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हमारी पार्टियों के लिए बेरोज़गारी कोई मुद्दा है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 23, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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हमारी पार्टियों के लिए बेरोज़गारी कोई मुद्दा है ?

Ravish Kumarरविश कुमार

2019 के चुनाव में बेरोजगारी की बात बहुत हो रही है, मगर इस पर न तो सरकार की तरफ से कुछ ठोस आ रहा है और न ही विपक्ष की तरफ से. पक्ष और विपक्ष की उदासीनता के बीच बेरोजगारों को भी समझ नहीं आ रहा है कि वे अपने मुद्दों का क्या करें. 20 मार्च के इंडियन एक्सप्रेस में जे मजूमदार की खबर छपी है. इस खबर के अनुसार वर्क फोर्स यानी काम करने वालों की तादाद में तेजी से गिरावट आई है. पांच साल पहले की तुलना में इस वक्त कम लोग काम पर लगे हुए हैं. 1993-94 के बाद पहली बार आई कार्य बल में गिरावट आई है. एनएसएसओ ने 2017-18 के लिए पेरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे किया था, यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है.

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इसके अनुसार 2012-13 में पुरुषों का वर्क फोर्स यानी कार्य बल 30.4 करोड़ था जो 2017-18 में घटकर 28.6 करोड़ हो गया. मर्दों के वर्क फोर्स में इतनी गिरावट 1993-94 के बाद पहली बार देखी गई है. गांवों में पुरुषों के कार्य बल में 6.4 प्रतिशत की गिरावट है. यह काफी है. शहरों में 4.7 फीसदी है. आपको याद होगा कि यह रिपोर्ट सरकार जब जारी नहीं कर रही थी तब इसके विरोध में पिछले साल दिसंबर में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कार्यवाहक चेयरमैन पी. सी. मोहन और अन्य सदस्य जेवी मीनाक्षी ने इस्तीफा दे दिया था. इस डेटा के अनुसार 4 करोड़ से अधिक रोजगार खत्म हुआ है. 2011-12 से 2017-18 के बीच. बेरोजगारी कितनी भयावह हो गई होगी आप समझ सकते हैं.




क्या इस वक्त बेरोजगारी पर बहस नहीं होनी चाहिए. सिर्फ कांग्रेस बीजेपी करने के लिए नहीं, बल्कि हमने क्या ऐसा किया जिससे बेरोजगारी इतनी भयावह हो गई और क्या ऐसा करने वाले हैं, क्या हमारे राजनीतिक दलों के पास वाकई कोई ऐसा आइडिया है जिससे लगे कि बेरोजगारी को लेकर कोई समाधान निकल सकता है. यह सवाल अगर हल्के में नहीं लिया गया तो अगले पांच सालों के लिए बेरोजगार खुद के साथ नाइंसाफी करेंगे. बेरोजगारों और नौजवानों को सभी नेताओं को मजबूर करना होगा कि वे बेरोजगारी के सवाल पर आएं. अपना ब्लूप्रिंट बताएं.

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनमी के महेश व्यास बेरोजगारी के आंकड़े पर लगातार लिखते रहते हैं. महेश व्यास ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा कि बेरोजगारी की दर उन युवाओं में अधिक है जो छठी से लेकर स्नातक हैं. जो बिल्कुल पढ़े-लिखे नहीं हैं, उन्हें काम मिल जा रहा है. महेश व्यास ने बताया है कि बीए और एमए पास करने वाले युवाओं के बीच सितंबर से दिसंबर 2018 के बीच बेरोजगारी की दर 13.2 प्रतिशत हो गई थीं. एक साल पहले यह दर 12.1 प्रतिशत थी. 10वीं और 12वीं पास करने वाले नौजवानों के बीच बेरोजगारी की दर 10.6 प्रतिशत है. नौजवानों को काम नहीं मिल रहा है इस कारण उन्होंने काम की तलाश भी छोड़ दी है. इसलिए भारत में लेबर पार्टिशिपेशन रेट बहुत कम है. मात्र 43 प्रतिशत. हमारे सहयोगी सोहित मिश्र ने महेश व्यास से बात की है.




आप हिन्दी अखबार पढ़ते होंगे, चैनल देखते होंगे क्या उनमें ऐसी जानकारियां दी जाती हैं. एक सवाल यह भी है. क्या बेरोजगारों से संबंधित अध्ययनों को मीडिया की रिपोर्ट से गायब किया जा रहा है. आप जानते हैं कि रेलवे में पिछले दिनों ग्रुप डी और लोको पायलट की भर्ती परीक्षा हुई. दि वायर के पत्रकार अरुण दास ने बताया है कि रेलवे में हेल्पर बनने के लिए बीए पास और एमए पास नौजवानों ने भी अप्लाई किया है. जबकि पात्रता मात्र 10वीं की थी. 82 लाख उम्मीदवार उच्च शिक्षा प्राप्त थे. कोई इंजीनियर है, कोई साइंस में स्नातक है, कोई कॉमर्स में स्नातक है तो किसी के पास मैनेजमेंट की डिग्री लिए हुए हैं. करीब 17 लाख उम्मीदवार ही ऐसे थे जिनके पास सिर्प 10वीं की योग्यता थी. रेलवे ने दावा किया था कि 2 करोड़ आवेदन आए थे.

ये हालत है. पढ़े लिखे लोगों के लिए रोजगार नहीं है. हर दिन बेरोजगारों के मैसेज आते हैं. कायदे से इस मुद्दे पर गंभीर बहस होनी चाहिए थी. इस चुनाव में जो मुद्दे हैं उनका बेरोजगारी से कोई संबंध नहीं लगता है, लेकिन इस स्थिति से कब तक बचा जा सकेगा. हमने 19 मार्च के प्राइम टाइम में दिखाया था कि बलिया के एक प्राइमरी स्कूल को इस तरह से रंगा गया है कि वह बीजेपी के झंडे की तरह दिखाई देने लगा है. स्थानीय अखबारों में भी खबर छपी थी. आज हम नई तस्वीर दिखा रहे हैं. एक ही दिन में स्कूल का रंग बदल गया है. सफेद रंग की इमारत हो गई है और हरे रंग का बॉर्डर है. अधिकारियों को बधाई. इसी तरह की सक्रियता अन्य मामलों में भी अपेक्षित है.




वापस लौटते हैं नौकरी के सवाल पर. कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां नौजवान सरकारी नौकरी के लिए धरना प्रदर्शन पर नहीं बैठा है. यूपी में 69000 शिक्षकों की बहाली का मामला है. आए दिन नौजवान मैसेज करते रहते हैं. लगता ही नहीं है, उन्हें किसी और मुद्दे की पड़ी है. हर दिन मैसेज भेजते हैं, आप इनकी परेशानी का अंदाजा लगाइए. बल्कि इन 69000 के बीच जाकर सर्वे कीजिए कि कौन नेता लोकप्रिय है, दो सेकेंड में रिजल्ट पता चल जाएगा. यह तस्वीर हमें बंगाल के छात्रों ने भेजी है. पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा सेवा आयोग के बाहर ये लोग 28 फरवरी से भूख हड़ताल पर हैं. 21 दिन से ये बारी-बारी से हड़ताल कर रहे हैं. मैसेज भेजने वाले ने बताया कि 60 से ज्यादा शिक्षक भूख हड़ताल के कारण अस्पताल में भर्ती हुए हैं.

पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग के पैनल में इन सभी का नाम है. इन्होंने राज्य स्तरीय परीक्षा पास की थी. 2012 के बाद से शिक्षकों की बहाली नहीं हुई है. ये चाहते हैं कि जितने भी शिक्षक वेटिंग लिस्ट में हैं उन सबकी नियुक्ति हो. हर इंटरव्यू से पहले वैकेंसी को अपडेट किया जाए. एक सीट पर 14 लोगों को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाए. यही समस्या बिहार में है. एस टेट के शिक्षकों की डिग्री ही लैप्स कर गई. सब टीवी पर हिन्दू मुस्लिम और कश्मीर के डिबेट में उलझे रह गए और नौकरी की पात्रता समाप्त हो गई. इनका कहना है कि मीडिया का कवरेज नहीं हो रहा है पर इनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि ये लोग जब न्यूज चैनल देखते हैं तो क्या देखते हैं? क्या वे ऐसी खबरों को गंभीरता से और सबसे पहले पढ़ते हैं?




चुनाव के समय दो तरह की लड़ाई चलती है. राजनीतिक दल चाहते हैं कि उनके बनाए मुद्दे पर जनता को हांक लिया जाए. जनता अपने मुद्दों को लेकर यहां वहां भटकती रह जाती है. वह हर दिन न्यूज चैनलों की बहस को अपने मुद्दे समझ कर देखती है और जब अपना मुद्दा समझ आता है तब वह व्हाट्स एप नंबर ढूंढती है. आज व्हाट्स एप मैसेज आए हैं. एक मैसेज खजुराहों से आया है.

श्नमस्कार, मोदी जी चैकीदार की बात करते हैं. हम लोगों की हालत भुखमरी की बनी हुई है. हम लोग मध्यप्रदेश में खजुराहों भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में दैनिक श्रमिक के रूप में काम करते हैं. पिछले पांच महीने से कोई वेतन नहीं मिला है. अफसरों की तानाशाही बनी है. होली के त्योहार में भी हम दैनिक श्रमिकों के पास एक फूटी कौड़ी नहीं है. मैं बिहार से हूं, लेकिन पैसे न मिलने के कारण घर नहीं जा पाया.श्श्

पांच-पांच महीने से जहां वेतन नहीं मिला है, हमें ऐसे कई मैसेज मिलते हैं. पता नहीं ये लोग किस उम्मीद में हमें मैसेज करते हैं. बिहार से आज एक शिक्षिका का मैसेज आया कि मैं बिहार बांका जिले से हूं. मैं मिडिल स्कूल में टीचर हूं. हम लोगों को पिछले 5 महीने से सैलरी नहीं आई है. घर चलाना मुश्किल हो रहा है. आपसे रिक्वेस्ट है कि प्राइम टाइम में इस मैटर को दिखाए.




इस कैटगरी के पौने तीन लाख शिक्षक हैं. मैसेज भेजने के बाद इनका एक और मैसेज आया कि अभी-अभी दो महीने का वेतन आ गया है. तो इसी तरह से इनका जीवन कटता है. नियोजित शिक्षकों को भी कई महीनों से वेतन नहीं मिला है. शुक्र है कि ये सब मुद्दे नहीं हैं. वर्ना आप पूछ रहे होते कि बताओ खुश कौन है. एक पूरी सूची बन सकती है कि किन-किन विभागों में 5 महीने से सैलरी नहीं मिली है.

फिर इन लोगों का एक सर्वे हो सकता है कि ये मीडिया में क्या देखना पसंद करते हैं. क्या अपनी तकलीफ को लेकर ईमानदार हैं या फिर उन सपनों में खो जाते हैं जो कहीं और किसी कारखाने में तय किए जाते हैं. ये कहानियां बताती हैं कि असल में सरकारें चल कैसे रही हैं. इन मुद्दों के कारण बहुत कुछ सीखने को मिलता है. जैसे मुझे नहीं पता था कि इंडियन इंजीनियरिंग सर्विसेज की परीक्षा में कंप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग करने वाले छात्र भाग नहीं ले सकते. वे इसके लिए योग्य नहीं माने जाते हैं. मैंने खुद से चेक नहीं किया है, लेकिन एक छात्र ने गुजारिश की है.

(प्रस्तुत आलेख रविश कुमार के ब्लाॅग से साभार ली गई है)




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