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क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
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क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को 'तोजो का कुत्ता' कहा था ?
क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में सुभाष चन्द्र बोस एक विशिष्ट व्यक्तित्व रहे हैं. साथ ही स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कम्युनिस्ट आंदोलन की धारा का उल्लेख काफी सम्मान के साथ किया जाता है — यह धारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर भी विद्यमान रही है.

स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में एक ओर नरमपंथी धारा के नेता थे — जैसे गोखले, बिंदु, सुरेन्द्रनाथ बन्द्योपाध्याय. ये सिर्फ कानूनी लड़ाई और बातचीत के मार्ग पर विश्वास रखते थे. दूसरी ओर चरमपंथी धारा थी — जो सशस्त्र आन्दोलन का पक्षधर थे. इन चरमपंथियों का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे कम्युनिस्ट विचारधारा में विलीन होकर वर्ग- संघर्ष और जनआन्दोलनों के मार्ग पर अग्रसर हुआ.

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सुभाष चन्द्र बोस इन दोनों धाराओं से अलग एक भिन्न मार्ग पर चले. यद्यपि वे कम्युनिस्ट नहीं थे, मगर स्वयं को वे वामपंथी मानते थे. अनेक अवसरों पर उन्होंने कम्युनिस्टों के जन-आन्दोलनों और मज़दूर- किसान संगठनों के प्रति सहानुभूति दिखाई; यहां तक कि उनके जीवन में मजदूर आन्दोलन से जुड़ने का भी इतिहास रहा है.

स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चन्द्र बोस और कम्युनिस्ट आन्दोलन दोनों का सम्मानपूर्वक उल्लेख होता है. सुभाष चन्द्र बोस कम्युनिस्ट न होते हुए भी किसी प्रकार से दक्षिणपंथी नहीं थे; व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक होते हुए भी वे पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष रहे और अपने आज़ाद हिन्द फौज का संचालन उसी विचारधारा के अनुरूप करते रहे. धर्मान्धता और हिन्दुत्ववाद के विरुद्ध उनका स्पष्ट रुख इतिहास में प्रखर रूप से दर्ज है.

इसलिए यह सवाल उठता है कि कम्युनिस्ट पार्टी सुभाष चन्द्र बोस को किस दृष्टि से देखती थी, इतिहास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है. इसी संदर्भ में विवाद उठता है — ‘कम्युनिस्ट पार्टी ने सुभाष चन्द्र बोस को ‘Tojo’s dog’ कहा था ?’ — इसका ऐतिहासिक सत्य प्रस्तुत करना जरूरी है.

1941 के बाद सीपीआई की जनयुद्ध की लाईन क्यों अपनाया ?

22 जून 1941 तक, जब हिटलर ने “Operation Barbarossa’ के माध्यम से सोवियत संघ पर आक्रमण आरम्भ किया, इसके पहले सीपीआई इस युद्ध को ‘साम्राज्यवादी युद्ध’ कहती थी, जो ब्रिटेन और जर्मनी के बीच थी— दोनों खेमे को साम्राज्यवादी माना जा रहा था; इसलिए उन्होंने किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं किया. उनका राय था कि यह केवल साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच उपनिवेश के लिए संघर्ष है.

परन्तु 22 जून के बाद उनकी नीति बदली और उन्होंने इस युद्ध को ‘जनयुद्ध’ घोषित कर दिया. उनके तर्क तीन प्रमुख थे. यह अब मात्र साम्राज्यवादी युद्ध नहीं रह गया; यह फासीवाद बनाम लोकतंत्र का संघर्ष बन चुका है. फासीवाद मानव सभ्यता का सबसे बड़ा शत्रु है. हिटलर ने जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित किया; Tojo की जापान ने चीन तथा कोरिया में नरसंहार किए. आज यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि पहले मित्रशक्तियों के साथ मिलकर फासीवाद को पराजित किया जाए, उसके पश्चात् ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष को रफ्तार दिया जाए.
इसी कारण सीपीआई का नारा था – Defeat Fascism First. इसलिए सीपीआई ने सुभाष चन्द्र बोस की नीति की निन्दा की थी.

सुभाष चन्द्र का रुख भिन्न था. वे यह मानते थे कि ‘The enemy of my enemy is my friend’ — यानि शत्रु के शत्रु अपना मित्र है. उनका तर्क था कि ब्रिटिश भारत के लिए मुख्य शत्रु हैं; अतः जापान अथवा जर्मनी की सहायता लेकर भी पहले ब्रिटिशों को हटाना आवश्यक है.

सुभाष चन्द्र स्वयं कहते थे: ‘देश को स्वतंत्र करने के लिए ज़रूरत पड़े तो शैतान से भी हाथ मिला लूंगा.’ यह उनके एकतरफा देशप्रेम का बयान था — जिसके उद्देश्य पर प्रश्न नहीं उठते थे. परन्तु सैद्धान्तिक तौर पर सीपीआई इस लाईन को स्वीकार नहीं कर सकी, क्योंकि उनके लिए फासीवाद वर्गीय शत्रु था. अतः सीपीआई के पत्र ‘जनयुद्ध’ में 1943–44 के कालखंड में INA के संबंध में जो शीर्षक दर्शाए गए, वे इस प्रकार हैं –

  • Japanese Quisling Army — 12 March 1944
  • Agents of Fascism — 18 June 1943
  • Traitors to the Nation — 5 Nov 1943
  • Fifth Columnists — 23 July 1943

हालांकि Tojo’s dog जैसे व्यक्तिगत अपमानजनक शब्दों का प्रयोग सीपीआई के किसी आधिकारिक लेख, पुस्तिका या प्रस्ताव में नहीं मिलता. तो Tojo’s dog कथन का वास्तविक स्रोत क्या है ?

कई लोगों को आश्चर्य होगा, पर सत्य यह है कि यह शब्द बंध पारिवारिक और निजी बातचीतों में कहा गया माना जाता है — विशेषकर सुभाष चन्द्र के बड़े भाई बैरिस्टर शरत चन्द्र बोस के मुंह से निकला माना जाता है.

इस संदर्भ में पारिवारिक स्रोत के रूप में प्रोफेसर सुगत बोस की पुस्तक उल्लेखनीय है. शरत चन्द्र के पुत्र शिशिर कुमार बोस के पुत्र, इतिहासकार सुगत बोस की पुस्तक ‘His Majesty’s Opponent’ (2011) के पृष्ठ 247–248 में लिखा है –

‘Sarat was deeply distressed by his brother’s decision to seek Axis help. He believed it compromised the moral basis of the Indian struggle. In private conversations in 1943 and 1944 Sarat Chandra Bose expressed his bitterness about his brother’s alliance with the Japanese. He is reported to have called Subhas ‘Tojo’s dog’ in anger.’

शरत चन्द्र बोस की राजनीतिक स्थिति

बैरिस्टर शरत चन्द्र कांग्रेस के गांधीवादी प्रवाह के नेता थे; वे कानूनी आन्दोलन और संवाद के पक्षधर थे. उन्हें जापानी सैन्य सहायता नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं थी. जैसे सीपीआई कुछ कारणों से इसे स्वीकार नहीं कर सकी, वैसे ही शरत चन्द्र भी कुछ नैतिक कारणों से इसे स्वीकार नहीं कर सके.

1941 में सुभाष चन्द्र के गृहरुद्ध अवस्था मे पलायन के समय वे दो कारणों से चिंतित थे: 1) यह भय था कि वे जापान के हाथ ‘कठपुतली सरकार’ बन सकते हैं; 2) चिंता थी कि ब्रिटिश उन्हें पकड़कर फांसी दे सकते हैं — इन्हीं चिंताओं में क्रोधवश उन्होंने ‘Tojo’s dog’ जैसा कथन कहा था, ऐसा माना जाता है. तथापि भाई के प्रति उनका स्नेह और समर्थन अंततः अटूट रहा.

पारिवारिक सम्बन्ध औचित्यपूर्ण रहे

शरत चन्द्र का भाई के प्रति गहरा स्नेह था; उनके बीच व्यक्तिगत वैमनस्य का कोई प्रमाण नहीं मिलता.

प्रमाण — शिशिर कुमार बोस की स्थिति

शिशिर कुमार बोस ने 16 जनवरी 1941 की रात सुभाष चन्द्र के गुप्त प्रस्थान के समय उन्हें वांडर्स वाहन में बिठाकर कोलकाता से गोमो स्टेशन तक पहुंचाया था. शिशिर के अनुसार शरत चन्द्र और सुभाष के मध्य कोई वैक्तिक कलह नहीं था.

‘is reported to have’ का आशय

इसका अर्थ यह है कि किसी लिखित पत्र या आधिकारिक अभिलेख में यह शब्द नहीं है; सुगत बोस ने यह जानकारी पारिवारिक स्रोतों से प्राप्त की थी.

क्या कम्युनिस्ट पार्टी में सुभाष चन्द्र के प्रति व्यक्तिगत वैमनस्य था ?

नहीं, भले ही सीपीआई सुभाष चन्द्र के विचार — ‘शैतान से भी हाथ मिलाना’ — से असहमत थी, पर वे कभी सुभाष चन्द्र की देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाते. सीपीआई ने केवल अपने वैचारिक विश्लेषण के आधार पर उस समझौते की तीव्र आलोचना की; व्यक्तिगत द्वेष का भाव नहीं था.

बाद में दक्षिणपन्थी प्रचारकों ने सीपीआई की आलोचना का मजाक उड़ाकर और उस पर तर्कहीन रोष जोड़कर यह झूठ फैलाया कि सीपीआई ने सुभाष चन्द्र को ‘Tojo’s dog’ कहा था.

क्या कामरेड भवानी सेन ने सुभाष चन्द्र को Tojo’s dog कहा था ?

नहीं, कमरेड भवानी सेन सीपीआई के एक नेता और ‘People’s War’ पत्रिका के संपादक थे. उन्होंने INA को ‘Japanese puppet’ और ‘Fascist agent’ कहा था; पर ‘Tojo’s dog’ जैसा वाक्य उनके किसी लेख में नहीं मिलता. यह बाद में दक्षिणपन्थी प्रचारकों द्वारा रचित कथा प्रतीत होती है, जिसका प्रयोग श्यामाप्रसाद मुखर्जी के समय की राजनीतिक असहमति के संदर्भ में भी किया गया और बाद में हिन्दुत्ववादी व बीजेपी प्रवर्तक इसे आगे बढ़ाते रहे.

सीपीआई का सुभाष चन्द्र या आज़ाद हिन्द फौज के प्रति राग-भाव न रखने का एक और प्रमाण:

द्वितीय विश्व युद्ध के समापन के पश्चात् 1945 में, जब ब्रिटिश सरकार ने आज़ाद हिन्द फौज के अधिकारियों के विरुद्ध लालकिले में मुकदमों का आरम्भ किया, तब सीपीआई ने देशव्यापी आन्दोलन खड़ा कर के आईएनए के अधिकारियों की रिहाई की मांग सबसे पहले उठाई. यदि सीपीआई के मन में सुभाष चन्द्र या आईएनए के प्रति कोई व्यक्तिगत वैमनस्य होता, तो वे यह कदम नहीं उठाते.

यह घटना सिद्ध करती है कि 1942–44 के दौरान सीपीआई की असहमति केवल वैचारिक और राजनीतिक थी, न कि निजी वैमनस्य; सीपीआई ने कभी सुभाष चन्द्र और आईएनए की देशभक्ति पर प्रश्न नहीं उठाया.

निष्कर्ष

ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है — नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ने आधिकारिक रूप से कभी सुभाष चन्द्र बोस को ‘Tojo’s dog’ नहीं कहा. न सीपीआई ने, न ही कामरेड भवानी सेन ने ऐसा कोई आधिकारिक शब्द प्रयोग किया. सीपीआई ने INA को ‘Quisling’ और ‘Fascist Agent’ कहा, जो उनके ‘People’s War’ लाईन का हिस्सा था. ‘Tojo’s dog’ कथन शरत चन्द्र बोस की पारिवारिक—व्यक्तिगत क्रोधपूर्ण टिप्पणी माना जाता है. बाद में anti-communist तथा दक्षिणपन्थी प्रवक्ताओं ने इस कथन को सीपीआई के खाते में डालने का प्रयत्न किया; वास्तविकता यह है कि वे स्वयं भी सुभाष चन्द्र के अननुरागी नहीं थे.

सुभाष चन्द्र बोस का देशप्रेम, त्याग और INA की बलिदानी गाथा किसी कम्युनिस्ट के लिए भी इस प्रकार के अपमानजनक वक्तव्य को जन्म नहीं दे सकती. इतिहास को तर्कशीलता से समझा जाना चाहिए, न कि उद्देश्यपरक मिथ्या और कलंक फैला कर.

  • सौरभ दत्त 

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