं.
धोलेरा में बन रहा एकमात्र वास्तविक फैब्रिकेशन प्लांट भी अभी व्यावसायिक उत्पादन से सालों दूर है और केवल कागजी दावों पर चल रहा है. सरकार केवल विदेशी और निजी कंपनियों (जैसे माइक्रोन, फॉक्सकॉन) को जनता के टैक्स का ₹76,000 करोड़ ‘सब्सिडी’ के तौर पर रेवड़ियों की तरह बांटकर यह झूठा माहौल बना रही है कि हम आत्मनिर्भर हो गए हैं.
भारत में जिस आईटी हब और चिप डिजाइनिंग के ईको-सिस्टम का फायदा आज ये कंपनियां उठा रही हैं, उसकी पूरी नींव तो दशकों पहले बेंगलुरु को ‘सिलिकॉन वैली’ बनाकर रख दी गई थी, जिसकी बदौलत आज देश सॉफ्टवेयर और डिजाइन में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है.
एक तरफ देश की गरीब और मध्यमवर्गीय जनता 12 साल से लगातार बढ़ती कमरतोड़ महंगाई की मार झेल रही है, जहां 2014 का ₹410 का घरेलू एलपीजी सिलेंडर आज ₹1000 पार है, पेट्रोल ₹100 के पार है और खाने का तेल, दालें, दवाइयां सब आम आदमी की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं.
दूसरी तरफ हमारे प्रधान सेवक करोड़ों रुपये के आलीशान वीवीआईपी बोइंग 777 विमानों में घूम रहे हैं, ₹20,000 करोड़ से अधिक के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत अपने लिए महल बनवा रहे हैं और रोज नए-नए विदेशी परिधानों में फोटोशूट करा रहे हैं.
24 घंटे काम करने का दावा करने वाली इस सरकार ने पिछले 12 सालों में महिलाओं, बुजुर्गों या बच्चों के लिए एक भी ऐसी दूरगामी और कल्याणकारी बुनियादी योजना लागू नहीं की जो पूर्ववर्ती मनरेगा (MGNREGA), शिक्षा का अधिकार (RTE) या खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) की बराबरी कर सके.
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