Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जो सत्ता की तामाम विफलताओं पर पानी फेर दे, हर राजनैतिक पार्टी के नेता को किंकर्तव्यविमूढ़ बना दे.

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 13, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जो सत्ता की तामाम विफलताओं पर पानी फेर दे, हर राजनैतिक पार्टी के नेता को किंकर्तव्यविमूढ़ बना दे.

Vinay Oswalविनय ओसवाल, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
यह लेख भाजपा विरोधियों के 2019 में सत्ता में आने की संभावनाओं या न आने पर नहीं बल्कि इस विषय पर केंद्रित है कि भाजपा और उसके नेताओं के प्रति पिछले पांच सालों में मतदाताओं के एक बड़े वर्ग की मानसिकता में इतना प्रेम कैसे उपज गया कि उसका तार्किक विरोध भी उन्हें चुभने लगा है ? पूर्ण बहुमत के साथ पांच साल पूरे कर चुकी भाजपा सरकार मतदाताओं को वो क्या-क्या नहीं दे सकी, जिसके सपने 2014 में दिखाकर वह सत्ता में आई थी, वह इसका मूल्यांकन क्यों नही करना चाहता ? इस मूल विषय पर ही विचार करना होगा.

वर्ष 2014 में मतदाताओं ने सत्ता के बदलाव के हक़ में मतदान किया था, 2019 में वह सत्ता को बनाये रखने – न रखने पर मतदान करेंगे.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कर्ज के बोझ से कराहते किसान आदि-आदि समस्याओं से जूझ रहे देश में 2014 में चुनी हुई सरकार कितना बदलाव ला सकी ? प्रमुख टीवी चैनल, अंग्रेजी व अन्य भाषायी अखबार आदि सभी ने अपने अपने व्यावसायिक हित में जितना उचित समझा, पूरे पांच साल अपने-अपने तरीके से परोसा या नहीं परोसा. इस के अलावा सोशल मीडिया पर हर आम-और-खास अपने ‘मन की बात’ का इजहार भी खुल कर करते रहे हैं.

यूं तो सौ सालों से परन्तु विशेष रूप से 70 सालों से युवाओं के अपरिपक्व मस्तिष्क की अवस्था से ही आरएसएस उसमें “राष्ट्र/देश प्रेम“ के बीज बोने और उसे फसल उगाने लायक बनाने का दुःसाध्य प्रयोग कर रही है. यह कोई गुप-चुप तरीके से नहीं, खूब ढोल-नगाड़ों के साथ किया जाने वाला कार्य है, जिस पर, सभी पार्टियां, लोकतन्त्र में ‘विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार की स्वतंत्रता’ का समर्थक दिखने के नाम पर आंखें मूंदे रही. कांग्रेस भी. कांग्रेस का विशेष उल्लेख इसलिए कि किसी अन्य राजनैतिक गठबंधनों के शासनकाल की तुलना में उसका या उसके गठबन्धन का शासन सर्वाधिक अवधि के लिए रहा है.

कांग्रेस की पहली सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल से लेकर आपातकाल के अलावा भी ऐसे अवसर आये है, जब कांग्रेस सरकारों ने आरएसएस की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के प्रयास किये, पर आरएसएस की गतिविधियां पर यह अंकुश निष्प्रभावी ही रही. शायद आरएसएस का अस्तित्व समाप्त करना कभी कांग्रेस का गम्भीर उद्देश्य रहा भी नहीं. कांग्रेस ही नही तमाम भाजपा विरोधी पार्टियां आज अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए एड़ियां रगड़ती नजर आ रही हैं. वो पार्टियां भी जो कभी भाजपा विरोधी होने के दावों के बावजूद, उसकी सरकार बनाने में अपना कंधा दे चुकी हैं. और इसीलिए मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है. कांग्रेस, वामपंथियों और हाल ही में अस्तित्व में आई ‘आप’ को छोड़ कर आज देश में कौन सी पार्टी है जिसका अतीत इस मामले में साफ-सुथरा है ?




यह लेख भाजपा विरोधियों के 2019 में सत्ता में आने की संभावनाओं या न आने पर नहीं बल्कि इस विषय पर केंद्रित है कि भाजपा और उसके नेताओं के प्रति पिछले पांच सालों में मतदाताओं के एक बड़े वर्ग की मानसिकता में इतना प्रेम कैसे उपज गया कि उसका तार्किक विरोध भी उन्हें चुभने लगा है ? पूर्ण बहुमत के साथ पांच साल पूरे कर चुकी भाजपा सरकार मतदाताओं को वो क्या-क्या नहीं दे सकी, जिसके सपने 2014 में दिखाकर वह सत्ता में आई थी, वह इसका मूल्यांकन क्यों नही करना चाहता ? इस मूल विषय पर ही विचार करना होगा.




युवाओं के अपरिपक्व मस्तिष्क की अवस्था से ही आरएसएस उसमें ‘देश/राष्ट्र प्रेम’ के बीज बोने और फसल उगाने लायक बनाने का दुःसाध्य प्रयोग एक लम्बे समय से कर रही है. आज उसे लगता है उसकी ‘हाड़-तोड़’ मेहनत अपना रंग दिखा रही है. आज भाजपा के खेमें में इतनी संख्या में युवा और अन्य मतदाता हैं कि वह तामाम मोर्चों पर विफलताओं के बावजूद दुबारा सत्ता की बागडोर सम्भालने की ओर पूरे आत्मविश्वास से आगे बढ़ती दिखने का यत्न कर रही है, जिसका एक मात्र श्रेय आरएसएस को ही जाता है.

70 सत्तर सालों से (यूं तो अपनी स्थापना के समय से) आरएसएस समाज के निम्न शिक्षित से उच्च शिक्षित और आर्थिक रूप से विपन्न से लेकर सम्पन्न वर्ग के बीच, चाहे वे हिंदुस्तान के किसी भी क्षेत्र में बसते हों, किसी भी जातीय वर्ग से आते हों जीवन-यापन करने के लिए कुछ भी करते हो या किसी भी भारतीय उपासना पद्धति के मानने वाले हों, के बीच काम कर रही है. उनकी सामाजिक परिस्थितियों, विषमताओं समस्याओं को समझने और उनके संघर्ष में उनका साथी बनने या होने का एहसास कराने का हर सम्भव प्रयास कर रही है. आज उसके संगठनों का जाल इतना विस्तृत है कि खुद आरएसएस के किसी स्वयंसेवक के लिए उसकी पूरी जानकारी रखना सम्भव नहीं है.




सामाज में अपनी इस गहरी पैठ के चलते लोगां के अचेतन मस्तिष्क में आरएसएस ने राष्ट्र प्रेम, जिसे वह देश प्रेम ही समझता है, के प्रति एक अजीब-सा लगाव और इसके साथ ही भाजपा विरोधियों के प्रति एक अजीब सी नफरत पैदा कर दी है. ऐसी नफरत जो एक पुलवामा और उसके जबाब में सर्जिकल स्ट्राइक के घटित होने पर देश के सामने मुंहबाये खड़े तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारी पड़ जाय. सत्ता की तामाम विफलताओं पर पानी फेर दे. देश में हर राजनैतिक पार्टी के नेताओं को किंकर्तव्यविमूढ़ बना दे.

बीते वर्ष के नवम्बर माह में देश की राजधानी की सड़कों पर अयोध्या में विवादित स्थल पर ही ‘राम मंदिर’ बनाने में विफल सरकार की गर्दन पर हाथ डालने के लिये भीड़ जमा करनेवाली आरएसएस का मुखिया मात्र दो माह बाद कुम्भ मेले में आयोजित ‘धर्म संसद’ में उसी विवादित-स्थल पर ‘राम मंदिर’ निर्माण मुद्दे को बिना कोई तार्किक कारण बताए ठण्डे बस्ते के हवाले कर दे ? ऐसा करते देख कर मेरे मन में तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे थे, जिनके जबाब पिछले माह ताबड़तोड़ घटे घटनाक्रमों से मिल गया, यह दावा तो मैं नही कर सकता पर फरवरी माह में घटे घटनाक्रम नया प्रश्न तो जरूर खडा कर गया.




नया प्रश्न की आरएसएस के मुखिया को फरवरी में घटनेवाले घटनाक्रमों का क्या पूर्वानुमान हो गया था ? क्या वे पूर्ण आश्वस्त हो गए थे कि निकट भविष्य में घटने वाली घटनाएं, चुनाव से पूर्व सरकार की विफलताओं, राफेल घोटाले के आरोप में फंसी सरकार के खिलाफ बनते माहौल आदि-आदि पर पानी फेर देगा ?

सच्चाई जो भी हो, पर हक़ीक़त यही है कि देशप्रेम की आंधी में ऐसे अनगिनत प्रश्न जड़ से उखड़कर दूर जा पड़े हैं और निर्जीव से जान पड़ने लगे हैं.
आरएसएस को आखिरकार अपना लक्ष्य हासिल करने में अपेक्षित सफलता मिल गयी, जिसका गम्भीर मूल्यांकन कभी किसी राजनैतिक पार्टी ने नहीं किया.




30 सालों में तैयार हुए मतदाताओं की मानसिकता में एक जबरदस्त बदलाव मैंने नोट किया है : ‘अब वे अपने दिमागी खेतों की जमीन पर बीज बोने वालों को फसल भी काटने देंगे’. जिस विचारधारा विशेष के लोगों ने उनके दिमाग की जमीन को पिछले एक शताब्दी में इस लायक बनाया, उसी के हक़ में वह अपना मतदान करेंगे.

इन सब के लिए दोषी मतदाता नहीं है. हर राजनैतिक पार्टीयों के कर्ता-धर्ता हैं जो उसी समाज के दुःख-दर्द का साथी बनने से परहेज करते रहे, जो चुनावों में उन्हें जीताता रहा है. अविश्वसनीय-सा लगता है कि वही जिताने वाला समाज अपने बीच से उन्हें ही जड़ से उखाड़ फेंकेगा और उनकी जगह एक अर्से से राजनैतिक अछूत बने लोगों को बिठा लेगा. भले ही ऐसा लगे इनकी संख्या बहुत नहीं है, पर इतनी कम भी नही है कि कोई दूसरा राजनैतिक गठबन्धन इन्हें सत्ता से बे-दखल कर दे.




Read Also –

किसानों को उल्लू बनाने के लिए बहुत ज़रूरी हैं राष्ट्रवाद के नारे
लाशों का व्यापारी, वोटों का तस्कर
ख़बरों के घमासान में ग़रीब, मज़दूर की जगह कहां ?
भार‍तीय संविधान और लोकतंत्र : कितना जनतांत्रिक ?





[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]



Tags: किसानदेश प्रेमभाजपाभ्रष्टाचारयुवा
Previous Post

शुक्रिया इमरान ! भारत में चुनावी तिथि घोषित कराने के लिए

Next Post

मोदी की ‘विनम्रता’ !

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

मोदी की 'विनम्रता' !

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

कार्पोरेटाइजेशन का विरोध यानी देशभक्ति पर धब्बा

December 22, 2020

आदिवासी तबाही की ओर

August 24, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

March 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

March 7, 2026

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.