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राम बहादुर आजाद : शून्य से शिखर तक

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 12, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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राम बहादुर आजाद : शून्य से शिखर तक

आजाद राजीव रंजन, स्वतंत्र पत्रकार
वो खुद भी कहा करते थे कि उनके समय का विधायक, सांसद और नेता शायद ही कोई बचा है ! आजाद अपने जीवन के अंतिम काल में भी कहते थे कि ‘आज की राजनीति बदल गयी लेकिन मैं खुद को नहीं बदल पाया.’ वो कहते थे कि कभी उन्हें भी बदलने के लिए काफी लोगों ने प्रयास किया. काफी प्रलोभन दिया गया लेकिन मैं अपने को बदल नहीं पाया. मैं समाजवादी था और समाजवादी ही रह गया. शायद यही कारण रहा कि मैं वर्तमान की राजनीति में मिसफिट हो गया.’

समाजवादी चिंतक, लेखक, विचारक, प्रतिरोध की आवाज, जय प्रकाश आंदोलन के सेनानी और पूर्व विधायक 26 जनवरी, 2019 को रामबहादुर आजाद जी हमारे बीच नहीं रहे. उनके निधन के बाद खगडि़या में एक वैचारिक, राजनैतिक और सामाजिक शून्यता-सी हो गयी है. अपने 90 वर्ष से ज्यादा के जीवन काल में पूर्व विधायक ने लोहिया, जय प्रकाश नारायण का दामन कभी नहीं छोड़ा. उन्होंने कर्पूरी ठाकुर, मधु लिमये, चन्द्रशेखर, जार्ज फर्नांडीस के विचारों से कभी समझौता नहीं किया. जीवन के आखिरी समय में भी गांधीजी, जेपी, लोहिया, मधु लिमये, कर्पूरी ठाकुर, चन्द्रशेखर जैसे नेताओं की तस्वीरों, किताबों को अपने सिरहाने से नहीं हटाया। घर की दीवारों पर महान नेताओं की तस्वीरों ने हमेशा से उन्हें ऊर्जा प्रदान की. आखिरी वक्त तक अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के प्रति उनका प्रेम उनके टेबल, मेज और चौकी पर देखने को मिला. जहां नये-पुराने अखबार, पत्रिकाएं उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उपस्थित थे. आजाद हमेशा अपनी शर्त्तों पर जीवन जिये और ता-उम्र समाज हित, देश हित और राजनीति हित के लिए कार्य किया. उनका चिंतन हमेशा एक निश्चित दिशा में थी. मित्रों और परिजनों से नाराजगी की परवाह किये बिना उन्होंने सच कहने से कभी गुरेज नहीं किया. इसी का परिणाम था कि उनके दोस्त कम विरोधी ज्यादा थे.

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आजाद जी अपनी चर्चाओं के दौरान कहा करते थे, कि उन्हें उनके जन्म की निश्चित तिथि नहीं मालूम है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक उनका जन्म 1930 के आसपास हुआ था. ऐसे बिहार विधानसभा में उनके बारे में उपलब्ध जानकारी में उनकी जन्म की तिथि 5 फरवरी, 1934 अंकित है. रामबहादुर आजाद जी की सामाजिक एवं राजनैतिक यात्रा काफी कठिनाईयों से भरी हुई थी. उनके पूर्वज गंगा कटाव के कारण हीरा टोल (साहेबपुरकमाल, बेगूसराय) से निकलकर खगडि़या शहर आ गए थे, जहां संघर्षों के साथ उनका जीवन चलने लगा. मुश्किलों और कठिनाईयों के बीच उनकी समुचित पढ़ाई नहीं हो पायी और कम उम्र में उनकी शादी कनकलता देवी से हो गयी. उन दिनों वे खगडि़या में अवस्थित सोशलिस्ट पार्टी के सबडिविजनल ऑफिस जाने लगे.




आते-जाते वहां उन्होंने पार्टी दफ्तर में झाडू-पोंछा करना शुरू कर दिया. नेताओं के लिए बिछावन लगाना, साफ-सफाई करना उनका काम था. उन दिनों सोशलिस्ट पार्टी की बड़ी ताकत थी. धीरे-धीरे उन्होंने पार्टी का पर्चा-पोस्टर बांटना शुरू कर दिया. वो इन कामों में रमने लगे. बीतते समय के साथ वो स्थानीय नेताओं के साथ उठने-बैठने लगे और उन्हें कभी-कभी नेताओं के साथ चाय पीने का मौका मिलने लगा. उनके इस तरह के कामों को देखकर घर के लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि लड़का बैरी हो गया है. लोगों की चाकरी करने लगा है. जूठन उठाने और खाने लगा है. हालत यह थी कि परिवार के सभी सदस्य उनको लेकर उदास, हताश और निराश रहने लगे लेकिन आजाद तो अपनी धुन मेें थे.

इसी बीच उनके कामों को देखकर पार्टी ने उन्हें किताब और अखबार बांटने का आदेश दिया. किताब और अखबार बांटने से जहां उनके संपर्क का दायरा बढ़ता गया, वहीं थोड़ी बहुत आमदनी भी होने लगी. किताब अखबार बांटने के दौरान वो उन किताबों एवं अखबारों को थोड़ा-बहुत पढ़ना भी शुरू कर दिया. उस समय सोशलिस्ट पार्टी के सचिव जय प्रकाश नारायण थे. अब उनका मन पार्टी के कामों में और अधिक लगने लगा. पार्टी के कुछ नेताओं ने उनकी दिलचस्पी और सक्रियता को देखते हुए उन्हें पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने की सलाह दी. उनका फार्म भरा गया और उन्हें पार्टी से जोड़ा गया. सन् 1950 में सदस्यता लेने के बाद उन्होंने मन लगाकर पार्टी का काम करना आरंभ कर दिया. कुछ ही समय के बाद उनके काम के तरीकों को देखकर सभी नेता प्रसन्न रहने लगे और उनकी पहचान बढ़ने लगी. कुछ वरिष्ठ नेता उनसे कहते थेे कि ‘राम बहादुर तुम काफी एक्टिव और एनर्जेटिक लड़के हो, तुम पार्टी के स्थानीय सचिव पद के लिए स्टैंड करो.’ उस समय पार्टी का जिला मुख्यालय मुंगेर था. सचिव का चुनाव उन्होंने काफी मतों से जीत लिया और पार्टी के सेक्रेटरी हो गये.




कल तक जिस पार्टी के दफ्तर में वो साफ-सफाई करते थे, अब उस पार्टी के संचालन की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गयी. फिर क्या था, राजनीतिक में उनकी सक्रियता निरंतर बढ़ती चली गयी. पार्टी के बड़े नेताओं ने उनकी गतिविधि एवं नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उनकी जिम्मेदारियों में निरंतर बढ़ोत्तरी करने लगे. कपिलदेव सिंह, बाबू श्रीकृष्ण सिंह, बच्चू शास्त्री, राम नारायण चौधरी, त्रिपुरारी सिंह, रामजीवन सिंह जैसे नेताओं ने राजनीति के ककहरा सिखाने में काफी मदद की. इन्हीं नेताओें के मार्गदर्शन में राम बहादुर आजाद के राजनीति की धारा धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी थी. इसी बीच चंदे के पैसे से इन्होंने मुंगेर शहर के बीच चौराहे पर पार्टी का दफ्तर खोल दिया, जहां कार्यकर्त्ताओं के रहने और खाने-पीने का इंतजाम किया गया.

उसी दौरान उपेन्द्र वर्मा (जो बाद में मंत्री बने) को ऑफिस सेक्रेटरी के रूप में चुना गया. पार्टी की चिट्ठी-पत्री व अन्य कागजी काम उन्हीं को सौंपा गया. आजाद उस समय काफी व्यस्त रहने लगे. इसी बीच पार्टी ने 1952 में फैसला लिया कि बकास जमीन की लड़ाई लड़ी जाए. तब पार्टी के बड़े नेता एस. एम. जोशी, जॉर्ज फर्नांडीस, डा- मधु लिमये का एकाएक फरमान आया कि खगडि़या में तीन स्थानों पर सिकमी बट्टेदारी और जमींदारों के खिलाफ बड़े आंदोलन की तैयारी करो. यह आंदोलन शहर से कुछ दूर इमली के उखरोड़ा ग्राम में, सोनमनकी घाट के खैरी-खुटहा ग्राम में और चौथम के आदावारी ग्राम में चलाया जाना था. इनमें सबसे बड़ा आंदोलन खैरी खुटहा में किसान आंदोलन के तौर पर हुआ.




यहां किसानों को संगठित कर वहां के जमींदार रायबहादुर देवनंदन प्रसाद की पांच हजार बीघे जोत की जमीन को आजाद कराया. बटाईगिरी के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए खगडि़या सब डिविजन की इन तीनों जगहों को चुना गया था. खैरी-खुटहा शहर के तकरीबन 30 किलोमीटर दूर था. आने-जाने का कोई साधन नहीं था. सबसे पहले जमींदार देवनंदन प्रसाद के खिलाफ आजाद के नेतृत्व में मोर्चा खोला गया. वे मुंगेर के रहने वाले थे. उनके पास हजारों बीघा जमीन थी. वहां ज्यादातर लोग निम्न जाति के थे, जैसे-मुसहर, तियर, किराय आदि. पार्टी ने तय किया कि सबसे पहले जमींदारों के खिलाफ आंदोलन किया जाए. गरीब-गुरबा, शोषित-पीडि़त लोगों की आवाज को बुलंद करने के लिए आखिरकार पार्टी ने आजाद का डिप्यूटेशन वहीं कर दिया और निर्देश दिया कि उस लड़ाई का नेतृत्व तब तक करोगे, जब तक कोई संतोषजनक फैसला नहीं आ जाता. पार्टी ने आजाद के नेतृत्व पर भरोसा किया और आजाद वहां पहुंच गए.

वहां जाने के बाद पहले तो पूरे इलाके का भ्रमण किया. उन दिनों लाउडस्पीकर तो था नहीं, इसलिए ढ़़ोल-नगाड़े की मदद से ईलाके के लोगों के बीच यह संदेश दिया गया कि जमींदारों के खिलाफ उनकी जमीनों पर हमला बोलना है. जमींदारों की जमीन पर अब चढ़ाई होगी. किसानों से अपील की कि वे उनकी जमीन लूट अभियान का हिस्सा बनेें. सैकड़ों लोग कचिया, कुदाल और फावड़ा लेकर निकल पड़े. जब हमला बोला गया तो वहां की सारी फसलें कटवा दी. रायबहादुर के पुश्तैनी घर की एक-एक ईंट खोदकर निकाल ली गयी और उन्हीं ईंटों से सड़कें बनवा दीं. उनके ट्रैक्टर के पार्ट-पूर्जे खोलकर कोसी नदी में फेंकवा दिया गया. बड़ी संख्या में किसानों के जुटने के बाद हंगामा बरप गया. खबर मिलने के बाद भारी तादाद में पुलिस वहां पहुंच गयी. वहां के औरत-मर्द सभी गांव छोड़कर भागने लगे. पूरा ईलाका छावनी में तब्दील हो गया. आजाद जहां थे, वो वहीं रहे. भागे नहीं.




पार्टी का स्पष्ट निर्देश था कि जगह नहीं छोड़ना है. पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. पुलिस हाथ मेें हथकड़ी और कमर में रस्सी लगाकर वहां से 30 किलोमीटर पैदल उन्हें खगडि़या लेकर आई. पुलिस द्वारा भारतीय दंड संहिता, 395 के तहत डकैती और लूट का अभियुक्त बनाया गया. पहले आजाद को खगडि़या जेल में रखा गया. बाद में मुंगेर जेल शिफ्ट कर दिया गया, जहां काफी यातनाएं दी गयी. पार्टी के प्रयासों और तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के हस्तक्षेप के बाद उन्हें जेल में क्लास वन की फैसिलिटी मिल पायी. इस मामले में काफी प्रयास के बाद भी राम बहादुर आजाद की जमानत नहीं हो पा रही थी. सारे न्यायालय इनकी जमानत को खारिज कर रहे थे.

इसी दौरान जेल में उनसे मिलने लोहिया जी आए. पर जेल प्रशासन ने लोहिया जी को आजाद से मिलने नहीं दिया. लोहिया जी भी हठधर्मी थे. वहीं जेल के सामने धरने पर बैठ गये. आखिर प्रशासन ने शाम में लोहिया जी को आजाद से मिलने दिया. लोहिया जी ने आजाद से पूछा कि ‘आजाद तुम घबराते तो नहीं हो ? डर तो नहीं लगता ?’ आजाद ने हिम्मत बांधकर कहा कि ‘नहीं, बिल्कुल नहीं.’ उन्होंने आजाद जी की पीठ पर हाथ रखते हुए ढ़ाढ़स बंधाया और साथ लाई हुई मिठाई को आजाद के मुंह में डाल दिया. दो साल के पार्टी के प्रयास और तत्कालीन आईजी के हस्तक्षेप के बाद आजाद को जमानत मिली.

जेल से निकलने के बाद तो आजाद एक परिपक्व नेता बन चुके थे. उन्होंने स्थानीय स्तर पर रिक्शा वालों, टमटम चालकों, कुलियों आदि के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ना शुरू कर दिया था. वो छोटे-छोटे समूहों को एकत्रित करने लगे. अब वो एक मास लीडर के रूप में उभर चुके थे.




इसी बीच पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने का निर्देश दिया. उन दिनों मधेपुरा और सहरसा के भूपेंद्र नारायण मंडल, विनायक यादव, परमेश्वर कुंवर, भोला सिंह वगैरह पार्टी के सक्रिय नेताओं में से थे. 1962 में पार्टी ने खगडि़या विधानसभा से उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया. 1962 में आजाद पहली बार चुनावी मैदान में उतरे और चुनाव चिन्ह गाछ छाप था. इस चुनाव में वे कांग्रेस प्र्त्याशी से महज 2 हजार मतों से हार गये. आजाद चुनाव भले हार गये हों पर इस चुनाव ने उनके राजनीतिक कद और भी बड़ा बना दिया. पार्टी ने पुनः 1967 में उन्हें टिकट दिया.

उस समय उनके चुनाव अभियान के लिए मधु लिमये और डा. लोहिया आए. मधुजी को पार्टी ने उनके चुनाव प्रचार और भाषण के लिए डिप्यूटेशन कर दिया. उस समय खगडि़या में कोेई बड़ा मैदान नहीं था. गंडक के किनारे बड़ी चुनावी सभा आयोजित की गयी. सभा में काफी भीड़ थी. भीड़ देख के ही सभी बड़े नेताओं ने मुझे बधाई दी और कहा कि अब तुम्हें जीतने से कोई नहीं रोक सकता. सभी सीनियर नेताओं की बात सही हुई और मैं कांग्रेस के प्रत्याशी को एक बड़े अंतर से हरा दिया. इस चुनाव का सारा खर्च या तो पार्टी के बड़े नेताओं ने उठाया या फिर कार्यकर्त्ताओं ने आम जन के बूट पॉलिश करके इकट्ठा किया था.




इधर, बिहार की राजनीति काफी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही थी. कई सरकारें बनी और टूटी. कई लोग मुख्यमंत्री बने और हटे. इनमें कर्पूरी ठाकुर, भोला पासवान शास्त्री, बीपी मंडल, सतीश प्रसाद सिंह प्रमुख थे. इन आपा-धापी के बीच बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. पुनः 1969 में चुनाव की घोषणा हुई और उन्हें फिर से पार्टी ने चुनाव मैदान में उतारा. इस बार कांग्रेस पार्टी ने इनके खिलाफ एक मजबूत प्रत्याशी दिया. लेकिन जनता इस बार भी रामबहादुर आजाद के साथ थी और पुनः रामबहादुर आजाद एक बड़े अंतर से चुनाव जीत गये. इस जीत के बाद जो विजयी जुलूस निकला वो ऐतिहासिक था. इसी बीच हारे हुए प्रत्याशी ने आजाद के गले में माला डाल दिया, जिसके बाद आजाद ने वही माला वापस उनके गले में डाल दिया. आजाद ने उन्हें पैर छूकर प्रणाम किया और दोनों ने एक दूसरे का गले लगाया. इसी बीच 1972 में फिर से विधानसभा भंग हो गयी.

इसी बीच राजनीति चलती रही. जेपी आंदोलन में इन्होंने सक्रियता से भाग लिया. कई बार जेल भी गये. आजाद जेल सुधार समिति के सदस्य रहे तो मधु दंडवते ने रेलवे बोर्ड में जेडआरयूसीसी का मेंबर बना दिया. इसी बीच जार्ज ने भी उन्हें पोस्टल डिपार्टमेंट का मेंबर बनाया. इसके अलावे भी ये कई कमिटियों में थे.




सोशलिस्ट पार्टियां देश में कई हिस्सों में बंट गयी थी. सभी बड़े नेता अपनी डफली, अपना राग अलाप रहे थे. समाजवादियों को एकजुट करने की काफी कोशिशें हुई पर सफलता नहीं मिली. आजाद की राजनीति अंत में आकर चन्द्रशेखर जी के साथ सिमट गयी. चन्द्रशेखर जी जब तक सक्रिय रहे आजाद भी समाजवादी जनता पार्टी द्वारा राजनीति में सक्रिय रहे. चन्द्रशेखर जी की मौत के बाद जहां पार्टी निष्क्रिय हो गयी, वहीं रामबहादुर आजाद भी स्वघोषित राजनीति से सन्यास ले लिया. उम्र के साथ शरीर ने भी साथ देना छोड़ दिया. इसके बाद भी लिखने-पढ़ने, सामाजिक एवं राजनैतिक गतिविधियों में इनकी रूचि बनी रही.

अपने अंत समय तक भी ये देश-दुनिया की खबरों की पूरी जानकारी रखते थे और उस पर गंभीर चर्चा करते थे. बढ़ती उम्र के साथ उनके साथ के लोग कम होते चले गए. वो खुद भी कहा करते थे कि उनके समय का विधायक, सांसद और नेता शायद ही कोई बचा है ! आजाद अपने जीवन के अंतिम काल में भी कहते थे कि ‘आज की राजनीति बदल गयी लेकिन मैं खुद को नहीं बदल पाया.’ वो कहते थे कि कभी उन्हें भी बदलने के लिए काफी लोगों ने प्रयास किया. काफी प्रलोभन दिया गया लेकिन मैं अपने को बदल नहीं पाया. मैं समाजवादी था और समाजवादी ही रह गया. शायद यही कारण रहा कि मैं वर्तमान की राजनीति में मिसफिट हो गया.’




अब रामबहादुर आजाद हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी राजनीति ने हमें जरूर यह बताया कि पूर्व की राजनीति में एक आम कार्यकर्ता भी शून्य से शिखर तक पहुंच सकता था. नेता जीत और हार के बाद भी रिश्ते बनाकर रखते थे. विचारों और सिद्धांतों की प्राथमिकता थी. धनबल, बाहुबल और जाति का बल नहीं था. कार्यकर्त्ता पार्टी की आत्मा हुआ करती थी. हर पार्टी में एक लोकतंत्र था. पर अब शायद भारतीय राजनीति का पुराना चेहरा बदल गया है. इन बदलते परिदृश्य में कुछ लोग अपने को एडजस्ट नहीं कर पाये, उनमें रामबहादुर आजाद भी एक थे.

26 जनवरी 2019 को उनके निधन के पूर्व तक वो देश, दुनिया, समाज और अपने चाहने वालों की खोज-खबर लिया करते थे. उनके पास उम्र के अनुसार काफी अनुभव था. कई किस्से थे, कई संस्मरण था. उनकी स्मरण शक्ति कमाल की थी. 60-70 वर्ष पुरानी बातों, व्यक्तियों, कार्यों के बारे में वो चर्चा किया करते थे. उन्होंने अपनी जिन्दगी भरपुर तरीके से जिया. आज वो जहां हों लेकिन सदा हमारे दिलों में रहेंगे.

(रामबहादुर आजाद जी के साथ हुई चर्चाओं, बातचीत और विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार किया गया आलेख)




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Tags: किसान आंदोलनराम बहादुर आजाद
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