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‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जो सत्ता की तामाम विफलताओं पर पानी फेर दे, हर राजनैतिक पार्टी के नेता को किंकर्तव्यविमूढ़ बना दे.

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 13, 2019
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‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जो सत्ता की तामाम विफलताओं पर पानी फेर दे, हर राजनैतिक पार्टी के नेता को किंकर्तव्यविमूढ़ बना दे.

Vinay Oswalविनय ओसवाल, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
यह लेख भाजपा विरोधियों के 2019 में सत्ता में आने की संभावनाओं या न आने पर नहीं बल्कि इस विषय पर केंद्रित है कि भाजपा और उसके नेताओं के प्रति पिछले पांच सालों में मतदाताओं के एक बड़े वर्ग की मानसिकता में इतना प्रेम कैसे उपज गया कि उसका तार्किक विरोध भी उन्हें चुभने लगा है ? पूर्ण बहुमत के साथ पांच साल पूरे कर चुकी भाजपा सरकार मतदाताओं को वो क्या-क्या नहीं दे सकी, जिसके सपने 2014 में दिखाकर वह सत्ता में आई थी, वह इसका मूल्यांकन क्यों नही करना चाहता ? इस मूल विषय पर ही विचार करना होगा.

वर्ष 2014 में मतदाताओं ने सत्ता के बदलाव के हक़ में मतदान किया था, 2019 में वह सत्ता को बनाये रखने – न रखने पर मतदान करेंगे.

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भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कर्ज के बोझ से कराहते किसान आदि-आदि समस्याओं से जूझ रहे देश में 2014 में चुनी हुई सरकार कितना बदलाव ला सकी ? प्रमुख टीवी चैनल, अंग्रेजी व अन्य भाषायी अखबार आदि सभी ने अपने अपने व्यावसायिक हित में जितना उचित समझा, पूरे पांच साल अपने-अपने तरीके से परोसा या नहीं परोसा. इस के अलावा सोशल मीडिया पर हर आम-और-खास अपने ‘मन की बात’ का इजहार भी खुल कर करते रहे हैं.

यूं तो सौ सालों से परन्तु विशेष रूप से 70 सालों से युवाओं के अपरिपक्व मस्तिष्क की अवस्था से ही आरएसएस उसमें “राष्ट्र/देश प्रेम“ के बीज बोने और उसे फसल उगाने लायक बनाने का दुःसाध्य प्रयोग कर रही है. यह कोई गुप-चुप तरीके से नहीं, खूब ढोल-नगाड़ों के साथ किया जाने वाला कार्य है, जिस पर, सभी पार्टियां, लोकतन्त्र में ‘विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार की स्वतंत्रता’ का समर्थक दिखने के नाम पर आंखें मूंदे रही. कांग्रेस भी. कांग्रेस का विशेष उल्लेख इसलिए कि किसी अन्य राजनैतिक गठबंधनों के शासनकाल की तुलना में उसका या उसके गठबन्धन का शासन सर्वाधिक अवधि के लिए रहा है.

कांग्रेस की पहली सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल से लेकर आपातकाल के अलावा भी ऐसे अवसर आये है, जब कांग्रेस सरकारों ने आरएसएस की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के प्रयास किये, पर आरएसएस की गतिविधियां पर यह अंकुश निष्प्रभावी ही रही. शायद आरएसएस का अस्तित्व समाप्त करना कभी कांग्रेस का गम्भीर उद्देश्य रहा भी नहीं. कांग्रेस ही नही तमाम भाजपा विरोधी पार्टियां आज अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए एड़ियां रगड़ती नजर आ रही हैं. वो पार्टियां भी जो कभी भाजपा विरोधी होने के दावों के बावजूद, उसकी सरकार बनाने में अपना कंधा दे चुकी हैं. और इसीलिए मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है. कांग्रेस, वामपंथियों और हाल ही में अस्तित्व में आई ‘आप’ को छोड़ कर आज देश में कौन सी पार्टी है जिसका अतीत इस मामले में साफ-सुथरा है ?




यह लेख भाजपा विरोधियों के 2019 में सत्ता में आने की संभावनाओं या न आने पर नहीं बल्कि इस विषय पर केंद्रित है कि भाजपा और उसके नेताओं के प्रति पिछले पांच सालों में मतदाताओं के एक बड़े वर्ग की मानसिकता में इतना प्रेम कैसे उपज गया कि उसका तार्किक विरोध भी उन्हें चुभने लगा है ? पूर्ण बहुमत के साथ पांच साल पूरे कर चुकी भाजपा सरकार मतदाताओं को वो क्या-क्या नहीं दे सकी, जिसके सपने 2014 में दिखाकर वह सत्ता में आई थी, वह इसका मूल्यांकन क्यों नही करना चाहता ? इस मूल विषय पर ही विचार करना होगा.




युवाओं के अपरिपक्व मस्तिष्क की अवस्था से ही आरएसएस उसमें ‘देश/राष्ट्र प्रेम’ के बीज बोने और फसल उगाने लायक बनाने का दुःसाध्य प्रयोग एक लम्बे समय से कर रही है. आज उसे लगता है उसकी ‘हाड़-तोड़’ मेहनत अपना रंग दिखा रही है. आज भाजपा के खेमें में इतनी संख्या में युवा और अन्य मतदाता हैं कि वह तामाम मोर्चों पर विफलताओं के बावजूद दुबारा सत्ता की बागडोर सम्भालने की ओर पूरे आत्मविश्वास से आगे बढ़ती दिखने का यत्न कर रही है, जिसका एक मात्र श्रेय आरएसएस को ही जाता है.

70 सत्तर सालों से (यूं तो अपनी स्थापना के समय से) आरएसएस समाज के निम्न शिक्षित से उच्च शिक्षित और आर्थिक रूप से विपन्न से लेकर सम्पन्न वर्ग के बीच, चाहे वे हिंदुस्तान के किसी भी क्षेत्र में बसते हों, किसी भी जातीय वर्ग से आते हों जीवन-यापन करने के लिए कुछ भी करते हो या किसी भी भारतीय उपासना पद्धति के मानने वाले हों, के बीच काम कर रही है. उनकी सामाजिक परिस्थितियों, विषमताओं समस्याओं को समझने और उनके संघर्ष में उनका साथी बनने या होने का एहसास कराने का हर सम्भव प्रयास कर रही है. आज उसके संगठनों का जाल इतना विस्तृत है कि खुद आरएसएस के किसी स्वयंसेवक के लिए उसकी पूरी जानकारी रखना सम्भव नहीं है.




सामाज में अपनी इस गहरी पैठ के चलते लोगां के अचेतन मस्तिष्क में आरएसएस ने राष्ट्र प्रेम, जिसे वह देश प्रेम ही समझता है, के प्रति एक अजीब-सा लगाव और इसके साथ ही भाजपा विरोधियों के प्रति एक अजीब सी नफरत पैदा कर दी है. ऐसी नफरत जो एक पुलवामा और उसके जबाब में सर्जिकल स्ट्राइक के घटित होने पर देश के सामने मुंहबाये खड़े तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारी पड़ जाय. सत्ता की तामाम विफलताओं पर पानी फेर दे. देश में हर राजनैतिक पार्टी के नेताओं को किंकर्तव्यविमूढ़ बना दे.

बीते वर्ष के नवम्बर माह में देश की राजधानी की सड़कों पर अयोध्या में विवादित स्थल पर ही ‘राम मंदिर’ बनाने में विफल सरकार की गर्दन पर हाथ डालने के लिये भीड़ जमा करनेवाली आरएसएस का मुखिया मात्र दो माह बाद कुम्भ मेले में आयोजित ‘धर्म संसद’ में उसी विवादित-स्थल पर ‘राम मंदिर’ निर्माण मुद्दे को बिना कोई तार्किक कारण बताए ठण्डे बस्ते के हवाले कर दे ? ऐसा करते देख कर मेरे मन में तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे थे, जिनके जबाब पिछले माह ताबड़तोड़ घटे घटनाक्रमों से मिल गया, यह दावा तो मैं नही कर सकता पर फरवरी माह में घटे घटनाक्रम नया प्रश्न तो जरूर खडा कर गया.




नया प्रश्न की आरएसएस के मुखिया को फरवरी में घटनेवाले घटनाक्रमों का क्या पूर्वानुमान हो गया था ? क्या वे पूर्ण आश्वस्त हो गए थे कि निकट भविष्य में घटने वाली घटनाएं, चुनाव से पूर्व सरकार की विफलताओं, राफेल घोटाले के आरोप में फंसी सरकार के खिलाफ बनते माहौल आदि-आदि पर पानी फेर देगा ?

सच्चाई जो भी हो, पर हक़ीक़त यही है कि देशप्रेम की आंधी में ऐसे अनगिनत प्रश्न जड़ से उखड़कर दूर जा पड़े हैं और निर्जीव से जान पड़ने लगे हैं.
आरएसएस को आखिरकार अपना लक्ष्य हासिल करने में अपेक्षित सफलता मिल गयी, जिसका गम्भीर मूल्यांकन कभी किसी राजनैतिक पार्टी ने नहीं किया.




30 सालों में तैयार हुए मतदाताओं की मानसिकता में एक जबरदस्त बदलाव मैंने नोट किया है : ‘अब वे अपने दिमागी खेतों की जमीन पर बीज बोने वालों को फसल भी काटने देंगे’. जिस विचारधारा विशेष के लोगों ने उनके दिमाग की जमीन को पिछले एक शताब्दी में इस लायक बनाया, उसी के हक़ में वह अपना मतदान करेंगे.

इन सब के लिए दोषी मतदाता नहीं है. हर राजनैतिक पार्टीयों के कर्ता-धर्ता हैं जो उसी समाज के दुःख-दर्द का साथी बनने से परहेज करते रहे, जो चुनावों में उन्हें जीताता रहा है. अविश्वसनीय-सा लगता है कि वही जिताने वाला समाज अपने बीच से उन्हें ही जड़ से उखाड़ फेंकेगा और उनकी जगह एक अर्से से राजनैतिक अछूत बने लोगों को बिठा लेगा. भले ही ऐसा लगे इनकी संख्या बहुत नहीं है, पर इतनी कम भी नही है कि कोई दूसरा राजनैतिक गठबन्धन इन्हें सत्ता से बे-दखल कर दे.




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Tags: किसानदेश प्रेमभाजपाभ्रष्टाचारयुवा
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