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माओवादी नेतृत्व में बदलाव : कितनी उम्मीद, कितनी बेमानी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 11, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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माओवादी नेतृत्व में बदलाव : कितनी उम्मीद, कितनी बेमानी (बायें) पूर्व महासचिव गणपति और (दांयें ) नये महासचिव बासवराज

21 सितम्बर 2004 में, सीपीआई (एमएल) (पीपुल्स वार) और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) का विलय हुआ और सीपीआई (माओवादी) बनी. समृद्ध विचाराधात्मक और राजनीतिक लाईन पर आधारित यह विलय भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन में एक बड़ा छलांग साबित हुआ. यह विकास भारत के क्रांतिकारी इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ.

सीपीआई माओवादी ने अपनी पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की घोषणा केन्द्रीय कमेटी के प्रवक्ता का. अभय ने 10 नवंबर, 2018 को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कर दी है. अपनी प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए बताया कि फरवरी, 2017 में सीपीआई माओवादी की केन्द्रीय कमेटी की 5वीं बैठक में नये महासचिव का चुनाव हुआ था. प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार का. गणपति ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान गिरते स्वास्थ्य, बढ़ती उम्र और केंद्रीय कमेटी की मजबूती के लक्ष्य और भविष्य को देखते हुए महासचिव के पद और जिम्मेदारियों से स्वैच्छिक अवकाश तथा उनकी जगह दूसरे का. को महासचिव का पद व जिम्मेदारियों को सौंपने का प्रस्ताव रखा. केंद्रीय कमेटी की पांचवीं मीटिंग में इस प्रस्ताव पर विचार-विमर्श कर इसे स्वीकृत करते हुए का. बासवराजू (नम्बल्ला केशव राव) को महासचिव के रूप में चयनित किया गया.




का. गणपति को सीपीआई (एमएल) (पीपुल्स वार) के महासचिव के रूप में जून 1992 में चयनित किया गया था, वह वक्त पार्टी के लिए मुश्किलों से भरा था. का. गणपति 1991 में आंध्र प्रदेश सरकार पार्टी को कुचलने का दूसरा चरण शुरू कर चुकी थी. उस वक्त पार्टी को सशस्त्र संघर्ष को उन्नत करने की कार्यनीति को लागू करने से लेकर कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था. उस वक्त केंद्रीय कमेटी के सचिव कोंडापल्ली सीतारमैया व उनके नेतृत्वाधीन कमेटी उन चुनौतियों से निपटने की स्थिति में नहीं थी, जो पार्टी सामना कर रही थी. ऐसी स्थिति में सभी पार्टी कतारों तथा जनता पर आधारित हो कर उन चुनौतियों का सामना करने के बजाय सीतारमैया और केंद्रीय कमेटी के एक सदस्य ने षड़यंत्रपूर्ण पद्धतियां अपनायी और पार्टी के लिए आंतरिक संकट का कारण बने.

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पर पूरी पार्टी कतारों ने, इने-गिने अवसरवादियों के गुट जो पार्टी को विभाजित करने चाहते थे, उसके खिलाफ सैद्धांतिक संघर्ष चलाने के लिए एकजूट हो गए. इस अवसर पर केंद्रीय कमेटी के युवा नेतृत्व ने पार्टी को इस आंतरिक संकट से निकालने का जो तरीका अपनाया, वह पूरी पार्टी के लिए एक अच्छा शिक्षा अभियान साबित हुआ और पार्टी कार्यशैली को चुस्त-दुरुस्त किया. पूरी पार्टी विचारधारात्मक और राजनीतिक स्तर पर विकसित हुई. मुख्य रूप से केंद्रीय कमेटी में सामूहिक नेतृत्व व सामूहिक टीम संचालन की शैली विकसित हुई. का. गणपति ने केंद्रीय कमेटी के इस क्रांतिकारी पहल में एक महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी नेतृत्व की भूमिका निभाई. इस प्रक्रिया में पूरी पार्टी एक साथ उठ खड़ी हुई, षड़यंत्रकारियों को मात दी और खुद को जनवादी केंद्रीयता के कसौटी पर खड़े होकर चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किया. इस स्थिति में केंद्रीय कमेटी, जो एक सामूहिक नेतृत्व के रूप में विकसित हुई, ने का. गणपति को अपना नया महासचिव के रुप में चयन किया.




1995 में, हमने यानी सीपीआई (एमएल) (पीपुल्स वार) ने ऑल इंडिया स्पेशल कांफ्रेंस आयोजित किया और पार्टी लाइन को समृद्ध किया। इस कांफ्रेंस में नई केंद्रीय कमेटी को चुना गया. नई केंद्रीय कमेटी ने पुनः का. गणपति को महासचिव चुना. अगस्त 1998 में, सीपीआई (एमएल) (पीपुल्स वार) और सीपीआई (एमएल) (पार्टी यूनिटी) का विलय हो कर सीपीआई (एमएल) (पीपुल्स वार) बना. इस विकास के साथ-साथ पार्टी ने अपने क्षेत्र को कई राज्यों में विस्तार किया और पूर्व की तुलना में और ज्यादा भारतीय चरित्र हासिल किया. इस अवसर पर बनी नयी केंद्रीय कमेटी ने का. गणपति को ही पार्टी के महासचिव के रुप में चयन किया. 2 दिसम्बर 2000 को अपने सामरिक लाइन व नीति को विकसित किया और पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी बनाया गया.

भूतपूर्व सीपीआई (एमएल) (पीपुल्स वार) की 9वीं कांग्रेस 2001 में हुई, जिसके फलस्वरुप पार्टी के राजनीतिक, सामरिक और सांगठनिक लाइन को और समृद्ध किया गया. उक्त कांग्रेस ने भारत की ठोस परिस्थिति में दीर्घकालीन जनयुद्ध की रणनीति को व्यवहार में लागू करने के एक अंश के बतौर गुरिल्ला आधार (बेस) की स्थापना करने का जैसा कुछ नयी चीजें को सामने लाया. पार्टी ने सेन्ट्रल मिलिटरी कमीशन के नेतृत्व में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी बनाने तथा साथ ही पीपुल्स वार और स्टेट पावर के बीच अंतर्संबंध पर बल देने के लिए प्रोत्साहित किया. यहां नयी केंद्रीय कमेटी ने एक बार फिर का. गणपति को पार्टी महासचिव के बतौर चयन किए.




21 सितम्बर 2004 में, सीपीआई (एमएल) (पीपुल्स वार) और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) का विलय हुआ और सीपीआई (माओवादी) बनी. समृद्ध विचाराधात्मक और राजनीतिक लाईन पर आधारित यह विलय भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन में एक बड़ा छलांग साबित हुआ. यह विकास भारत के क्रांतिकारी इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ. यह विकास पार्टी को और मजबूत तथा और विस्तारित किया. दोनों पार्टियों की गुरिल्ला आर्मी का भी आपस में विलय हुआ और एक मजबूत पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी का गठन हुआ. 2004 तक देश के कई क्रांतिकारी समूह और व्यक्ति जो छोटी-छोटी इकाई के रूप में थे, वे सभी उस समय के दो मुख्य धारा एमसीसीआई और सीपीआई (एमएल) (पीपुल्स वार) में उस समय तक विलय हो चुके थे. ये दो मुख्यधारा विलय होकर सीपीआई (माओवादी) बन कर एक महाधारा के रुप में विकसित हुई.

नक्सलबाड़ी पीढ़ी के कई नेता जिन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई थी और जिनके पास समृद्ध अनुभव था, वे भी इस पार्टी के गठन प्रक्रिया में शामिल हुए. ऐसे नेतृत्व व कैडरों से समृद्ध पार्टी की केंद्रीय कमेटी ने का. गणपति को महासचिव के रूप में चुना. 2007 में आयोजित एकता कांग्रेस-9वीं कांग्रेस में सर्वसम्मति से इन्हें पार्टी महासचिव के बतौर चयन किया गया. एकता कांग्रेस-9वीं कांग्रेस के बाद, केंद्रीय कमिटी के नेतृत्व में आंदोलन ने नयी ऊंचाईयों को छुआ. विकास की इस प्रक्रिया में हम कह सकते हैं कि 2013 के अंत तक सीपीआई (एमएल) (नक्सलबाड़ी) और सीपीआई (माओवादी) के विलय के साथ भारतीय क्रांतिकारी पार्टी की एकीकरण की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी.

का. गणपति के पार्टी महासचिव के बतौर अपने दायित्व को निभाते समय यानी 25 वर्षों की अवधि (1992-2017) के दौरान, केंद्रीय नेतृत्व द्वारा जारी आंदोलन ने कई उतार-चढ़ाव का सामना करते हुए अग्रगति हासिल किया. पार्टी भी तीव्र व तीखा वर्ग-संघर्ष की आग में तपी-तपायी यानी फौलादी बनी. इसने दुश्मनों के प्रतिक्रांतिकारी हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए क्रांतिकारी कतार और क्रांतिकारी जनता को एक दृढ़ सर्वहारा नेतृत्व मुहैया किया.




इस प्रक्रिया में, का. गणपति ने पूर्व की भांति केंद्रीय कमेटी और पूरी पार्टी को और शक्तिशाली करने के लिए सारी शक्ति व योग्यता को समर्पित कर देने के साथ गिरते स्वास्थ्य व बढ़ती उम्र के कारण खुद को महासचिव के पद व दायित्व से अवकाश ले रहे हैं. इस कारण केंद्रीय कमेटी ने का. बासवराजू (नम्बल्ला केशव राव) को महासचिव नियुक्त किया. का. बासवराजू पार्टी के विभिन्न कमेटी के सचिव के रूप में साढ़े तीन दशक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य के बतौर 27 वर्ष तथा पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य के बतौर 18 वर्ष तक पार्टी की अग्रिम पंक्ति में रहकर अपना सफल नेतृत्व प्रदान करते आए हैं. वे मुख्य रूप से सेंट्रल मिलिट्री कमिशन के प्रभारी के बतौर जारी जनयुद्ध की अग्रगति करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं.

विशेष तौर पर कहा जाए तो 1992 के बाद सामूहिक नेतृत्व के उत्थान से वे केंद्रीय कमेटी के प्रमुख कामरेडों में से एक के बतौर महासचिव के जैसा प्रोन्नति किये. दरअसल पूरी पार्टी को विकास करने की प्रक्रिया के एक अंश के बतौर ही केंद्रीय कमेटी में उक्त बदलाव किया गया. इन बदलावों ने केंद्रीय कमेटी को और ज्यादा मजबूत करेगा.




केंद्रीय कमेटी वादा करती है कि वे पार्टी के सभी स्तर-कतार और क्रांतिकारी जनता को पार्टी के सांगठनिक सिद्धांतों-जनवादी केंद्रीयता व आत्मआलोचना-आलोचना के सिद्धांत के कार्यान्वयन में पूरे अटल और दृढ़ रहेंगे तथा पूरी पार्टी के सभी स्तर व कतार और क्रांतिकारी जनता को सामूहिक केंद्रीय नेतृत्व प्रदान करेंगे जन लाइन व वर्ग लाइन के आधार पर दुश्मन द्वारा जारी ‘समाधान’ के नाम पर फासीवादी रणनीति के अधीन प्रतिक्रांतिकारी आक्रामक कार्यवाही को चकनाचूर करेंगे. जनता को जनयुद्ध में शामिल करेंगे तथा देश भर में नई जनवादी क्रांति को सफल करने के लिए सर्वहारा वर्ग के हिरावल दस्ता के बतौर सामूहिक केंद्रीय नेतृत्व प्रदान करेंगे.

अब देखना यह है कि सीपीआई माओवादी में हुए नेतृत्व परिवर्तन के बाद उसकी अगली रणनीति में क्या बदलाव आता है ? माओवादी ताकतों में केवल बढ़ोतरी होती है अथवा माओवादी जिस क्रांति की बात करते हैं वह अंजाम तक पहुंचती है अथवा नहीं ? क्या आदिवासियों और देश की मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव आ पाता है अथवा नहीं ? लेकिन इन सब सवालों से इतर एक महत्वपूर्ण बात जो है वह यह कि माओवादियों के बतौर देश भर में बने अलग-अलग खेमे एक साथ विलय करके एक झंडे के नीचे एकत्र हो गये हैं, जिससे उन लोगों की बीच की आपसी कलह और उससें होने वाली भ्रम का बादल छंट गया है. इसके साथ ही देश में एक साथ दो सत्ता उठ खड़ी हो गई. भारत सरकार की सत्ता, जो औद्यौगिक घरानों, दलाल पूंजीपतियों-जमींदारों की लठैत है तो दूसरी माओवादियों की सत्ता, जो देश के जनमानस, आदिवासी, दलितों, पिछड़ों, प्रगतिशील ताकतों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है.

  • मनीष ठाकुर





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